अर्थ - अनर्थ
यह श्लोक महाभारत का नहीं है। यह एक आधुनिक संस्कृत पहेली (riddle) या लोक-व्युत्पत्ति (folk etymology) है, , गीताप्रेस संस्करण या किसी प्रामाणिक महाभारत पाठ में यह श्लोक नहीं मिलता। व्यास-गणेश संवाद की प्रसिद्ध कथा (जहाँ गणेश बिना रुके लिखते हैं और व्यास गूढ़ श्लोक बोलकर समय लेते हैं) महाभारत के आदि पर्व के कुछ परंपरागत आख्यानों में है,
केशवं पतितं दृष्ट्वा द्रोणो हर्षमुपागतः।
कौरवाः सर्वे रुदन्ति हा! हा! केशव! केशवः॥
सम्पूर्ण महाभारत में कृष्ण तो कहीं गिरे नहीं और अगर कहीं गिर भी गये हों तो कृष्ण को गिरते देखकर द्रोण हर्ष से क्यों उछल पड़ेंगे? और तो और शत्रु पक्ष के दुष्ट कौरव हा! हा ! केशव! केशव! कर के क्यों रोयेंगे…?
किन्तु यहाँ उनका अर्थ है.
केशव:
पारंपरिक अर्थ: भगवान विष्णु या कृष्ण (कः + ईशः + वः)।
संशोधित/व्यावहारिक अर्थ: "के" (सप्तमी विभक्ति में 'जल में' या 'पानी पर') + "शवम्" (मृत शरीर या लाश)। अर्थात जलराशि में तैरती हुई या प्रवाहित लाश।
द्रोण:
पारंपरिक अर्थ: आचार्य द्रोणाचार्य, जो कौरव-पांडव सेना के गुरु थे।
संशोधित/व्यावहारिक अर्थ: लोक-निरुक्ति या पक्षी-वाचक संदर्भ में कौव्वा (Crow) या काग। (संस्कृत में 'द्रोणकाक' या काक-विशेष का संदर्भ मिलता है, जो मरे हुए जीवों के मांस पर आश्रित होते हैं)।
कौरव:
पारंपरिक अर्थ: धृतराष्ट्र के सौ पुत्र और उनकी सेना।
संशोधित/व्यावहारिक अर्थ: व्युत्पत्ति की दृष्टि से कुरुक्षेत्र की भूमि पर विचरने वाले मांसाहारी वन्य जीव, विशेषकर सियार (Jackal) या शृगाल, जो युद्ध के मैदान में मरे हुए सैनिकों के अवशेषों के मुख्य उपभोगकर्ता थे।
कुरुक्षेत्र की भूमि पर अठारह दिनों का प्रलय थम चुका था। सूर्य अब भी गगन से आग बरसा रहा था, किंतु धरती पर आग से अधिक रक्त और लाशों की तासीर थी। वह कोई सामान्य रणक्षेत्र नहीं था, बल्कि मनुष्य के अंधकारमय अहंकार का सबसे बड़ा श्मशान था।
लाखों योद्धा धराशायी हो चुके थे। चिताएँ सजाने के लिए न तो अब जंगल बचे थे और न ही जीवित बचे हाथों में इतनी शक्ति कि वे अपनों का अंतिम संस्कार कर सकें। युद्ध की विभीषिका इतनी विकराल थी कि राजाओं और सैनिकों के शवों के ढेर के ढेर वैसे ही पड़े सड़ रहे थे। अंततः, महामारी और दुर्गंध से बचने के लिए एक ही उपाय बचा था—लाखों मृत शरीरों को पास की जलधाराओं और नदियों में प्रवाहित कर देना।
नदियाँ लाल थीं, और उनका प्रवाह मूक लाशों के बोझ से सिसक रहा था।
इसी वीरान और खौफनाक सन्नाटे के बीच, कुरुक्षेत्र का आसमान और तट दो अलग-अलग दुनियाओं में बँट चुके थे।
आसमान में काले बादलों की तरह मंडरा रहे द्रोण (कौव्वे) मारे खुशी के पागलों की तरह कांव-कांव कर रहे थे। एक कौव्वे ने जब पानी के थपेड़े खाती हुई अनगिनत लाशों के तैरते हुए कारवां को देखा, तो उसका कलेजा गर्व और हर्ष से भर उठा। उसके लिए यह युद्ध कोई नीति या अधर्म की लड़ाई नहीं था, बल्कि उसके लिए यह महीनों का खुला दावतनामा था। वह पंख फड़फड़ाता हुआ आसमान में गोता लगाने लगा और हर्षोन्माद में चिल्ला उठा—देख, जल में कैसा प्रचुर आहार बह रहा है!
किन्तु, जमीन की स्थिति बिल्कुल उलट थी।
तट की गीली और खून से सनी मिट्टी पर कौरव (जंगल के सियार और शृगाल) मंडरा रहे थे। उनकी आँखें भूख से लाल थीं। उन्होंने पानी के तेज बहाव में तैरती हुई उन अनगिनत लाशों को अपनी आँखों के सामने बहते हुए देखा—मांस का ऐसा अंबार, जिसे वे दूर से सूंघ तो सकते थे, अपनी जीभ से महसूस भी कर सकते थे, किंतु पा नहीं सकते थे।
सियार को तैरना नहीं आता था। वह गहराता हुआ पानी और उसकी तेज धारा उसके लिए एक अभिशाप बन चुकी थी।
सामने प्रचुर भोजन था, जीवन भर का सबसे बड़ा शिकार था, किंतु बीच में पानी का व्यवधान था। उस बेबसी, उस लाचारी और उस असहनीय लालच ने सियार की चीख को एक अमानवीय विलाप में बदल दिया। वह पानी की ओर देखकर अपना सिर पीट-पीटकर रोने लगा—
"हा! हा! केशव! केशव!"(अर्थात: हाय! हाय! लाश पानी में है! लाश पानी में है! काश यह जमीन पर होती, तो हम महीनों तक तृप्त होकर खाते!)
उस शांत और वीरान शाम को कुरुक्षेत्र के तट पर गूंजने वाली सियारों की वह चीख और कौव्वों की वह विजय-घोषणा, मनुष्य के उस महायुद्ध का सबसे बड़ा और व्यंग्यात्मक सच थी। मनुष्य ने युद्ध राजाओं के नाम पर लड़ा, प्रतिष्ठा के नाम पर लड़ा, और अंत में उसके इस अहंकार का उत्सव मनाने के लिए प्रकृति के ये छोटे-छोटे अपमार्जक ही बचे रहे—एक जो आसमान से उड़कर मजे ले रहा था, और दूसरा जो तट पर खड़ा बस आंसू बहा रहा था।