यहाँ आपकी कहानी का एक संपूर्ण, भावुक और परिष्कृत रूप प्रस्तुत है, जिसे आप 'मातृभारती' पर प्रकाशित करने के लिए उपयोग कर सकते हैं:
अधूरी मोहब्बत की दास्ताँ
एयरपोर्ट पर एक छब्बीस-सत्ताईस साल का नौजवान हाथ में पासपोर्ट और फ्लाइट की टिकट लिए खामोश खड़ा था। उसकी नजरें थोड़ी दूर खड़ी एक लड़की पर टिकी थीं। उन नजरों में कोई हवस या शिकायत नहीं थी, बस एक असीम ममता और छलकता हुआ प्यार था।
कुछ देर बाद वह आगे बढ़ा और भारी मन से पासपोर्ट और टिकट राधिका की ओर बढ़ाते हुए बोला, "ये लो राधिका... यह तुम्हारा पासपोर्ट और यह तुम्हारी टिकट।"
राधिका ने एक नजर उस कागज को देखा, फिर धीरे से पूछा, "देव, तुम कहाँ जाओगे?"
देव ने चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाई और कहा, "तुम मेरी चिंता मत करो राधिका... आई एम सो हैप्पी!"
लेकिन उसकी इन जुबानी बातों को उसकी आँखें झुठला रही थीं। आँखों में साफ झलक रहा था अपनी दुनिया उजड़ने का डर और किसी बेहद कीमती चीज को हमेशा के लिए खोने की कसक। कुछ पल दोनों तरफ सन्नाटा छाया रहा।
फिर देव ने उदास स्वर में पूछा, "बस... तुमने उसे कॉल कर दिया न कि तुम आ रही हो?"
"हाँ देव, कर दिया है।" राधिका ने धीमी आवाज में जवाब दिया।
राधिका का उतरा हुआ चेहरा देखकर देव ने तुरंत अपने अंदर के तूफान को छुपाया और झूठी हँसी हँसते हुए बोला, "अरे, तुमने यह मुँह क्यों लटकाया हुआ है? आज तो जश्न मनाने का मौका है! आज तुम अपने सच्चे प्यार से मिलने जा रही हो।"
राधिका ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया, बस होंठों पर एक फीकी सी मुस्कान लाकर खामोश हो गई। तभी लाउडस्पीकर पर फ्लाइट की घोषणा गूँज उठी। कुछ ही पलों में राधिका, देव से कोसों दूर जाने के लिए आगे बढ़ गई। देव अपलक उसे जाते हुए देखता रहा।
जब राधिका आखिरी बार मुड़कर 'बाय' कहती हुई ओझल हो गई, तो शायद उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह अपने साथ देव की सारी खुशियाँ, उसकी जीने की वजह और उसका पूरा संसार समेटकर ले जा रही है। आखिर देव का उसके सिवा इस दुनिया में था ही कौन?
अनाथालय की चारदीवारी में पले-बढ़े देव ने जब से राधिका से शादी की थी, तब से उसने सिर्फ एक ही सपना देखा था—कि अब उसका भी एक अपना परिवार होगा, अब कोई उसे अनाथ नहीं कहेगा। वह राधिका की झोली में दुनिया की हर एक खुशी ला कर डाल देना चाहता था।
देव की आँखों के सामने वही पुराना मंजर घूमने लगा, जब उसने पहली बार राधिका को देखा था। उसने खुद से वादा किया था कि वह इसके कदमों में जन्नत लाकर बिछा देगा। और जब राधिका शादी के लाल जोड़े में उसके घर आई थी, तो देव को लगा था कि उसे अपनी सारी दुआओं का सिला मिल गया है।
इन्हीं ख्यालों में डूबे देव को अचानक होश आया कि अब राधिका उसके पास नहीं है—वह जा चुकी है। यह अहसास होते ही उसका दिल एक असहनीय दर्द से चीख उठा। उसने कार की स्टीयरिंग इतनी जोर से भींची कि उसकी उँगलियाँ सफेद पड़ गईं। मन बहलाने के लिए उसने कार का रेडियो ऑन किया, लेकिन रेडियो पर बजता हर गाना उसके अकेलेपन का उपहास उड़ा रहा था। गुस्से में उसने रेडियो बंद किया और गाड़ी घर की तरफ मोड़ दी।
सीधे घर पहुँचने पर उसने देखा कि दरवाजे पर ताला लटका था—जिसे सुबह खुद राधिका ही लगाकर गई थी। देव ने जैसे ही ताला खोला, एक ठंडी और खाली हवा ने उसका स्वागत किया। उसने गौर से अपने आशियाने को देखा। कल तक जिस घर में राधिका की हँसी, उसकी चूड़ियों की खनक और पायल के घुंघरुओं की गूँज हुआ करती थी, आज वहाँ किसी मसान जैसी खामोशी पसरी हुई थी।
देव ने लाइट जलाई। सामने डाइनिंग टेबल पर उनकी सालगिरह का केक रखा था, जिसकी मोमबत्तियाँ पूरी तरह पिघलकर मेज पर जम चुकी थीं—ठीक देव के उन अरमानों की तरह, जो पसीज-पसीज कर दम तोड़ चुके थे।
बिना कोई आवाज किए देव उस टेबल के पास आकर बैठ गया। उसकी नजरें उस केक पर टिक गईं, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’।
कुछ पंक्तियाँ...
बरसों से एक ख्वाब देखा, वो पूरा न हुआ,
जिसको समझा था अपना, वो मेरा न हुआ...* 💔
देव राधिका को हमेशा के लिए विदा कर आया था। उससे दूर होना देव के लिए ऐसा था, जैसे अपने ही हाथों अपने सीने को चीरकर दिल के हजार टुकड़े कर देना। पर उसने यह पत्थर दिल काम किया, क्योंकि राधिका उसके साथ खुश नहीं थी।
शादी की पहली ही रात राधिका ने साफ कह दिया था कि वह देव को कभी पति नहीं मान सकती, क्योंकि वह सिर्फ आकाश से प्यार करती है। वह तो किसी मजबूरी में इस रिश्ते में बँधी थी। पर नादान देव यह सोचता रहा कि अगर वह राधिका को पलकों पर बिठाकर रखेगा, तो शायद एक दिन उसे भी प्यार हो जाएगा। पिछले एक साल से वह पागलों की तरह राधिका की हर खुशी, हर इच्छा का ख्याल रख रहा था। उसे जो भी पसंद होता, देव दिन-रात एक करके उसे लाकर उसके कदमों में रख देता था।
जब राधिका ने कहा कि वह आकाश के पास जाना चाहती है, तब भी देव ने उफ़ तक नहीं की। उसने कभी अपनी बेबसी जाहिर नहीं होने दी। लेकिन जब-जब राधिका फोन पर आकाश से बातें करती, देव अकेले में फफक-फफक कर रोता था। वह रोज़ भगवान से प्रार्थना करता कि राधिका एक बार उसकी आँखों में झाँककर देखे, तो उसे वहाँ अपने लिए बहने वाला समंदर नजर आ जाएगा। पर राधिका की आँखों पर तो सिर्फ 'आकाश' नाम की पट्टी बंधी थी।
देव ने काँपते हुए हाथ से उस केक को छुआ। यह राधिका का फेवरेट केक था, जिसे देव ने अपने हाथों से बनाया था। उसका मन चीख-चीख कर कहना चाहता था—“राधिका! मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ... उस आकाश से भी कहीं ज्यादा!”
पर इन शब्दों को वह कभी अपनी जुबान पर नहीं ला पाया। उसे डर था कि अगर उसने अपने प्यार का इजहार कर दिया, तो राधिका अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर एहसासों के बोझ तले उसके साथ रहने लगेगी। और देव को उसका जिस्म नहीं, उसका मन चाहिए था। वह उसे सिर्फ खुश देखना चाहता था।
उसने पास रखी काँच की चूड़ियों को उठाया और केक का एक छोटा सा टुकड़ा तोड़कर अपने मुँह में रखा। मिठास जैसे ही गले के नीचे उतरी, उसकी आँखों से एक आँसुओं की बूँद गाल पर फिसल आई। उस केक का स्वाद उसे जहर की तरह कड़वा लग रहा था—बिलकुल उसकी इस अधूरी मोहब्बत की तरह।
थके कदमों से देव राधिका के कमरे की दहलीज पर पहुँचा। कहने को तो कमरा सूना था, पर हवा में अभी भी राधिका की खुशबू और उसकी मौजूदगी का एहसास था। सामने दीवार पर टंगी उनकी शादी की बड़ी सी तस्वीर पर उसकी नजरें ठहर गईं। तस्वीर में राधिका कितनी उदास और बेबस लग रही थी, और देव... देव दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान होने के गुमान में मुस्कुरा रहा था। उसे तब क्या पता था कि वह जिसे अपना जीवनसंगिनी बनाकर ला रहा है, उसका दिल किसी और की अमानत है।
देव ने अलमारी खोली। वहाँ उसे वह रेशमी साड़ी मिली, जो उसने राधिका को शादी की पहली रात गिफ्ट की थी। राधिका ने उसे छुआ तक नहीं था। देव ने उस कपड़े को अपनी उँगलियों से छुआ और अतीत की गहराइयों में खो गया।
"पूरे एक साल... पूरे एक साल मैं तुम्हारे साथ रहा राधिका, पर कभी यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया कि मैं तुमसे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। मुझे लगा था कि शब्दों की क्या जरूरत है, तुम खुद-ब-खुद एक दिन समझ जाओगी..."
अंधेरे कमरे में दीवार से पीठ टिकाए, देव खुद से ही बड़बड़ा रहा था। उसकी सिसकियाँ उस खाली कमरे की दीवारों से टकराकर लौट रही थीं, और उसका प्यार उसकी ही खामोशी में कहीं गुम हो गया था।
End