अध्याय 6: वह रात
उस रात अंगद घर नहीं गया।
वह स्टेशन के बाहर लगी एक लोहे की बेंच पर बैठा रहा।
बारिश शुरू हो चुकी थी।
हल्की-हल्की बूँदें प्लेटफ़ॉर्म की सीढ़ियों पर गिर रही थीं और पीली रोशनी में चमक रही थीं।
उसकी हथेली अब भी बंद थी।
अंदर वही चाँदी की अंगूठी थी।
एम.
उसने उसे फिर खोला।
फिर देखा।
फिर मुट्ठी बंद कर ली।
दिमाग में मीरा की आखिरी बात गूँज रही थी—
“याद करो।”
लेकिन याद करे क्या?
उसे अपनी ज़िंदगी याद थी।
कम से कम उसे ऐसा लगता था।
कॉलेज।
पहली नौकरी।
पहला बड़ा प्रोजेक्ट।
अपने पिता से हुई आखिरी बहस।
अपनी महत्वाकांक्षा।
अपने सपने।
सब कुछ।
लेकिन जब भी वह 16 अगस्त 2016 के बारे में सोचता…
उसके दिमाग में एक काली दीवार खड़ी हो जाती।
जैसे किसी ने उस दिन को उसकी यादों से काटकर अलग कर दिया हो।
---
सुबह के करीब चार बजे अंगद घर पहुँचा।
कमरे में अंधेरा था।
उसने लाइट नहीं जलाई।
सीधा अपने बिस्तर पर बैठ गया।
फोन निकाला।
उसने इंटरनेट पर तारीख खोजी।
16 अगस्त 2016।
कुछ खास नहीं।
बारिश।
मुंबई में सामान्य ट्रैफिक।
कुछ स्थानीय खबरें।
उसने खोज को और छोटा किया—
मुंबई लोकल दुर्घटना 16 अगस्त 2016।
स्क्रीन पर कई खबरें सामने आईं।
कुछ छोटी घटनाएँ।
कुछ मामूली हादसे।
लेकिन एक खबर देखकर उसकी उँगली स्क्रीन पर रुक गई।
उसकी धड़कन अचानक तेज़ हो गई।
“रात की लोकल में गंभीर दुर्घटना, कई यात्री घायल।”
अंगद ने खबर खोली।
उसने पढ़ना शुरू किया।
घटना का समय—
रात 11:58।
उसकी आँखें फैल गईं।
उसने नीचे स्क्रॉल किया।
ट्रेन का नाम पढ़ते ही उसके हाथ काँपने लगे।
वही ट्रेन।
वही रूट।
वही रात।
उसने खबर की तस्वीर खोली।
धुंधली-सी तस्वीर थी।
दुर्घटनाग्रस्त ट्रेन।
टूटा हुआ डिब्बा।
पटरियों के पास जमा भीड़।
अंगद तस्वीर को घूरता रहा।
फिर उसने खबर में घायलों की सूची देखी।
कई नाम थे।
लेकिन एक नाम पर उसकी नजर टिक गई।
अंगद मल्होत्रा।
उसकी साँस रुक गई।
कुछ सेकंड तक वह स्क्रीन को देखता रहा।
फिर धीरे से फोन नीचे कर दिया।
“नहीं…”
उसने सिर हिलाया।
“ये मेरा नाम नहीं हो सकता।”
लेकिन नाम वही था।
उम्र भी वही।
शहर भी वही।
---
उसने तुरंत दूसरी वेबसाइट खोली।
फिर तीसरी।
फिर पुरानी खबरों के संग्रह में खोजा।
हर जगह एक ही बात।
16 अगस्त 2016।
रात 11:58।
लोकल ट्रेन दुर्घटना।
और फिर—
दो यात्री गंभीर रूप से घायल।
एक का नाम अंगद था।
दूसरे नाम की जगह सिर्फ इतना लिखा था—
“एक अज्ञात युवती।”
अंगद की आँखें उस शब्द पर अटक गईं।
युवती।
उसने फोन बंद कर दिया।
कमरे में सन्नाटा था।
और उस सन्नाटे में उसे पहली बार महसूस हुआ—
शायद मीरा सिर्फ उसकी कल्पना नहीं थी।
---
अगली रात वह फिर स्टेशन पहुँचा।
लेकिन इस बार उसके हाथ में नोटबुक नहीं थी।
उसके पास सिर्फ एक सवाल था।
मीरा कौन थी?
11:52।
ट्रेन आई।
अंगद अंदर चढ़ा।
आज डिब्बा पहले से ज्यादा खाली था।
वह उसी सीट पर जाकर बैठ गया।
कुछ देर तक कुछ नहीं हुआ।
11:55।
11:56।
11:57।
फिर—
सामने की सीट पर मीरा आकर बैठ गई।
अंगद ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे सब पता चल गया।”
मीरा चुप रही।
“दस साल पहले हादसा हुआ था।”
चुप्पी।
“मैं उस ट्रेन में था।”
मीरा की आँखें धीरे से उठीं।
“हाँ।”
अंगद के अंदर कुछ टूट-सा गया।
“तुम भी थीं?”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
अंगद आगे झुका।
“तुम मर गई थीं?”
मीरा की आँखों में पहली बार नमी दिखाई दी।
“तुम्हें क्या लगता है?”
अंगद ने जवाब नहीं दिया।
“अगर तुम मर चुकी हो…” उसने धीरे से कहा, “तो मैं तुमसे बात कैसे कर रहा हूँ?”
मीरा ने खिड़की के बाहर देखा।
“शायद यही सवाल तुम्हें पूछना चाहिए।”
“किससे?”
“खुद से।”
---
अंगद झुंझला गया।
“पहेलियाँ मत बुझाओ, मीरा!”
उसकी आवाज़ पूरे डिब्बे में गूँज गई।
“मुझे जानना है कि उस रात क्या हुआ था!”
मीरा उसकी तरफ मुड़ी।
“तुम सच जानना चाहते हो?”
“हाँ।”
“पूरा सच?”
“हाँ।”
मीरा कुछ सेकंड उसे देखती रही।
फिर बोली—
“तो आज जो देखोगे… उससे भागना मत।”
अंगद कुछ समझ पाता, उससे पहले ट्रेन की रफ्तार अचानक बढ़ गई।
बाहर की रोशनियाँ तेजी से पीछे भागने लगीं।
मीरा ने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं।
और फिर—
डिब्बे की लाइट बुझ गई।
---
अंगद ने आँखें खोलीं।
लेकिन वह अब उसी ट्रेन में नहीं था।
बारिश हो रही थी।
तेज़।
इतनी तेज़ कि सामने खड़ा आदमी भी धुंधला दिखाई दे रहा था।
उसके हाथ में फोन था।
स्क्रीन पर समय—
11:41 PM।
वह खुद को देख सकता था।
कुछ कदम दूर।
फोन पर किसी से बात करते हुए।
“हाँ, मैं समझ रहा हूँ…”
अंगद ने अपनी ही आवाज़ सुनी।
“लेकिन अगर मैंने ये प्रोजेक्ट नहीं लिया तो मौका दोबारा नहीं मिलेगा।”
वर्तमान वाला अंगद स्तब्ध होकर अपनी पुरानी शक्ल को देखता रहा।
वही चेहरा।
वही कपड़े।
वही बैग।
फिर उसकी नजर दूसरी तरफ गई।
एक लड़की प्लेटफ़ॉर्म के किनारे खड़ी थी।
चेहरा बारिश से ढका हुआ।
लेकिन अंगद उसे पहचान गया।
मीरा।
वह उसके पास गई।
“सुनिए…”
पुराना अंगद फोन पर ही व्यस्त था।
मीरा ने फिर कहा—
“ये ट्रेन कहाँ जाएगी?”
पुराने अंगद ने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
“पता नहीं।”
वह आगे बढ़ गई।
वर्तमान अंगद चिल्लाया—
“मीरा!”
लेकिन किसी ने नहीं सुना।
वह दौड़ा।
मीरा के पीछे।
दृश्य बदल गया।
अब दोनों ट्रेन में थे।
पुराना अंगद खिड़की के पास बैठा था।
फोन पर वही बातचीत जारी थी।
मीरा कुछ सीट दूर बैठी थी।
वह बार-बार दरवाज़े की तरफ देख रही थी।
अचानक ट्रेन ने जोरदार झटका खाया।
एक आदमी लड़खड़ाया।
लोग चीखे।
मीरा उठी।
पुराना अंगद ने उसकी तरफ देखा।
बस एक पल के लिए।
उनकी नजरें मिलीं।
मीरा ने कुछ कहा—
लेकिन ट्रेन की आवाज़ में शब्द दब गए।
फिर—
दूसरा झटका।
इस बार बहुत तेज़।
मीरा दरवाज़े की तरफ जा गिरी।
पुराने अंगद ने फोन कान से हटाया।
उसकी आँखों में पहली बार डर आया।
उसने हाथ बढ़ाया—
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
---
“नहीं!”
वर्तमान अंगद चीख पड़ा।
वह मीरा की तरफ दौड़ा।
लेकिन उसका हाथ उसके आर-पार निकल गया।
वह सिर्फ देख सकता था।
कुछ कर नहीं सकता था।
अगले ही पल—
एक भयानक आवाज़ हुई।
लोहे के मुड़ने की।
काँच टूटने की।
लोगों के चीखने की।
ट्रेन बुरी तरह हिली।
अंधेरा।
फिर सन्नाटा।
---
अंगद ने आँखें खोलीं।
वह फिर उसी डिब्बे में था।
साँसें बेकाबू थीं।
उसका चेहरा पसीने से भीग चुका था।
सामने मीरा बैठी थी।
इस बार उसकी आँखों में आँसू थे।
अंगद ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“उस रात…”
वह रुक गया।
“मैं तुम्हें बचा सकता था?”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
अंगद ने फिर पूछा—
“मैंने कोशिश क्यों नहीं की?”
मीरा की आँखों से एक आँसू नीचे गिरा।
उसने बहुत धीरे से कहा—
“तुमने की थी।”
अंगद ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन…”
मीरा ने उसकी बात पूरी की—
“तुम देर से पहुँचे थे।”
अंगद की आँखें भर आईं।
“तुम बची थीं?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
कुछ सेकंड बाद उसने कहा—
“हाँ।”
अंगद की साँस जैसे रुक गई।
“फिर… तुम कहाँ थीं?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
और इस बार उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि अंगद को उसे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।
“मैं अभी भी वहीं हूँ, अंगद।”
ट्रेन की लाइट बुझ गई।
और अंधेरे में…
दूर कहीं मशीन की आवाज़ सुनाई दी—
बीप…
बीप…
बीप…
अंगद ने आँखें खोल दीं।
लेकिन इस बार उसके सामने ट्रेन नहीं थी।
सिर्फ एक सफेद कमरा था।
एक बिस्तर।
और उस पर…
कोई लेटा हुआ था।
फिर दृश्य अचानक टूट गया।
अंगद चीखते हुए अपनी सीट से उठ बैठा।
ट्रेन फिर सामान्य थी।
मीरा गायब थी।
लेकिन अब उसे एक बात पता थी—
हादसे में कोई मरा नहीं था।
कम-से-कम…
मीरा नहीं।