samay ke us par in Hindi Love Stories by mahendr Kachariya books and stories PDF | समय के उस पार एक अनोखी प्रेम कहानी

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समय के उस पार एक अनोखी प्रेम कहानी

अध्याय 1: बारिश की वो शाम और एक अजनबी डायरी
सूरज की किरणें जब ढलने लगती हैं और शहर की हलचल थोड़ी धीमी पड़ जाती है, तब सूरत के मघदूम क्षेत्र की पुरानी गलियों में एक अलग ही सुकून उतर आता है। ऐसी ही एक शाम थी, जब मूसलाधार बारिश ने पूरे शहर को अपनी आगोश में ले लिया था।
अंश पिछले तीन सालों से इसी शहर में एक छोटे से प्रकाशन संस्थान (पब्लिकेशन हाउस) में संपादन (एडिटिंग) का काम करता था। वह एक शांत स्वभाव का लड़का था, जिसे शब्दों से ज्यादा खामोशी पसंद थी। उस शाम, जब बारिश बहुत तेज हो गई, तो अंश शहर के एक पुराने, लेकिन बेहद खूबसूरत और शांत कैफे में जा बैठा। कैफे की बड़ी सी कांच की खिड़की के बाहर बारिश की बूंदें गिर रही थीं और अंदर कॉफी की सौंधी खुशबू फैली हुई थी।
अंश ने अपनी मेज पर कॉफी का मग रखा ही था कि उसकी नजर बगल वाली खाली मेज पर पड़ी। वहां एक भूरे रंग की पुरानी डायरी रखी थी, जिसके पन्ने थोड़े मुड़े हुए थे। अंश ने इधर-उधर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। उसने डायरी उठाई। उस पर कोई नाम नहीं था, बस पहले पन्ने पर नीली स्याही से एक खूबसूरत शेर लिखा था:
"तलाश जिसकी थी, वो मंज़िल तो नहीं मिली,
पर रास्ते ने हमें खुद से मिला दिया।"
अंश जिज्ञासा को रोक नहीं पाया और उसने डायरी का पहला पन्ना पलटा। वह किसी की व्यक्तिगत डायरी नहीं, बल्कि कहानियों और कविताओं का एक कच्चा चिट्ठा था। हर पन्ने पर एक ऐसा दर्द और एक ऐसी उम्मीद छिपी थी, जो सीधे दिल को छू जाती थी। अंश को लगा कि इन शब्दों में कोई जादू है। उसने उस दिन वह डायरी अपने पास रख ली, यह सोचकर कि अगली बार जब वह इस कैफे में आएगा, तो इसे यहीं छोड़ देगा, या शायद उस शख्स को ढूंढेगा जिसका यह है।

 शब्दों का सफर और इशिता
अगले कुछ हफ्तों तक अंश का मन उसी डायरी में उलझा रहा। उसने उस डायरी की कविताओं पर आधारित एक छोटा सा लेख अपने पब्लिकेशन के साप्ताहिक कॉलम के लिए लिख डाला। वह लेख इतना लोकप्रिय हुआ कि पाठकों की तरफ से उसकी खूब सराहना हुई।
एक दिन, जब अंश ऑफिस के काम में व्यस्त था, रिसेप्शन से फोन आया कि कोई मिलने आया है। जब अंश बाहर गया, तो उसने देखा कि काउंटर पर एक लड़की खड़ी है। उसने नीले रंग का एक साधारण सा कुर्ता पहन रखा था, और उसकी आंखों में एक अजीब सी बेचैनी और चमक दोनों थीं।
"नमस्ते, मैं इशिता हूँ," लड़की ने कहा, उसकी आवाज़ में थोड़ी घबराहट थी। "शायद आप हैरान होंगे कि मैं यहाँ क्यों आई हूँ... लेकिन जो लेख आपने पिछले हफ्ते लिखा था, और जिस डायरी के आधार पर वह लिखा गया था... वो... वो मेरी डायरी है।"
अंश अवाक रह गया। उसने तुरंत अपनी मेज की दराज से वो भूरे रंग की डायरी निकाली और इशिता की तरफ बढ़ा दी।
इशिता की आंखें नम हो गईं। उसने डायरी को अपने सीने से लगा लिया। "मुझे लगा था कि यह हमेशा के लिए खो गई। उस कैफे में मैं बहुत परेशान थी, और जल्दबाजी में इसे वहीं भूल आई थी। जब मैंने आपका लेख पढ़ा, तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि किसी ने मेरी अधूरी पंक्तियों को इतने खूबसूरत तरीके से पूरा कर दिया है।"
उस दिन दोनों के बीच बातचीत का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह दफ्तर की चार दीवारों से बाहर निकलकर शहर के पार्कों, मरीन ड्राइव और पुरानी किताबों की दुकानों तक जा पहुंचा। अंश को धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि इशिता सिर्फ एक पाठक या डायरी की मालकिन नहीं, बल्कि उसके तन्हा जीवन की सबसे खूबसूरत धुन बन चुकी थी।