My Dear Professor - Part 38 in Hindi Love Stories by Vartika reena books and stories PDF | माई डियर प्रोफेसर - भाग 38

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माई डियर प्रोफेसर - भाग 38

















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चारू के लाख जतन करने पर भी अमर उसे लेकर कार मे आ जाता है। वो उसे आराम से कार मे बिठाया है। और झुक कर उसके पैरो के पास उसकी सैंडल रख देता है। 

अमर के कंधे चारू के घूटने से हल्का स्पर्श कर रहे थे। स्पर्श कुछ क्षणो का ही था किंतु चारू के शरीर मे तरंगे उत्पन्न करने के लिए काफी था। 

अमर घूम कर गाडी की दूसरी तरफ चला गया तो चारू की सांस मे सांस आई। वो सीट से टक्कर बैठ गई।  अमर ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गया। उसने इगंशन ओन किया और गाडी चालू हो गई । अमर ने एक नजर चारू पर डाली । वो.आंखे बंद करे सीट से सर टिकाए बैठी थी।

अमर ने विंडो खोल दी। और कार आगे बडा दी। 
हवा अमर से होते हुए चारू तक पहुंच रही थी। उसकी जंगल और कॉफी की खुशबू चारू की धडकने बडा रही थी। 

चारू ने गहरी सांस खिंची । अमर की गंध ने उसे आल्खन मे ले लिया। एक गर्माहट और अपनापन चकरू को महसूस होने लगा। उसकी सांसे तेज हो गई। 

चारू ने हाथ बडाकर डैशबोर्ड पकड लिया। उसने मुंह खोलकर सांस लेना शुरू कर दिया। 

तभी एक आवाझ उसके कानो मे गूंज गई।  

" तुम किसी लायक नही हो। किसी के प्रेम के योग्य नही । तभी अमर सर ने तुम्हे मना कर दिया। "

चारू की आंखो से आंसू बहने लगे। 

अमर ने जब चकरू की बिगड़ती हालत देखी तो कार एक तरफ लगाकर वो चारू की ओर मुखातिब हुआ।  

उसके माथे पर बल पड गए।  अभी तक तो चारू ठीक थी। अब क्या हो गया। वही अमर कुछ बोलता की चारू ने अपने एक हाथ से दूसरे हाथ की कलाई पर नाखून गडा दिए।  

अमर की आंखे बडी हो गई।  
" चारू डोंट ! " , अमर ने चारू की कलाई पकड ली। 

चारू ने डबडबाई निगाहो से अमर को देखा। 
" मां ने कहा था कि मै..लायक नही प्यार के ! मै मनहूस हूं ।"

चारू की बात सुनकर अमर को एहसास हुआ की उहके खून मे उबाल आ रहा है। आखिर कैसे कोई चारू को ऐसी बाते बोल सकता है। 

अमर ने गहरी सांस ली और गुस्सा शांत किया। उसने होले से चारू की कलाई से नाखून छुडाए । और अंगूठे से उसकी खाल पर पडे लाल निशान पर फहराने लगा। 


" हम बाद मे बात करेंगे इस बारे मे । पहले स्वंय को शांत करो। " , अमर ने प्यार से कहा। 

उसने चारू को हल्के से अपनी तरफ खींचा । और सीने से लगा लिया। वो चारू का सर सहलाने लगा। चारू की सांसे धीमी और संयत होने लगी। उसने अमर के सीने मे सर छुपा लिया।




एक बार शांत होने पर चारू अपनी सीट पर सही से बैठ गई।  उसने आंसू पहुचे और खिडकी से बाहर देखने लगी।

आज भी उनके आगे कमजोर पड जाती हूं। सब दर्द कह जाती हूं। पर ये पहली बार था की उन्होने मुझे सीने से लगाया है। मेरा सर सहलाया है। मुझे एहसास कराया है की मै..मै भी मायने रखती हूं। की वो..वो.मेरी फिक्र करते है।


सोचते सोचते चारू ने अमर को देखा। अमर गंभीरता से कार ड्राइव कर रहा था। 

" आप इतना ध्यान क्यो रख रहे हो सर ? " चारू ने सवाल किया। 

अमर ने अचानक हुए सवाल पर चारू की सवालिया निगाहो से देखा। 
" तुम्हे लगता है..मै तुम्हारी फिक्र नही करता ! ", अमर ने बाई भंव उचका कर सवाल किया। 

चारू के होठो पर दर्द भरी मुस्कान आ गई। " आपने जो बाते कही थी मुझे उससे तो यही लगता है कि मै आपकी नजरो मे नकारा थी । "

अमर के हाथ स्टेयरिंग पर कस गए।  
उसने दांत पिसते हुए कहा , " तो इसलिए तुम पांच साल तक मुझे इग्नोर करती रही । " 

" आपने अपमान किया था । आपकी बात कि मै नही समझुंगी की क्या होता है ऐम , गोल..चुभ गई  थी। आपको मुझसे प्यार नही ये समझ आता मुझे । पर मै किसी लायक नही..ये तिरस्कार स्वीकर नही मुझे । ", चारू ने दर्द और गुस्से के मिले जुले भाव से कहा। 

अमर की भाव कोमल हो गए।  
" तुम पूरी बात नही जानती चारू । हां..मै गुस्से मे ज्यादा बोल गया था। पर मेरे हार्श वर्ड्स का कारण कुछ और था। तुम्हे खुद से जोड कर मुहिबत मे नही डाल सकता था मै । " 
अमर तडप कर बोला। 


चारू ने चौंक कर अमर को देखा । 
" मुसीबत..मै ! कैसे ? " 

अमर ने गहरी सांस छोडी। उसने चारू को एक नजर देखा फिर सामने सडक पर देखने लगा। 

" मै..मेघराज मे हो रहे खनन के खिलाफ खडा था। तस्करी करने वालो का सबसे बडा दुश्मन । " अमल चकरू की तरफ देखा । 
" तुम्हे याद है एक बार जंगल से कुछ लोगो की लाशे मिली थी। और पुलिस तुमसे पूछताछ करने आई थी । " 


अमर के सवाल पर चारू ने हां मे सर हिला दिया। उसे याद आई वो रात जब वो जंगल मे गई थी और उसने लकडी की तस्करी करते लोगो को देखा था। 

" इससे आपका क्या लेना देना ? ", चारू ने असमंजस की स्थिति मे सवाल किया। 

अमर हल्के से हँस दिया ।
" इन लोगो को मैने ही मारा था। " 



क्रमशः