[55]
रात्री निवास हेतु मार्ग में पड़े गाँव में दोनों ने प्रवेश किया। किसी सज्जन के घर दोनों को आश्रय मिला। भोजन पूर्ण होते ही सज्जन ने कहा, “आज गाँव में माता के भजन का कार्यक्रम है। साधुओं की एक टोली आई है। क्या आप चलोगे भजन कीर्तन में?”
शैल ने कहा, “सारा जी चलेंगे क्या?”
“जी अवश्य चलेंगे।”
“किन्तु आप वहाँ नहीं आ सकती। केवल शैल ही चल सकता है।”
“क्यों? क्या स्त्रीयां वहाँ नहीं जाती है?”
“स्त्रीयां भी जाती है किन्तु आप नहीं जा सकती। क्यों कि ...।”
“मैं मुस्लिम स्त्री हूँ इसलिए न?”
“वहाँ विधर्मियों का आना निषेध है।”
“ठीक है, शैल। तुम जाकर आओ। मैं यहाँ विश्राम करती हूँ।”
“नहीं। मैं भी यहाँ रहूँगा। आप गाँव वालों भजन कीर्तन करें। हम यहीं रहेंगे।” शैल ने कहा।
गाँव के चोक में भजन कीर्तन की सारी तैयारियां हो गई थी। सारे गाँव जन धीरे धीरे जुड़ रहे थे। साधुओं की टोली भी आ गई। ढोल, मंजीरे आदि वाध्य सजने लगे। कीर्तन आरंभ होने की क्षण आने पर संत ने घोषणा की, “क्या सारे गाँव जन आ चुके हैं?”
“हां, हां।” एक साथ अनेक ध्वनियाँ उठीं। संत ने सभी गाँवजनों पर विहंगम दृष्टि डाली। सब को ध्यान पूर्वक देखने के पश्चात जब गाँव जन की ध्वनियाँ शांत हो गई तो वे बोले, “वृद्ध, अशक्त एवं बालकों के उपरांत अभी भी दो व्यक्ति किसी घर में है। उन्हें यहाँ आने से क्यों रोका गया है?”
सभी गाँवजन विस्मय एवं प्रश्न भरी दृष्टि से एक दूसरे के मुख को देखने लगे। उस विस्मय, उस प्रश्न का उत्तर किसी के पास न था। अब वे सभी उसी दृष्टि से संत को देखने लगे।
“आपके गाँव में दो अतिथि आए हैं। दोनों कीर्तन में आना चाहते हैं। किन्तु किसी ने उन्हें यहाँ आने से रोका है। क्यों रोका गया है?”
संत के शब्दों को सुनकर सभी आँखें उस सज्जन को ताकने लगी।
सज्जन खड़े हुए और बोले, “महाराज, उन दोनों में से एक स्त्री है जो विधर्मी है। मुस्लिम है। तो मैंने उसे यहाँ आने से रोक दिया।” सज्जन स्थिर से, मूढ़ से खड़े रहे, संत को ताकते रहे।
“उन दोनों को यहाँ ले कर आओ।”
“किन्तु महाराज ...।”
“आप निश्चिंत रहिए। आपके सभी प्रश्नों के उत्तर, सभी संशयों के समाधान मिल जाएंगे। बस आप उन्हें यहाँ लेकर आइए।”
संत के शब्दों को कोई टाल न सका। उस सज्जन के साथ गाँव की दो चार स्त्रीयां शैल और सारा को लाने के लिए चल पड़े। ग्राम जनों में कौतुक जाग उठा। ‘अब क्या होनेवाला है?’ सभी उत्कंठा से इसकी चर्चा करने लगे। कुछ ही घड़ी में शैल और सारा को लेकर गाँवजन आ गए।
“उन्हें सम्मान के साथ मेरे प्रत्यक्ष स्थान दें।” संत ने आदेश दिया। सारा ने स्थान ग्रहण किया।
“बेटी सरिता, ईश्वर की इस सभा में तुम्हारा स्वागत है।”
“महाराज, इसका नाम सरिता नहीं, सारा है।”
“कुछ क्षण पूर्व यह सारा थी, अब यह सरिता है। हैं न सरिता?”
सारा इन बातों से आश्चर्य में पड गई। अवाक हो गई।
“बोलो बेटी, तुम सरिता ही हो न?”
सारा ने कुछ कहने के लिए होंठों से प्रयास किया किन्तु अधरों से शब्द निकल नहीं पाए। सारी सभा इस बात को सुनकर उत्तेजित हो गई।
संत ने कहा, “गाँवजनों, शांत हो जाओ। मेरी बात पर आश्चर्य होना सहज है। अब मैं जो कुछ कहूँ उसे ध्यान से सुनो।”
शीघ्र ही सभा शांत हो गई। सभी की आँखें और कान उत्सुकता से संत की तरफ खींच गए।
“जिसे आप सारा समझ रहे हो वह पूर्व में सरिता थी। उनका परिवार सनातनी था। देश विभाजन के पश्चात पाकिस्तान में ही रह गया। समय व्यतीत होने पर कुछ विवशताओं के कारण पूरा परिवार सनातन को त्याग विधर्मी हो गया था। पिछले कुछ दिनों से वह भारत में है। यहाँ के तरंगों ने, यहाँ की ऊर्जा ने उन्हें प्रभावित किया है। इसी कारण उनके सनातन संस्कार पुन: जागृत हो गए हैं। आज ही उसने नदी को मैया मानकर पूजा अर्चना भी की है। अभी यहाँ अग्नि प्रज्वलित होगा, आज, इसी क्षण, इसी स्थान पर अग्नि की साक्षी में सारा अपना विधर्म त्यागकर सनातन धर्म में घर वापसी करेगी। और पुन: सरिता नाम धारण करेगी। बेटी, क्या तुम इस प्रस्ताव का स्वीकार करती हो?”
संत द्वारा सहसा पूछे गए प्रश्न से सारा दिगमूढ़ सी हो गई। उसे कोई उत्तर नहीं सुझा तो मौन हो गई।
“बेटी, यदि तुम नहीं चाहोगे तो तुम्हारा सनातन में पुन: प्रवेश नहीं होगा। अत: अपने मन की इच्छा प्रकट करो। कहो तुम्हें सनातन में घर वापसी स्वीकार्य है या नहीं?”
सारा की आँखों से अनायास ही अश्रु बहने लगे। मन में प्रसन्नता का अनुभव होने लगा। अश्रुओं के साथ सारा विषाद बहकर नष्ट हो गया। होंठों पर स्मित आ गया। वह स्वत: अग्नि के समीप चली गई। संत भी वहाँ आए। आँखें बंद कर संत ने हथेली में जल लिया, कुछ मंत्रों का पाठ किया, आँखें खोलीं और वह अभिमंत्रित जल सारा को दे दिया। सारा ने उसे अपनी हथेली में लिया, आचमन किया, शेष जल अपने मस्तक पर चढ़ा दिया।
“बेटी सरिता, घर वापसी पर सनातन धर्म तुम्हारा स्वीकार करता है। ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। तुम्हारा मंगल हो।” संत ने आशीष दिए।
सरिता ने संत को प्रणाम किया। सभी गाँवजनों में हर्ष व्याप गया। रात्रिभर ईश्वर का नाम संकीर्तन चलता रहा। कीर्तन सम्पन्न होते ही गाँवजन घर चले गए, संतों की टोली अपने मार्ग पर चल पड़ी।