Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 62

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 62

अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 62 : माँ की लिखी हुई कहानी
अंतिम पुस्तकालय में अचानक सन्नाटा छा गया।
एक पल पहले तक जहाँ हजारों किताबों के पन्ने हवा में उड़ रहे थे, वहीं अब सब कुछ बिल्कुल शांत था।
अनन्या की नजर उस सफेद किताब पर टिकी थी।
उसके कवर पर सिर्फ एक शब्द था—
"लेखक"
और पहले पन्ने पर...
"अनन्या की माँ।"
अनन्या के होंठ काँपने लगे।
"मेरी माँ..."
उसने धीरे से वह किताब उठानी चाही।
लेकिन जैसे ही उसकी उँगलियाँ किताब के कवर से छुईं—
धड़ाम!
एक तेज़ रोशनी पूरे पुस्तकालय में फैल गई।
अनन्या पीछे गिरते-गिरते बची।
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"सावधान!"
अनन्या ने उसकी ओर देखा, फिर किताब की तरफ।
"यह मेरी माँ की किताब है..."
कबीर ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"और शायद..."
"यही वह किताब है जिससे हमारी पूरी कहानी शुरू हुई थी।"
नैना ने धीरे से पूछा—
"लेकिन अगर माँ ने यह किताब लिखी थी..."
"तो दीदी ने क्या लिखा?"
कबीर कुछ बोल पाता, उससे पहले सफेद किताब अपने-आप खुल गई।
पहले पन्ने पर एक तारीख लिखी थी।
अनन्या उसे देखते ही ठिठक गई।
"यह..."
आरव ने पूछा—
"क्या हुआ?"
अनन्या ने काँपती आवाज़ में कहा—
"यह वही दिन है..."
"जिस दिन नैना गायब हुई थी।"
नैना का चेहरा बदल गया।
"मैं गायब नहीं हुई थी।"
अनन्या ने उसकी ओर देखा।
"क्या?"
नैना ने अपना सिर पकड़ लिया।
"मुझे याद है..."
"उस दिन मुझे कोई लेकर नहीं गया था।"
"मैं..."
वह रुक गई।
अचानक उसके चेहरे पर दर्द उभर आया।
"मैं खुद गई थी।"
अनन्या की साँस रुक गई।
"कहाँ?"
नैना ने किताब की तरफ देखा।
"माँ के पास।"
सफेद किताब के पन्ने पलटने लगे।
एक पुराना कमरा दिखाई दिया।
वही कमरा...
जहाँ अनन्या और नैना बचपन में बैठकर कहानियाँ लिखा करती थीं।
लेकिन इस बार कमरे में उनकी माँ भी थीं।
उनके हाथ में वही सफेद किताब थी।
छोटी नैना उनके सामने खड़ी थी।
"माँ..."
"क्या आप सच में कहानियों को जिंदा कर सकती हैं?"
माँ ने मुस्कुराकर कहा—
"कहानी जिंदा नहीं होती, बेटा।"
"कहानी में छिपी भावनाएँ जिंदा होती हैं।"
नैना ने पूछा—
"तो क्या मैं भी कहानी का हिस्सा बन सकती हूँ?"
माँ की मुस्कान गायब हो गई।
उन्होंने नैना के सिर पर हाथ रखा।
"तुम्हें कहानी का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम..."
माँ रुक गईं।
फिर उन्होंने कहा—
"तुम कहानी और असली दुनिया के बीच का दरवाज़ा हो।"
वर्तमान में खड़ी नैना की आँखें फैल गईं।
"दरवाज़ा..."
कबीर ने तुरंत कहा—
"अब समझ आया।"
आरव ने उसकी ओर देखा।
"क्या?"
कबीर बोला—
"नैना किसी कहानी को सिर्फ महसूस नहीं करती।"
"वह उसके अंदर प्रवेश कर सकती है।"
"और..."
अनन्या ने बात पूरी की—
"दूसरों को भी कहानी के अंदर ले जा सकती है।"
कबीर ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
सफेद किताब में अगला दृश्य सामने आया।
इस बार छोटी अनन्या कमरे में दाखिल हुई।
उसने माँ से पूछा—
"माँ, आप क्या लिख रही हैं?"
माँ ने किताब तुरंत बंद कर दी।
"कुछ नहीं।"
अनन्या ने जिद की।
"दिखाइए ना।"
माँ ने उसकी आँखों में देखा।
फिर बहुत गंभीर होकर कहा—
"अनन्या..."
"अगर कभी यह किताब तुम्हारे हाथ लगे..."
"तो इसे पूरा मत करना।"
छोटी अनन्या ने पूछा—
"क्यों?"
माँ ने कहा—
"क्योंकि कुछ कहानियाँ पूरी होने के लिए नहीं होतीं।"
"कुछ कहानियाँ..."
"सिर्फ इसलिए अधूरी छोड़ी जाती हैं..."
"ताकि कोई गलत व्यक्ति उन्हें पूरा न कर सके।"
अनन्या वर्तमान में खड़ी उस दृश्य को देख रही थी।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
"माँ ने मुझे कभी यह क्यों नहीं बताया?"
कबीर ने कहा—
"क्योंकि वह चाहती थीं कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।"
आरव ने पूछा—
"और भक्षक?"
कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।
"भक्षक उनकी कहानी से पैदा हुआ था।"
"लेकिन..."
"वह उसे रोक नहीं पाईं।"
अचानक सफेद किताब के पन्ने काले पड़ गए।
एक जोरदार हवा पूरे पुस्तकालय में चली।
सभी किताबों की अलमारियाँ हिलने लगीं।
नैना पीछे हट गई।
"वह आ रहा है।"
अनन्या ने पूछा—
"कौन?"
नैना ने फुसफुसाकर कहा—
"माँ।"
सब चुप हो गए।
आरव ने कहा—
"लेकिन तुम्हारी माँ तो..."
नैना ने उसकी बात काट दी।
"मुझे नहीं पता।"
"लेकिन मैं उनकी मौजूदगी महसूस कर रही हूँ।"
अचानक पुस्तकालय के सबसे दूर वाले हिस्से से कदमों की आवाज़ आई।
ठक...
ठक...
ठक...
चारों उस दिशा में देखने लगे।
एक औरत धीरे-धीरे अंधेरे से बाहर आई।
सफेद साड़ी।
हाथ में वही पुरानी कलम।
चेहरा शांत।
लेकिन आँखों में ऐसा दर्द...
जैसे उसने सदियों से किसी का इंतज़ार किया हो।
अनन्या के होंठों से सिर्फ एक शब्द निकला—
"माँ..."
औरत रुक गई।
उसकी आँखें अनन्या पर टिक गईं।
कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखती रहीं।
फिर औरत की आँखों से आँसू बह निकले।
"अनन्या..."
अनन्या दौड़कर उसकी तरफ जाना चाहती थी।
लेकिन कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"रुको।"
अनन्या ने हैरानी से उसे देखा।
"यह मेरी माँ हैं!"
कबीर ने कहा—
"हो सकती हैं।"
"लेकिन यह जगह किसी को उसके असली रूप में नहीं दिखाती।"
औरत ने उनकी बात सुन ली।
वह मुस्कुराई।
"कबीर..."
कबीर का चेहरा बदल गया।
"आप मुझे जानती हैं?"
औरत ने कहा—
"मैंने ही तुम्हें लिखा था।"
कबीर बिल्कुल शांत हो गया।
अनन्या ने उसकी ओर देखा।
"माँ..."
"आपने कबीर को लिखा था?"
औरत ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
फिर उसने कहा—
"लेकिन मैंने उसे भक्षक बनने के लिए नहीं लिखा था।"
भक्षक की आवाज़ अचानक पूरे पुस्तकालय में गूँज उठी—
"लेकिन आपने मुझे बनाया था!"
सारी किताबें एक साथ काँप उठीं।
माँ ने ऊपर देखा।
उनके चेहरे पर दर्द आ गया।
"हाँ..."
"मैंने तुम्हें बनाया था।"
"लेकिन मैंने तुम्हें नफरत नहीं दी थी।"
काली धुंध पूरे पुस्तकालय में फैलने लगी।
भक्षक का चेहरा दिखाई दिया।
"नफरत नहीं..."
"लेकिन अकेलापन दिया था।"
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
"मुझसे गलती हुई।"
भक्षक हँसा।
"गलती?"
"एक लेखक की गलती..."
"उसकी कहानी के पात्र के लिए पूरी जिंदगी बन जाती है।"
अनन्या ने आगे बढ़कर कहा—
"बस!"
भक्षक उसकी ओर मुड़ा।
"तुम बीच में मत आओ।"
अनन्या ने कहा—
"नहीं।"
"यह कहानी सिर्फ तुम्हारी और मेरी माँ की नहीं है।"
"यह मेरी भी है।"
"नैना की भी।"
"कबीर की भी।"
"और आरव की भी।"
भक्षक ने कहा—
"तो फिर बताओ..."
"तुम सबकी कहानी का अंत क्या होगा?"
अनन्या ने उसकी आँखों में देखा।
"यह फैसला..."
"अब तुम नहीं करोगे।"
माँ ने सफेद किताब अनन्या की ओर बढ़ाई।
"इसे लो।"
अनन्या ने किताब पकड़ ली।
"इसमें क्या है?"
माँ ने कहा—
"तुम्हारी शुरुआत।"
अनन्या ने पहला पन्ना खोला।
वहाँ लिखा था—
"एक लड़की..."
अगला पन्ना—
"जिसे अपनी कहानी याद नहीं।"
अगला—
"उसकी बहन..."
फिर—
"एक ऐसा लड़का..."
फिर—
"एक अधूरा पात्र..."
अनन्या की आँखें फैल गईं।
"यह तो..."
आरव ने कहा—
"हम सब हैं।"
कबीर ने सफेद किताब को देखा।
"तो हमारी जिंदगी..."
माँ ने कहा—
"सिर्फ एक कहानी नहीं है।"
"यह कई कहानियों का संगम है।"
नैना ने पूछा—
"और भक्षक?"
माँ ने उसकी ओर देखा।
"वह भी।"
नैना चुप हो गई।
माँ ने कहा—
"उसे नष्ट करना संभव नहीं।"
"क्योंकि डर को कोई पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता।"
"लेकिन..."
"उसे दिशा दी जा सकती है।"
भक्षक की आवाज़ फिर आई—
"और अगर मैं दिशा लेने से इनकार कर दूँ?"
माँ ने कहा—
"तब..."
"तुम हमेशा अधूरे रहोगे।"
यह सुनते ही भक्षक की आकृति काँप गई।
वह जैसे उस शब्द से सबसे ज्यादा डरता था।
अधूरा।
अनन्या ने तुरंत समझ लिया।
"तुम्हारा सबसे बड़ा डर..."
"अधूरा रह जाना है।"
भक्षक चुप रहा।
अनन्या आगे बढ़ी।
"तुम दुनिया की सारी कहानियाँ इसलिए निगलना चाहते हो..."
"क्योंकि तुम्हें लगता है कि अगर सब कहानियाँ खत्म हो गईं..."
"तो तुम्हारी कहानी भी पूरी हो जाएगी।"
भक्षक की आँखों में पहली बार गुस्से के बजाय दर्द दिखाई दिया।
"हाँ।"
अनन्या ने कहा—
"लेकिन तुम गलत हो।"
"कहानी पूरी होने से..."
"जीवन पूरा नहीं होता।"
"कभी-कभी..."
"अधूरी कहानी भी जीती रहती है।"
कबीर ने मुस्कुराकर कहा—
"क्योंकि कोई उसे आगे लिखता है।"
आरव ने अनन्या की तरफ देखा।
"और शायद..."
"हम सब मिलकर इसे आगे लिख सकते हैं।"
नैना ने अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया।
"इस बार..."
"कोई अकेला नहीं रहेगा।"
अचानक सफेद किताब के आखिरी पन्ने पर शब्द उभरने लगे।
"अगला अध्याय..."
फिर एक और लाइन—
"जहाँ पहली किताब लिखी गई थी।"
माँ का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
"तुम्हें वहाँ जाना होगा।"
अनन्या ने पूछा—
"कहाँ?"
माँ ने जवाब दिया—
"पुराने घर में।"
आरव ने पूछा—
"कौन-सा घर?"
माँ ने अनन्या की तरफ देखा।
"वही घर..."
"जहाँ तुम दोनों बहनों ने पहली बार कहानी लिखी थी।"
नैना के चेहरे पर डर उतर आया।
"लेकिन वह घर तो..."
माँ ने उसकी बात पूरी की—
"बीस साल पहले जलकर खत्म हो चुका है।"
अनन्या ने सफेद किताब को देखा।
उसके पन्ने पर आखिरी शब्द लिखा था—
"कल रात।"
माँ ने धीरे से कहा—
"वहाँ तुम्हें अपनी कहानी का पहला शब्द मिलेगा।"
"और उसी शब्द से..."
"तुम भक्षक की कहानी का नया अंत लिख सकोगी।"
भक्षक अचानक जोर से हँसा।
"जाओ..."
"क्योंकि उस घर में..."
"तुम्हें वह सच मिलेगा जिसे तुम्हारी माँ ने भी तुमसे छिपाया था।"
अनन्या ने माँ की ओर देखा।
"माँ..."
"आपने मुझसे और क्या छिपाया है?"
माँ ने जवाब नहीं दिया।
सिर्फ उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।
और सफेद किताब के आखिरी पन्ने पर एक नया वाक्य उभर आया—
"अनन्या की माँ ने भक्षक को नहीं..."
"किसी और को जन्म दिया था।"
अनन्या के हाथ से किताब छूटते-छूटते बची।
कबीर ने पन्ने को देखा।
आरव ने पूछा—
"किसी और को?"
नैना धीरे से बोली—
"कौन?"
और उसी क्षण...
पुस्तकालय के अंधेरे में किसी बच्चे की हँसी गूँजी।
"दीदी..."
अनन्या जम गई।
वह आवाज़...
नैना की नहीं थी।
क्योंकि नैना उसके बिल्कुल पास खड़ी थी।
तो फिर...
कौन था?
क्रमशः...