Bad system heavy in the game in Hindi Sports by Virendra Devangan books and stories PDF | खेल में बदहाल सिस्टम भारी

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खेल में बदहाल सिस्टम भारी

भारत के एथलिटों ने ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स-2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए 39 पदक जीते। इसमें 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक शामिल है। ये केवल तमगे नहीं, भारत की खेल आशाओं व अभिलाषाओं का जीता-जागता दृष्टांत है।

यदि कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 के खेलों से वर्तमान खेल की तुलना की जाए, तो ये पदक आधे के करीब हैं। तब भारत के खिलाड़ियों ने 61 पदक अपने नाम किए थे।

ग्लास्गो में महिलाएं पुरुषों से आगे रहीं। इन्होंने 13 में-से 8 स्वर्णपदक अपनी झोली में डाले। भारत की इन स्वर्ण पदकधारी बहादुर बेटियों ने वेटलिफ्टिंग, मुक्केबाजी और जूडो जैसे पावर गेम में हस्तगत किए, जो किसी महानतम उपलब्धि से कम नहीं कही जा सकती।

गौरतलब यह भी कि इस गेम्स में बैडमिंटन, शूटिंग, हॉकी, कुश्ती, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे ग्लैमरस खेलों को सम्मिलित नहीं किया गया था।

राज्यवार जीते गए पदक-अधिकतम से न्यूनतम
राज्य-स्वर्ण रजत कांस्य कुल
हरियाणा- 07 02 02 11
मणिपुर- 01 02 01 04
तमिलनाडु- 00 02 01 03
बिहार- 01 00 01 02
दिल्ली- 01 00 01 02
महाराष्ट्र- 01 01 00 02
केरलम्- 00 02 00 02
पंजाब- 00 02 00 02
यूपी- 00 01 01 02
उत्तराखंड- 00 01 01 02
त्रिपुरा- 01 00 00 01
राजस्थान- 01 00 00 01
आंध्र प्रदेश 00 01 00 01
असम- 00 01 00 01
छत्तीसगढ़- 00 01 00 01
मप्र- 00 01 00 01
कर्नाटक- 00 00 01 01

इस तालिका का अवलोकन पर लगता है कि ये तो महज 17 राज्यों के खिलाड़ियों का पदक है। इस तालिका में गुजरात, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, प. बंगाल, उड़िसा, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, मेधालय, अरूणालय प्रदेश, मिजोरम, सिक्किम जैसे राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों का नाम नदारत है।

इनमें से गुजरात, जम्मू-कश्मीर, प. बंगाल, उड़िसा, झारखंड, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश अपेक्षाकृत बड़े राज्य हैं। क्या वजह है कि ये राज्य खेल व खिलाड़ियों के मामले में फिसड्डी रहे?

वजहें-
जहां सुविधाओं के नाम पर महज कागजी खानापूर्ति की जाती है, उन राज्यों से एक भी खिलाड़ी ऐसे नहीं निकले, जो अंतरराष्ट्रीय पदक जीत सके। वजह, वहां न सही से खेल अधिकारी, मंत्री व उनका विभाग हैं, न कोच हैं, न कोचिंग संस्थान, न रहने, आने-जाने व खाने-पीने की माकूल व्यवस्थाएं।

खेल मंत्रालय के अधिकारियों व मंत्रियों से पूछा जाए कि वे किस खेल में सिद्धहस्त हैं, तो जवाब मिलेगा क्रिकेट। जबकि ओलंपिक, एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ में ट्रेक एवं फील्ड गेम महत्वपूर्ण हुआ करता है।

कहना ना होगा कि राज्यों की सड़ी-गली राजनीति ने खेलों के लिए बजट इतना कम रखा है कि उससे खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिलना तो दूर; हतोत्साहन ज्यादा मिलता है।

ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि खेल पुरस्कार देने का सिलसिला कई-कई सालों तक थमा रहता है। अर्थात खेल दिवस के दिन, जो खेल पुरस्कार राज्य के खिलाड़ियों को सहजता से दिए जाने चाहिए, वे दो-तीन साल तक टलते रहते हैं।

असल में, राज्यों की प्राथमिकता सूची में खेल है ही नहीं। रहेगा भी कैसे? उन्हें राजनीतिक गोटी बिठाने से फुर्सत मिले तब ना, वे खेलों पर नजरें इनायत करेंगे!

कहने को तो प्रदेशों में खेलसंघ खूब बने हैं, पर उनमें राजनेताओं की तूती बोलती है। भूतपूर्व व अनुभवी खिलाड़ी उनके रहमोकरम पर जीते-खाते रहते हैं। यही उनकी खूबी है।

सरकारी स्कूलों व कॉलेजों में जब-कभी खेल सामग्री क्रय की जाती है, उसमें सरकारों के नाक के नीचे जमकर कमीशनबाजी होती है और खिलाड़ियों को घटिया क्वालिटी का सामान थमा दिया जाता है।

ऐसे में खिलाड़ी बनना और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदक जीतना खिलाड़ियों के अपने खुद के प्रयासों का बेहतरीन नतीजा ही कहा जा सकता है।

खेल व खिलाड़ियों की अनदेखी का आलम यह है कि जिनके लिए ये विभाग बने हैं, उनकी गतिविधियों की सूध लेनेवाला कोई नहीं रहता।

यहां तक कि सरकारें पदकवीर खेल हीरोज को सोशल मीडिया प्लैटफार्मों यथा-फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और अन्य माध्यमों में प्रमोट नहीं करते, जिन्हें देख-समझ कर युवा, किशोरवर्ग और उनके पालक प्रोत्साहित हों और खेलों में भविष्य संवारने के लिए आगे आएं।

ऐसी स्थिति में राज्यों में अच्छे खिलाड़ी बनने की संभावनाएं दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती।

गांवों, कस्बों, शहरों व नगरों में खेल मैदान खूब बने हैं, लेकिन उनका रखरखाव सही ढंग से नहीं होने से अनुपयोगी पड़े हुए रहते हैं। इनको उपयोगी और खिलाड़ियों के लिए सुलभ करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? सरकारों व स्थानीय निकायों की! लेकिन, वे इस ओर से आंखें मूंदे रहते हैं।

सोचनीय पहलू यह भी कि आनेवाली पीढ़ी को पता कैसे चलेगा कि उनके राज्य का कोई खेलनायक किसी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय गेम्स में हीरो बनकर उभरा था। ऐसे में खिलाड़ियों की पहचान जहां सीमित रह जाती है, वहीं आगामी पीढ़ी उनसे प्रेरणा नहीं ले पाती।

अगर किसी राज्य का खेलनायक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदक जीतता है, और उसकी कहानी स्कूलों, कॉलेजों, खेल अकादमियों, चौक-चौबारों व स्थानीय युवाओं में प्रचारित-प्रसारित नहीं की जाएगी, तो युवा पीढ़ी उनसे क्या सीखेगी?

वहीं, स्पांन्सरशिप का अपना पेंच है। कंपनियां व निजी संस्थाएं उभरते खिलाड़ियों को आगे बढ़ाना चाहें, तो पर भी उनके हाथ-पैर ठिठक जाते हैं। वे खुलकर सामने नहीं आते और दिल खोलकर प्रोत्साहित नहीं करते।

‘‘खेलो इंडिया गेम्स’’ का भी लगभग यही आलम है; क्योंकि जिस देश में खेलभावना नहीं, खेलमंत्री व खेलाधिकारी खिलाड़ी नहीं, वहां का सिस्टम वैसे ही काम करेगा, जैसे कि अब तक करता आया है। यानी ढाक के वही तीन पात!

यही वजह है कि आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड व कनाडा जैसे देश, जो हमारी जनसंख्या से बेहद कमतर हैं, पदक तालिका में हमसे आगे रहते हैं और स्कॉटलैंड जैसा फिसड्डी देश हमारे समतुल्य नजर आता हैं।

शुक्र है कि भारत के प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 26 को लाल किले के प्राचीर से घोषणा की है कि गांव-गांव में खिलाड़ियों की पहचान करने के लिए टैलेंट हंट प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी।

देखना यही है कि यह घोषणा कब तक मूर्तरूप धारण करती है और हमारे राज्यों की खेल-व्यवस्थाएं इसमें कितना सहयोग करती हैं?
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