Flute Tune - Part 4 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | बांसुरी की धुन - भाग 4

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बांसुरी की धुन - भाग 4


रामलाल की पहली वाणी
"जयगुरु..."
रामलाल के मुँह से निकला यह एक शब्द पूरे प्रांगण में जैसे ठहर गया।
उसने सामने बैठे लोगों की ओर देखा। सैकड़ों आँखें उसी पर टिकी थीं।
उसके हाथ काँप रहे थे।
माइक पकड़ने का यह उसका पहला अवसर था।
कुछ क्षण वह मौन खड़ा रहा। फिर उसने गहरी साँस ली और धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—
"जयगुरु... आप सभी को।"
उसकी आवाज में न वक्ता का आत्मविश्वास था, न किसी विद्वान का गर्व।
वहाँ केवल एक पश्चाताप से भरे मनुष्य की सच्चाई थी।
"मैं कोई ज्ञानी नहीं हूँ... न गुणी हूँ।"
भीड़ बिल्कुल शांत थी।
"मैंने ऐसी कोई गली, चौक या रास्ता नहीं छोड़ा, जहाँ मैं शराब पीकर गिरा न हूँ।"
कुछ लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
रामलाल बोलता गया—
"मैं शिक्षक था... लेकिन शिक्षक होकर भी अपने जीवन में शिक्षक की गरिमा नहीं रख सका।"
उसकी आवाज भर्रा गई।
"मुझे लगता था कि शिक्षा का अर्थ है—पढ़ना, लिखना, परीक्षा पास करना और दूसरों को पढ़ाना।"
उसने क्षणभर रुककर कहा—
"लेकिन आज समझ में आया कि शिक्षा केवल ज्ञान नहीं देती। शिक्षा के साथ विनम्रता कैसे आएगी? अहिंसा चरित्र में कैसे उतरेगी? मनुष्य अपने आचरण को कैसे बदलेगा? इसका मार्ग कौन बताएगा?"
उसने सिर झुका लिया।
"मेरी शिक्षा में यह सब नहीं था।"
कुछ क्षण तक केवल हवा में लगे बाँस के आसन की हल्की सरसराहट सुनाई देती रही।
फिर उसने कहा—
"मैं लगभग छह महीने तक अलग-अलग मठों और तीर्थों में घूमता रहा। बहुत कुछ देखा... बहुत कुछ सुना... लेकिन जिस चीज की तलाश थी, वह कहीं नहीं मिली।"
अब उसकी आवाज में आश्चर्य था।
"आज यहाँ आकर पहली बार मैंने देखा कि एक संताल भाई ठाकुर जी को भोग अर्पित कर सकता है।"
उसने रावण हेंब्रम की ओर देखा।
"एक संताल दीक्षा दे सकता है। संताली भाषा में श्रीश्री ठाकुर से बात कर सकता है। यहाँ किसी ने यह नहीं पूछा कि तुम किस जाति के हो।"
रामलाल की आँखें चमक उठीं।
"आज मेरे मन में पहली बार प्रश्न उठा—अगर परमात्मा सबका है, तो उसके सामने मनुष्य-मनुष्य में इतनी दीवारें क्यों?"
वह कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
"मैंने आज एक और बात समझी..."
उसने सत्यानुसरण की ओर देखा।
"धर्म चरित्र में है, केवल ग्रंथों में नहीं। ग्रंथ मार्ग दिखाते हैं, लेकिन उस मार्ग पर चलना मनुष्य को स्वयं पड़ता है।"
उसके भीतर जैसे कोई बात पूरी तरह बैठ चुकी थी।
"आज मैं अपने आपको धन्य समझता हूँ।"
उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।
"आप सभी को आनंदित जयगुरु।"
इतना कहकर उसने माइक धीरे से तापस मंडल के हाथों में दे दिया।
कुछ क्षण तक पूरा प्रांगण मौन रहा।
फिर कहीं से धीमी आवाज आई—
"जयगुरु..."
और देखते ही देखते अनेक कंठ उसी स्वर में मिल गए।
"जयगुरु..."
जिस रामलाल को आज तक लोग एक शराबी मास्टर के रूप में जानते थे, आज उसी के मुँह से ऐसी बातें सुनकर लोगों के मन में एक नई जिज्ञासा जन्म ले चुकी थी।
वही रामलाल...
जो कभी शराब के नशे में गलियों में पड़ा मिलता था।
जो काम से अधिक आलस्य और बुरी संगति के लिए जाना जाता था।
जो धर्म, नीति और सदाचार से कोसों दूर था।
आज उसके भीतर जैसे कोई दूसरा मनुष्य दिखाई दे रहा था।
लेकिन सत्संग अभी समाप्त नहीं हुई थी।
तभी रावण हेंब्रम ने माइक अपने हाथ में लिया।
उन्होंने चारों ओर देखा और शांत स्वर में कहा—
"मैं एक संताल भाई हूँ।"
भीड़ फिर शांत हो गई।
"मैं विशुद्ध शाकाहारी भोजन करता हूँ। मांस-मछली, प्याज और लहसुन से दूर रहता हूँ।"
उन्होंने कुछ क्षण रुककर कहा—
"लेकिन आज मैं एक और बात कहना चाहता हूँ।"
"जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता।"
सभा में हलचल-सी हुई।
रावण हेंब्रम ने अपनी बात जारी रखी—
"ब्राह्मण कोई जाति नहीं, एक पदवी है। ब्रह्म को जानने वाला, सत्य को अपने जीवन में धारण करने वाला, अपने आचरण से दूसरों को प्रकाश देने वाला—वही ब्राह्मण कहलाने योग्य है।"
"लेकिन हमने एक पदवी को जाति मान लिया।"
"और फिर जाति को जन्म से बाँध दिया।"
"यहीं से भेद की दीवारें खड़ी होने लगीं।"
भीड़ के बीच से अचानक एक आवाज उठी—
"हेंब्रम जी!"
सभी की निगाहें उस व्यक्ति की ओर घूम गईं।
वह व्यक्ति कुछ उत्तेजित दिखाई दे रहा था।
उसने कहा—
"अगर आपकी बात मान ली जाए तो वर्ण-विचार ही मिट जाएगा! फिर समाज की व्यवस्था कैसे चलेगी?"
सभा में कुछ लोग उसकी बात का समर्थन करते हुए सिर हिलाने लगे।
रावण हेंब्रम शांत खड़े रहे।
प्रश्न गंभीर था।
तापस मंडल भी ध्यानपूर्वक देखने लगे।
वह व्यक्ति फिर बोला—
"क्या ठाकुर जी का यही मार्ग है?"
अब पूरे प्रांगण में एक गहरा मौन छा गया।
रामलाल भी ध्यान से रावण हेंब्रम की ओर देखने लगा।
उसे लगा जैसे आज पहली बार उसके सामने केवल पूजा नहीं, बल्कि धर्म का वास्तविक प्रश्न खड़ा हुआ है।
रावण हेंब्रम ने माइक को दोनों हाथों से थामा।
उनके चेहरे पर न क्रोध था, न उत्तेजना।
केवल एक शांत मुस्कान थी।
उन्होंने धीरे से कहा—
"भाई, आपका प्रश्न गलत नहीं है..."

क्रमशः....