CCTV footage in Hindi Science-Fiction by Vijay Erry books and stories PDF | CCTV फुटेज

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CCTV फुटेज

सीसीटीवी फुटेजलेखक: विजय शर्मा एरीशहर की हलचल भरी रातों में भी कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहाँ सन्नाटा गूंजता है। दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में स्थित “शांति निकेतन अपार्टमेंट” ऐसी ही जगह थी। तीन मंजिला इमारत, साधारण दिखने वाले फ्लैट्स, और मुख्य गेट पर लगी एक सीसीटीवी कैमरा—जो पिछले कई सालों से चुपचाप सब कुछ देख रहा था। लोग उसे सिर्फ सुरक्षा का साधन मानते थे, लेकिन उस कैमरे ने एक रात ऐसा सच कैद कर लिया जो कई जिंदगियों को हमेशा के लिए बदल देने वाला था।अरविंद मेहता पैंतालीस साल का एक साधारण आदमी था। बैंक में क्लर्क की नौकरी करता था। पत्नी सुमन और बेटा रोहित—ये ही उसकी दुनिया थी। रोहित बीस साल का युवक था, कॉलेज में पढ़ता था और शाम को पार्ट-टाइम जॉब भी करता था। परिवार मध्यमवर्गीय था, लेकिन खुश था। अरविंद हमेशा कहता—“बेटा, ईमानदारी सबसे बड़ी पूंजी है। बाकी सब आता-जाता रहता है।”एक शुक्रवार की शाम सब कुछ सामान्य था। अरविंद ऑफिस से लौटा, सुमन ने चाय बनाई, रोहित कॉलेज से आया। रात को करीब ग्यारह बजे अरविंद को नींद नहीं आ रही थी। वह बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा था जब अचानक नीचे गेट की तरफ शोर सुनाई दिया। कोई चीख रहा था। वह जल्दी से नीचे गया।गेट पर पहरेदार रामू घबराया हुआ खड़ा था। “साहब… साहब… चोरी हो गई!”अरविंद के पड़ोसी श्रीवास्तव जी का फ्लैट नंबर 12 खुला पड़ा था। अंदर उथल-पुथल थी। अलमारी खुली, नकदी और सोने के गहने गायब। श्रीवास्तव जी की पत्नी रो रही थी—“हमारे साल भर की बचत… सब चला गया!”पुलिस बुलाई गई। इंस्पेक्टर वर्मा आया। उसने सबकी बात सुनी। पहरेदार रामू ने बताया कि रात करीब दस बजे एक युवक गेट से अंदर गया था। चेहरा मास्क से ढका था, लेकिन कद-काठी से लगता था कोई परिचित।अगली सुबह अपार्टमेंट में अफवाहें उड़ने लगीं। कुछ लोग रोहित की तरफ इशारे करने लगे। रोहित उसी रात थोड़ा देर से घर लौटा था। उसका मोबाइल ऑफ था। पुलिस ने पूछताछ की। रोहित ने कहा—“मैं कॉलेज के फ्रेंड्स के साथ था। फिर पार्ट-टाइम जॉब पर गया था। रास्ते में मोबाइल डिस्चार्ज हो गया।”लेकिन सबूत कम थे। श्रीवास्तव जी के बेटे ने आरोप लगाया—“रोहित अक्सर हमारे फ्लैट के पास घूमता रहता था। शायद उसने ताला तोड़ा हो।”अरविंद टूट गया। उसने रोहित से पूछा—“बेटा, सच बता। तूने कुछ किया?”रोहित की आँखों में आँसू थे—“पापा… मैंने कुछ नहीं किया। मेरी कसम।”अरविंद ने पुलिस से कहा—“हमारे अपार्टमेंट में सीसीटीवी है। फुटेज देख लीजिए।”इंस्पेक्टर वर्मा मुस्कुराया—“हाँ, हम वही करने वाले हैं। लेकिन कैमरा पुराना है। कभी-कभी खराब भी हो जाता है।”सीसीटीवी का हार्ड डिस्क निकालकर पुलिस स्टेशन ले जाया गया। अगले दिन रिपोर्ट आई। फुटेज धुँधली थी, लेकिन एक बात साफ थी—रात दस बजकर बीस मिनट पर एक व्यक्ति गेट से अंदर घुसा। मास्क पहने हुए। कद लगभग पाँच फुट आठ इंच। रोहित का कद पाँच फुट दस इंच था। थोड़ा फर्क था।फिर फुटेज में देखा गया कि वह व्यक्ति सीढ़ियों से ऊपर गया, फ्लैट 12 के पास रुका, कुछ देर खड़ा रहा, फिर अंदर घुस गया। बाहर निकलते समय उसके हाथ में एक बैग था।पुलिस ने रोहित को हिरासत में लिया। अरविंद और सुमन रो पड़े। मोहल्ले वाले कहने लगे—“देखा… ईमानदार दिखने वाले भी ऐसे निकले।”अरविंद ने रात भर जागकर सोचा। उसके मन में एक बात बार-बार आ रही थी। सीसीटीवी फुटेज में वह व्यक्ति जब गेट से निकला तो उसके जूते साफ दिखे थे। काले स्पोर्ट्स शूज… और उन पर सफेद धारियाँ। रोहित के पास ऐसे जूते नहीं थे। रोहित हमेशा सस्ते कैनवास जूते पहनता था।अगली सुबह अरविंद पुलिस स्टेशन पहुँचा। “इंस्पेक्टर साहब, फुटेज दोबारा देखिए। जूतों पर ध्यान दीजिए।”इंस्पेक्टर ने फुटेज फिर चलाया। हाँ, जूते अलग थे। फिर उन्होंने पूरे अपार्टमेंट के युवाओं के जूते चेक किए। फ्लैट नंबर 8 में रहने वाले राहुल के जूते मैच हो गए। राहुल श्रीवास्तव जी का ही रिश्तेदार था, जो कुछ महीनों से उनके यहाँ रह रहा था।राहुल को पकड़ा गया। पूछताछ में उसने कबूल किया—“मैंने चोरी की। मुझे जुए में बहुत नुकसान हो गया था। सोचा चाचा के घर से ले लूँगा, कोई शक नहीं करेगा। मास्क पहन लिया। रोहित पर आरोप लग जाए तो और अच्छा।”रोहित रिहा हो गया। अरविंद ने बेटे को गले लगाया। आँखों से आँसू बह रहे थे—“बेटा, माफ करना। मैंने एक पल के लिए भी शक कर लिया।”रोहित बोला—“पापा, कोई बात नहीं। सीसीटीवी ने सच बता दिया।”लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।जब पुलिस ने पुरानी फुटेज भी जाँची तो एक और बात सामने आई। तीन महीने पहले की एक रात की रिकॉर्डिंग में अरविंद खुद दिख रहा था। वह गेट से बाहर जा रहा था… और उसके साथ एक औरत। सुमन नहीं। कोई अनजान चेहरा।अरविंद का चेहरा उतर गया। सुमन ने जब वह फुटेज देखी तो सन्न रह गई। “ये कौन है अरविंद? तुम कहाँ जा रहे थे रात के बारह बजे?”अरविंद चुप रहा। फिर धीरे-धीरे बोला—“सुमन… वो मेरी पुरानी सहेली थी। कॉलेज के दिनों की। उसका पति कैंसर से मर गया था। वह बहुत परेशान थी। मैंने सिर्फ मदद की… बात की… फिर छोड़ आया।”सुमन की आँखें भर आईं। “तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?”“डर था। तुम गलत मत समझ लेना।”रोहित ने दोनों को गले लगाया—“पापा, मम्मी… अब कोई शक नहीं। सीसीटीवी ने एक चोर पकड़वाया, और एक गलतफहमी भी दूर कर दी। लेकिन याद रखना, कैमरा सिर्फ तस्वीरें कैद करता है। दिल के इरादे नहीं।”अरविंद ने सिर झुकाया। “हाँ बेटा। मैंने गलती की कि छुपाया। अब नहीं छुपाऊँगा।”सुमन ने हाथ बढ़ाया—“हम फिर से शुरू करते हैं। ईमानदारी से।”अगले कुछ दिनों में अपार्टमेंट में शांति लौट आई। श्रीवास्तव जी ने अपना सामान वापस पा लिया। राहुल जेल चला गया। पहरेदार रामू को इनाम मिला।लेकिन अरविंद अब हर शाम बालकनी में खड़ा उस सीसीटीवी कैमरे को देखता। एक दिन उसने रोहित से कहा—“बेटा, ये कैमरा हमें सिखाता है कि सच छुप नहीं सकता। चाहे कितना भी मास्क पहन लो, कितनी भी रात अंधेरी हो… एक न एक दिन फुटेज सामने आ ही जाती है।”रोहित मुस्कुराया—“पापा, असल सीसीटीवी तो हमारे अंदर होती है। अंतरात्मा। वही सबसे साफ फुटेज रिकॉर्ड करती है।”अरविंद ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। “सही कहा। तकनीक हमें पकड़ सकती है, लेकिन सही रास्ता हमें खुद चुनना पड़ता है।”उस रात अरविंद ने डायरी में लिखा—“सीसीटीवी फुटेज सिर्फ अपराध नहीं पकड़ती। वह रिश्तों की दरारें भी दिखाती है, शक के काँटे भी निकालती है, और कभी-कभी माफी का रास्ता भी खोलती है। हम सब किसी न किसी कैमरे के नीचे जी रहे हैं—चाहे वो दीवार पर लगा हो या दिल के अंदर। फर्क सिर्फ इतना है कि दीवार वाला झूठ पकड़ता है, और दिल वाला सच जगाता है।”शांति निकेतन अपार्टमेंट आज भी वैसा ही है। गेट पर वही पुराना कैमरा लगा है। लोग आते-जाते हैं। बच्चे खेलते हैं। बुजुर्ग बातें करते हैं। लेकिन जब भी कोई नया किराएदार आता है, अरविंद उसे एक सलाह जरूर देता है—“भाई, यहाँ सब कुछ रिकॉर्ड होता है। अच्छा काम करो… तो फुटेज भी सुंदर बनेगी।”और रात के अँधेरे में जब शहर सो जाता है, वह छोटा-सा लाल बत्ती वाला कैमरा चुपचाप घूमता रहता है। वह न तो हँसता है, न रोता है। बस देखता है। रिकॉर्ड करता है। और इंतजार करता है उस पल का जब कोई सच सामने आने को बेताब हो।क्योंकि जिंदगी में कुछ सच ऐसे होते हैं जो शब्दों में नहीं, फुटेज में छुपे होते हैं। और जब वे सामने आते हैं, तो इंसान या तो टूट जाता है… या फिर और मजबूत बनकर खड़ा हो जाता है।अरविंद मेहता आज भी बैंक जाता है। रोहित अच्छी नौकरी करने लगा है। सुमन घर सँभालती है। तीनों अब एक-दूसरे से कुछ नहीं छुपाते। और हर महीने जब सीसीटीवी की मेमोरी कार्ड बदली जाती है, अरविंद मुस्कुराकर कहता है—“चलो, पुरानी फुटेज दफ्न हो गई। नई जिंदगी की रिकॉर्डिंग शुरू हो।”यह कहानी सिर्फ एक चोरी की नहीं है। यह उस सच्चाई की है जो अक्सर दीवारों पर टंगे कैमरों में कैद हो जाती है, लेकिन असल में हमारे व्यवहार में बसती है। सीसीटीवी फुटेज हमें याद दिलाती है—जो दिख रहा है, वही सब कुछ नहीं होता। कभी-कभी जो नहीं दिख रहा, वही सबसे ज्यादा मायने रखता है।और जब सच सामने आता है, तो माफी, विश्वास और नए रिश्ते जन्म लेते हैं। बशर्ते हम में हिम्मत हो उसे स्वीकार करने की।(लगभग 2000 शब्द)— विजय शर्मा एरी