last letter in Hindi Love Stories by Bittu Jain books and stories PDF | आखिरी चिट्ठी

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आखिरी चिट्ठी

बारिश की शाम थी। नंदिनी स्टेशन की पुरानी बेंच पर बैठी थी। आज ठीक पाँच साल बाद उसने वही जगह चुनी थी, जहाँ आर्यन ने उससे आख़िरी बार कहा था, अगर किस्मत ने चाहा, तो यहीं मिलेंगे।

वह कभी नहीं आया।

हर साल इसी तारीख़ को नंदिनी यहाँ आती थी। कुछ देर उस बेंच पर बैठती, आती-जाती ट्रेनों को देखती और बिना कुछ कहे लौट जाती। उसे लगता था कि शायद किसी दिन भीड़ में वही मुस्कान फिर दिखाई दे जाएगी।

तभी एक बूढ़े चायवाले ने आवाज़ दी, बिटिया... ये चिट्ठी तुम्हारे लिए है।

मेरे लिए?

एक लड़का पाँच साल पहले छोड़ गया था। बोला था, अगर ये लड़की कभी लौटे, तो दे देना।

काँपते हाथों से उसने लिफाफा खोला।

 नंदिनी, अगर ये चिट्ठी तुम्हारे हाथ में है, तो समझना मैं अपना वादा निभाने नहीं आ पाया। उस दिन स्टेशन आते वक्त मेरा एक्सीडेंट हो गया था। डॉक्टर ने कहा था कि शायद मैं बच जाऊँ... पर किस्मत ने साथ नहीं दिया।मैं नहीं चाहता था कि तुम सारी उम्र मेरा इंतज़ार करो। इसलिए ये चिट्ठी छोड़ गया हूँ।एक वादा करो... मेरी यादों को सज़ा मत बनाना। किसी दिन फिर से मुस्कुराना, किसी से प्यार करना... क्योंकि तुम्हारी मुस्कान से ज़्यादा खूबसूरत मैंने कभी कुछ नहीं देखा। तुम्हारा, आर्यन।

नंदिनी की आँखों से आँसू चिट्ठी पर गिरने लगे।

उसे अचानक सब कुछ याद आने लगा।

वही पहली मुलाक़ात... जब आर्यन ने गलती से उसकी किताब उठा ली थी।

वही चाय की दुकान, जहाँ वह हर बार पैसे देने की ज़िद करता था।

वही बारिश, जिसमें उसने अपना जैकेट उसके सिर पर रख दिया था और खुद भीगता रहा।

एक बार उसने मज़ाक में कहा था, अगर मैं कभी खो गया ना, तो मुझे ढूँढने मत आना।

नंदिनी हँस पड़ी थी, तुम कहीं नहीं खोओगे।

आज उसे समझ आया... कुछ लोग सचमुच खो जाते हैं, लेकिन यादों में हमेशा मिलते रहते हैं।

चायवाला धीरे से बोला, बिटिया, आख़िरी दिन भी वो तुम्हारा ही नाम ले रहा था। अस्पताल जाने से पहले मेरे हाथ में ये चिट्ठी देकर बोला था... अगर वो लौटे, तो उसे रोने मत देना।

नंदिनी ने पहली बार उस बूढ़े आदमी को ध्यान से देखा। उसकी आँखें भी नम थीं।

आपने पाँच साल तक इसे संभालकर रखा?

वह मुस्कुराया, कुछ वादे उम्र से बड़े होते हैं।

बारिश अब तेज़ हो चुकी थी।

नंदिनी उठी और स्टेशन के उस कोने तक चली गई जहाँ कभी दोनों ने अपने नाम बेंच पर हल्के से खुरचे थे। लकड़ी घिस चुकी थी, पर उँगलियों को अब भी वे निशान महसूस हो रहे थे।

उसने अपने बैग से एक छोटा-सा सफेद गुलाब निकाला। यह वही फूल था जिसे आर्यन हमेशा कहता था... लाल गुलाब सब देते हैं, सफेद वाला सिर्फ़ सच्चे लोग देते हैं।

उसने फूल वहीं रख दिया।

जाने से पहले उसने चिट्ठी को मोड़ा, सीने से लगाया और आसमान की तरफ देखा।

उसी पल बादलों के बीच से हल्की धूप निकल आई।

नंदिनी मुस्कुराई... शायद पाँच साल में पहली बार।

घर लौटकर उसने आर्यन की सारी तस्वीरें नहीं हटाईं। बस उनके पास एक छोटी-सी पर्ची रख दी।

मैंने तुम्हें भुलाया नहीं... लेकिन तुम्हारी बात मान ली है। अब मैं जीना सीख रही हूँ।

खिड़की के बाहर बारिश थम चुकी थी।

और उस शाम पहली बार उसे लगा कि कुछ लोग बिछड़कर भी हमारी ज़िंदगी से जाते नहीं... वे बस एक आख़िरी चिट्ठी बनकर हमेशा दिल में रह जाते हैं। ❤️