रात का समय था। मैं उन दिनों जोशीमठ में कॉलेज करता था और अपने रूम पार्टनर के साथ रहता था।
एक रात मेरा रूम पार्टनर किसी से फोन पर बात कर रहा था। मैं पास ही बैठा था। मैंने यूँ ही पूछ लिया,
“किसका फोन है?”
उसने बिना ज्यादा कुछ सोचे कहा, “बहन का फोन है।”
मैंने भी ज्यादा सवाल नहीं किया। उस समय मुझे लगा कि सच में उसकी बहन का ही फोन होगा।
अगले दिन मैंने देखा कि वह उसी लड़की से वीडियो कॉल पर बात कर रहा था। इस बार वह उसे छेड़ भी रहा था और दोनों के बीच काफी हँसी-मजाक चल रहा था।
मेरी नजर अचानक मोबाइल की स्क्रीन पर चली गई। मैंने चुपके से उसे देख लिया। मुझे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन इतना जरूर लगा कि कल रात वाली “बहन” की कहानी शायद कुछ और थी।
कुछ देर बाद उनकी बात खत्म हो गई।
मैं चुपचाप बैठा रहा। पता नहीं उस समय मेरे मन में क्या आया। शायद जिज्ञासा थी, शायद मजाक करने का मन था।
मैंने अपने रूम पार्टनर से कहा,
“यार, मेरी भी बात करा दे।”
वह मेरी तरफ देखने लगा। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे उसे समझ आ गया हो कि मैं कल रात की बात भूल नहीं पाया हूँ।
मैं भी चुप रहा, लेकिन मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
आखिर वह लड़की थी कौन, जिसे कल रात वह अपनी बहन बता रहा था?
उस समय मुझे नहीं पता था कि मेरी यह छोटी-सी जिज्ञासा आगे चलकर मेरी जिंदगी की एक ऐसी कहानी का हिस्सा बन जाएगी, जिसे मैं आज भी याद करता हूँ।
उस समय मेरे रूम पार्टनर ने मेरी बात को मज़ाक में ले लिया था। उसे लगा कि मैं बस यूँ ही कह रहा हूँ कि मेरी भी बात करा दे।
लेकिन सच यह था कि मेरे मन में उससे बात करने की दिलचस्पी थी।
वह मेरी बात को शायद भूल भी गया और देखते-देखते दो-तीन दिन निकल गए।
उन दिनों हम दोनों के बीच ऐसी दोस्ती थी कि एक-दूसरे का फोन भी कभी-कभी उठा लेते थे। कोई खास बात नहीं लगती थी। उसी तरह एक दिन मैंने उसका फोन हाथ में लिया और WhatsApp पर Status देखने लगा।
एक-दो Status देखे… फिर तीसरा… चौथा…
अचानक मेरी नजर एक तस्वीर पर रुक गई।
वह उसी लड़की की तस्वीर थी।
उसने झूला पुल पर फोटो खिंचवाई थी। हरे रंग का सूट और नीली सलवार पहने हुए वह बहुत खूबसूरत लग रही थी।
मैं कुछ देर तक उस तस्वीर को देखता ही रह गया।
पता नहीं उस तस्वीर में ऐसा क्या था, लेकिन वह मुझे पहली नजर में ही इतनी प्यारी लगी कि मेरे मन में उससे बात करने की इच्छा और बढ़ गई।
मैंने फोन अपने रूम पार्टनर को वापस किया और फिर उसके पीछे पड़ गया।
“यार, एक बार मेरी बात करा दे।”
वह हर बार मेरी बात को टाल देता।
कभी मज़ाक में बात बदल देता, कभी कह देता कि बाद में करा दूँगा।
लेकिन मैं भी कहाँ मानने वाला था।
मैं बार-बार उससे कहता रहा कि बस एक बार बात करा दे। मुझे उससे कुछ खास नहीं कहना था, बस बातचीत करनी थी। शायद उस समय मैं खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि एक तस्वीर देखकर मेरे अंदर इतनी जिज्ञासा क्यों पैदा हो गई थी।
लेकिन वह मेरी बात सुनने के बजाय मुझे नजरअंदाज करने लगा।
मैं कहता रहा और वह टालता रहा।
उस समय मुझे नहीं पता था कि जिसे मैंने सिर्फ एक तस्वीर में देखा था, वह लड़की आगे चलकर मेरी जिंदगी की कहानी का इतना बड़ा हिस्सा बन जाएगी।
कभी-कभी जिंदगी में कुछ मुलाकातें पहले नहीं होतीं…
पहले उनकी एक तस्वीर आती है, फिर धीरे-धीरे वह तस्वीर याद बन जाती है।
उसने उस लड़की का नाम भी कुछ ऐसा रखा हुआ था—“मुसी”, जिसे हम चूहा कहते हैं।
मुझे उसका असली नाम तक पता नहीं था। मैं Facebook पर उसे ढूँढने की कोशिश करता, लेकिन जब भी उससे उसका नाम पूछता, वह साफ मना कर देती।
एक लड़की से बात करने के लिए मुझे क्या-क्या नहीं करना पड़ा था!
मेरा रूम पार्टनर था, और मुझे पता था कि उसे आलू के पराँठे बहुत पसंद हैं। इसलिए कभी उसके लिए पराँठे बना देता, कभी उसके कॉलेज का काम कर देता। उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत में मैं मदद करने को तैयार रहता।
सच कहूँ तो, सिर्फ एक बार उस लड़की से बात कराने के लिए उसने मुझसे न जाने कितने काम करवा लिए थे।
अब उसे तो जैसे आराम मिल गया था।
क्योंकि उसका काम करने के लिए मैं जो था।
शायद यही सोचकर वह लगभग पूरे एक महीने तक मुझे टालता रहा। हर बार कोई न कोई बहाना बना देता—“आज नहीं”, “कल करा दूँगा”, “अभी टाइम नहीं है।”
मैं भी उम्मीद लगाए बैठा रहता।
फिर एक दिन अचानक उसकी वीडियो कॉल आई। वह लड़की भी वीडियो कॉल पर थी। मेरा दिल खुश हो गया। मैंने तुरंत अपने पार्टनर से कहा—
“भाई, आज तो बात करा दे।”
लेकिन उसने फिर मेरी बात टाल दी।
बस, उस दिन मेरा पारा चढ़ गया।
मुझे गुस्सा आ गया और मैं अपने पार्टनर पर चिल्लाने लगा। उसे शायद समझ नहीं आ रहा था कि मैं इतना गुस्सा क्यों कर रहा हूँ।
उधर वीडियो कॉल पर वह लड़की सब सुन रही थी।
उसने पूछा—
“क्या हुआ?”
मेरे दोस्त ने हँसते हुए उससे कहा—
“मेरा पार्टनर तेरे प्यार में पागल हो गया है।”
उसकी बात सुनकर मैं कुछ पल के लिए चुप हो गया।
क्योंकि वह बात मजाक में कही गई थी, लेकिन मेरे लिए उसमें थोड़ी-सी सच्चाई छिपी थी।
मैं सच में उससे बात करना चाहता था।
मगर मैं यह बात उस लड़की के सामने कैसे कहता?
मैं तो बस किसी तरह उससे दो बातें करना चाहता था… और उन दो बातों के लिए मैं अपने पार्टनर के कितने ही काम करने को तैयार था।
उसने शायद मज़ाक में ही कहा था,
उसने ये बोला—वो तेरे प्यार में पागल हो गया।”
इतना सुनते ही मेरा पूरा चेहरा उतर गया। मैं कुछ बोल नहीं पाया। अभी तक उसने मेरी बात नहीं मानी थी, फिर भी मैं पागलों की तरह अपने दोस्त के पीछे पड़ा हुआ था।
करीब डेढ़ महीना बीत गया।
एक दिन उसे अचानक मेरा एक काम पड़ गया। ऐसा काम, जो उस समय शायद सिर्फ मैं ही कर सकता था। उसे इंजेक्शन लगवाना था और बाकी लड़के इंजेक्शन लगाने से डर रहे थे।
उसने मजबूरी में मुझे बुलाया।
मैंने उसकी बात सुनी और मेरे मन में फिर वही सवाल आया—
“एक बार उससे बात करवा दे।”
उसने इस बार भी मना कर दिया।
लेकिन इंजेक्शन लगाना ज़रूरी था। आखिरकार उसने मेरी बात मान ली। शायद उसे भी लगा कि इस बार मेरी मदद के बदले मेरी छोटी-सी इच्छा पूरी कर देनी चाहिए।
उसने कहा,
“ठीक है… बात करवा दूँगा।”
मेरे लिए वो सिर्फ दो शब्द नहीं थे।
डेढ़ महीने से जिस एक छोटी-सी उम्मीद के पीछे मैं पागलों की तरह भाग रहा था, आखिरकार उस उम्मीद को रास्ता मिल गया था।
अब पहली बार मुझे लग रहा था कि शायद…
जिससे बात करने के लिए मैं इतना कुछ कर रहा था, उससे सच में बात हो जाएगी।
और यहीं से मेरी कहानी ने एक नया मोड़ लिया।
क्योंकि अब पहली बार मेरे हाथ में उसका नंबर नहीं, बल्कि उससे बात करने का एक मौका था।
दोस्त के फोन से मैंने पहली बार उससे बात की।
शायद हमारी बात करीब तीस मिनट से भी ज्यादा हुई थी। मेरे लिए वो तीस मिनट बहुत खास थे, क्योंकि इतने दिनों से जिस लड़की से बात करने के लिए मैं अपने दोस्त के पीछे पड़ा था, आखिरकार आज उसकी आवाज़ मेरे कानों में थी।
बात शुरू होते ही मैंने सबसे पहले उसका नाम पूछा।
क्योंकि मुझे अपने रूम पार्टनर पर बिल्कुल भरोसा नहीं था। मुझे पता था कि अगर मैंने उससे उसका नाम पूछा तो शायद वो मुझे कभी नहीं बताएगा। इसलिए जैसे ही मौका मिला, मैंने खुद ही पूछ लिया।
फिर धीरे-धीरे हमारी बातें आगे बढ़ने लगीं।
मैंने उसका हाल-चाल पूछा। कहाँ से है, कैसी है, पढ़ाई कैसी चल रही है… ऐसी ही छोटी-छोटी बातें पूछता रहा।
सच कहूँ तो उस समय मुझे यह भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या पूछूँ और क्या नहीं।
बस मन कर रहा था कि फोन कटे ही नहीं।
जिस लड़की से बात करने के लिए मैं डेढ़ महीने से इतना परेशान था, आज आखिरकार उससे बात हो रही थी।
उसकी आवाज़ सुनते हुए मेरे चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी।
शायद उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी उस आधे घंटे से ज्यादा की बातचीत मेरे लिए कितनी बड़ी बात थी।
उस दिन पहली बार मुझे लगा कि इतने दिनों की मेरी सारी कोशिशें बेकार नहीं गईं।
क्योंकि अब वो सिर्फ मेरे दोस्त की जान-पहचान वाली लड़की नहीं थी… अब मैं उसका नाम जानता था, उसकी आवाज़ पहचानता था और उससे बात भी कर चुका था।
और शायद यहीं से हमारी कहानी का असली हिस्सा शुरू हुआ।
पहली बातचीत से मोबाइल नंबर तक
उसने जब अपना नाम बताया, तो सबसे पहले मैंने उसे फेसबुक पर सर्च किया। नाम डालते ही उसकी प्रोफाइल मेरे सामने थी। मैंने बिना ज्यादा सोचे उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी।
मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह इतनी जल्दी रिक्वेस्ट स्वीकार कर लेगी। लेकिन करीब एक घंटे के अंदर ही उसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट हो गई।
हमारी पहली बातचीत फेसबुक पर ही शुरू हुई। शुरुआत में बस थोड़ी-बहुत बातें होती थीं—एक-दूसरे के बारे में जानना, हाल-चाल पूछना और छोटी-छोटी बातें शेयर करना।
धीरे-धीरे हमारी बातचीत बढ़ने लगी। दो-तीन हफ्ते कब निकल गए, पता ही नहीं चला। अब बात करने में एक अपनापन-सा महसूस होने लगा था।
फिर एक दिन मैंने हिम्मत करके उससे उसका मोबाइल नंबर मांग लिया।
उस समय मेरे मन में कई सवाल थे—पता नहीं वह नंबर देगी या नहीं, कहीं उसे बुरा तो नहीं लगेगा?
लेकिन अब तक हमारी बातचीत इतनी आगे बढ़ चुकी थी कि मैंने सोच लिया था कि एक बार पूछकर देखता हूं।
यही वह छोटा-सा कदम था, जिसने हमारी फेसबुक वाली बातचीत को फोन की बातचीत में बदल दिया।
काफल की एक छोटी-सी फरमाइश
नंबर तो मुझे मिल गया था, लेकिन मैंने कॉल पर बात करने का फैसला नहीं किया। शायद उस समय मुझे लगता था कि फोन पर बात करने से कहीं हमारी सहजता खत्म न हो जाए। इसलिए हमारी बातचीत व्हाट्सऐप पर ही होती रही।
व्हाट्सऐप पर हमारी बातें बिल्कुल सामान्य होती थीं। हाल-चाल पूछना, दिनभर की छोटी-छोटी बातें और कभी-कभी हंसी-मजाक। न मैंने कभी अपनी सीमा पार करने की कोशिश की और न उसने। हमारी बातचीत में एक सम्मान बना रहा।
देखते-देखते बात करते हुए करीब एक साल हो गया।
जून का महीना था। हमारे गांव में उस समय काफल पकने लगते हैं। पहाड़ों में काफल का मौसम अपने आप में खास होता है। जंगलों में पेड़ों पर लाल-लाल काफल देखकर मन अपने आप उन्हें तोड़ने के लिए मचल उठता है।
एक दिन मैंने काफल की फोटो अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर लगाई।
कुछ देर बाद उसका मैसेज आया—
“मुझे भी लाना काफल।”
उसने यह बात मजाक में कही थी या सच में, मुझे आज तक नहीं पता।
लेकिन मैंने उसे मजाक नहीं समझा।
मैंने मन ही मन तय कर लिया कि अगर उसने मांगा है, तो मैं जरूर दूंगा।
अगले ही दिन मैं अपने गांव के कुछ लड़कों के साथ जंगल की तरफ निकल गया। काफल तोड़ते हुए मेरे मन में बस यही ख्याल था कि उसे ये काफल देने हैं।
काफल इकट्ठे करके मैं घर लौट आया।
अगले दिन मुझे मार्केट भी जाना था।
अब मेरे सामने एक सवाल था—काफल उसके तक कैसे पहुंचाऊं?
शायद उस छोटी-सी फरमाइश ने मेरे लिए एक नया बहाना तैयार कर दिया था… उससे मिलने का।
उस रात मुझे ठीक से नींद ही नहीं आई। सोने में काफी देर लग गई और करीब रात के दो बजे जाकर कहीं आँख लगी। लेकिन सुबह पाँच बजे ही मेरी आँख खुल गई।
वरना मुझे सुबह उठाने के लिए घर में दो लोगों की जरूरत पड़ती थी। उस दिन न किसी ने जगाया, न किसी ने आवाज लगाई—पता नहीं क्यों, मन खुद ही सुबह होने का इंतजार कर रहा था।
घरवालों को बस इतना पता था कि मैं बाजार जा रहा हूँ। मैं किससे मिलने जा रहा हूँ, यह बात मैंने किसी को नहीं बताई थी।
सुबह उठकर सबसे पहले मैंने कपड़े निकाले। लेकिन जो कपड़े पहले पहने, वे मुझे पसंद ही नहीं आए। वैसे उन्हीं कपड़ों में मैं अक्सर बाजार चला जाता था, लेकिन आज बात कुछ और थी।
आज मुझे किसी खास से मिलने जाना था।
मैंने बहनों से कह-कहकर कई बार कपड़े बदलवाए। एक पहनता, फिर दूसरा पहनता और आईने में खुद को देखता। मन में बस एक ही बात थी—
आज मुझे सबसे अच्छा दिखना है।
आखिरकार यह मेरी जिंदगी की पहली मुलाकात थी। इससे पहले हम दोनों कभी आमने-सामने नहीं मिले थे। इतने दिनों से फोन और मैसेज पर बातें होती रही थीं, लेकिन आज पहली बार उसे अपने सामने देखने वाला था।
कपड़े पहनकर घर से निकला तो रास्ते भर मेरे मन में तरह-तरह के सवाल घूम रहे थे।
मैं उससे पहली बात क्या करूँगा?
क्या बोलूँगा?
कैसे बोलूँगा?
कहीं मैं उसके सामने घबरा तो नहीं जाऊँगा?
और पता नहीं, मैं उससे ठीक से बात भी कर पाऊँगा या नहीं?
जितना बाजार करीब आता जा रहा था, दिल उतनी ही तेज धड़क रहा था।
रास्ता तो वही था, लेकिन उस दिन सब कुछ अलग लग रहा था।
इन्हीं सवालों और धड़कनों के साथ आखिरकार मैं बाजार पहुँच गया।
अब बस इंतजार था उस पल का…
जब पहली बार वह मेरे सामने होगी।
मार्केट पहुँचते ही मेरी बेचैनी और बढ़ गई।
अब बस एक ही सवाल बार-बार दिमाग में घूम रहा था—
“वो कब आएगी?”
मैं बार-बार इधर-उधर देख रहा था। हर आती-जाती लड़की को देखकर एक पल के लिए लगता कि शायद वही है।
अचानक मेरे फोन की घंटी बजी।
मेरे दिल की धड़कन एकदम तेज हो गई। मुझे लगा—
“उसका कॉल आ गया!”
मैंने तुरंत फोन की तरफ देखा, लेकिन स्क्रीन पर कंपनी का नंबर था।
उस समय मुझे इतनी झुंझलाहट हुई कि मन किया फोन करने वाले को वहीं जाकर डाँट दूँ। आखिर आज ही फोन करना था क्या?
लेकिन फोन मैंने हाथ में ही पकड़े रखा। मन में एक डर भी था—
“कहीं उसका कॉल आया हो और मैंने सुना न हो?”
फिर दूसरा ख्याल आया—
“हो सकता है उसने मैसेज किया हो और मेरा इंटरनेट नहीं चल रहा हो।”
मैं बार-बार फोन की स्क्रीन देख रहा था। दिमाग में पता नहीं कितनी बातें चल रही थीं।
तभी अचानक फिर फोन की घंटी बजी।
इस बार मैंने बिना एक पल गंवाए झट से फोन उठा लिया।
लेकिन…
वो उसका फोन नहीं था।
मेरे पापा का कॉल था।
उन्होंने बाजार से कुछ सामान लाने के लिए कहा।
उनकी बात सुनते ही मेरा चेहरा उतर गया। अभी कुछ देर पहले तक जिस फोन की घंटी मुझे खुशी दे रही थी, वही फोन अब मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।
फोन रखते ही मेरे दिमाग में एक और अजीब-सा ख्याल आया—
“कहीं वो आज आना ही भूल तो नहीं गई?”
फिर सोचा—
“या घर में किसी ने उसे रोक दिया होगा?”
“कहीं उसके घरवालों को पता तो नहीं चल गया?”
“या फिर उसने आने का इरादा ही बदल दिया?”
पता नहीं क्यों, मेरा दिमाग उस समय हर तरह की बेकार की बातें सोचने लगा था।
असल में इंतज़ार शायद ऐसा ही होता है।
जब किसी खास इंसान का इंतज़ार हो, तो कुछ मिनट भी घंटों जैसे लगने लगते हैं।
मैं वहीं खड़ा फोन को हाथ में पकड़े बस उसकी एक कॉल का इंतज़ार कर रहा था।
मुझे क्या पता था कि कुछ ही देर में मेरा ये इंतज़ार एक ऐसी मुलाकात में बदलने वाला था, जिसे मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगा।
फिर अचानक मेरे फोन की घंटी बजी।
इस बार न जाने क्यों, मन में गुस्सा भी था और उदासी भी। मैंने थोड़ा गुस्से में फोन उठाया और कहा—
“हैलो…”
उधर से धीमी-सी आवाज आई—
“कहाँ हो आप?”
मैंने तुरंत फोन की स्क्रीन देखी।
इस बार सच में उसका ही कॉल था।
मेरी सारी नाराज़गी और बेचैनी एक पल में गायब हो गई। मैंने जल्दी से कहा—
“मैं इस रेस्टोरेंट में हूँ… आ जाओ।”
कुछ देर बाद वह अपनी एक दोस्त के साथ वहाँ आ गई।
मैंने उन्हें बैठने के लिए कहा। बैठते ही मैंने पूछा—
“पानी लाऊँ?”
उन्होंने पानी के लिए मना कर दिया।
मैंने फिर कहा—
“चाय मंगाऊँ?”
उन्होंने उसके लिए भी मना कर दिया।
मैं थोड़ा असमंजस में पड़ गया। फिर मैंने पूछ लिया—
“तो कुछ खाओगे?”
जवाब आया—
“कुछ नहीं।”
मैंने हँसते हुए कहा—
“ये क्या बात हुई? कुछ तो खाओ।”
फिर मैंने कहा—
“कुछ भी मंगा देता हूँ।”
और बिना ज्यादा पूछे मैंने ठंडा ऑर्डर कर दिया।
लेकिन इन सब बातों के बीच एक बात ऐसी थी, जिसे मैं खुद भी महसूस कर रहा था।
मैंने अभी तक उनका चेहरा ठीक से देखा ही नहीं था।
कोशिश तो कर रहा था, लेकिन पता नहीं क्यों डर भी लग रहा था। इतने दिनों से जिस चेहरे की कल्पना करता आया था, आज वही चेहरा मेरे सामने था और मैं उसे देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
आखिरकार मैंने जैसे-तैसे हिम्मत की और उनकी तरफ देखा।
और उस एक पल में…
मैं उस चेहरे को आज तक नहीं भूल पाया।
चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था। यहाँ तक कि आँखों में काजल भी नहीं लगा था। फिर भी पता नहीं क्यों, वह चेहरा मुझे बाकी सब चेहरों से अलग लगा।
मेरी नजर सबसे पहले उनके गाल पर गई।
वहाँ एक छोटा-सा तिल था।
पता नहीं क्यों, मेरी नजर उसी तिल पर टिक गई। शायद वह तिल भी उसी चेहरे के लिए बना था।
हम बातें करते रहे।
एक बात खत्म होती तो दूसरी शुरू हो जाती। न उनकी बातें खत्म होने का नाम ले रही थीं, न मेरी।
देखते-देखते काफी समय बीत गया।
हमारे साथ आई उनकी दोस्त आखिरकार बोल पड़ी—
“तुम दोनों थकते भी नहीं हो? कितनी बातें करते हो!”
हम दोनों बस मुस्कुरा दिए।
लेकिन सच कहूँ तो उस समय मुझे समय का पता ही नहीं चल रहा था।
मुझे लग रहा था जैसे अभी तो हम मिले हैं और वक्त इतनी जल्दी कैसे बीत गया।
फिर धीरे-धीरे जाने का समय आ गया।
मैंने उनके लिए स्टील के डिब्बे में काफल लाकर रखे थे। वह डिब्बा उन्हें देते हुए मन में एक अजीब-सी उदासी थी।
मेरा बिल्कुल भी मन नहीं था कि वह जाएँ।
और शायद…
उनका भी जाने का मन नहीं था।
क्योंकि जाने का समय आ चुका था, फिर भी वह जाने का नाम नहीं ले रही थीं।
उस छोटी-सी मुलाकात में पता ही नहीं चला कि कब पहली झिझक खत्म हुई और कब ऐसा लगने लगा कि जैसे हम पहली बार नहीं, बल्कि बहुत पहले से एक-दूसरे को जानते हों।
बस फर्क इतना था कि उस दिन पहली बार…
मैंने उस चेहरे को अपनी आँखों से देखा था, जिसे इतने समय से सिर्फ अपने ख्यालों में देखा करता था।
समय हो रहा था। मुझे नहीं पता चला कि एक घंटा बीत गया था या दो। लेकिन जब वह जाने लगीं, तो मैं बार-बार मुड़कर उन्हें देख रहा था। शायद मन कर रहा था कि यह पल थोड़ा और ठहर जाए।
यह हमारी दूसरी बार फोन पर हुई बातचीत थी, लेकिन पहली मुलाकात थी।
घर पहुँचने के बाद मैंने उन्हें मैसेज किया—
“घर पहुँच गए? काफल खराब तो नहीं हुए?”
थोड़ी देर बाद उनका जवाब आया—
“मैं कब की पहुँच गई हूँ। काफल ठीक थे।”
बस, इतना ही।
उसके बाद न जाने क्यों मेरी इच्छा नहीं हुई कि मैं उन्हें दोबारा कॉल करूँ या कोई और मैसेज करूँ। मन में एक अजीब-सी खुशी थी। ऐसा लग रहा था जैसे मैंने पता नहीं कौन-सी बड़ी बाजी जीत ली हो।
इसके बाद करीब नौ महीने तक हमारी बातें बस सामान्य ही होती रहीं। न कोई बड़ी उम्मीद थी, न कोई खास दावा। बस कभी-कभी बातचीत हो जाती और फिर अपनी-अपनी जिंदगी में हम व्यस्त हो जाते।
और हाँ… मेरे दिए हुए काफल का वह डिब्बा भी उनके पास ही था। लगभग एक साल तक।
आज सोचता हूँ तो लगता है, उस छोटे-से काफल के डिब्बे में शायद सिर्फ काफल नहीं थे… उसमें मेरी पहली मुलाकात की याद भी बंद थी, जो पूरे एक साल तक उनके पास रही।
एक शाम अचानक उनका फोन आया।
वैसे वह कभी फोन नहीं करती थीं और सच कहूँ तो मैं भी उन्हें फोन नहीं करता था। शायद हमारे बीच बातचीत का यही तरीका बन गया था—कभी मैसेज, कभी थोड़ी-बहुत बात और फिर अपनी-अपनी जिंदगी।
उनकी पहाड़ी बोली मुझे आज भी ठीक से समझ नहीं आती थी, इसलिए उस दिन भी हमने हिंदी में ही बात की।
मैंने हाल-चाल पूछा। पता नहीं क्यों, उस दिन हमारी करीब बीस मिनट तक बात हुई।
बातों के बीच मुझे ऐसा लगा जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहती हैं। कई बार लगा कि शायद वह कुछ बोलने वाली हैं, लेकिन फिर रुक जाती थीं। मैं समझ तो रहा था कि उनके मन में कुछ है, लेकिन मैंने ज्यादा जोर नहीं दिया।
मैंने सोचा, जब उन्हें कहना होगा, खुद कह देंगी।
कुछ देर बाद हमारी बात खत्म हुई और मैंने फोन काट दिया।
लेकिन उसी रात उनके मैसेज के जवाब कुछ गुस्से में आने लगे।
मैं सोचने लगा—आखिर मैंने ऐसा क्या कह दिया?
मुझे लगा शायद मेरी किसी बात से उन्हें बुरा लगा है। फिर उन्होंने बताया कि बात पढ़ाई से जुड़ी हुई थी। शायद उस समय मेरी समझ में उनकी बात पूरी तरह नहीं आई थी।
यह बात शायद 2021 की है।
लेकिन उस रात कुछ ऐसा हुआ कि मैंने ही लड़ाई की शुरुआत कर दी। पता नहीं क्यों, मैं खुद ही नाराज़ हो गया। गुस्सा इतना बढ़ गया कि मैंने उनका नंबर ब्लॉक कर दिया और फोन से नंबर भी डिलीट कर दिया।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सबसे बड़ा सवाल यही आता है—
मैंने ऐसा क्यों किया था?
मुझे खुद नहीं पता।
शायद गुस्से में इंसान वही कर देता है, जिसका पछतावा उसे बाद में होता है।
उस समय मुझे लगा था कि मैंने बस एक नंबर डिलीट किया है और एक इंसान को ब्लॉक किया है।
लेकिन शायद मैं उससे कहीं ज्यादा कुछ अपने हाथों से दूर कर रहा था।
और उस वक्त मुझे इसका जरा भी अंदाज़ा नहीं था कि यह नाराज़गी आगे चलकर हमारी कहानी में कितनी बड़ी जगह लेने वाली है।
वह गुस्सा मेरे अंदर करीब तीन साल तक रहा।
तीन साल बहुत लंबा समय होता है। इस दौरान जिंदगी आगे बढ़ती रही, लोग मिलते रहे, रास्ते बदलते रहे, लेकिन कहीं न कहीं उनके लिए मेरे मन में वही नाराज़गी बनी रही।
फिर एक दिन अचानक, बिल्कुल इत्तेफाक से हमारी मुलाकात बाजार में हो गई।
उस समय मैं अपने एक दोस्त के साथ अस्पताल में था। हम दोनों की तबीयत खराब थी और किसी काम से वहाँ आए थे।
तभी अचानक मेरी नजर उन पर पड़ी।
कुछ पल के लिए समय जैसे रुक गया।
वही चेहरा… जिसे मैंने तीन साल पहले गुस्से में अपने जीवन से दूर कर दिया था।
लेकिन उस वक्त मुझे कुछ समझ नहीं आया। मैंने उन्हें देखते ही अनदेखा कर दिया और वहाँ से चला गया।
आज सोचता हूँ तो लगता है, शायद मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।
वह मुझे देखती रहीं और मैं बिना कुछ कहे वहाँ से निकल गया।
उस समय शायद मेरे अंदर पुरानी नाराज़गी, झिझक और पता नहीं कितनी बातें एक साथ चल रही थीं। इसलिए मैं कुछ समझ ही नहीं पाया।
लेकिन वहाँ से जाने के कुछ समय बाद अचानक मेरे मन में एक सवाल आया—
उन्होंने मेरे बारे में क्या सोचा होगा?
शायद उन्होंने सोचा होगा कि मैंने उन्हें पहचानकर भी अनदेखा कर दिया।
शायद उन्हें बुरा लगा होगा।
और शायद उन्हें यह भी समझ नहीं आया होगा कि मैंने ऐसा क्यों किया।
सच तो यह है कि आज भी मुझे वह पसंद हैं।
आज भी मुझे वह अच्छी लगती हैं।
तीन साल की नाराज़गी के बाद भी शायद दिल ने उन्हें कभी पूरी तरह छोड़ा ही नहीं था।
लेकिन तब भी मैंने उनसे बात नहीं की।
कुछ समय बाद अचानक इंस्टाग्राम पर उनकी रिक्वेस्ट आई।
मैंने रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली।
लेकिन फिर भी कोई मैसेज नहीं किया।
शायद दोनों तरफ बहुत कुछ था, लेकिन शब्द किसी के पास नहीं थे।
और हमारी कहानी में एक बार फिर वही हुआ—
मुलाकात हुई, रास्ते सामने आए, लेकिन हम दोनों फिर भी एक-दूसरे से कुछ कह नहीं पाए।
पहला मैसेज भी उन्हीं का आया था।
उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा और वहीं से फिर हमारी बातचीत शुरू हो गई। धीरे-धीरे बात पहले से अलग होने लगी। अब बातचीत में वह पुरानी दूरी नहीं थी। शायद समय ने कुछ नाराज़गियाँ कम कर दी थीं।
एक बात आज तक मेरे मन में है—उन्होंने कभी मुझसे यह नहीं पूछा कि मैंने तीन साल पहले ऐसा क्यों किया था।
न उन्होंने पूछा कि मैंने उन्हें ब्लॉक क्यों किया था, न यह कि अचानक नंबर क्यों डिलीट कर दिया था।
और शायद अच्छा ही हुआ।
क्योंकि मेरे पास भी उस सवाल का कोई सही जवाब नहीं है।
अब हालात ऐसे हैं कि फोन पर कोई भी नोटिफिकेशन आता है, तो सबसे पहले मेरे मन में यही ख्याल आता है—
शायद उनका मैसेज आया है।
वह अपनी फोटो कभी नहीं लगातीं, लेकिन मेरे दिमाग में आज भी उनकी वही पुरानी तस्वीर बसी हुई है। वही चेहरा, वही मुलाकात और वही याद, जिसे इतने सालों बाद भी मैं भूल नहीं पाया।
कई बार मन करता है कि जो बात इतने समय से दिल में है, वह उन्हें बता दूँ।
कह दूँ कि शायद वह मेरे लिए सिर्फ एक अच्छी दोस्त नहीं हैं।
लेकिन फिर एक डर सामने आकर खड़ा हो जाता है—
क्या उनके दिल में भी मेरे लिए कुछ है?
मुझे नहीं पता।
और शायद इसी “पता नहीं” ने मुझे आज तक रोक रखा है।
वह मेरी बहुत अच्छी दोस्त बन चुकी हैं। उनसे बातें करना अच्छा लगता है। अपनी कई बातें उनसे कह देता हूँ, लेकिन दिल की सबसे जरूरी बात आज भी छुपाकर रखता हूँ।
डर लगता है…
कहीं मैंने अपने दिल की बात कह दी और उनके मन में मेरे लिए वैसा कुछ नहीं हुआ तो?
कहीं मेरी एक बात से हमारी इतनी अच्छी दोस्ती खत्म न हो जाए?
इसलिए मैं चुप रहता हूँ।
बाहर से सब सामान्य है—हम दोस्त हैं, बातें करते हैं, एक-दूसरे का हाल पूछते हैं।
लेकिन मेरे अंदर एक कहानी अभी भी चल रही है।
एक ऐसी कहानी, जिसमें सवाल बहुत हैं…
और जवाब सिर्फ एक इंसान के पास है।
क्या उनके दिल में भी मेरे लिए कुछ है?
अब हालात कुछ ऐसे हैं कि हमारी बात रोज होती है।
सुबह का Good Morning उनके मैसेज से शुरू होता है और रात का Good Night भी उन्हीं के मैसेज पर खत्म होता है। दिनभर छोटी-बड़ी बातें होती रहती हैं। कभी हँसी-मजाक, कभी हाल-चाल और कभी बिना किसी खास वजह के भी बातचीत।
शायद इसी वजह से अब वह मेरी जिंदगी का एक ऐसा हिस्सा बन गई हैं, जिसकी आदत सी हो गई है।
लेकिन एक बात आज भी मेरे अंदर अटकी हुई है—अब हिम्मत नहीं होती कि उनसे दोबारा उनका नंबर माँग सकूँ।
कई बार ऐसा हुआ है कि मैसेज करते-करते मन ने कहा, आज बोल ही देता हूँ।
कह दूँ कि मेरे दिल में उनके लिए क्या है।
लेकिन जैसे ही कहने की हिम्मत जुटाता हूँ, एक डर सामने आ जाता है—
अगर उन्होंने मना कर दिया तो?
और उससे भी बड़ा डर—
अगर मेरी बात से हमारी दोस्ती ही खत्म हो गई तो?
जिस इंसान को इतने सालों बाद वापस अपनी जिंदगी में पाया है, उसे दोबारा खोने का डर शायद मुझे बोलने ही नहीं देता।
इसलिए आज भी मैं अपनी बात दिल में रखता हूँ।
शायद कभी कह पाऊँ…
और शायद कभी नहीं।
लेकिन एक बात मैं अपने दिल से नहीं छुपा सकता—
वह मेरी पहली पसंद थीं…
और शायद मेरी आखिरी पसंद भी वही रहेंगी।
क्योंकि कुछ लोग जिंदगी में बहुत देर से वापस आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो समझ आता है कि दिल ने उन्हें इतने सालों में कभी जाने ही नहीं दिया था।
कुछ बातें अधूरी रह गईं,
कुछ मुलाकातें अधूरी रह गईं।
दिल में जो था, कह न सका,
बस वही बातें अधूरी रह गईं।
पसंद थी वो, आज भी पसंद है,
बस कहने की हिम्मत नहीं।
डर लगता है कहीं बता दिया तो,
जो अपना है वो भी अपना न रहे कहीं।
इसलिए खामोश हूँ आज भी,
दिल की बात दिल में ही रखता हूँ।
वो मेरी पहली पसंद थी,
और शायद आखिरी भी रहेगी…
बस
कुछ बातें अधूरी रह गईं।
अंकित खत्री