Blueberry Cottage - 1 in Hindi Horror Stories by Anamika books and stories PDF | ब्लूबेरी कॉटेज - भाग 1

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ब्लूबेरी कॉटेज - भाग 1

ब्लूबेरी कॉटेज
भाग - १
​लेखिका "अनामिका" 
सड़क के दोनों ओर फैले घने, हरे-भरे पेड़ और हल्की छनकर आती धूप... ऐसा लग रहा था मानो किसी टीवी सीरियल का कोई खूबसूरत दृश्य चल रहा हो। रास्ता एकदम सुनसान और शांत था। इसी खूबसूरत राह पर एक काले रंग की कार आराम से बढ़ रही थी। कार के अंदर का माहौल बहुत ही खुशनुमा था।
​अमित गाड़ी चला रहा था और बगल में बैठी उसकी पत्नी सीमा रेडियो पर बजते पुराने गानों पर गुनगुना रही थी। पीछे की सीट पर बैठी उनकी 15 साल की बेटी, अनन्या, अपने हेडफोन हटाकर माता-पिता की इस मस्ती को देख मुस्कुरा रही थी। तीनों किसी मंजिल पर पहुंचने की खुशी में हंसी-मजाक कर रहे थे, चुटकुले कस रहे थे। पूरा परिवार एक अलग ही सुकून में डूबा हुआ था।
​फिर, अचानक उस शांति को चीरती हुई एक चीखती हुई आवाज आई।
​सामने वाले मोड़ से अत्यधिक तेज रफ्तार में एक बेकाबू ट्रक लहराता हुआ सीधा उनकी कार की तरफ आया। अमित को संभलने या ब्रेक मारने का एक सेकेंड का भी मौका नहीं मिला। "अमित!" सीमा के हलक से एक खौफनाक चीख निकली।
​धड़ाम!
​लोहे से लोहा टकराने की एक दिल दहला देने वाली भयानक आवाज गूंज उठी। ट्रक की जोरदार टक्कर से कार हवा में उछल गई। खिड़कियों के कांच एक झटके में चकनाचूर होकर चारों तरफ बिखर गए। कार सड़क पर दो-तीन बार पलटी खाती हुई घिसटती चली गई और अंत में उल्टी होकर सड़क किनारे जा गिरी।
​सन्नाटा फिर से छा गया, लेकिन इस बार वह सुकून का नहीं, बल्कि मौत जैसा खौफनाक सन्नाटा था। पलटी हुई कार से काला धुआं निकल रहा था, पेट्रोल की बदबू हवा में फैल रही थी और अंदर पड़ा वह खुशहाल परिवार अब खून से लथपथ, बेसुध पड़ा था।
​कुछ मिनटों के खौफनाक सन्नाटे के बाद, धीमी-धीमी कराहों के साथ अमित और सीमा की आंखें खुलीं। जब उन्होंने धुंधली निगाहों से आसपास देखा, तो पाया कि वे तीनों कार के अंदर नहीं, बल्कि सड़क किनारे सूखे पत्तों पर पड़े हुए थे।
​हैरानी की बात थी कि इतने खौफनाक हादसे के बावजूद किसी को कोई गहरी चोट नहीं आई थी—बस कुछ खरोंचें और मामूली चोट के निशान थे। अमित ने कांपते हाथों से सीमा को उठाया और फिर दोनों भागकर अनन्या की तरफ लपके। बेटी को सही-सलामत देख उनकी जान में जान आई। तीनों ने एक-दूसरे को सीने से लगा लिया, मानों यकीन दिला रहे हों कि वे जिंदा हैं।
​लेकिन जैसे ही उनकी नजर कुछ दूरी पर पड़ी कार पर गई, उनका खून जम गया।
​कार पूरी तरह से कुचली जा चुकी थी; उसका ढांचा इस कदर टूट-फूट गया था कि उसमें से किसी का जिंदा निकलना नामुमकिन लगता था। गाड़ी का भयानक मंजर देखकर तीनों कांप उठे। अपनी सलामती पर यकीन न करते हुए, उन्होंने नम आंखों से हाथ जोड़े और भगवान का लाख-लाख शुक्रिया अदा किया कि इस विनाशकारी एक्सीडेंट में भी उनकी जान बच गई।
​हादसे के सदमे से उबरकर उन्होंने तय किया कि कॉटेज का बाकी सफर पैदल ही तय करेंगे। दिन का उजाला ढलने लगा था और रास्ते पर घना कोहरा छा रहा था।
​सड़क के दोनों ओर लगे ऊंचे, पुराने पेड़ हवा से आपस में टकराकर ऐसी आवाजें निकाल रहे थे मानो फुसफुसाकर कोई चेतावनी दे रहे हों। झाड़ियों से आती अजीब सी घिसटने की आवाजें और परिंदों की खौफनाक चीखें सन्नाटे को चीर रही थीं। हर कदम पर ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य आंखें अंधेरे में से उनका पीछा कर रही हों। खौफ के मारे तीनों का दिल दहल रहा था, फिर भी वे एक-दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ते रहे।
​जैसे-जैसे वे पहुंचे, सामने बने उस कॉटेज को देखकर उनका डर और बढ़ गया। वह जगह किसी कॉटेज से ज्यादा कोई वीरान मुर्दाघर या कब्रिस्तान जैसी लग रही थी। वहां पसरा सन्नाटा भारी और खौफनाक था, जहां हवा भी थम सी गई थी।
​घर के मुहाने पर बस एक पुरानी, जर्जर चाय-सिगरेट की गुमटी थी, जिसमें एक आदमी बैठा था। अमित ने आगे बढ़कर पूछा, "सुनिए भाई साहब... क्या यही 'ब्लू वैली' कॉटेज है? इसके मालिक कहां मिलेंगे? क्या आसपास कोई मैकेनिक मिलेगा?" लेकिन वह आदमी बिल्कुल टस से मस नहीं हुआ। न तो उसने अमित की तरफ देखा, न ही किसी बात का जवाब दिया। वह बस शून्य में अपलक निहारता रहा, मानो उसने कुछ सुना ही न हो। उसकी इस रहस्यमयी खामोशी को देखकर सीमा ने घबराकर कहा, "लगता है यह बहरा या गूंगा है... चलिए, अंदर ही चलकर देखते हैं।"
​वे तीनों जैसे ही गुमटी से मुंह मोड़कर कॉटेज के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़े, उस आदमी ने धीरे-धीरे अपनी गर्दन उनकी तरफ घुमाई। उसकी आंखों में कोई चमक नहीं थी—बिल्कुल सफेद और पथराई हुई आंखें। वह बेहद अजीब और खौफनाक नजरों से कभी उन तीनों को तो कभी उस कॉटेज की काली पड़ती जा रही इमारत को घूरने लगा।
​अमित ने जैसे ही कॉटेज का भारी लकड़ी का दरवाजा धकेला, ऊपर टंगा विंड चाइम अचानक तेज हवा से हिल उठा। सन्नाटे को चीरती हुई उसकी 'टन-टन' की तीखी और धातुई आवाज पूरे हॉल में किसी गूंजती हुई चीख की तरह फैल गई, जिसने तीनों की रूह कंपा दी।
​दरवाजा खुलते ही अंदर का नजारा सामने आया। हॉल में धूल की मोटी परत जमा थी, खिड़कियों पर मकड़ी के जाले लटक रहे थे और हवा में गलन व सीलन की बदबू भरी हुई थी। वहां का सन्नाटा इतना गहरा था कि लगता था सालों से यहां कोई इंसान तो क्या, रोशनी की एक किरण भी नहीं पहुंची है। वह जगह किसी खूबसूरत कॉटेज के बजाय एक शापित वीरान खंडहर जैसी भयानक लग रही थी।
हॉल की बदहाली और गंदगी देखकर अमित और सीमा का मन घबराने लगा था, लेकिन जैसे ही उन्होंने आगे बढ़कर कमरे का स्विच दबाया, पूरा हॉल ट्यूबलाइट की तेज़ रोशनी से जगमगा उठा। हैरान अमित ने नल की टोंटी घुमाई, तो उसमें से भी साफ़ पानी का साफ़ सुथरा धारदार बहाव शुरू हो गया। रसोई में जाने पर उनका अचरज और बढ़ गया—शेल्फ़ पर ताज़ा राशन, पैक्ड दाल, चावल, मसाले, आटा और चाय-चीनी का सामान सलीके से रखा हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो किसी ने उनके आने से ठीक पहले ही यह सब इंतज़ाम करके रखा हो। बाहर से किसी वीरान, शापित खंडहर जैसा दिखने वाला कॉटेज अंदर से रहने के लिए पूरी तरह तैयार था।
​यह सब देखकर तीनों एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। उनके मन में ढेरों सवाल कौंध रहे थे कि इस बीहड़ में यह सब कैसे मुमकिन है?
​तभी... सन्नाटे को चीरती हुई, कॉटेज के सबसे पिछले कमरे से एक अजीब सी घिसटने और भारी सांस लेने की खौफनाक आवाज़ आई। तीनों का खून जम गया। अमित ने अनन्या को पीछे धकेला और कांपते हाथों से उस बंद कमरे के दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाए। दरवाजे के हैंडल पर हाथ रखते ही आवाज़ और तेज़ हो गई—मानो कोई दरवाज़े के ठीक उस पार खड़ा उनका इंतज़ार कर रहा हो....
पहला भाग समाप्त, कहानी जारी है....