अध्याय 4: समय के खिलाफ
अंगद की आँखें खुली थीं।
लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
डिब्बे की पीली रोशनी सामने थी, लोग अपनी जगह बैठे थे, ट्रेन अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी—फिर भी उसे लग रहा था जैसे सब कुछ किसी मोटे शीशे के पीछे हो।
उसने अपनी हथेलियाँ देखीं।
काँप रही थीं।
उसने मुट्ठी बाँधी।
फिर खोली।
फिर बाँधी।
“शांत हो जा…”
उसने खुद से कहा।
लेकिन दिमाग में सिर्फ एक ही दृश्य घूम रहा था—
दरवाज़ा।
हवा।
एक लड़की।
और उसकी उंगलियों से बस एक सेकंड की दूरी पर छूटती हुई कलाई।
अंगद ने आँखें बंद कर लीं।
तभी ट्रेन की रफ्तार कम होने लगी।
घोषणा हुई।
अगला स्टेशन।
अंगद ने तुरंत आँखें खोलीं।
उसने घड़ी देखी।
11:57।
उसके चेहरे पर अचानक एक विचार आया।
अगर यह सब दोबारा होने वाला है…
तो शायद वह इसे रोक सकता है।
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अगली रात वह 11:30 पर ही स्टेशन पहुँच गया।
इस बार उसके हाथ में फोन नहीं था।
वह प्लेटफ़ॉर्म के उस हिस्से में खड़ा हुआ जहाँ से ट्रेन सबसे साफ दिखाई देती थी।
उसने जेब से एक छोटी नोटबुक निकाली।
ऊपर लिखा—
11:30 — प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचा।
नीचे—
देखते हैं क्या दोहराता है।
उसने कुछ देर इंतज़ार किया।
11:35।
11:40।
11:45।
कुछ भी असामान्य नहीं।
11:50।
एक आदमी चाय लेकर उसके पास से गुज़रा।
अंगद ने उसे देखा।
उसके कप पर नीली स्याही से एक छोटा-सा निशान बना था।
अंगद ने नोट कर लिया।
11:51 — नीला कप।
11:52।
दूर से ट्रेन की रोशनी दिखाई दी।
अंगद की धड़कन तेज़ हो गई।
ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आई।
वह चढ़ गया।
इस बार उसने उसी डिब्बे को चुना।
उसी सीट के सामने खड़ा हो गया।
उसने घड़ी देखी।
11:53।
कुछ नहीं।
11:54।
कुछ नहीं।
11:55।
एक आदमी खाँसा।
अंगद तुरंत उसकी तरफ मुड़ा।
फिर खुद पर झुंझला गया।
“हर चीज़ को संकेत मत समझ…”
11:56।
उसने दरवाज़े की तरफ देखा।
कुछ नहीं।
11:57।
उसने राहत की साँस ली।
“शायद आज नहीं…”
और तभी—
“अंगद।”
उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
आवाज़ पीछे से आई थी।
वह धीरे-धीरे मुड़ा।
मीरा खड़ी थी।
इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।
अंगद कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर उसने नोटबुक उसकी तरफ बढ़ा दी।
“तुम्हें इसके बारे में पता है?”
मीरा ने नोटबुक नहीं ली।
“किसके बारे में?”
“जो हो रहा है उसके बारे में।”
“क्या हो रहा है?”
अंगद की आवाज़ ऊँची हो गई।
“ये सब दोहराया क्यों जा रहा है?”
डिब्बे में बैठे दो लोग उसकी तरफ देखने लगे।
मीरा ने शांत स्वर में कहा—
“धीरे बोलो।”
“तुम जानती हो!”
“हाँ।”
अंगद जैसे जम गया।
पहली बार उसने उससे सीधा जवाब सुना था।
“तो फिर बताओ।”
मीरा चुप रही।
“तुम कौन हो?”
चुप्पी।
“मुझे क्यों जानती हो?”
चुप्पी।
“और ये सब हर रात क्यों दोहराता है?”
मीरा ने खिड़की के बाहर देखा।
बाहर अंधेरा था।
कुछ सेकंड बाद उसने कहा—
“तुम गलत सवाल पूछ रहे हो।”
अंगद झल्लाया।
“तो सही सवाल क्या है?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम यहाँ कितनी बार आ चुके हो?”
अंगद के चेहरे का रंग बदल गया।
“क्या मतलब?”
“जितनी बार तुम्हें याद है… उससे ज्यादा।”
अंगद हँस पड़ा।
वो हँसी डर छुपाने वाली थी।
“तुम मुझे पागल समझ रही हो?”
“नहीं।”
मीरा की आवाज़ बेहद धीमी थी।
“मैं तुम्हें याद दिलाने की कोशिश कर रही हूँ।”
अंगद की हँसी रुक गई।
“क्या?”
मीरा ने बस इतना कहा—
“तुम्हें कल की रात याद है।”
“हाँ।”
“उससे पहले वाली?”
अंगद चुप।
मीरा एक कदम आगे आई।
“उससे पहले वाली?”
अंगद ने माथे पर हाथ रख लिया।
अचानक उसके सिर में तेज़ दर्द उठा।
एक आवाज़…
एक ट्रेन…
किसी के रोने की आवाज़…
और फिर—
एक लड़की का हाथ।
अंगद ने आँखें खोल दीं।
सामने मीरा थी।
लेकिन अब उसका चेहरा धुंधला दिखाई दे रहा था।
“तुमने क्या किया?”
“कुछ नहीं।”
“फिर ये सब क्यों दिख रहा है?”
मीरा ने धीरे से कहा—
“क्योंकि तुम्हारा दिमाग याद करने लगा है।”
अंगद पीछे हट गया।
“क्या याद?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
ट्रेन अचानक एक सुरंग में घुस गई।
पूरा डिब्बा अंधेरे में डूब गया।
एक सेकंड।
दो सेकंड।
तीन—
फिर अचानक रोशनी वापस आई।
अंगद ने सामने देखा।
मीरा गायब थी।
लेकिन इस बार उसकी सीट पर कुछ पड़ा था।
एक कागज़।
अंगद ने उसे उठाया।
कागज़ पर सिर्फ एक तारीख लिखी थी।
16 अगस्त 2016
अंगद कुछ सेकंड तक उस तारीख को देखता रहा।
फिर उसकी आँखें फैल गईं।
उसने धीरे से अपनी जेब से फोन निकाला।
आज की तारीख देखी।
16 अगस्त 2026।
दस साल।
ठीक दस साल।
उसकी उंगलियाँ फोन पर जम गईं।
उसे अचानक लगा जैसे डिब्बे की सारी आवाज़ें दूर चली गई हों।
सिर्फ एक आवाज़ बची थी—
ट्रेन के पहियों की।
धड़ाम…
धड़ाम…
धड़ाम…
और फिर उसके दिमाग में एक आखिरी तस्वीर चमकी—
एक अस्पताल का सफेद कमरा।
एक मशीन।
लगातार बजती हुई—
बीप… बीप… बीप…
अंगद ने झटके से आँखें बंद कर लीं।
जब खोलीं—
वह फिर उसी ट्रेन में था।
लेकिन उसके हाथ में वह कागज़ अभी भी था।
और उस पर लिखी तारीख भी।
16 अगस्त 2016।
पहली बार अंगद को लगा—
शायद वह इस ट्रेन में समय को नहीं बदल रहा।
शायद…
समय उसे किसी चीज़ तक वापस ले जा रहा है।