वह कमरे में बेड पर लेटी हुई थी और बड़ी संजीदा निगाहों से दीवार पर लगी उस तस्वीर को देख रही थी।
ग्राउंड फ्लोर से वाजाह ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, “समीरा, मुझे कार की चाबी चाहिए।”
उसने दोबारा आवाज़ लगाई, पर दोबारा भी कोई जवाब न आया।
वह सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर आया और दो पल के लिए हैरान रह गया। उसने समीरा को कभी इतनी गौर से उस तस्वीर को देखते हुए नहीं देखा था।
वाजाह कमरे में आया। वाजाह ने बेड पर समीरा को लेटा हुआ देखकर कमरे में दाख़िल होते हुए अपनी नज़रें झुका लीं और चाबी लेने के लिए ड्रॉअर की तरफ़ बढ़ा। उसे देख के समीरा बेड से खड़ी हो गई थी।
वाजाह ने ड्रॉअर को आहिस्ता से खोलते हुए समीरा को शरारती अंदाज़ में देखा।
“ तुम मुझे इतने तसव्वुर से क्यों देख रही थीं?” वाजाह ने समीरा को छेड़ने के अंदाज़ में कहा।
“मैं तुम्हें नहीं देख रही थी, बल्कि दीवार के पास रखे हुए फ्लावर वास को देख रही थी। इन फ्लावर्स का कलर काफ़ी डल हो चुका है, तुम्हें इन्हें चेंज करना चाहिए।”
वाजाह ने गर्दन नीचे करके अपनी गर्दन पर हाथ रखकर हल्की-सी स्माइल दी।
“फ्लावर वास में फ्लावर्स को सुबह ही चेंज किया गया है और अभी उसमें फ्रेश फ्लावर्स लगाए गए हैं,” वाजाह ने समीरा को छेड़ते हुए कहा।
वह जानता था समीरा वाजाह की तस्वीर को देख रही थी, पर वह इसका ज़िक्र वाजाह के सामने नहीं करना चाहती थी।
“मुझपे ये ब्लू सूट अच्छा लग रहा है न?” वाजाह उससे बात उगलवाना चाहता था।
समीरा ने अपने खोए हुए लहजे में कहा, “मुझे तुम्हारा ब्रोच अच्छा लग रहा है।”
वह कुछ शर्मा गया और चाबी उसके हाथ से फिसलकर नीचे गिर गई। समीरा ने कभी उसकी तारीफ़ उसके सामने नहीं की थी।
चाबी गिरने के बाद समीरा को अपने अल्फ़ाज़ समझ आए। वह हिचकिचा गई थी। उसके गाल सुर्ख़ हो गए थे। वह बेड से उठी और अपने हाथ से वाजाह के कंधे को साइड करते हुए रूम से बाहर आ गई।
वाजाह ने मुस्कुराते हुए अपने शोल्डर को वापस छुआ और चाबी लेकर कमरे से बाहर निकल गया।
समीरा हॉल में काउच पर बैठी हुई थी और कॉफ़ी पी रही थी। वह अब भी मुस्कुरा रही थी।
वाजाह सीढ़ियों से उतरते वक़्त भी समीरा को ही देख रहा था। सीढ़ियाँ देखने के बजाय उसकी निगाहे बार बार समीरा पर जा टिकती थी । जैसे वह किसी शाम को कोई ख़ूबसूरत मंज़र देख रहा हो। उसकी निगाहें समीरा से एक पल न हटती थीं।
पर जैसे ही समीरा ने अपनी आँखें उसकी आँखों से मिलाईं, उसकी पलकें एक लम्हे के लिए झुक गई थीं।
“तुम कॉफ़ी पियोगे?”
“हाँ, पी लूँगा, पर तुम पिलाओगी,” वह शरारती अंदाज़ में समीरा को छेड़ते हुए बोला।
समीरा इसका कोई जवाब न दे सकी और अपना कप उठाकर किचन में चली गई।
और वाजाह अपनी कार लेकर दोस्तों से मिलने जा रहा था, पर समीरा के बग़ैर रहना उसे अच्छा मालूम नहीं होता था। वह समीरा की ग़ैर-मौजूदगी एक पल भी बर्दाश्त नहीं कर सकता था। वह समीरा के साथ रहना चाहता था।
“तुम मेरे साथ बाहर चलोगी?”
“नहीं, आज नहीं। आज मैं बिज़ी हूँ। हम फिर कभी चलेंगे। अभी तुम जाओ। अली ने बाज़ दफ़ा तुम्हें कॉल किया है, वो तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”
वाजाह चला गया। उसे जाते हुए भी केवल समीरा का चेहरा ही ज़ेहन में आ रहा था। उसके ख़यालों में केवल समीरा ही आती थी। वह उसे जहाँ की सबसे हसीन लड़की लगती थी।