मेरे घर का रास्ता
इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा, जो अपने घर का रास्ता भूल सके।
बचपन में हम जिस जगह रहते हैं, वहाँ के रास्ते, गलियाँ और छोटी-छोटी पहचानें हमारे मन में इस तरह बस जाती हैं कि हम उन्हें चाहकर भी भूल नहीं पाते। चाहे हम जीवन में कितनी ही दूर क्यों न चले जाएँ, अपने घर का रास्ता हमारी यादों में कहीं न कहीं हमेशा जीवित रहता है।
घर का रास्ता केवल वह रास्ता नहीं होता, जो हमें एक जगह से दूसरी जगह तक पहुँचाता है। वह हमारी पहचान होता है। वह हमारे हृदय में बसा हुआ वह अपनापन होता है, जिसकी ओर मन बार-बार लौटना चाहता है।
मुझे अपने बचपन की एक घटना आज भी याद है।
जब मैं लगभग छह वर्ष की थी, तब मैं अपनी मम्मी के साथ कहीं गई थी। वहाँ बहुत अधिक भीड़ थी। बस स्टैंड पर लोगों की भीड़ के बीच मैं अपनी मम्मी से अलग हो गई। हमारा घर बस स्टैंड से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर था।
उस समय मुझे लगा कि मेरी मम्मी मेरे साथ हैं, लेकिन कुछ देर बाद जब मैंने ध्यान से देखा, तो मम्मी मेरे पास नहीं थीं।
मैं घबरा गई।
मम्मी को भी उस समय पता नहीं चल पाया था कि मैं उनके साथ घर नहीं पहुँची हूँ। मेरे सामने कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो मुझे घर तक पहुँचाता।
लेकिन उस छोटी-सी उम्र में मैंने अपने मन पर विश्वास किया।
मैंने अपने अंतरमन से पूछा और उन रास्तों को याद करने की कोशिश की, जिनसे मैं अपनी मम्मी के साथ घर आया-जाया करती थी।
मैं उसी रास्ते पर चल पड़ी।
छह वर्ष की वह छोटी-सी बच्ची अपनी परिस्थितियों से डरकर रुक नहीं गई। उसने अपने मन पर विश्वास किया और धीरे-धीरे उस राह पर चलती रही, जो उसे उसके घर तक ले गई।
और आखिरकार मैं अपने घर पहुँच गई।
आज जब मैं उस घटना को याद करती हूँ, तो लगता है कि वह केवल बचपन की एक घटना नहीं थी।
वह जीवन का एक छोटा-सा पाठ भी था।
समय बीत गया।
हम बड़े हो गए।
बचपन की बहुत-सी बातें पीछे छूट गईं और धीरे-धीरे वे बातें हमारी यादें बनकर रह गईं। फिर कभी जब हम एकांत में बैठते हैं, किसी शांत जगह पर मन ठहरता है या बीते हुए समय को याद करते हैं, तो वही पुरानी यादें हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती हैं।
तब हम सोचते हैं—
वे दिन कितने अनमोल थे।
उस समय हम इतने छोटे थे कि जीवन के बारे में बहुत कुछ जानते भी नहीं थे, फिर भी हमें अपने घर का रास्ता पता था।
हम शायद तब यह नहीं जानते थे कि मंज़िल क्या होती है, संघर्ष क्या होता है और जीवन हमें किस दिशा में ले जाएगा।
लेकिन हमें इतना जरूर पता था कि हमें अपने घर पहुँचना है।
शायद यही जीवन की एक बड़ी सच्चाई है।
जब मन में किसी मंज़िल तक पहुँचने का विश्वास होता है, तो रास्ते धीरे-धीरे स्वयं दिखाई देने लगते हैं।
बचपन की ऐसी ही कुछ और घटनाएँ भी समय के साथ मेरी यादों में लौटने लगीं।
मुझे अपनी बेटी रिया से जुड़ी एक घटना याद आती है।
एक बार हम सभी परिवार वाले किसी स्थान पर एक उत्सव में गए थे। वहाँ बहुत अच्छा महोत्सव चल रहा था। चारों ओर उत्साह और आनंद का वातावरण था। रिया भी बहुत उत्साहित थी और खुशी-खुशी इधर-उधर घूम रही थी।
हम सभी पूजा में व्यस्त हो गए।
इसी बीच रिया न जाने कब नदी के किनारे जाकर बैठ गई।
जब पूजा के बाद माँ ने पूछा कि रिया कहाँ है, तो हमने चारों ओर देखा। वह कहीं दिखाई नहीं दी।
हम सब उसे ढूँढ़ने लगे।
एक पल के लिए पूरे परिवार की चिंता बढ़ गई। हम सब भगवान से प्रार्थना करने लगे कि रिया जहाँ भी हो, सही-सलामत हमारे पास लौट आए।
मन में तरह-तरह के विचार आने लगे और उस समय बचपन की मेरी वह घटना भी अचानक याद आ गई—जब मैं छह वर्ष की उम्र में अपनी मम्मी से बिछड़ गई थी और अपने घर का रास्ता खोजते हुए घर पहुँच गई थी।
शायद जीवन में कुछ घटनाएँ समय बीत जाने के बाद भी हमारे भीतर कहीं सुरक्षित रहती हैं। जब वैसी ही कोई परिस्थिति सामने आती है, तो वे यादें अचानक हमारे सामने आ जाती हैं।
हम सबकी प्रार्थना और चिंता के बीच आखिरकार रिया हमारे पास वापस आ गई।
उस क्षण हमारे मन को बहुत राहत मिली।
हमने भगवान को धन्यवाद दिया।
उस दिन मुझे फिर महसूस हुआ कि जीवन में विश्वास कितना महत्वपूर्ण है।
विश्वास केवल भगवान पर ही नहीं होना चाहिए, बल्कि स्वयं पर भी होना चाहिए और उन लोगों पर भी, जो हमारे अपने हैं।
छह वर्ष की उम्र में मैंने अपने मन पर विश्वास करके अपने घर का रास्ता खोजा था।
और उस दिन रिया के लौट आने पर हमने विश्वास और प्रार्थना के महत्व को फिर से महसूस किया।
आज जब मैं इन दोनों घटनाओं को याद करती हूँ, तो लगता है कि जीवन हमें छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से बहुत बड़े पाठ सिखाता है।
कभी कोई रास्ता हमें घर तक पहुँचाता है,
तो कभी कोई विश्वास हमें अपनी मंज़िल तक पहुँचाता है।
रास्ते हमेशा आसान नहीं होते।
कभी हम अकेले पड़ जाते हैं,
कभी परिस्थितियाँ हमें घेर लेती हैं,
कभी हमें समझ नहीं आता कि आगे किस दिशा में जाना है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी मंज़िल हमसे दूर हो गई है।
कभी-कभी हमें बस अपने भीतर के विश्वास को सुनने की आवश्यकता होती है।
इसलिए जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, अपनी मंज़िल का रास्ता मत छोड़िए।
धीरे चलिए,
लेकिन चलते रहिए।
थक जाइए,
लेकिन रुकिए मत।
अपने मन पर विश्वास रखिए, ईश्वर पर विश्वास रखिए और लगातार मेहनत करते रहिए।
क्योंकि जिस तरह छह वर्ष की उस बच्ची ने भीड़ के बीच अपने घर का रास्ता खोज लिया था, उसी तरह जीवन की भीड़ और कठिन परिस्थितियों के बीच हम भी अपनी मंज़िल का रास्ता खोज सकते हैं।
बस आवश्यकता है—
विश्वास की,
धैर्य की,
प्रार्थना की,
और लगातार आगे बढ़ते रहने की।
क्योंकि घर का रास्ता हो या जीवन की मंज़िल का रास्ता—
जिसे पाने की सच्ची चाह हो,
उसका रास्ता मनुष्य अपने भीतर कहीं न कहीं खोज ही लेता है।