Raaj ke saat phere in Hindi Adventure Stories by jaisy singh books and stories PDF | राज़ के सात फेरे - 2

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राज़ के सात फेरे - 2

अन्विका अपने भारी लहँगे को सँभालते हुए धीरे-धीरे मंडप की ओर बढ़ गई। उसके पायल की मधुर छनछनाहट पूरे हॉल में गूँज रही थी। चारों तरफ बैठे मेहमानों की निगाहें उसी पर टिकी हुई थीं। वहीं दूसरी ओर रुद्रांश अब भी अपनी जगह पर खड़ा था। उसकी आँखें अन्विका पर टिकी थीं, लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
तभी यशवर्धन राठौर उसके पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए मुस्कुराकर बोले—
"क्या हुआ रुद्रांश? यहाँ खड़े-खड़े क्या सोच रहे हो?"
"पंडित जी कब से तुम्हें बुला रहे हैं।"
"जाओ... अब दूल्हे राजा को भी मंडप में पहुँच जाना चाहिए।"
पिता की आवाज सुनकर रुद्रांश जैसे अपने ख्यालों से बाहर आया। अगले ही पल उसके चेहरे पर वही बिंदास मुस्कान लौट आई।
"जी पापा।"
और वह धीमे कदमों से आगे बढ़ता हुआ मंडप में जाकर अन्विका के सामने बैठ गया।
उधर पंडित जी ने मंत्रोच्चार शुरू कर दिया।
पूरा वातावरण वैदिक मंत्रों की ध्वनि से गूँज उठा।
अग्नि की लौ शांत होकर जल रही थी।
चारों तरफ बैठे लोग उस शाही विवाह के साक्षी बने हुए थे।
वहीं यशवर्धन राठौर भी संतुष्ट होकर अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गए।
दूसरी तरफ...
प्रणव राठौर हाथ में पैसों से भरा हुआ काला सूटकेस लिए हॉल से बाहर निकला।
इस समय अधिकतर मेहमान शादी की रस्मों में व्यस्त थे।
बाहर सिर्फ कुछ गार्ड ही मौजूद थे।
प्रणव ने एक गार्ड को इशारे से अपने पास बुलाया।
"ये लो..."
उसने सूटकेस गार्ड को थमाते हुए कहा—
"पापा ने कहा है इसे गरीबों में बाँट देना।"
गार्ड की आँखें खुशी से चमक उठीं।
"जी सर।"
लेकिन...
जहाँ गार्ड के चेहरे पर खुशी थी...
वहीं प्रणव के चेहरे पर ना खुशी थी...
ना संतोष...
बल्कि एक अजीब सी बेचैनी और मजबूरी साफ दिखाई दे रही थी।
तभी पीछे से एक मधुर आवाज सुनाई दी—
"आप यहाँ क्या कर रहे हैं?"
"अंदर चलिए... सब लोग आपको ढूँढ़ रहे हैं।"
आवाज सुनकर प्रणव पलटा।
और सामने खड़ी चंचल को देखकर उसके चेहरे के भाव और कठोर हो गए।
क्रीम रंग की साड़ी में सजी चंचल मुस्कुरा रही थी।
प्रणव तुरंत उसके करीब आया और धीमी लेकिन गुस्से से भरी आवाज में बोला—
"मुझे शामिल नहीं होना इस शादी में।"
"मेरा दम घुट रहा है।"
चंचल के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
वह धीरे से बोली—
"जरा धीरे बोलिए प्रणव जी।"
"अगर किसी ने सुन लिया ना..."
"तो सच में भूचाल आ जाएगा।"
फिर उसकी आँखों में एक अलग ही चमक उतर आई।
"अब बिना तमाशा किए अंदर चलिए।"
"और खुशी-खुशी शादी में शामिल होइए।"
"किसी को जरा सा भी शक नहीं होना चाहिए।"
"समझे आप?"
प्रणव ने बिना कुछ कहे अपना हाथ उसके हाथ से छुड़ा लिया।
और गुस्से में वापस हॉल की ओर बढ़ गया।
उधर...
चंचल उसे जाते हुए देखकर मुस्कुरा उठी।
"कब समझेंगे आप प्रणव जी..."
"इस खेल में खुश होने का दिखावा करना कितना जरूरी है।"
"वरना जो सपना हम पिछले पाँच सालों से बुन रहे हैं..."
"वो पूरा कैसे होगा?"
उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।
और अगले ही पल वो भी वापस हॉल के अंदर चली गई।
इधर...
मंडप में बैठी कुसुम मल्होत्रा की आँखें नम थीं।
समय आ चुका था...
अपनी बेटी का कन्यादान करने का।
उनके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे।
अन्विका भी अपनी माँ को देख रही थी।
उसकी आँखों में भी नमी उतर आई।
पंडित जी मंत्र पढ़ते हुए बोले—
"आज माता अपनी पुत्री का कन्यादान करके उसका हाथ वर के हाथों में सौंपेंगी।"
कुसुम ने काँपते हाथों से अन्विका का हाथ पकड़ा।
और उसे धीरे से रुद्रांश के हाथों में रख दिया।
उस पल उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने अपनी बेटी का माथा चूम लिया।
"हमेशा खुश रहना बेटा..."
"भगवान तुम्हें दुनिया की हर खुशी दे।"
पंडित जी मंत्र पढ़ते हुए बोले—
"आज से कन्या की सारी जिम्मेदारी वर को सौंपी जाती है।"
"इसके सम्मान, सुरक्षा और सुख-दुख का उत्तरदायित्व अब आपका है।"
ये सुनते ही...
रुद्रांश ने अचानक अन्विका का हाथ कसकर पकड़ लिया।
इतना कसकर कि अन्विका को दर्द होने लगा।
लेकिन उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई।
और उसी पल...
रुद्रांश के मन में एक ठंडी आवाज गूँजी—
"आज से हर पल मेरी यही कोशिश रहेगी..."
"कैसे तुम्हें और तुम्हारे सम्मान को टुकड़े-टुकड़े कर दूँ।"
दूसरी तरफ...
दर्द सहते हुए भी अन्विका के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
उसने मन ही मन कहा—
"वादा है तुमसे रुद्रांश..."
"तुम्हारे दिए हर दर्द को मैं सूद समेत तुम्हें वापस लौटाऊँगी..."कन्यादान की रस्म पूरी होते ही पंडित जी ने अग्नि में घी की आहुति दी।
पूरा मंडप वेद मंत्रों की ध्वनि से गूँज उठा।
अग्नि की लपटें धीरे-धीरे ऊपर उठ रही थीं, मानो स्वयं देवता इस विवाह के साक्षी बने हों।
इधर चारों तरफ बैठे मेहमान खुशी से ताली बजा रहे थे।
वहीं कुसुम मल्होत्रा अपनी नम आँखों को बार-बार पोंछ रही थीं।
चंचल मुस्कुराते हुए आगे बढ़ी।
उसके हाथों में लाल रंग का पवित्र दुपट्टा था।
उसने बड़े प्यार से अन्विका के दुपट्टे को रुद्रांश के शेरवानी के पटके से बाँधते हुए मुस्कुराकर कहा—
"भगवान करे ये रिश्ता हमेशा ऐसे ही बंधा रहे।"
"आप दोनों का साथ कभी ना टूटे।"
उसकी बात सुनकर पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
लेकिन...
शायद कोई नहीं जानता था कि इस गाठ के पीछे कितनी नफरत बंधी हुई थी।
कुछ ही पल बाद...
पंडित जी की गंभीर आवाज गूँजी—
"अब वर-वधू सात फेरे लेंगे।"
दोनों अपनी जगह से उठ खड़े हुए।
पूरा वातावरण पवित्र मंत्रों से भर चुका था।
कैमरों की फ्लैश लगातार चमक रही थीं।
सभी मेहमान साँसें रोककर इस शुभ घड़ी को देख रहे थे।
पंडित जी बोले—
"पहला फेरा..."
"इस फेरे के साथ पति-पत्नी जीवन की हर जिम्मेदारी मिलकर निभाने का वचन लेते हैं।"
रुद्रांश आगे बढ़ा।
उसके पीछे अन्विका थी।
लेकिन उसके मन में एक जहरीली मुस्कान उभर आई।
"आज से तुम्हारे कंधों पर जिम्मेदारियों का ऐसा बोझ डालूँगा कि उसके नीचे दबकर तुम्हारा दम घुट जाएगा।"
उधर अन्विका के होंठों पर भी हल्की मुस्कान थी।
"मैं तुम्हें कोई भी जिम्मेदारी निभाने के लायक नहीं छोड़ूँगी।"
"तुम्हारी ताकत ही तुमसे छीन लूँगी।"
पंडित जी की आवाज फिर गूँजी—
"दूसरा फेरा..."
"पति-पत्नी एक-दूसरे की शक्ति बनेंगे।"
इस बार...
दोनों के मन में एक ही विचार था।
"आज से मेरा लक्ष्य सिर्फ तुम्हें कमजोर करना है।"
दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी...
लेकिन दिलों में सिर्फ जहर भरा हुआ था।
"तीसरा फेरा..."
"धन, समृद्धि और सुखी जीवन के लिए।"
अन्विका की आँखों में ठंडी आग उतर आई।
"बहुत घमंड है ना तुम्हें अपने रुतबे और ताकत पर?"
"मैं तुम्हें सड़क का भिखारी बना दूँगी।"
"तुम्हारा एक-एक साम्राज्य राख में बदल दूँगी।"
उधर रुद्रांश के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
"तुम्हें अपने पैसों पर बड़ा घमंड है ना?"
"मैं तुम्हें एक-एक रुपये के लिए मोहताज कर दूँगा।"
"तुम्हारी पहचान ही तुमसे छीन लूँगा।"
अग्नि की लपटें तेज हो उठीं।
मानो आने वाले तूफान का संकेत दे रही हों।
"चौथा फेरा..."
"खुशी और प्रेम के लिए।"
इस बार दोनों के कदम साथ चल रहे थे...
लेकिन उनके दिल एक-दूसरे से कोसों दूर थे।
अन्विका मन ही मन बोली—
"मैं तुम्हारी हर खुशी को आग लगा दूँगी।"
"और रही बात प्रेम की..."
"तो इस जन्म में तुम कभी मेरा प्यार नहीं पा सकोगे।"
रुद्रांश की आँखों में भी वही नफरत थी।
"तुम्हारे हिस्से में सिर्फ दर्द होगा।"
"मोहब्बत नहीं।"
"पाँचवाँ फेरा..."
"परिवार और संतान की खुशियों के लिए।"
पंडित जी की बात सुनते ही...
अन्विका के होंठों पर अचानक एक अजीब सी मुस्कान आ गई।
उसकी आँखों में नफरत की चमक साफ दिखाई दे रही थी।
"आज के बाद इस परिवार में कभी खुशियाँ नहीं आएँगी।"
"राठौर परिवार की हर मुस्कान छीन लूँगी मैं।"
दूसरी तरफ रुद्रांश बस चुपचाप उसे देख रहा था।
लेकिन उसकी आँखों में भी एक तूफान दफन था।
"छठा फेरा..."
"हर परिस्थिति में एक-दूसरे का साथ निभाने का वचन।"
इस बार रुद्रांश मुस्कुरा उठा।
"तुम्हें मेरा साथ किसी क़ीमत पर नहीं मिलेगा।"
"मैं तुम्हें अकेला रहने पर मजबूर कर दूँगा।"
"इतना अकेला कि तुम्हारी आवाज सुनने वाला भी कोई नहीं होगा।"
अन्विका ने भी मन ही मन कहा—
"मैं तुमसे तुम्हारा हर सहारा छीन लूँगी।"
"तुम्हें इतना लाचार कर दूँगी कि तुम्हें खुद पर तरस आएगा।"
अब समय था...
अंतिम फेरे का।
पंडित जी की गंभीर आवाज फिर गूँजी—
"सातवाँ और अंतिम फेरा..."
"सात जन्मों तक साथ निभाने का वचन।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
हर चेहरे पर मुस्कान थी।
लेकिन...
दो लोग ऐसे भी थे...
जो एक-दूसरे के साथ सात जन्म नहीं...
बल्कि एक जन्म भी नहीं बिताना चाहते थे।
अन्विका ने मन ही मन कहा—
"मैं तुम्हारी जिंदगी में इतने दर्द भर दूँगी..."
"कि तुम भगवान से प्रार्थना करोगे कि अगले किसी भी जन्म में मेरा सामना तुमसे ना हो।"
उधर रुद्रांश की आँखों में एक ठंडी मुस्कान उतर आई।
"आज से..."
"अभी से..."
"अन्विका मल्होत्रा..."
"तुम्हारी जिंदगी किसी नरक से कम नहीं होगी।"
"आई प्रॉमिस यू..."
और उसी के साथ...
सात फेरे पूरे हो गए।
पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले—
"आज से आप दोनों पति-पत्नी हैं।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
इसके बाद रुद्रांश ने सिंदूर उठाया।
उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे अन्विका की माँग तक पहुँचीं।
और अगले ही पल...
उसकी माँग सिंदूर से भर गई।
फिर उसने अपने हाथों से मंगलसूत्र उठाकर अन्विका के गले में पहना दिया।
चारों तरफ शंख और तालियों की आवाज गूँज उठी।
हर कोई मुस्कुरा रहा था।
लेकिन...
शायद इस भीड़ में कोई ऐसा भी था जो इस शादी से खुश नहीं था।
क्योंकि आज सिर्फ एक शादी नहीं हुई थी...
बल्कि शुरू हुई थी...
नफरत की एक ऐसी कहानी...
जो ना जाने कितनी जिंदगियाँ तबाह करने वाली थी...


🌙 Chapter ending lines:
सात फेरे पूरे हो चुके थे...
दुनिया की नजरों में दो लोग एक पवित्र बंधन में बंध चुके थे...
लेकिन...
उन सात फेरों के साथ ही दो दिलों ने एक-दूसरे को बर्बाद करने की कसम भी खाई थी।
एक तरफ थी...
अन्विका मल्होत्रा...
जो राठौर परिवार के सर्वनाश का सपना लिए उनकी बहू बनकर आई थी।
और दूसरी तरफ था...
रुद्रांश राठौर...
जो अपनी मुस्कान के पीछे एक ऐसा राज़ छुपाए बैठा था...
जिससे शायद अभी तक पूरी दुनिया अनजान थी।
लेकिन...
अगर सिर्फ यही सच होता...
तो शायद कहानी इतनी खतरनाक ना होती।
क्योंकि इस खेल में सिर्फ अन्विका और रुद्रांश ही खिलाड़ी नहीं थे...
कहीं और भी...
कुछ लोग मुस्कुरा रहे थे...
कुछ लोग...
पिछले पाँच सालों से एक ऐसा जाल बुन रहे थे...
जिसका अंदाजा शायद किसी को नहीं था।
आखिर क्यों राठौर परिवार से इतनी नफरत करती है अन्विका?
क्या है रुद्रांश का असली मकसद?
प्रणव इस शादी से खुश क्यों नहीं है?
और चंचल आखिर कौन सा खेल खेल रही है?
क्या नफरत की नींव पर बना ये रिश्ता...
एक दिन मोहब्बत में बदलेगा?
या फिर...
ये सात फेरे...
कई जिंदगियों की बर्बादी का कारण बनेंगे?
जानने के लिए पढ़ते रहिए...

❤️ "राज़ के सात फेरे" ❤️

To Be Continued...

❤️ Dear Lovely Readers ❤️
"राज़ के सात फेरे" का ये अध्याय यहीं समाप्त होता है।
उम्मीद है आपको रुद्रांश और अन्विका की ये रहस्यमयी और नफरत से भरी शुरुआत पसंद आ रही होगी।
अगर आपको ये अध्याय अच्छा लगा हो तो कृपया इसे ❤️ Like जरूर करें।
💬 Comment करके बताइए कि आपको अब तक सबसे ज्यादा कौन सा किरदार रहस्यमयी या दिलचस्प लगा—
अन्विका, रुद्रांश, कुसुम, यशवर्धन, प्रणव या चंचल?
⭐ अपना Review देना बिल्कुल मत भूलिए, क्योंकि आपके Review और Support से ही मुझे और भी बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है।
📌 कहानी को Follow जरूर करें ताकि आने वाले रोमांच, रहस्य और इमोशंस से भरे अध्याय आपसे मिस ना हों।
📢 और अगर आपको लगता है कि "राज़ के सात फेरे" दूसरों को भी पसंद आएगी, तो इसे Share जरूर करें।
मिलते हैं अगले अध्याय में...
तब तक के लिए...
ढेर सारा प्यार और धन्यवाद ❤️