old friends in Hindi Motivational Stories by Vijay Erry books and stories PDF | पुराने मित्र

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पुराने मित्र

पुराने मित्र 
लेखक: विजय शर्मा एरी (Vijay Sharma Erry)
समय बीतता है, लोग बदलते हैं, शहर बदलते हैं, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो दिल के किसी कोने में हमेशा जिंदा रहते हैं। पुराने दोस्त उसी कोने के वासी होते हैं। यह कहानी उन्हीं दो दिलों की है जो सालों के फासले के बावजूद एक-दूसरे से जुड़े रहे।
अमृतसर के पुराने मोहल्ले में एक छोटी-सी गली थी—गली नंबर सात। वहाँ दो मकान आमने-सामने थे। एक में रहता था राजेश शर्मा, और दूसरे में अजय सिंह। दोनों की उम्र लगभग एक जैसी थी। बचपन से ही दोनों एक-दूसरे के साथ खेलते, पढ़ते और लड़ते थे। स्कूल में एक ही बेंच पर बैठते। जब कोई एक फेल होता तो दूसरा भी जान-बूझकर फेल हो जाता, ताकि अगले साल भी साथ रह सकें। माँ-बाप कहते—“ये दोनों तो जुड़वाँ भाई जैसे हैं।”
राजेश के पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। अजय के पिता एक छोटी-सी वर्कशॉप चलाते थे। दोनों परिवारों की हालत साधारण थी, लेकिन प्यार और इज्जत बहुत थी। शाम को दोनों लड़के गली में क्रिकेट खेलते। एक दिन राजेश का हाथ कट गया। अजय ने अपना रुमाल फाड़कर बाँध दिया और रोते हुए बोला—“यार, अगर तू कुछ हो गया तो मैं भी नहीं जीऊँगा।” राजेश हँसा—“अरे बेवकूफ, थोड़ा-सा खून निकला है।” लेकिन उस दिन दोनों की आँखें नम थीं।
साल बीतते गए। दसवीं पास करने के बाद रास्ते अलग हो गए। राजेश ने साइंस ली और आगे जाकर इंजीनियरिंग की। अजय ने कॉमर्स लिया और पिता की वर्कशॉप संभालने लगा। राजेश दिल्ली चला गया। अजय अमृतसर में ही रहा। पहले तो पत्र आते-जाते रहे, फिर फोन आने लगे। धीरे-धीरे बातें कम होती गईं। शादी हो गई, बच्चे हो गए, जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं। जिंदगी की भागदौड़ में पुरानी दोस्ती कहीं पीछे छूट गई।
बीस साल बाद...
राजेश अब दिल्ली में एक बड़ी कंपनी में सीनियर मैनेजर था। पत्नी सुनीता और दो बच्चे—आरव और अनन्या। घर में सब कुछ था—बड़ी गाड़ी, अच्छा फ्लैट, नौकर-चाकर। लेकिन दिल में एक खालीपन था। रात को जब अकेला बैठता तो पुरानी यादें सतातीं। गली नंबर सात, अजय की हँसी, स्कूल की वह बेंच, और वह रुमाल जो अजय ने बाँधा था।
एक दिन ऑफिस में बैठे-बैठे अचानक दिल में कुछ हुआ। उसने फोन उठाया और पुराना नंबर डायल किया। तीन बार घंटी बजी। फिर एक परिचित आवाज आई—“हैलो?”
राजेश की आवाज थर्रा गई—“अजय... मैं राजेश बोल रहा हूँ।”
दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया। फिर अजय बोला—“राजेश? यार... इतने साल बाद? कहाँ खो गया था तू?”
दोनों हँस पड़े। आवाज में हँसी के साथ आँसू भी थे। बातें होने लगीं। अजय ने बताया कि वर्कशॉप अब अच्छी चल रही है। बेटा कॉलेज में है, बेटी शादीशुदा। पत्नी भी ठीक है। राजेश ने अपने बारे में बताया। फिर अजय बोला—“यार, एक बार अमृतसर आ जा। गली अभी भी वैसी ही है। तेरा घर अब किराए पर है, लेकिन यादें अभी भी वहीं हैं।”
राजेश ने वादा किया। एक महीने बाद छुट्टी लेकर अमृतसर पहुँचा। स्टेशन पर अजय खुद खड़ा था। बाल सफेद हो चुके थे, पेट निकल आया था, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक थी। दोनों ने गले लगाया। आसपास के लोग देख रहे थे, लेकिन दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता था। बीस साल का फासला एक पल में मिट गया।
गली नंबर सात पहुँचे। राजेश का पुराना घर अब किसी और का था। दीवारें नई थीं, लेकिन नीम का पेड़ अभी भी खड़ा था। अजय बोला—“याद है, इस पेड़ पर हमने कितने आम खाए थे? और वह दिन जब तू ऊपर से गिर गया था?” राजेश हँसा—“तूने मुझे नीचे से पकड़ा था। वरना हाथ-पैर टूट जाते।”
शाम को अजय के घर चाय पी। पुरानी बातें निकलने लगीं। स्कूल का वह टीचर जो दोनों को रोज पीटता था। वह लड़की जिस पर दोनों को क्रश था। वह बारिश का दिन जब दोनों भीगते हुए घर पहुँचे और माँ ने डांटा। अजय की पत्नी ने कहा—“आप दोनों अभी भी बच्चे जैसे लगते हैं।”
रात को दोनों छत पर बैठे। आसमान में तारे चमक रहे थे। राजेश बोला—“यार, जिंदगी में सब कुछ पा लिया, लेकिन दिल नहीं भरा। कभी-कभी लगता है कि कुछ अधूरा रह गया।”
अजय चुप रहा। फिर बोला—“मेरे साथ भी यही है। वर्कशॉप चल रही है, परिवार खुश है, लेकिन जब अकेला होता हूँ तो सोचता हूँ—काश राजेश यहीं होता। हम साथ होते तो शायद जिंदगी और भी रंगीन होती।”
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। आँखों में पानी था।
अगले दिन दोनों ने पुराने स्कूल का दौरा किया। स्कूल अब बहुत बदल चुका था। नई बिल्डिंग, नए टीचर। लेकिन वह बेंच अभी भी वहाँ थी जहाँ दोनों बैठते थे। राजेश ने हाथ फेरा और बोला—“इस बेंच ने कितनी कहानियाँ सुनी होंगी।” अजय ने हँसते हुए कहा—“और कितने डंडे खाए होंगे।”
फिर दोनों ने उस पार्क में घूमने का फैसला किया जहाँ बचपन में क्रिकेट खेलते थे। अब वहाँ नए बच्चे खेल रहे थे। एक छोटे लड़के का हाथ कट गया। राजेश ने तुरंत अपना रुमाल निकाला और बाँधने लगा। अजय देख रहा था। अचानक उसने कहा—“यार, याद है वह दिन?” राजेश ने सिर हिलाया। दोनों की आँखें फिर नम हो गईं।
तीन दिन बाद राजेश को दिल्ली लौटना था। स्टेशन पर अजय ने एक छोटा पैकेट दिया। राजेश ने खोला—अंदर एक पुराना रुमाल था, जिस पर हल्के खून के निशान अभी भी दिख रहे थे। अजय बोला—“यह वही रुमाल है। मैंने बचा रखा था। सोचता था कभी तुझे दूँगा।”
राजेश का गला रुँध गया। उसने अजय को कसकर गले लगाया—“यार, हम कभी अलग नहीं हुए। सिर्फ दूरी थी। दिल हमेशा साथ था।”
ट्रेन चल पड़ी। अजय प्लेटफॉर्म पर खड़ा हाथ हिलाता रहा जब तक ट्रेन नजर से ओझल नहीं हो गई।
दिल्ली लौटकर राजेश ने फैसला किया। हर साल कम से कम एक बार अमृतसर जरूर आएगा। और अजय को भी दिल्ली बुलाएगा। फोन पर बातें नियमित हो गईं। वीडियो कॉल पर बच्चे एक-दूसरे से बात करने लगे। धीरे-धीरे दोनों परिवार भी करीब आ गए।
एक साल बाद अजय दिल्ली आया। राजेश ने उसे अपने ऑफिस दिखाया, बच्चों से मिलवाया। शाम को दोनों पार्क में बैठे। राजेश बोला—“यार, पुराने दोस्त सच में जिंदगी का सबसे बड़ा खजाना होते हैं। पैसा, पद, गाड़ी—सब आते-जाते रहते हैं। लेकिन यह रिश्ता...”
अजय ने मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ। और यह रिश्ता बनाए रखने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। जैसे बचपन में हम एक-दूसरे के लिए करते थे।”
दोनों हँसे। आसमान में सूरज डूब रहा था। सुनहरी रोशनी में दोनों के चेहरे चमक रहे थे—जैसे बीस साल पहले गली नंबर सात में चमकते थे।
समय बीतता रहा। राजेश रिटायर हो गया। अजय की वर्कशॉप अब बेटा संभालने लगा। दोनों बुजुर्ग हो गए। लेकिन दोस्ती और भी गहरी हो गई। कभी अमृतसर, कभी दिल्ली। कभी फोन पर घंटों बातें। कभी चुपचाप एक-दूसरे की साँस सुनते रहना।
एक दिन राजेश बीमार पड़ा। अस्पताल में था। अजय तुरंत अमृतसर से दिल्ली पहुँच गया। रात-दिन उसके पास बैठा रहा। सुनीता ने कहा—“आपके आने से राजेश को बहुत ताकत मिली है।” अजय ने सिर्फ मुस्कुराकर कहा—“यह तो मेरा फर्ज है। बचपन में उसने भी मेरे लिए यही किया था।”
राजेश ठीक हो गया। अस्पताल से निकलते समय उसने अजय का हाथ पकड़ा और बोला—“यार, जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर भी तू मेरे साथ है। इससे बड़ा कोई तोहफा नहीं हो सकता।”
अजय ने जवाब दिया—“हम हमेशा साथ रहेंगे। चाहे शरीर अलग हो जाए, दिल हमेशा एक रहेंगे।”
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि पुराने दोस्तों की कहानी कभी खत्म नहीं होती। वह पीढ़ियों तक चलती रहती है। राजेश और अजय के बच्चे अब भी उस दोस्ती की बात करते हैं। गली नंबर सात में नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है। और जब हवा चलती है तो लगता है जैसे दो पुराने दोस्त अभी भी वहाँ हँस रहे हों, खेल रहे हों, और एक-दूसरे से कह रहे हों—“यार, हम कभी अलग नहीं होंगे।”
जीवन में बहुत कुछ मिलता है और खोता है। लेकिन सच्ची दोस्ती वह प्रकाश है जो अँधेरे में भी रास्ता दिखाती है। पुराने दोस्त हमें याद दिलाते हैं कि हम कहाँ से आए हैं, और हमारा असली रूप क्या है। वे हमारे सबसे बड़े आलोचक भी होते हैं और सबसे बड़े समर्थक भी।
अगर आपके जीवन में भी कोई पुराना दोस्त है जिससे बातें टूट गई हैं, तो आज ही फोन उठाएँ। एक संदेश भेजें। क्योंकि समय कभी किसी का इंतजार नहीं करता। और दोस्ती को जीवित रखने के लिए सिर्फ एक छोटा-सा कदम काफी होता है।
राजेश और अजय की तरह... हमेशा के लिए साथ।
— विजय शर्मा एरी
(लगभग 2000 शब्द)