We will also do evil in Hindi Comedy stories by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | हम भी बुराई करेंगे

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हम भी बुराई करेंगे

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आजकल एक फैशन हो गया है ,बुराई करने का।

 कोई दिक्कत नहीं । परसाई जी कहते हैं खाने के पूर्व और खाने के दो घंटे बाद प्रतिदिन निंदा रसपान से स्वास्थ्य और हाजमा सही रहता है।

 परन्तु परसाई जी के समय बुराई के बड़े शास्त्रीय विषय होते थे यथा किस की लड़की किसके साथ भागी, कौन कितना रिश्वतखोर है, किसने रचना चुराकर अपने नाम से छपवाई, या राशन का गेहूं ब्लैक में बेच रिया है ,बहुत हुआ तो अमरीकी अन्न बेहद दोयम दर्जे का है, बस।

 लेकिन आजकल बुराई ,इसे आलोचना जैसा सौन्दर्यशास्त्रीय नाम नहीं दे सकते।क्योंकि वह अलग विषय हो जाएगा।

 तो बुराई प्रारंभ होती है सीधे सरकार से। फिर कोई अधिक ही है तो प्रधानमंत्री से कम उतरता ही नहीं।

एक कवि थे, जी हां, आखिर उनका भी उद्धार हो ही गया , जब देखो तब प्रधानमंत्री की हर बात की बुराई और हंसी उड़ाते अपनी फूहड़ कविताओं और टपोरी जैसे चेहरे से। उनका इससे पहले का सफर मात्र सौ में से बीस फीसदी था लेकिन प्रधानमंत्री की बुराई या मजाक कर करके वह नब्बे तक पहुंचे। कोई दिक्कत नहीं रोटी कमाओ। लेकिन जब बाहर के देशों और खासकर मुस्लिम देशों में जब उसने देश और प्रधानमंत्री पर फूहड़,हैश मजाक किए तो वह अलग ही मामला हो गया। सुनते है किसी ने केस वेस कर दिया और अब चक्कर लगा रहे कोर्ट के।

             तो दुबे जी ने सबक सीखा और कभी अपने से ऊंचे हैसियत वाले की बुराई अपरोक्ष नहीं की। मिले, रामा श्यामा हुई ही थी कि बोले, "एक राज की बात बताएं? "

हमने देखा कि राज की बात बताने पर मुंह सिकुड़ कर बिल जैसा हो जाता है और आंखे बिल्ली जैसी।

   "अरे बताओ,वही सुनने तो आएं हैं बंधु", इत्मीनान से बैठते हुए हम बोले।

 "वह जो साला गुप्ता है न ,वह.."

कौनसा गुप्ता? तीन हैं ।बिजली वाला,परचूनी वाला और एक शिक्षक।

 

"बिजली वाला गुप्ता,अब समझे !! तो वह गुप्ता नहीं है।"

 हमने उनकी तरफ देखा,कहीं दिमाग तो नहीं फिर गया?

वह फिर बोले ,"सच कह रहा हूं ।वह गुप्ता जो है गुप्ता है ही नहीं।"

अरे क्या बकवास कर रहे हो? ,-हमसे रहा नहीं गया, "भांग चढ़ाकर आए हो क्या? गुप्ता ,गुप्ता नहीं है? क्या तुक इस बात की?"

वह रुके,चारों ओर देखा फिर धीमी आवाज में बोले, "वह वो है। वह सच में वह नहीं जो दिखता है। मुझे तो शुरू से ही उसका रंग देखकर शक हुआ था। "

कुछ समझे हम कि यह कोई और बात बिना संदर्भ के कर रहे हैं।

" दुबे भाई, जो कहना चाह रहे उसे अब नहीं बोला तो हम चले ।"

    "वह वंचित वर्ग में आता है। कोई ऊंची जाति का नहीं है... कहकर ऐसे देखा जैसे पेट का अल्सर निकल गया हो।

धत्त तेरे की। यह भी कोई खबर है? अब तो हमें उससे ईर्ष्या हो रही है। कोई हमें भी बामन से वंचित बना दे। 

"हैं!! क्या बात कर रहे हो पाण्डेय जी? कुछ तो अपनी ऊंची जाति का ख्याल करो।"

अरे खाक ख्याल रखें? कुछ मिला नहीं उल्टा छीन और लिया। तीनो बच्चे योग्य होते हुए भी बेरोजगार बैठे हैं। एक, इंजीनियर बना था बड़ी मेहनत से।जमकर मेहनत की , महंगी से महंगी कोचिंग दिलाई।कठिन परीक्षा दी जेईई प्रथम और द्वितीय राउंड। तब नंबर आया वह भी दूर के इंजिनियरिंग कॉलेज में।जबकि सभी कोटे वाले अच्छी ब्रांच और बड़े सरकारी कॉलेज पा गए। यह बीच वाला बेटा अठ्ठासी फीसदी अंक बारहवीं में लाने के बाद भी पीछे का पीछे।लॉ कर रहा, बेरोजगारों की आखिरी पनाह। बड़े की फीस,रहना खाना,आना जाना चार साल तक किया। उसके बाद इंटरव्यू के तीन राउंड हुए। सभी सिफारिशियों को अच्छी कम्पनी मिली।इन जैसे सामान्य वर्ग को आखिर राउंड में थर्ड क्लास कंपनी ने जॉब ऑफर किया,वह भी दूसरे शहर में। क्या करते ? नहीं लेते तो यह भी नहीं मिलता। और काम क्या ? फाइल और अन्य जगहों से डेटा की एंट्री करना और तुलना करना। यानि जो आपने,मैंने क्लर्की की,वैसे काम।

सुबह नौ बजे जाता है और शाम आठ बजे लौटता है। 

  क्या जिंदगी हो गई है हमारी? लगता है ईश्वर भी हमसे गिन गिनके बदले ले रहा। वह बीच वाला एक जगह मुंशीगिरी कर रहा लॉ करने के बाद। छोटा वाला इनका हाल देख पहले ही हथियार डाल चुका। कह रहा दुकान करेगा मोबाइल रिपेयरिंग की।

   दुबे जी ऐसे सुनते रहे मानो सकते में आ गए हो। फिर हाथ पर हाथ रखकर बोले,"हिम्मत धरों।वह सब देख रहा।कुछ करेगा जरूर।"

   अरे यह हम अपने बचपन से सुनते आ रहे। कछु न हुओ। हम जवान हुए, क्लर्क बने और अब दो बरस बाद रिटायर्ड हो जाएंगे। कुछ भी फर्क नहीं आया। जिंदगी का कोल्हू वही है, बैल बदल गया। पिताजी की जगह हम आ गए और अब हमारी जगह हमारे बच्चे। क्या कोई ऊपर है भी?

कहते हुए ऊपर वाले की घनघोर बुराई शुरु।

           दरअसल अनिश्चितता ही जिंदगी की धुरी है। यदि सब कुछ एकदम से तय हो हुआ कर सामने रख दिया जाए मनुष्य के तो क्या हो?

सारी गड़बड़ियां और बेइमानी एक साथ हो जाए।गिनती के पांच प्रतिशत लोग सारे अच्छे अवसर हथिया लें और आम व्यक्ति वहीं का वहीं। तो यह परमात्मा की परीक्षा प्रणाली है जिसमें कोई पेपर लीक भी नहीं होता। कुछ लोग दावा जरूर करते हैं भगवान, अल्लाह, गॉड के एजेंट होने का पर वह होते नहीं। क्योंकि वह स्वयं हर एक के लिए जिंदगी का प्रश्नपत्र तैयार करके उसे फूलप्रूफ तकनीक से उस व्यक्ति के जन्म से ही उसके साथ बांध देता है। वह परीक्षा व्यक्ति की ,हर वर्ष नहीं होती बल्कि हर दिन,हर सप्ताह होती है। और उसमें पास फेल का भी हर बालक से बुजर्ग तक,स्त्री से पुरुष तक को पता चल जाता है।

                  "क्या कोई रास्ता है परीक्षक को खुश करने का या कुछ प्रश्नों को पहले जानने का?"

 अब यार,तुम हद से आगे जा रहे। अभी ऊपर वाले की बुराई कर रहे थे।और अब उसे ही रिश्वत देने की सोच रहे? क्या समझ रखा है खुद को... कांग्रेस या सपा या...?

      "हे हे हे!! " कहते उन्होंने वहां से विदा ली। 

निंदक नियरे राखिये को इस देश में लगता है बहुत गंभीरता से ले लिया गया है।हर व्यक्ति किसी न किसी की बुराई में व्यस्त है। कुछ नहीं तो सरकार से लेकर ट्रंप,खुमैनी,पुतिन, जेलेंस्की तक की। 

कभी ऐसा भी हो जाए तो कितना अच्छा हो कि हर व्यक्ति कम से कम दिन में एक बार अपनी भी सार्वजनिक बुराई करे। फिर क्षमा भी मांगे तो क्या बढ़िया हो!!

" मैने अपने अहंकार के लिए स्त्रियों पर बुर्का,हिजाब अनिवार्य करके उन्हें आधुनिक विश्व में हंसी का पात्र बना दिया। मुझे अल्लाह और आप सभी क्षमा करें।"

   "मैंने हथियार विक्रेताओं,टीवी न्यूज़ चैनल और शेयर मार्केट से अरबों खरबों की कमाई के लिए गल्फ वार,रूस,यूक्रेन वार को हवा दी। ऊपर से उन्हें शांत करवाने के नाम पर खुद की वाह वाही की असफल कोशिश की। मुझे क्षमा करे पूरा विश्व।"

      "मैंने सत्ता के लिए देश की अस्मिता,एकता और भाईचारे को विदेशों तक में सुनियोजित ढंग से बदनाम किया। आजादी के बाद से आज तक खास वर्गों को आज तक वोट बैंक समझा। उन्हें अशिक्षित,हाशिए पर ही रहने दिया।मुझे तो कड़ा दंड मिलना चाहिए। (यह चार पांच नेताओं ने कहा)।

    " हमारे मन में अभी भी यही है कि इस देश को धर्म विशेष का ही बना दें। इंशा अल्लाह,आंकड़ों से बढ़ती जनसंख्या से हम दो हजार पचास तक बहुसंख्यक हो जाएंगे। भले ही हमारी औरतें,बच्चियां मरती रहें बीमारी से हमारे नौजवान अशिक्षित रह जाएं।"

        "और हम लेखक भी पाले बदलेंगे तो हमें कोई माफ नहीं करें। हम सत्ता भोगी हो गए हैं। जबकि हमें बिल्कुल सीधे वंचितों, कठिनाइयों और गलत फैसलों पर बोलना चाहिए।अपने ही संगठन के खिलाफ ।"

       यह जो सोच रहे हो न,यह कभी नहीं होगा। उल्टे तुम्हे ही पागल करार देकर बंद कर देंगे ।इसलिए दूसरों की कमियां देखो,उन्हें फिजूल के मुद्दों में उलझाओ और मस्ती से राज करते रहो।

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(डॉ. संदीप अवस्थी 

(आपका व्यंग्य संग्रह "जालिम स्त्रियों के बीच पुरुष " बहुत चर्चा में है इन दिनों। अमेज़न,फ्लिपकार्ट,इंडिया नेटबुक्स से मंगवाया जा सकता है)

804,विजय सरिता एंक्लेव

बी ब्लॉक,पंचशील,अजमेर

305004,राजस्थान।

मो 7737407061)