Samarpan in Hindi Motivational Stories by Gyaneshwar Anand Gyanesh books and stories PDF | समर्पण

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समर्पण


     आज के समय में शायद ही कोई ऐसा कार्यालय हो, जहाँ भ्रष्टाचार ने किसी न किसी रूप में अपनी जड़ें न जमा रखी हों। कहीं रिश्वत के रूप में, कहीं चापलूसी के रूप में और कहीं अपने लोगों को लाभ पहुँचाने की प्रवृत्ति के रूप में। सबसे अधिक कठिनाई उस व्यक्ति के लिए होती है, जो इस वातावरण में भी ईमानदारी और अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा का दामन नहीं छोड़ता।
नगर पालिका परिषद के कार्यालय में भी परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही थीं।
वहाँ आनन्द नाम का एक कर्मचारी कार्यरत था। वह अपने काम के प्रति अत्यन्त निष्ठावान, ईमानदार और कर्तव्यपरायण था। कार्यालय में उसकी शैक्षिक योग्यता सबसे अधिक थी। उसने स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त की थी। ज्ञान, समझ और कार्यक्षमता के मामले में वह अपने अनेक सहकर्मियों से आगे था।
लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमी यही थी कि वह चापलूस नहीं था।
वह अधिकारियों के सामने अनावश्यक प्रशंसा के पुल नहीं बाँधता था। न किसी के तलवे चाटता था और न अपने काम के बदले किसी एहसान की उम्मीद करता था। उसका मानना था कि कर्मचारी का असली परिचय उसकी कुर्सी से नहीं, बल्कि उसके काम से होता है।
लेकिन कार्यालय की व्यवस्था में योग्यता से अधिक महत्व कभी-कभी संबंधों और चापलूसी को मिलने लगता है।
आनन्द के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
नगर पालिका के जलकल विभाग में एक कर्मचारी दैनिक वेतन पर कूपचालक के पद पर कार्यरत था। उसकी शैक्षिक योग्यता आनन्द से बहुत कम थी, लेकिन वह अधिकारियों की चापलूसी करने में माहिर था। धीरे-धीरे उसने अधिकारियों का विश्वास इस हद तक जीत लिया कि उसे लिपिक के पद पर समायोजित कर दिया गया।
दूसरी ओर, उच्च शैक्षिक योग्यता रखने वाले आनन्द को कर-वसूली जैसे कार्य पर लगा दिया गया।
आनन्द को यह बात भीतर तक कचोटती थी।
नियमों और शासनादेशों में मृतक आश्रित कोटे के अंतर्गत नियुक्ति के संबंध में यह व्यवस्था थी कि अभ्यर्थी की शैक्षिक योग्यता के आधार पर उसे उपयुक्त पद पर नियुक्ति प्रदान की जाए, बशर्ते वह पद समूह ‘ग’ से ऊपर का न हो। आनन्द स्नातकोत्तर था, इसलिए उसकी योग्यता के अनुरूप लिपिक पद पर नियुक्ति का अवसर बनता था।
लेकिन उसे चतुर्थ श्रेणी के कर-वसूली पद पर नियुक्त कर दिया गया।
उस दिन आनन्द ने पहली बार महसूस किया कि योग्यता कभी-कभी व्यक्ति का अधिकार तो बन सकती है, लेकिन उसे पाने की गारंटी नहीं।
उसने अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखी।
“सर, मेरी शैक्षिक योग्यता के अनुसार मुझे लिपिक पद पर नियुक्ति मिलनी चाहिए थी। यदि नियमानुसार सम्भव हो तो मेरा समायोजन लिपिक पद पर कर दिया जाए।”
अधिकारी ने उसकी बात सुनी और सहज भाव से कहा—
“हाँ-हाँ, हो जाएगा। अभी रहने दो। बाद में देखेंगे।”
आनन्द ने उस उत्तर में आश्वासन खोजने की कोशिश की।
वह चुप हो गया।
उसने सोचा—शायद समय के साथ न्याय हो जाएगा।
लेकिन समय बीतता गया और वह ‘बाद में’ कभी नहीं आया।
चापलूसी का दरबार
कार्यालय में एक अजीब-सी व्यवस्था बन चुकी थी।
जो कर्मचारी अधिकारियों के आसपास मंडराते रहते, हर बात पर “जी सर”, “बिल्कुल सर”, “आप जैसा कहें सर” कहते और छोटी-सी बात पर भी अधिकारी की प्रशंसा करने का अवसर नहीं छोड़ते—उन्हें कार्यालय के सुविधाजनक और प्रभावशाली कार्य मिल जाते।
किसी को महत्वपूर्ण फाइलें मिलतीं, किसी को ऐसा काम मिलता जिसमें अधिकार और सुविधा दोनों थीं।
और आनन्द?
उसे ऐसे काम सौंपे जाते, जिनमें जिम्मेदारी अधिक होती और सुविधा कम।
सरकार की प्राथमिकता वाले कार्य, समयबद्ध योजनाएँ, उलझी हुई फाइलें, कठिन गणनाएँ और ऐसे मामले जिनमें थोड़ी-सी लापरवाही भी बड़ी समस्या पैदा कर सकती थी—ये सब धीरे-धीरे आनन्द की मेज तक पहुँचने लगे।
सहकर्मियों के बीच चर्चा होने लगी—
“यह काम भी आनन्द को दे दो।”
“वह कर देगा।”
“जितना मुश्किल काम है, आनन्द के पास भेज दो।”
पहले यह बात आनन्द को अच्छी लगती थी।
उसे लगता था कि अधिकारी उस पर विश्वास करते हैं।
लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ में आने लगा कि यह विश्वास जितना दिखाई देता है, उतना है नहीं। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें काम की जिम्मेदारी उसके हिस्से थी और श्रेय किसी और के।
फिर भी आनन्द ने कभी शिकायत नहीं की।
वह फाइल खोलता, नियम पढ़ता, तथ्यों को समझता और पूरे मन से काम में लग जाता।
उसकी आदत थी—
“काम चाहे छोटा हो या बड़ा, उसे अधूरा छोड़ना अपने कर्तव्य के साथ विश्वासघात है।”
इसलिए वह हर कार्य को समय पर पूरा करता।
एक दिन सरकार की ओर से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और समयबद्ध कार्य कार्यालय में आया। अधिकारी ने फाइल पर नजर डाली और कहा—
“यह काम आनन्द को दे दो।”
पास बैठे एक कर्मचारी ने धीमे स्वर में कहा—
“सर, यह तो बहुत पेचीदा काम है।”
अधिकारी ने सहज भाव से उत्तर दिया—
“इसलिए तो आनन्द को दे रहे हैं।”
यह वाक्य किसी और के लिए साधारण हो सकता था, लेकिन आनन्द के लिए यह उसके वर्षों की मेहनत का प्रमाण था।
उसने फाइल उठाई।
रात तक बैठकर उसने काम पूरा किया।
अगली सुबह फाइल अधिकारी की मेज पर थी।
काम समय से पहले पूरा हो चुका था।
अधिकारी ने फाइल देखी और संतोष से सिर हिलाया।
लेकिन कमरे के दूसरे कोने में बैठे कुछ कर्मचारियों के चेहरों पर संतोष नहीं था।
उनके मन में एक प्रश्न उठ रहा था—
“हर कठिन काम आनन्द को ही क्यों मिलता है और वह हर बार सफल कैसे हो जाता है?”
धीरे-धीरे यह प्रश्न ईर्ष्या में बदलने लगा।
ईमानदारी की कीमत
आनन्द को अब समझ में आ गया था कि उसके सामने केवल काम की कठिनाइयाँ नहीं थीं।
उसके सामने उन लोगों की मानसिकता भी थी, जिन्हें उसकी योग्यता और ईमानदारी खटकने लगी थी।
वे चाहते थे कि आनन्द भी उनकी तरह किसी अधिकारी के आगे-पीछे घूमे।
किसी की प्रशंसा करे।
किसी की गलत बात पर भी “जी” कहे।
किसी अनुचित आदेश पर प्रश्न न उठाए।
लेकिन आनन्द ऐसा नहीं कर सकता था।
उसका स्वभाव अलग था।
वह मानता था कि—
“कर्मचारी की निष्ठा किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, अपने कर्तव्य के प्रति होनी चाहिए।”
इसलिए वह अपना काम करता रहा।
उसने न किसी से लड़ाई की, न किसी के विरुद्ध षड्यंत्र किया और न अपनी पीड़ा का ढिंढोरा पीटा।
उसके पास केवल दो चीजें थीं—
उसकी योग्यता और उसका समर्पण।
दिन बीतते गए।
कार्यालय में उसके विरुद्ध छोटी-छोटी बातें कही जाने लगीं।
कभी कहा जाता—
“आनन्द तो बहुत नियम-कायदा बताता है।”
कभी कोई कहता—
“इतनी ईमानदारी से भी क्या फायदा?”
और कभी कोई व्यंग्य करता—
“देखना, एक दिन यही ईमानदारी उसे भारी पड़ेगी।”
आनन्द मुस्करा देता।
वह जानता था कि सच्चाई का रास्ता कभी-कभी अकेला होता है।
लेकिन वह यह भी जानता था कि अकेला होना और गलत होना एक बात नहीं है।
समय की करवट
एक दिन कार्यालय में एक ऐसा मामला आया, जिसमें कई वर्षों के अभिलेखों की जाँच आवश्यक थी। मामला संवेदनशील था। जरा-सी गलती से विभाग को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता था।
फाइल कई कर्मचारियों के पास गई।
हर कोई उससे बचना चाहता था।
अन्ततः वह फिर आनन्द की मेज पर आ गई।
सहकर्मियों में से एक ने मुस्कराकर कहा—
“लो आनन्द जी, एक और मुश्किल काम आपके हिस्से में।”
आनन्द ने उसकी ओर देखा और शांत स्वर में कहा—
“काम मुश्किल है, इसलिए तो करना है।”
उसने फाइल खोली।
कई दिनों तक उसने पुराने अभिलेख खंगाले। एक-एक तथ्य की जाँच की। नियमों का अध्ययन किया। जहाँ कमी मिली, उसे चिन्हित किया और जहाँ सुधार की आवश्यकता थी, वहाँ उचित सुझाव दिया।
उसने अपना काम पूरा कर दिया।
जब अधिकारी ने पूरी रिपोर्ट देखी तो कुछ देर तक मौन रहे।
फिर उन्होंने कहा—
“आनन्द, अगर यह काम समय पर और सही तरीके से नहीं हुआ होता, तो विभाग को बड़ी परेशानी उठानी पड़ सकती थी।”
आनन्द ने केवल इतना कहा—
“सर, यह मेरा काम था।”
अधिकारी ने उसकी ओर देखा।
शायद पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि जिस कर्मचारी को वर्षों से केवल कठिन काम सौंपे जाते रहे, वह वास्तव में कार्यालय का सबसे भरोसेमंद कर्मचारी था।
आनन्द अपनी कुर्सी पर वापस आ गया।
उसने अपनी पुरानी फाइल खोली और फिर काम में लग गया।
उसे न प्रशंसा की आवश्यकता थी, न पुरस्कार की।
उसके लिए संतोष की सबसे बड़ी बात यही थी कि उसने अपना कर्तव्य निभाया।
क्योंकि उसके जीवन का एक ही सिद्धान्त था—
“अधिकार मिले या न मिले, कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए।”
और शायद यही उसका सबसे बड़ा समर्पण था।
उसने व्यवस्था से हार नहीं मानी थी।
उसने केवल यह तय किया था कि दूसरों की बेईमानी उसके भीतर की ईमानदारी को जन्म लेने से पहले ही मरने नहीं देगी।
आनन्द जानता था—
समय हर अन्याय का हिसाब रखता है।
और जिस दिन समय अपनी किताब खोलता है, उस दिन पद नहीं,
कर्म बोलते हैं।
यही आनन्द की कहानी थी—
एक ऐसे कर्मचारी की कहानी, जिसने अपने अधिकारों के साथ हुए अन्याय को सहा, चापलूसी के दौर में भी अपनी रीढ़ सीधी रखी और कठिन परिस्थितियों के बीच भी अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित रहा।
इसी समर्पण में उसकी असली जीत छिपी थी।
यदि आप चाहें, तो मैं इसका �⁠दूसरा भाग भी इसी साहित्यिक शैली में लिख सकता हूँ, जिसमें आनन्द के विरुद्ध कार्यालयी षड्यंत्र, झूठी शिकायत, जाँच, संघर्ष और अंततः सत्य की विजय को बहुत प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाया जा सकता है।