Banaras ki khamoshi - 3 in Hindi Love Stories by Neha kariyaal books and stories PDF | बनारस की ख़ामोशी - 3

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बनारस की ख़ामोशी - 3

ज्यों ज्यों समय बीत रहा था…
सब कुछ ठीक था।

मैं अपने बीते दिनों को भी भूल चुकी थी, और उस बात को भी, जिसे दीपक छुपा रहा था।
मैं बहुत खुश थी, कि दीपक अब मेरे साथ ही रहेगा।

फाइनल ईयर के पेपर खत्म होने के बाद हमने शादी करने का फैसला लिया। 
हमने सोचा दीपक एक अच्छी सी नौकरी कर लेगा।
मैं घर पर ही बच्चों को ट्यूशन दूंगी।
ये सब सोचने में कितना अच्छा लग रहा था। एक खूबसूरत दुनिया की कल्पना में जीने लगी।
लेकिन जैसा हम सोचते हैं, असल में सब उसका उल्टा होता है।
 हम चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, पर वक्त को कोई नहीं बदल सकता और न ही रोक सकता है।

ज़िंदगी ऐसी ही है। सब कुछ अपनी मर्जी से होता है। 
काश मुझे पता होता, कि आने वाला वक्त मेरी जिंदगी ही बदल कर रख देगा। 
मैं सबकुछ समेट लेती।

एक दिन… 
शाम के वक्त हम दोनों घूमने के लिए घाट पर गए। चारों तरफ आरती की धून और हवा में चन्दन की खुशबू थी।
लहरें किनारे से टकराकर लौट रही थीं।
कहीं दूर से मंजीरे के बजने की धून और किसी दुकान से पुराने गानों की आवाज सुनाई दे रही थी।

तो कहीं कुछ लोग हर हर गंगे गा रहे थे।

मैं अपने अच्छे भविष्य के लिए प्रार्थना करने लगी। 
बस मुझे अपनी दुआ में दीपक का साथ चाहिए था एक छोटी और प्यारी सी दुनिया चाहिए थी।

आरती खत्म होने के बाद मैं सीढ़ियों पर जा बैठी। पानी के बहने की आवाज से एक मधुर ध्वनि निकल रही थी। 
शायद इसे ही सुकून कहते हैं।

जैसे जैसे अंधेरा गहराया, पूरा घाट दीयो की रौशनी से जगमगा उठा।
अब गंगा किनारे ज्यादा भीड़ नहीं थी।

रात का वक़्त,
लोग वापस अपने अपने घर लौट रहे थे। मैं अपनी ही धून में खोई हुई सीढ़ियों पर बैठी थी।
कि दीपक मेरे पास आया, बोला उसे घर जाना है,
अपने माता पिता से हमारी शादी की बात करने।

और जल्द ही, उन्हें अपने साथ लेकर आयेगा। फ़िर हम दोनों शादी के लेंगे। 
 उसकी बात सुनकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था,
क्योंकि मुझे वो सब मिलने वाला था। जिसे में सपनो में सजाया करती थी। 
ठीक है चले जाओ और जल्दी लौटना, मैं यहीं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी।, मैंने उसकी आंखों में देखते हुए बोला।
दीपक मुस्कुराया और मेरे बालों को सहलाते हुए बोला जल्दी लौटूंगा।
एक दूसरे का हाथ थामे हम दोनों गंगा की लहरों को देखते रहे। 

अंधेरा भी बहुत हो गया था। चलो अब घर चलते हैं, दीपक बोला, हम्म वैसे भी समय बहुत हो गया है।

मेरा मन था, कि मैं यूँही रात भर दीपक का हाथ थामे, उन लहरों को देखती रहूं।
जो दूर दराज से न जाने कितनी कहानियां अपने साथ लाती है।

मैंने दीपक का हाथ कसकर पकड़ा,, काश हम पूरी रात ऐसे ही बैठे रहते। 
बिना ये सोचे कि कल क्या होगा? 

अब तुम ये बचकानी बातें बन्द करो। रही बात साथ होने की मै हमेशा तुम्हारे साथ हूँ और रहूंगा। दीपक प्यार से बोला,

रात भी बहुत हो चुकी,, धीरे धीरे सारे दीयों की लो बंद पड़ने लगी।

हम भी अपने अपने घर की ओर चले दिये।

मैं खुशी से झूमती हुई घर की ओर आ रही थी। 
ये कह कर सुनीता मुस्कुराने लगी।

उधर नैना पूरी तरह कहानी में खो चुकी थी। उसके लिए ये सब नया था।
बुआ बताओ आगे क्या हुआ?

अपनी किस्मत पर मुस्कुराते हुए, सुनीता ने हल्की सी लाचारी भरी आवाज में कहा… आज अगर उस दिन को याद करती हूँ तो सोचती हूं।

काश वो वक्त थोड़ा ओर रुका होता, मैंने दीपक के साथ कुछ पल और बिताए होते।
कुछ यादें और बनाई होती।
काश मैंने उसे रोक लिया होता।

ऐसा क्या हुआ था उसके बाद बुआ, नैना ने उत्सुकता से पूछा। 
वहीं जो ईश्वर की मर्जी होती है। जो किस्मत में लिखा हो। 

अगले दिन...
मैं उसके साथ स्टेशन तक उसे छोड़ने गई।
जाते जाते उसने मुझे गले लगाया, मेरे माथे को चूमा, 
बालों को सहलाते हुए, बोला, तुम मेरी चिंता मत करना। मैं जल्दी ही वापस आऊँगा। 
फिर हम दोनों एक नई ज़िंदगी शुरू करेंगे।

ये सब सुनकर मेरी आंखें भर आई। मेरा मन बेचैन हो उठा। 
अंदर आवाज़ आ रही थी, सुनीता रोक लो दीपक को मत जाने दो।
तभी ट्रेन का हार्न लगा।

दीपक ट्रेन की और बढ़ा। जैसे जैसे वो आगे की और जा रहा था। मेरी बैचेनी बढ़ रही थी। 

मैंने दीपक का हाथ कसकर पकड़ा बोली, जल्दी लौट आना। 

उसने फिर से अपना हाथ मेरे सिर पर रखा। हम्म,

और ट्रेन में बैठ कर चला गया।
मैंने खुशी खुशी उसे जाने दिया, मगर ये नहीं जानती थी।
दीपक को मैं आखिरी बार देख रही हूं। 

उसके जाने के बाद, मैंने अपनी पढ़ाई पर ध्यान दिया। 
जल्द ही समेस्टर एग्जाम शुरू होने वाले थे।
और दीपक भी उससे पहले वापस आने वाला था।

इस बार, मैं बिल्कुल भी उदास नहीं थी क्योंकि वो हमारे लिए वहां गया है।

कुछ दिन बीतने के बाद भी दीपक नहीं लौटा।
मैंने सोचा किसी भी काम में समय तो लगता है। इसी बात से खुद को तसल्ली दी।

काफ़ी समय ऐसे ही गुजर गया। 
मैं रोज गंगा किनारे बैठ कर उसका इंतजार करती। मन ही मन सोचती आज तो दीपक पक्का आयेगा।

लेकिन हर बार निराश हो कर घर आ जाती। 
मन में सवालों का तूफान उमड़ रहा था।
किससे पूछूं, आखिर कहां जाऊं कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। 

आख़िर क्या हुआ होगा, जो दीपक अभी तक नहीं लौटा।
क्या वो ठीक है, या फिर कुछ हुआ है।

कैसे पता लगाऊँ?

जिस गंगा के किनारे मुझे सुकून मिलता था। आज एक बैचेनी दिखाई देती है। 

कभी कभी आसमान को देखती हुई, खुद से बातें करती हूँ। पूछती हूँ... क्या दीपक लौटेगा या नहीं?

मेरी जिंदगी पूरी तरह उलट पुलट गई थी।
धीरे धीरे वक्त गुजर रहा था। पेड़ो के पत्ते पीले पड़ने लगे थे, जैसे वक्त ने उन पर अपनी उंगलियां फिरा दी हो।
दिनों का शोर अब यादों की खामोशी में बदलने लगा। सूरज हर रोज ढलता लेकिन उसके भीतर का उजाला अब पहले जैसा नहीं था।

पहले तो मुझे लगता था, जैसे वो पहली बार किसी काम में फंस गया था शायद वैसा ही हो । लेकिन मेरा मन अंदर से बहुत बैचेन हो रहा था। 
उसने न कोई फोन किया और न ही कोई खत भेजा।
मैंने उसके घर के कई चक्कर लगाए, जहां वो रहता था।
लेकिन हर बार ताला बंद मिलता। 
यहां तक कि उसने अपनी परीक्षा भी छोड़ दी थी, और शायद कॉलेज भी। उसके दोस्तों को भी उसके बारे में नहीं पता था।
 मैंने बहुत सारे खत भी भेजे, पर जवाब नहीं मिला।

लेकिन थोड़ी सी उम्मीद अभी भी जिंदा थी उसके लौट आने की। 
मैं फिर से उसका इंतजार करने लगी। अकेली बैठी मैं हवाओं से बातें करती।
उन लहरों से कहती... क्या दीपक भी मुझे याद करता है? अगर करता है तो उसे एक बार आना तो चाहिए।

लेकिन गंगा का पानी अब उतना शोर नहीं करता था। जितना जब करता था, जब हम आख़िरी बार साथ बैठे थे।
बीतते समय के साथ मेरी बैचेनी एक ख़ामोशी में बदल गई।
मेरे बदले व्यवहार, अकेलेपन को देखकर मेरे घर वाले भी परेशान थे।
 मैं रोज गंगा के किनारे बैठी उसके लौटने की दुआ करती। 
 कभी कभी जब किसी जोड़े को किनारे बैठा देखती।
तो लगता जैसे सब कल की बात हो— वही शाम, वही घाट, वही हवा।
लेकिन जब आईने में ख़ुद को देखती हूँ, तो लगता है वक्त कितना कुछ चुपचाप ले गया।
अब एक ही दुआ थी, एक बार दीपक आ जाए। 

धीरे धीरे हफ्ते महीनों में बदले और महीने साल में, पर वो नहीं आया, और न ही उसका कोई जवाब, न कोई जानकारी आई।

मैं उसका इंतजार तो कर रही थी लेकिन खामोशी में सिमटती जा रही थी।
अपने ही सवालों मे एक किरदार थी।

 शाम का समय… 

आरती की थाली में दीये जल रहे थे।
मैं घाट की सीढ़ियों पर बैठी अपने हाथों को मसल रही थी।
गंगा की लहरें मेरे पैरों को छू कर लौट रही थी, जैसे वो कुछ कहना चाहती है।

ऊपर आसमान में तारे बिखरे थे जैसे कोई पुरानी यादें फिर से लौट आई हों।
 गंगा का पानी धीरे धीरे बह रहा था, हर लहर जैसे उससे पूछ रही हो – क्या लौट आया वो ख़्याल, जिसे तुमने जाने दिया था?
मेरी उंगलियां पानी में डूबी हुईं थी, और मन उसी दिशा में बह रहा था।, जहां दीपक गया था।
हर लहर में उसका नाम था,
हर हवा के झोंके में उसका अलविदा।

मेरे कानो में अभी भी उसकी आवाज गूंज रही थी, जैसे वह मुझे बुला रहा है।
 
मैंने जब पीछे पलट कर देखा तो कोई नहीं था।
पूरा घाट शांत पड़ा था। सभी लोग अपने अपने घर जा रहे थे।
बची थी, सिर्फ चन्दन की खुशबू, जलते दीये।
और एक खामोशी जो सदियों से बनारस के घाटों में बसी है।

जिस उम्मीद को बांध कर में उसके लौटने का इंतजार कर रही थी।
वो तो जाने कब की गंगा की लहरों में बह गई। अब सिर्फ भ्रम था उसके आने का।

जब किसी के लौटने का पता न हो, कोई खबर न हो, सिर्फ़ उसके कहे शब्दों से, कि मैं आऊंगा।
आख़िर कोई कब तक किसी के लौटने का इंतजार कर सकता है।
वक्त के साथ तसल्ली भी कमजोर पड़ जाती है।

वक्त की चाल के साथ मुझे भी लगने लगा। शायद अब वो कभी नहीं लौटेगा।
उसने मुझे धोखा दिया। वो चला गया था, मुझे छोड़ कर अपने वादों को तोड़ कर।
और मैं अभी भी उन्हीं ख्यालों में थी कि वो आयेगा मेरे लिए? 
 खुद को गंगा की लहरों को सौंप कर, मैं टूटे मन के साथ घर पहुंची।
मेरी हालत देख घरवालों को चिंता सताने लगी,।
उन्होंने सोचा शायद मेरी शादी कर देना ही सही होगा, क्योंकि सबको लग रहा था।
दीपक अब नहीं लौटेगा।

मेरा क्या था,  मैं तो रोज अपने अधूरेपन से लड़ती और खुद में सिमट कर रह जाती।
मेरा सुकून मेरी मुस्कुराहट ये सब तो उसके के साथ ही चला गया था।
अब तो मैंने जीने की चाहत भी छोड़ दी थी।

मैंने घर वालों को बोल दिया था, कि मुझे अब शादी नहीं करनी।
मेरी आत्मा तो पहले ही मर चुकी है, अब शरीर से कौन शादी करेगा?
 मुझे ये तो नहीं पता था दीपक वापस आएगा या नहीं? पर उसका इंतजार था।

शायद वो एक दिन लौट आये।

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