अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 58 : नैना की आँखों में छिपा राज़
रात के लगभग बारह बज चुके थे।
शहर की सड़कें अब पहले से शांत थीं, लेकिन ऊँची इमारतों की खिड़कियों में जलती रोशनियाँ अब भी बता रही थीं कि शहर पूरी तरह सोया नहीं था।
एक पुरानी इमारत के सामने अनन्या, आरव और कबीर आकर रुक गए।
इमारत बाकी इमारतों से बिल्कुल अलग थी।
उसकी दीवारों पर पुरानी दरारें थीं।
खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे।
और सबसे अजीब बात...
इमारत की सबसे ऊपरी मंज़िल पर सिर्फ एक खिड़की में रोशनी जल रही थी।
अनन्या ने उस खिड़की को देखते हुए कहा—
"नैना वहीं है।"
आरव ने आसपास देखा।
"हमें सावधान रहना होगा।"
कबीर बिल्कुल शांत था।
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
"क्या हुआ?"
कबीर ने धीरे से कहा—
"यह जगह मुझे अच्छी तरह याद है।"
आरव चौंका।
"तुम पहले यहाँ आ चुके हो?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"लेकिन कब?"
कबीर कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने कहा—
"जब यह इमारत बनी भी नहीं थी।"
अनन्या और आरव दोनों उसे देखने लगे।
"क्या मतलब?"
कबीर ने इमारत की ओर देखते हुए कहा—
"यह जगह पहले एक लाइब्रेरी थी।"
"बहुत पुरानी लाइब्रेरी।"
"यहीं पहली बार..."
वह रुक गया।
अनन्या ने पूछा—
"पहली बार क्या?"
कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
"यहीं तुम्हारी दूसरी कहानी शुरू हुई थी।"
अनन्या के चेहरे का रंग उड़ गया।
"मेरी... दूसरी कहानी?"
"हाँ।"
"जिसे तुमने कभी पूरा नहीं किया।"
तीनों धीरे-धीरे इमारत के अंदर दाखिल हुए।
दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।
चीईईं...
अंदर घुप अंधेरा था।
आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
सामने एक लंबा गलियारा था।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।
लेकिन जैसे ही आरव की रोशनी उन चित्रों पर पड़ी...
उसकी टॉर्च अपने-आप बंद हो गई।
"क्या हुआ?"
आरव ने फोन को दोबारा चालू करने की कोशिश की।
स्क्रीन काली थी।
कबीर ने कहा—
"यहाँ बिजली से रोशनी नहीं होती।"
अनन्या ने पूछा—
"तो?"
कबीर ने कहा—
"यहाँ कहानियाँ रोशनी देती हैं।"
उसी समय...
गलियारे की दीवार पर एक छोटा-सा दीपक अपने-आप जल उठा।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
कुछ ही पलों में पूरा गलियारा पीली रोशनी से भर गया।
अनन्या ने सामने देखा।
दीवार पर एक बड़ा-सा बोर्ड लगा था।
उस पर लिखा था—
"अधूरी कहानियों का संग्रहालय"
अनन्या धीरे से आगे बढ़ी।
दरवाज़े के नीचे एक पुराना रजिस्टर पड़ा था।
उसने उसे उठाया।
पहले पन्ने पर सैकड़ों नाम लिखे थे।
कुछ नामों पर लाल निशान था।
कुछ नामों के आगे लिखा था—
"कहानी पूरी।"
कुछ के आगे—
"कहानी अधूरी।"
लेकिन सबसे आखिरी नाम देखकर अनन्या की साँस अटक गई।
वहाँ लिखा था—
"नैना — कहानी शुरू होने की प्रतीक्षा में।"
आरव ने पूछा—
"इसका मतलब?"
कबीर ने कहा—
"नैना की कहानी अभी शुरू ही नहीं हुई।"
अनन्या ने रजिस्टर बंद कर दिया।
"तो वह कौन है?"
कबीर ने धीरे से कहा—
"एक पात्र..."
"जिसे किसी लेखक ने अभी तक लिखा ही नहीं।"
ऊपर...
नैना अब भी छत पर खड़ी थी।
उसके पीछे दीवार पर खुली हुई हजारों काली आँखें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं।
नैना ने अपने हाथ में पकड़ी किताब को देखा।
"तुम मुझे यहाँ क्यों लाई?"
किताब के पन्ने अपने-आप पलटे।
एक तस्वीर उभरी।
उस तस्वीर में अनन्या थी।
लेकिन उसके साथ एक और लड़की थी।
नैना।
दोनों बहुत छोटी थीं।
और उनके बीच वही अधूरी किताब रखी थी।
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
"मुझे यह याद क्यों नहीं?"
किताब से आवाज़ आई—
"क्योंकि तुम्हारी यादें तुम्हारी नहीं हैं।"
नैना चौंकी।
"क्या?"
"उन्हें किसी और ने बंद किया है।"
"किसने?"
किताब के पन्ने काले हो गए।
फिर एक शब्द उभरा—
"अनन्या।"
नैना पीछे हट गई।
"नहीं..."
"वह ऐसा नहीं कर सकती।"
किताब ने कोई जवाब नहीं दिया।
नैना ने किताब बंद कर दी।
लेकिन उसके पीछे से एक आवाज़ आई—
"क्यों नहीं?"
नैना धीरे-धीरे पलटी।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन दीवार पर एक नया चेहरा उभर आया।
वह अनन्या का चेहरा था।
और उसके नीचे लिखा था—
"पहली लेखिका ने तुम्हें बनाया..."
"फिर तुमसे डरकर तुम्हारी यादें मिटा दीं।"
नैना ने दीवार को घूरते हुए कहा—
"झूठ!"
अचानक दीवार पर दूसरा चेहरा उभरा।
इस बार...
कबीर का।
उसके नीचे लिखा था—
"उसे भी अधूरा छोड़ा।"
फिर तीसरा चेहरा—
आरव।
उसके नीचे लिखा था—
"उसे भी कहानी से बाँध दिया।"
नैना की आँखों से आँसू निकल आए।
"तो..."
"मैं क्या हूँ?"
दीवार पर आखिरी शब्द उभरे—
"तुम वह हो..."
"जिसे अनन्या ने सबसे ज्यादा प्यार किया था।"
नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।
नीचे...
अनन्या अचानक रुक गई।
उसके सीने में तेज़ दर्द उठा।
"आह..."
आरव ने उसे संभाला।
"क्या हुआ?"
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
उसे किसी लड़की के रोने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
"तुमने मुझे क्यों छोड़ा?"
अनन्या ने सिर पकड़ लिया।
"नैना..."
आरव चौंका।
"तुम उसका नाम कैसे जानती हो?"
अनन्या ने आँखें खोलीं।
उसकी आँखों में आँसू थे।
"क्योंकि..."
"वह मुझे बुला रही है।"
कबीर ने गंभीर होकर कहा—
"वह सिर्फ तुम्हें नहीं बुला रही।"
"भक्षक भी उसे तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है।"
अनन्या ने पूछा—
"तो हमें जल्दी ऊपर जाना होगा।"
कबीर ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
लेकिन तभी...
पूरी इमारत काँप उठी।
दीवारों पर लिखे सारे नाम एक साथ चमकने लगे।
"अधूरी कहानी..."
"अधूरी कहानी..."
"अधूरी कहानी..."
आरव ने कहा—
"यह क्या हो रहा है?"
कबीर ने ऊपर देखा।
"भक्षक ने संग्रहालय ढूँढ लिया है।"
अनन्या ने पूछा—
"वह यहाँ क्यों आएगा?"
कबीर ने कहा—
"क्योंकि इस जगह पर..."
"दुनिया की सबसे ज्यादा अधूरी कहानियाँ हैं।"
और तभी...
गलियारे के अंत में काला धुआँ दिखाई दिया।
वही काली परछाईं धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी।
अनन्या ने किताब को कसकर पकड़ लिया।
"हमें ऊपर जाना होगा।"
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"साथ में।"
तीनों सीढ़ियों की ओर दौड़े।
लेकिन जैसे ही वे पहली सीढ़ी पर पहुँचे...
सीढ़ियाँ गायब हो गईं।
उनकी जगह एक गहरी खाई थी।
कबीर ने नीचे देखा।
"यह उसकी चाल है।"
अनन्या ने पूछा—
"अब?"
कबीर ने दीवार की ओर देखा।
वहाँ एक छोटा-सा दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।
उस पर लिखा था—
"केवल वह व्यक्ति खोल सकता है जिसे अपनी कहानी याद नहीं।"
तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।
आरव ने कहा—
"नैना।"
अनन्या ने सिर हिलाया।
"हमें उसके पास पहुँचना होगा।"
कबीर ने दरवाज़े को देखते हुए कहा—
"लेकिन इसके लिए..."
"हमें पहले उसे यहाँ लाना होगा।"
उसी क्षण ऊपर से नैना की आवाज़ आई—
"आपको मुझे ढूँढने की जरूरत नहीं है..."
तीनों ने ऊपर देखा।
सीढ़ियों के टूटे हुए हिस्से के पार...
नैना खड़ी थी।
उसके हाथ में अधूरी किताब थी।
लेकिन उसकी आँखें...
अब पूरी तरह काली थीं।
अनन्या ने काँपते हुए कहा—
"नैना..."
नैना मुस्कुराई।
"बहुत देर कर दी..."
उसके पीछे काली परछाईं खड़ी थी।
भक्षक की आवाज़ पूरे भवन में गूँजी—
"अब चुनो, अनन्या..."
"अपनी पुरानी कहानी..."
"या वह लड़की जिसे तुमने खुद अधूरा छोड़ा था।"
अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले।
और पहली बार...
नैना की काली आँखों में भी एक पल के लिए आँसू चमके।
उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—
"दीदी..."
अनन्या जम गई।
"दीदी?"
उस एक शब्द ने जैसे उसके भीतर बंद हजारों यादों का दरवाज़ा खोल दिया।
और उसी क्षण...
अधूरी किताब के पन्ने अपने-आप पलटने लगे।
एक नया अध्याय दिखाई दिया—
"दो बहनें और एक अधूरी कहानी।"
क्रमशः...