Ek Purush - 3 in Hindi Short Stories by Aloka Patel books and stories PDF | एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 3

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एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 3

भाग ३ — पापा की अपेक्षाएँ

मिहिर ने सोचा था कि घर का माहौल अब थोड़ा हल्का हो जाएगा।

लेकिन जिंदगी में कुछ शांतियाँ सिर्फ तूफान आने से पहले आती हैं।

वह दिन भी सामान्य तरीके से शुरू हुआ।

सुबह की चाय, नाश्ता, ऑफिस की भागदौड़ और घर की छोटी-बड़ी बातें।

मिहिर ऑफिस जाने के लिए निकल रहा था, तभी पापा ने पीछे से कहा,

“मिहिर, आज शाम को जल्दी आ जाना।”

मिहिर रुक गया।

“क्यों पापा?”

“मुझे तुमसे थोड़ी जरूरी बात करनी है।”

“क्या बात है?”

“तुम घर आओगे तब करेंगे।”

मिहिर ने पापा के चेहरे की तरफ देखा।

चेहरे पर गंभीरता थी।

“ठीक है।”

पूरा दिन मिहिर के मन में पापा की बात घूमती रही।

क्या हुआ होगा?

पैसों की कोई बात?

घर का कोई काम?

माँ की तबीयत?

या फिर कोई पुरानी बात?

शाम को ऑफिस का काम खत्म करके मिहिर समय पर निकल गया।

रास्ते में हर्ष का फोन आया।

“आज शाम चाय पीने आ।”

“आज नहीं यार।”

“क्यों?”

“पापा ने घर बुलाया है।”

“सब ठीक है?”

“पता नहीं।”

“कुछ हो तो मुझे फोन करना।”

“हाँ।”

फोन रखकर मिहिर घर पहुँच गया।

पापा बालकनी में कुर्सी पर बैठे थे।

मिहिर उनके सामने जाकर बैठ गया।

“बोलिए पापा।”

पापा ने तुरंत कुछ नहीं कहा।

थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा,

“तू खुश है?”

मिहिर को इस सवाल की उम्मीद नहीं थी।

“हाँ।”

पापा हँसे।

“सच में?”

मिहिर चुप हो गया।

“बेटा, झूठ बोलना सीखा कहाँ से?”

मिहिर नीचे देखने लगा।

पापा ने धीरे से कहा,

“मैं तुझे पिछले काफी समय से देख रहा हूँ।”

“क्या?”

“तू हँसता है, लेकिन खुश नहीं है। तू सबकी बात सुनता है, लेकिन तेरी बात कोई नहीं सुनता।”

मिहिर के गले में कुछ अटक गया।

“पापा…”

“मुझे पता है कि तू घर के लिए बहुत कुछ करता है।”

कुछ पल रुककर पापा ने कहा,

“लेकिन शायद तुझे लगता है कि मैं तुझसे बहुत उम्मीद रखता हूँ।”

मिहिर ने पहली बार पापा की आँखों में सीधे देखा।

“हाँ।”

पापा कुछ समय तक चुप रहे।

फिर वे अंदर गए और एक पुराना लोहे का बक्सा लेकर आए।

बक्से पर धूल जमी हुई थी।

“यह क्या है?”

“तेरी माँ को भी नहीं पता कि इसमें क्या है।”

पापा ने बक्सा खोला।

अंदर पुराने कागज, कुछ तस्वीरें और एक छोटी-सी डायरी थी।

पापा ने डायरी मिहिर के हाथ में दे दी।

“पढ़।”

मिहिर ने पहला पन्ना खोला।

ऊपर तारीख थी—

12 जून, 1998।

नीचे लिखा था—

“आज मिहिर का जन्म हुआ। डॉक्टर ने कहा कि बेटा स्वस्थ है। मैंने उसे पहली बार गोद में लिया तो मुझे लगा कि अब मेरी जिंदगी खत्म नहीं हुई… अब तो शुरू हुई है।”

मिहिर के हाथ काँपने लगे।

वह आगे पढ़ने लगा।

“मैं गरीब हूँ, लेकिन मेरे बेटे को मेरी तरह पैसों की तंगी न हो। उसे जो बनना हो, वह बनने दूँगा।”

अगला पन्ना।

“आज मिहिर का स्कूल में एडमिशन कराया। फीस भरने के लिए अपनी घड़ी बेच दी।”

मिहिर रुक गया।

“पापा…”

पापा ने कुछ नहीं कहा।

मिहिर आगे पढ़ने लगा।

“मिहिर को आज नए जूते चाहिए थे। तनख्वाह आने में अभी दस दिन बाकी हैं। लेकिन बच्चे के चेहरे की खुशी पैसों से बड़ी है।”

पन्ने के बाद पन्ने।

कहीं स्कूल की फीस।

कहीं मिहिर की कॉलेज की फीस।

कहीं बीमार माँ की दवा।

कहीं पापा के अपने अधूरे खर्च।

हर पन्ने पर एक ही नाम था—

मिहिर।

आखिरी पन्ने पर लिखा था—

“मेरा बेटा बड़ा हो गया है। अब मुझे उससे कुछ नहीं चाहिए। बस इतना कि वह कभी यह न माने कि वह अकेला है।”

मिहिर की आँखों से आँसू बहने लगे।

“पापा, आपने मुझे यह सब कभी बताया क्यों नहीं?”

पापा हल्के से मुस्कुराए।

“बाप अपने त्याग का हिसाब बेटे से थोड़े ही माँगता है?”

“लेकिन मैं…”

“तुझे पता था कि मैं तुझसे बहुत उम्मीद रखता हूँ।”

मिहिर चुप रहा।

पापा ने कहा,

“लेकिन मेरी उम्मीद पैसों की नहीं थी।”

“तो?”

“मुझे बस यह चाहिए कि तू एक अच्छा इंसान बनकर रहे।”

मिहिर उनकी तरफ देखता रहा।

“तुझे लगता होगा कि मैं तुझे घर के लिए, माँ के लिए, अपने लिए दौड़ाता हूँ।”

“हाँ।”

“लेकिन सच यह है कि जब मैं तुझे भागते-दौड़ते देखता हूँ ना… मुझे डर लगता है।”

“किस बात का?”

“कि कहीं तू भी मेरी तरह पूरी जिंदगी परिवार के लिए भागता न रहे और एक दिन पीछे मुड़कर देखे तो समझ आए कि तू खुद कहाँ था, यह तुझे ही पता नहीं।”

मिहिर एकदम स्थिर हो गया।

पापा के शब्दों में वर्षों की थकी हुई जिंदगी थी।

थोड़ी देर बाद पापा ने दूसरी बात कही।

“मुझे तुझसे एक बात कहनी है।”

“हाँ।”

“मैं अक्सर तेरे सामने सख्त बन जाता हूँ।”

“मुझे पता है।”

“कभी-कभी लगता है कि तू मेरी बात नहीं मानता।”

“यह भी सच है।”

पापा हँस दिए।

“लेकिन शायद मुझे डर है।”

“आपको?”

“हाँ।”

“किस बात का?”

“जब तू छोटा था, तब मुझे डर था कि दुनिया तुझे दुख देगी।”

पापा ने गहरी साँस ली।

“अब तू बड़ा हो गया है, तो मुझे डर है कि दुनिया की उम्मीदें तुझे अंदर से तोड़ न दें।”

मिहिर की आँखें फिर नम हो गईं।

वह पापा के पैरों के पास बैठ गया।

“पापा… मैंने आपको कभी समझा ही नहीं।”

पापा ने तुरंत उसे उठाया।

“नहीं बेटा।”

“लेकिन मैंने…”

“बेटा बाप को देर से समझे तो भी चलता है। बस एक दिन समझ जाए, इतना ही काफी है।”

उसी समय अंदर से निशा की आवाज़ आई।

“मिहिर?”

मिहिर बालकनी से अंदर आया।

निशा ने उसकी आँखें देखीं।

“तुम रोए?”

मिहिर ने कुछ नहीं कहा।

पापा भी अंदर आ गए।

पापा ने कहा,

“आज मैंने इसे अपनी पुरानी डायरी दिखाई।”

निशा थोड़ी हैरान हुई।

“कौन-सी डायरी?”

मिहिर ने डायरी उसके सामने रख दी।

निशा ने कुछ पन्ने पढ़े।

उसकी आँखों में भी आँसू आ गए।

“मिहिर…”

“मैं यहाँ हूँ।”

“मुझे पता ही नहीं था कि पापा ने तुम्हारे लिए इतना कुछ…”

पापा ने तुरंत कहा,

“बहू, बाप ने बेटे के लिए जो किया, उसका हिसाब नहीं रखा जाता।”

निशा धीरे से बोली,

“और पत्नी पति के लिए जो करती है, उसका भी नहीं?”

पापा ने उसकी तरफ देखा।

निशा मुस्कुराकर बोली,

“मुझे लगता है हम दोनों मिहिर को अपने-अपने तरीके से बचाना चाहते हैं।”

माँ भी वहाँ आ गईं।

“क्या हुआ?”

निशा ने कहा,

“माँ, आज हमें हमारा मिहिर समझ में आया।”

माँ ने मिहिर के सिर पर हाथ फेरा।

“मेरा बेटा तो मुझे हमेशा समझ आता था।”

मिहिर हँस पड़ा।

कई दिनों बाद उसकी वह हँसी सच्ची थी।

उस रात मिहिर अपने कमरे में गया।

निशा उसके पास बैठी थी।

“आज कुछ बदल गया है।”

मिहिर ने पूछा,

“क्या?”

“तुम।”

“मैं?”

“हाँ। आज पहली बार तुम सबको खुश करने की जगह सबको समझने की कोशिश करते हुए दिखे।”

मिहिर धीरे से मुस्कुराया।

“मुझे भी ऐसा ही लगता है।”

निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मुझे तुमसे एक बात कहनी है।”

“कहो।”

“मुझे तुम्हारी माँ से कभी ईर्ष्या नहीं थी।”

मिहिर ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

“तो?”

“मुझे डर था कि तुम्हारी जिंदगी में मेरी जगह छोटी हो जाएगी।”

मिहिर कुछ देर चुप रहा।

फिर बोला,

“मेरी जिंदगी में किसी की जगह छोटी या बड़ी नहीं है। हर किसी की अपनी अलग जगह है।”

निशा ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

“यह बात तुमने पहले क्यों नहीं समझी?”

मिहिर ने धीरे से कहा,

“शायद मुझे भी किसी ने समझाया नहीं था।”

लेकिन उस रात जब सब शांत हो गया…

मिहिर को हर्ष का मैसेज आया।

“कल तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है। मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला है। तुम्हारी मदद चाहिए।”

मिहिर ने मैसेज पढ़ा।

फोन एक तरफ रख दिया।

उसे पता नहीं था कि अगले दिन हर्ष जो बात बताएगा…

वह बात मिहिर को एक बार फिर दो रास्तों के बीच खड़ा कर देगी।

एक रास्ता था—

परिवार का।

दूसरा था—

वर्षों पुराने दोस्त का विश्वास।

और इस बार…

दोनों में से किसी एक को चुनना आसान नहीं था।

क्योंकि एक तरफ था रिश्ते का कर्ज…

और दूसरी तरफ था वर्षों पुराना विश्वास।