करीब चार सौ - पांच सौ साल पहले ...................
शिवनगर में हुए खौफनाक हादसे के आखिरी दिन एक विचित्र घटना घटी। हुआ यूँ कि आखिरी दिन बाबा बटेश्वर की नज़र गेरुआ धोती में लिपटी जामून के पेड़ का ओट लेकर खड़ी घुॅंघरू पर पड़ गई ... अपनी शक्तियों द्वारा जैसे उन्होंने सारा भेद जान लिया ।
वो घुॅंघरू को कठोर नजरों से देखते हुए प्रचण्ड स्वर में बोले,
" विश्वासघातिनी ! तू ही है ना वो जिसने ठाकुर वीर सिंह के लिए यम का दरवाजा खटखटाया ...... किचकन्या की साथिन यहाँ आ ! "
गाँव के कुछ लोग उसे किचकन्या की साथिन जान कर आक्रोशित होकर उसे पकड़ने के लिए बढ़े लेकिन अचरज की बात थी कि यह देख कर भी घुॅंघरू जरा भी नहीं डरी बल्कि धीरे - धीरे पीछे की ओर खिसकने लगी। फिर घुमी और जान लगाकर भागी, पलक झपकते ही जंगल की सीमा को लांघ गई। जो लोग उसे पकड़ने के लिए बढ़े थे, उसे जंगल में घुसता देख भय से जहाँ के तहाँ खड़े रह गए ... किसी की हिम्मत ही नहीं हुई आगे बढ़ने की .... किचकन्या के भय ने उनके कदमों को जकड़ लिया । इस घटना के बाद घुॅंघरू कभी शिवनगर में नहीं दिखाई दी ..............
पर जितने मुंह उतनी अफवाहें, कोई कहता कि वो किचकन्या की गुलाम बन गई है तो कोई कहता कि घुॅंघरू मर चुकी है, एक भयंकर चुड़ैल बन गई है और उस जामुन के पेड़ पर ही उलटा लटकी रहती है..............
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2024 .................
सिंहल राजघराने का बहुत ही शानदार पैलेस ......
इस शानदार पैलेस के एक शानदार कमरे में एक बेहद शानदार व्यक्तित्व वाला युवक खिड़की के सहारे खड़ा बहुत देर से एकटक चांद को देख रहा था ... चांदनी छीटक के उसके मुखड़े पर पड़ रही थी और उसके व्यक्तित्व को और मोहक बना रही थी .... यह थे सिंहल राजघराने के प्रिंस - स्वप्निल देव रॉय ! तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, स्वप्निल का जैसे स्वप्न भंग हुआ लेकिन वो दरवाजे के तरफ़ देखे बगैर बोला,
" कम इन ! "
एक नौकर सिर झुकाये अंदर आया और बोला,
" राजा साहब ने आपको याद किया है कुंवर साहब ! "
उसका सिर धीरे से हिला, नौकर वापस लौट गया। उसके जाने के बाद वो हंसा और व्यंग्यात्मक स्वर में बोला,
" राज गये, राजतंत्र गया ... इतने सालों से लोकतंत्र है भारत में पर इनके जुबान से कमबख़्त राजा साहब, कुंवर साहब जाता ही नहीं। "
वो कमरे से निकला और सीढ़ी उतरकर एक और आलिशान कमरे में पहुँचा, जहाँ एक करीब अस्सी साल के बेहद भव्य व्यक्तित्व वाले बुजुर्ग बैठे थे ... यही थे राजा साहब यानि विक्रम देव रॉय ! स्वप्निल ने बड़े आदर से पूछा,
" दादाजी ! आपने मुझे बुलाया था? "
बुजुर्ग मुस्कुराये, फिर हाथ के इशारे से युवक को अपने करीब बुलाया।
" यहाँ आइये, हमारे पास आकर जरा थोड़ी देर बैठिये तो। "
पोते के करीब आकर बैठने पे उन्होंने बड़े ही नेह से उसका पीठ थपथपाते हुए पूछा,
" हमें आपसे कुछ बात करनी है। "
" क्या दादाजी ? "
" हम चाहते हैं अब आप शादी कर लिजिए, हमारे मरने से पहले हमारी यह ख्वाहिश पूरी कर दिजिए। "
" ठीक है दादाजी ! मगर शादी करूँ किससे ? हाँ, वो बाहर गार्डन में जो लाल गुलाब के फूल खिलें हैं ना, बेहद खुबसूरत हैं, उन्ही से कर लेता हूँ। "
राजा साहब ठहाका मार के हंस पड़े, फिर युवराज के कान पकड़कर उमठते हुए बोले,
" शैतान ! अपने दादा से मजाक, बुरी बात ! "
" मज़ाक ही तो है दादाजी। शादी कर लूँ पर किससे ? कोई लड़की भी तो होनी चाहिए ना । "
" बिल्कुल ! इसलिए मैंने परसों पैलेस में पार्टी रखी है, जिसमें खासकर लड़कियां शामिल होंगी ... कई राजघरानों की बेटियाँ ... कई बड़े बिजनेस मैन की बेटियाँ और भी कईं ....... आप पर कोई बंदिश नहीं, फैसला पूरी तरह आपका होगा। "
बात खुशी की थी पर न जाने क्यों उसका चेहरा उतर गया, वो जबरदस्ती होठों पे मुस्कान लाते हुए बोला,
" अरे वाह ! आपने तो मेरे स्वयंवर की तैयारी कर रखी है। "
राजा साहब मुस्कुरा कर बोले,
" बुद्धू ! स्वयंवर लड़कियों का होता है, हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि आप सही साथी चुनें इसलिए बस मदद करने की कोशिश कर रहें हैं। आप खुद से कोई लड़की चुन लेते तो इतनी झंझट ही नहीं होती पर आपको तो कोई लड़की पसन्द ही नहीं आती।
राजा साहब लम्बी सांस लेकर बोले,
" खैर देखते हैं, परसों पार्टी में आपको उन हज़ार लड़कियों में से कोई लड़की पसन्द आती है या नहीं ........ । "
इस बार स्वप्निल की आवाज में जरा तल्ख़ी आई,
" ये क्यों नहीं कहते दादा जी कि बली का बकरा ढूँढ रहें हैं, ज़ब्ह करने के लिए मगर मैं ऐसा हरगिज़ होने नहीं दूंगा। "
राजा साहब भी धीमे मगर कठोर स्वर में बोले,
" अच्छा ! तो अब आप हमारे खिलाफ जायेंगे ? "
" हाँ ! क्योंकि मुझे लोगों की जिंदगी से खेलने का कोई शौक नहीं । "
" आप अच्छी तरह से जानते हैं कि हम मजबूर हैं । "
" होंगे पर मैं नहीं हूँ ...... ! "
इस बार राजा साहब चेतावनी सी देते हुए, सख्त स्वर में बोले,
" एक बात अच्छे से जान लिजिए स्वप्निल, होगा वही जो हम चाहेंगे। ये पार्टी कैंसिल नहीं होगी और आप को पार्टी में शामिल होना ही होगा। प्यार से कह रहें हैं मान जाइये वरना मनाने के तरीके और भी हैं। "
स्वप्निल ने यूँ आॅंखें मूंद लीं जैसे बहुत थक गया हो, जवाब में एक लफ्ज़ भी नहीं कहा। कुछ क्षण ऐसे ही निश्चल बैठे रहने के बाद बस उठा और सुस्त कदमों से राजा साहब के कमरे से बाहर निकल आया। बाहर निकल कर उसने देखा कि उसके डैडी सीढ़ियों पर खड़े हैं ... हमेशा की तरह वैराग्य से भरे हुए, चुप्प ... खामोश । उसने सदा से ही अपने डैडी का यही रूप देखा है पर हाॅं किस्से सुने हैं उसने कि कभी गौतम देव रॉय भी बेहद जिन्दादिल और दिल खुश इंसान हुआ करते थे पर उसकी माँ की मौत ने उन्हें ऐसा बना दिया। उनकी आंखों में एक ग्लानि का भाव रहता है अक्सर, स्वप्निल इस भाव को पहचानता था। इसलिए तो वो उस भयंकर भूल को नहीं दोहराना चाहता था जिसे उसके डैडी ने ही नहीं बल्कि इस राजघराने के मर्द सदियों से करते आ रहे थे ... स्त्रियों की बलि से ही यह वंश आगे बढ़ता रहा है। वो यह कभी नहीं भूल सकता कि उस की जिन्दगी, उसकी माँ की मौत बनी .... शायद इसी कारण उसके डैडी ने कभी उसके सिर पे प्यार से हाथ नहीं फेरा .... वो तो उसे ऐसे देखते हैं जैसे कोई इंसान अनजाने में मर्डर करके खौफ़ से मर्डर वेपन को देखता है। परन्तु उसके दादा यानि राजा साहब की नज़रों में यह सब कमज़ोर आदमी की बेकार की भावनाएँ हैं, उनके अनुसार सदियों से यह राजघराना यूँ ही आगे बढ़ता रहा है । हाँ ! सदियों से यह राजघराना यूँ ही आगे बढ़ता रहा है ... यह शापित राजघराना .... एक शाप जो इस राजघराने की स्त्रियों को निगल जाता है। इस शाप की रक्षा एक शंखचूड़नी करती थी ... शंखचूड़नी, जिसे आम भाषा में शाखचुन्नी भी कहा जाता है .... एक ऐसी प्रेतात्मा होती है जो किसी श्राप से बंधी होती है और यह शंखचूड़नी उसी ब्राह्मण स्त्री की आत्मा थी जिसने सिंहल राजघराने को मरते वक़्त यह भयावह श्राप दिया था .............
क्रमशः...................