"जब नज़रों से दिल तक का सफ़र महज़ एहसास बनकर रह जाए, तो उसे प्यार कहते हैं...
पर जब वो ही नज़रें आपकी रूह को नोचने पर उतारू हो जाएं, हर हद, हर बंदिश को चीर दें... तो वो प्यार नहीं, एक खौफनाक जुनून बन जाता है।"
जबलपुर। सिंघानिया निवास।
वक्त शाम के सात बजे। ड्राइंग रूम में पसरा हुआ सन्नाटा इतना भारी था कि दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम घड़ी की 'टिक-टिक' भी किसी हथौड़े जैसी लग रही थी।
इस घर का एक अलिखित नियम था—पिछले सत्तर सालों से इस खानदान के आंगन में किसी लड़की की किलकारी नहीं गूंजी थी। और फिर, इस सूखे को खत्म करते हुए पैदा हुई थी— शालू।
इसलिए सिंघानिया परिवार में शालू की महज़ 'चलती' नहीं थी, उसकी हुकूमत दौड़ती थी। वो आँखों का तारा नहीं, पूरे घर की इकलौती धड़कन थी, जिसके एक इशारे पर घर के नियम बदल दिए जाते थे।
लेकिन आज बात नियम की नहीं, उस महारानी के एक ज़िद्दी सपने की थी।
एक ऐसा सपना जो जबलपुर की इन संकरी गलियों से बहुत बड़ा था— IAS बनने का सपना।
"पापा... जबलपुर की कोचिंग में IAS की तैयारी नहीं होती, सिर्फ टाइमपास होता है। मेरा लक्ष्य मसूरी (LBSNAA) है, और उसका रास्ता दिल्ली से होकर गुज़रता है। मुझे दिल्ली जाना ही होगा।" शालू ने अपनी बात इस तरह रखी जैसे वो कोई गुज़ारिश नहीं, फैसला सुना रही हो।
उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी, जिसे बुझाना किसी के बस की बात नहीं थी।
ड्राइंग रूम में फिर से वही सन्नाटा छा गया।
सोफे पर बैठे रिटायर्ड टीचर आलोकनाथ सिंघानिया ने अपना चश्मा उतारा।
उनकी बूढ़ी आँखों में बेटी से दूर जाने का एक अनकहा खौफ था।
पास ही खड़ी माँ रमा बेचेनी से अपनी साड़ी का पल्लू उँगलियों में लपेट रही थी। उन्हें दिल्ली शहर से नहीं, उस शहर की बेदर्द दुनिया से डर लगता था जो मासूम लड़कियों को निगल जाती है।
"बेटा, दिल्ली बहुत दूर है..." आलोकनाथ की आवाज़ कांपी। "हम मिडिल क्लास लोग हैं शालू। वहां का खर्च, वहां का रहन-सहन..."
तभी दरवाज़े पर भारी जूतों की आहट हुई।
मटमैली खाकी पैंट और आधी मुड़ी हुई आस्तीन वाली शर्ट में किशन दरवाज़े पर खड़ा था।
फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में फॉरेस्ट गार्ड, शालू का बड़ा भाई, जो अक्सर अपनी बहन के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता था। आज भी वो हीरो वाली एंट्री ले चुका था।
किशन ने अपने भारी जूते उतारे और सीधे पिता के पास आकर खड़ा हो गया।
"पापा, माँ... शालू सही कह रही है।" किशन की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और ज़बरदस्त कॉन्फिडेंस था। "उसे दिल्ली ही जाना चाहिए। और आप लोग खर्चे की टेंशन क्यों ले रहे हो? जब तक मेरा जिस्म इस खाकी वर्दी को पहन रहा है, शालू की पढ़ाई का एक-एक रुपया मैं अपनी जेब से दूंगा।"
किशन पलटा और अपनी बहन की आँखों में देखते हुए मुस्कुराया, "मेरी बहन इस शहर की कोई आम लड़की नहीं है। वो कलेक्टर बनेगी, कोई चपरासी नहीं।"
कमरे का भारीपन अचानक जैसे हवा में उड़ गया। शालू की आँखों में आंसू तैर गए। इसी एक डायलॉग ने हारी हुई बाज़ी पलट दी थी।
आलोकनाथ ने नम आँखों से अपनी बेटी को देखा। "हम तुझे भेजना नहीं चाहते, ऐसा नहीं है पगले... बस तेरे बिना ये बड़ा सा घर हमें काटने दौड़ेगा। एकदम खाली लगेगा।"
शालू झट से दौड़ी और अपने पापा के गले लग गई। रोते हुए माहौल को चुटकियों में बदलना उसे बखूबी आता था।
"अरे मेरे भोले पापा! अब तो वीडियो कॉल का ज़माना है। आप मुझे रोज़ सुबह-शाम देखना, बस टच नहीं कर पाओगे। ऐसा समझ लेना कि आपकी बेटी का 'लाइव टेलीकास्ट' चल रहा है दिल्ली से!"
शालू की इस बात पर रमा की आँखों से भी आंसू छलक पड़े, लेकिन होंठों पर हँसी आ गई। किशन ने भी अपनी बहन के सिर पर हाथ फेरा।
मिशन दिल्ली— पास हो चुका था।
रात के नौ बज रहे थे। शालू ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फोन स्क्रीन पर एक नंबर डायल किया। नंबर के ऊपर नाम फ्लैश हो रहा था— 'आफत'। ये थी रीना। इस कहानी का दूसरा, लेकिन सबसे ज़रूरी बवंडर।
"हेलो! रीना!" शालू खुशी से चिल्लाई, "पैक योर इमेजिनरी बैग्स डार्लिंग! हम दिल्ली जा रहे हैं! भैया ने पापा को मना लिया!"
दूसरी तरफ से ऐसी चीख आई कि शालू को फोन कान से दूर करना पड़ा।
"क्या! आर यू सीरियस चुड़ैल?! ये तो पार्टी वाली बात है! सुन, कल फाइनल ट्रिप मारते हैं। भेड़ाघाट चलेंगे! जबलपुर को आखिरी बार जी लेते हैं, फिर तो दिल्ली के मुखर्जी नगर की भीड़ में किताबों के बीच ही मरना है हमें!"
शालू हँसी, "डन! कल शाम ठीक 3 बजे।"
डील पक्की हुई और शालू ने मुस्कुराते हुए फोन काट दिया। खुशी के मारे उसने ताज़ी हवा के लिए अपनी बालकनी का दरवाज़ा खोला।
रात के अंधेरे में जबलपुर की सर्द हवा उसके चेहरे से टकराई।
पर उस हवा में आज कुछ अजीब था... एक भारीपन।
शालू की नज़र अचानक सड़क के उस पार गई। बंद पड़ी पान की दुकान के पास, टिमटिमाती स्ट्रीट लाइट के ठीक नीचे, एक लंबी-चौड़ी परछाई खड़ी थी।
उस साये के हाथ में सुलगती हुई सिगरेट की लाल चमक सीधे शालू की ही बालकनी की तरफ उठी हुई थी। वो जो कोई भी था, बिना पलक झपकाए सिर्फ शालू को घूर रहा था।
शालू को अचानक अपनी रीढ़ की हड्डी में एक अजीब सी सिहरन दौड़ती महसूस हुई। घबराकर उसने तुरंत बालकनी का कांच का दरवाज़ा बंद कर दिया और पर्दे खींच दिए।
उसने खुद को तसल्ली दी कि शायद वो कोई राहगीर होगा। पर उसे कहाँ पता था कि उसके 'दिल्ली जाने' की भनक उस अंधेरे में खड़े साये तक पहुँच चुकी थी... और वो साया अब उसे इस शहर से इतनी आसानी से जाने नहीं देने वाला था।