Dil ne Der se Chuna - 2 in Hindi Love Stories by priyanshi bhuva books and stories PDF | दिल ने देर से चुना - 2

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दिल ने देर से चुना - 2

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Part 2 — सपनों की कीमत

आरोही ने उस रात बहुत सोचने के बाद आखिरकार फैसला कर लिया था कि वह अपना सपना नहीं छोड़ेगी। घर में पैसे नहीं थे, पिता के ऊपर कर्ज था और मां लगातार यही समझा रही थीं कि पहले घर संभालना जरूरी है, लेकिन आरोही के मन में एक बात साफ थी—अगर उसने आज डरकर अपना सपना छोड़ दिया, तो शायद जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाएगी। अगले दिन सुबह वह अपनी पुरानी डायरी लेकर आरव, कबीर और विवान के पास पहुंची। डायरी के पहले पन्ने पर उसने बड़े अक्षरों में लिखा था—"मेरी कंपनी।" कबीर ने पन्ना देखा और बोला, "कंपनी तो बना देंगे, लेकिन नाम क्या होगा? 'तीन बेरोजगारों की मेहनत और एक लड़की का गुस्सा'?" आरोही ने उसे घूरकर देखा। "तुम्हारा नाम कंपनी में नहीं होगा।" कबीर ने तुरंत कहा, "तो फिर मैं निवेशक भी नहीं हूं।" विवान हंस पड़ा और आरव ने पहली बार कई दिनों बाद आरोही को खुलकर मुस्कुराते देखा।

उनके पास पैसे बहुत कम थे, लेकिन हौसला बहुत था। विवान ने अपनी बचत निकाल दी। कबीर ने अपने पिता से झूठ बोलकर पैसे लेने की कोशिश की, लेकिन अगले ही दिन उसके पिता ने उसे पकड़ लिया। "कहां खर्च किए पैसे?" उन्होंने पूछा। कबीर कुछ सेकंड चुप रहा और बोला, "देश की अर्थव्यवस्था सुधारने में।" उसके पिता ने घूरकर देखा। "किस देश की?" कबीर ने धीरे से कहा, "अपने दोस्त की।" उस दिन उसे खूब डांट पड़ी, लेकिन आखिरकार उसके पिता ने थोड़ी मदद कर दी। आरव ने अपनी बाइक बेचने का फैसला किया। आरोही को जब पता चला तो उसने साफ मना कर दिया। "मैं तुम्हारी बाइक नहीं बिकवाऊंगी।" आरव मुस्कुराया, "बाइक दोबारा खरीदी जा सकती है। सपना दोबारा नहीं।" आरोही कुछ बोल नहीं पाई।

उन चारों ने मिलकर एक छोटा-सा ऑफिस किराए पर लिया। ऑफिस इतना छोटा था कि अगर कबीर कुर्सी पीछे करता तो सामने बैठे विवान के घुटने से टकरा जाता। पहले दिन ही कबीर ने कहा, "अगर हमारी कंपनी सफल नहीं हुई तो कम से कम इस कमरे में चार लोग एक साथ बैठने की ट्रेनिंग तो मिल जाएगी।" आरोही ने उसे फाइल से मारा। उस छोटी-सी जगह में उनकी बड़ी दुनिया बसने लगी।

शुरुआत आसान नहीं थी। पहले महीने सिर्फ सात orders मिले। दूसरे महीने पांच। तीसरे महीने एक भी बड़ा ग्राहक नहीं आया। आरोही रात-रात भर बैठकर हिसाब देखती और सोचती कि शायद उसके परिवार वाले सही थे। शायद उसका सपना सच में बहुत बड़ा था। एक रात उसने ऑफिस की लाइट बंद की और अकेली बैठी रही। आरव ने उसे देखा और पूछा, "घर नहीं जाना?" आरोही ने धीमे से कहा, "अगर मैं हार गई तो?" आरव उसके सामने बैठ गया। "तू हार नहीं रही। तू सीख रही है।" आरोही ने पूछा, "और अगर सब खत्म हो गया तो?" आरव ने मुस्कुराकर कहा, "तो फिर वहीं से शुरू करेंगे जहां खत्म हुआ।"

उसी समय दरवाजे पर कबीर आया और बोला, "बहुत emotional बातें हो गई हों तो कोई मुझे भी बताए कि रात के खाने के पैसे किसके पास हैं?" आरोही हंस पड़ी। विवान ने कहा, "तेरे पास थे।" कबीर ने तुरंत जवाब दिया, "थे। मैंने समोसा खा लिया।" चारों ने उसे घूरकर देखा और वह बोला, "क्या? भूख भी तो एक business problem है।"

धीरे-धीरे उनका छोटा business चलने लगा। एक customer दूसरे customer को लाने लगा। सोशल मीडिया पर आरोही के products की चर्चा होने लगी। एक दिन उसे पहला बड़ा order मिला। वह इतनी खुश हुई कि उसने तुरंत तीनों दोस्तों को फोन किया। कबीर ने फोन उठाकर कहा, "अगर फिर से कोई छोटा order है तो मैं सो रहा हूं।" आरोही चिल्लाई, "बड़ा order है!" कबीर बिस्तर से गिर पड़ा। "कितना बड़ा?" उसने पूछा। आरोही ने amount बताया। कुछ सेकंड तक दूसरी तरफ चुप्पी रही। फिर कबीर बोला, "मैडम, अब तो मैं आपके ऑफिस में चपरासी भी बनने को तैयार हूं।"

लेकिन उनकी सफलता जितनी बढ़ रही थी, किसी की जलन भी उतनी ही बढ़ रही थी। राघव दूर से सब देख रहा था। वह आरोही को पसंद करता था, लेकिन उसे यह स्वीकार नहीं था कि आरोही उसके बिना खुश रह सकती है। उससे भी ज्यादा उसे आरव, कबीर और विवान से परेशानी थी। उसे लगता था कि अगर ये तीनों आरोही की जिंदगी से निकल जाएं तो एक दिन आरोही खुद उसके पास आएगी।

राघव ने पहली चाल चली। उसने आरोही के सामने आरव के बारे में झूठ बोला कि आरव secretly उसकी कंपनी के पैसों से अपना अलग business शुरू करना चाहता है। आरोही ने पहले तो विश्वास नहीं किया, लेकिन राघव ने कुछ नकली documents भी दिखा दिए। आरोही ने आरव से सीधे पूछ लिया। आरव ने documents देखकर कहा, "ये मेरे signatures नहीं हैं।" विवान ने documents को ध्यान से देखा और कुछ ही घंटों में पता लगा लिया कि वे नकली थे। आरोही ने राघव को फोन किया। "तुमने ये क्यों किया?" राघव ने शांत आवाज में कहा, "मैं बस तुम्हें बचाना चाहता था।" आरोही ने कहा, "मुझे तुम्हारी मदद नहीं चाहिए। और मेरी दोस्ती तोड़ने की कोशिश मत करना।" राघव पहली बार असफल हुआ।

लेकिन उसने हार नहीं मानी।

कुछ महीनों बाद उसने कबीर के नाम से एक fake social media account बनाकर आरोही के business के खिलाफ गलत comments करना शुरू कर दिया। कुछ customers ने शिकायत की। आरोही ने कबीर से पूछा तो कबीर ने कसम खाकर कहा, "मैं इतना खाली नहीं हूं कि अपने ही business को बदनाम करूं। मैं तो दूसरों का भी time नहीं बचने देता।" विवान ने technical तरीके से पता लगाया और फिर से राघव का नाम सामने आया।

इस बार तीनों दोस्तों ने राघव को चेतावनी दी। आरव ने कहा, "हमसे जितनी दुश्मनी करनी है कर, लेकिन आरोही के सपने के साथ खेला तो हम चुप नहीं बैठेंगे।" राघव हंसकर बोला, "तुम लोग सोचते हो कि हमेशा उसे बचा लोगे?" विवान ने जवाब दिया, "हमेशा नहीं। लेकिन जब तक वो खुद खड़ी नहीं हो जाती, तब तक जरूर।"

राघव की तीसरी कोशिश ज्यादा खतरनाक थी। उसने आरोही के परिवार में गलतफहमी पैदा कर दी। उसने उसके पिता से कहा कि business में बहुत पैसा डूब रहा है और आरोही जल्द ही और कर्ज लेगी। पिता ने आरोही को घर बुलाकर कहा, "अब बस करो। हमें और कर्ज नहीं चाहिए।" आरोही की आंखों में आंसू आ गए। "पापा, मैं संभाल लूंगी।" पिता ने कहा, "हर बार यही कहती हो। लेकिन अगर कल सब कुछ खत्म हो गया तो?" आरोही के पास कोई जवाब नहीं था।

उस रात उसने business बंद करने का फैसला कर लिया।

अगली सुबह उसने ऑफिस में जाकर तीनों को बताया। "मैं सब खत्म कर रही हूं।" कबीर ने सोचा वह मजाक कर रही है। "क्या खत्म? मेरा lunch?" आरोही ने उसकी तरफ देखा तो कबीर समझ गया कि बात गंभीर है। विवान ने कुछ नहीं कहा। आरव ने सिर्फ एक सवाल पूछा, "तू सच में यह चाहती है?" आरोही की आंखों में आंसू थे। "नहीं। लेकिन मेरे पास कोई रास्ता नहीं है।"

आरव ने अपनी जेब से एक चाबी निकालकर टेबल पर रख दी। "ये क्या है?" आरोही ने पूछा। आरव बोला, "मेरी बाइक बेचने के बाद जो पैसे मिले थे, उनमें से कुछ मैंने बचाकर रखे थे।" आरोही ने चौंककर उसकी तरफ देखा। "तुमने वो पैसे अभी तक नहीं लगाए?" आरव ने कहा, "मैं चाहता था कि जरूरत के समय काम आएं।" विवान ने अपनी बचत भी निकालकर रख दी। कबीर ने अपनी जेबें उलट दीं और बोला, "मेरे पास दो सौ सैंतालीस रुपये हैं। लेकिन दिल पूरा है।" आरोही रोते हुए हंस पड़ी।

उस दिन उसने business बंद नहीं किया।

और शायद वही उसके जीवन का पहला बड़ा turning point था।

अगले दो साल में उसका business तेजी से बढ़ा। उसने छोटे ऑफिस को बड़ा किया। फिर दूसरी branch खोली। धीरे-धीरे उसका नाम शहर के बड़े business circles में आने लगा। अब वह सिर्फ सपने देखने वाली लड़की नहीं थी। वह उन्हें पूरा करने लगी थी।

लेकिन इसी बीच एक और रिश्ता उसकी जिंदगी में धीरे-धीरे जगह बना रहा था।

एक business conference में आरोही की मुलाकात रोहन से हुई।

रोहन बाकी लोगों से अलग था। वह बहुत confident था, अच्छी बातें करता था और business को समझता था। उसने आरोही की presentation सुनी और कहा, "आपमें बहुत potential है, लेकिन आपकी company अभी उस level पर नहीं है जहां उसे होना चाहिए।" आरोही को उसका confidence अच्छा लगा। उसने पूछा, "और आपको क्या लगता है कि उसे उस level पर कौन ले जा सकता है?" रोहन मुस्कुराया, "अगर आप मुझे मौका दें तो शायद मैं।"

आरोही ने पहली बार किसी अजनबी को अपने business के बारे में इतनी खुलकर बात करते देखा था।

उनकी meetings बढ़ने लगीं। पहले business की बातें होतीं, फिर जिंदगी की। रोहन आरोही के संघर्ष की तारीफ करता। वह कहता, "आपने जो बनाया है, वो बहुत कम लोग कर पाते हैं।" आरोही को उसकी बातें अच्छी लगतीं, क्योंकि रोहन उसकी मेहनत को समझता हुआ दिखाई देता था।

एक शाम बारिश में दोनों एक cafe के बाहर खड़े थे। रोहन ने पूछा, "क्या आपको कभी प्यार हुआ है?" आरोही कुछ पल चुप रही। "शायद हुआ था... लेकिन बाद में समझ आया कि वो प्यार नहीं था।" रोहन ने पूछा, "और अब?" आरोही ने उसकी तरफ देखा। "अब मुझे प्यार पर भरोसा नहीं है।" रोहन मुस्कुराया। "तो फिर भरोसा मुझ पर कर लीजिए।"

उसी समय दूर सड़क के दूसरी तरफ आरव, कबीर और विवान की गाड़ी खड़ी थी। तीनों ने रोहन और आरोही को साथ देखा। कबीर ने आरव की तरफ देखा और बोला, "भाई, कहानी में नया character आ गया।" आरव ने कुछ नहीं कहा। विवान ने उसकी तरफ देखा और पूछा, "तू ठीक है?" आरव ने मुस्कुराकर कहा, "अगर आरोही खुश है तो मैं ठीक हूं।"

कबीर ने पहली बार आरव को ध्यान से देखा। उसे पता था कि आरव के दिल में कुछ टूट रहा था।

लेकिन इस बार तीनों दोस्तों ने तय किया कि वे आरोही के फैसले में दखल नहीं देंगे।

आरोही और रोहन की नजदीकियां बढ़ती गईं। रोहन धीरे-धीरे उसके business का हिस्सा बनने लगा। वह contracts देखता, investors से बात करता और नई branches की planning में मदद करता। आरोही को लगता था कि आखिर उसे ऐसा इंसान मिल गया है जो उसके सपने को समझता है।

लेकिन एक बात वह नहीं जानती थी।

रोहन को आरोही से ज्यादा उसके business में दिलचस्पी थी।

वह धीरे-धीरे company के सारे important documents अपने control में ले रहा था।

आरोही को इसकी भनक तक नहीं लगी।

एक दिन उसने रोहन से कहा, "मैंने तुम पर जितना भरोसा किया है, उतना शायद किसी पर नहीं किया।"

रोहन ने उसके हाथ पर हाथ रखा और कहा, "और मैं उस भरोसे को कभी नहीं तोड़ूंगा।"

उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

लेकिन जैसे ही आरोही वहां से चली गई, उसकी मुस्कान बदल गई।

उसने अपने laptop पर company की files खोलीं और धीमे से कहा—

"बस थोड़ा और वक्त... फिर ये पूरी company मेरी होगी।"

उधर आरोही को बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि जिस इंसान को वह अपनी जिंदगी का सबसे भरोसेमंद इंसान समझ रही है, वही उसके नौ साल के संघर्ष को एक ही दिन में उससे छीनने वाला है।

और उस दिन...

सिर्फ उसका business नहीं टूटेगा।

उसका भरोसा भी टूटेगा।

Next part preview:

रोहन का असली खेल शुरू होगा। आरोही के signatures से एक ऐसा legal trap तैयार होगा जिससे उसकी पूरी company उसके हाथ से निकल जाएगी। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल होगा—**क्या आरव, कबीर और विवान समय रहते आरोही को बचा पाएंगे?