rainy day in Hindi Motivational Stories by Vijay Erry books and stories PDF | बरसात का दिन

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बरसात का दिन

बरसात का दिन
लेखक: विजय शर्मा एरी
गाँव रामपुर की धरती उस साल मानो प्यासी हो चुकी थी। जून का महीना बीत चुका था, जुलाई का पहला हफ्ता भी निकल गया, पर आसमान से एक भी बूँद नहीं गिरी थी। खेतों में दरारें पड़ गई थीं। मिट्टी इतनी सूख गई थी कि पैर रखने पर धूल उड़ती थी। किसान सुबह से शाम तक आसमान की ओर देखते रहते, पर काले बादल आते और बिना बरसे चले जाते।
रामलाल उसी गाँव का एक साधारण किसान था। उम्र पैंतालीस के आसपास। पत्नी सुमित्रा और इकलौती बेटी अंजलि के साथ छोटा-सा कच्चा घर। अंजलि सत्रह साल की थी, दसवीं पास करके अब इंटर की पढ़ाई कर रही थी। वह हर सुबह स्कूल जाती, शाम को लौटकर माँ की मदद करती और रात को लालटेन की रोशनी में किताबें पढ़ती।
उस दिन सुबह से ही आसमान में अजीब-सी हलचल थी। बादल घिरे हुए थे, हवा में नमी थी, और दूर से गर्जना की आवाज़ आ रही थी। रामलाल खेत से लौटा तो सुमित्रा ने कहा, “आज तो लगता है बारिश होगी।”
रामलाल ने मुस्कुराते हुए कहा, “काश! इस बार सच में बरस जाए। धान की नर्सरी सूखने को है।”
अंजलि स्कूल जाने की तैयारी कर रही थी। उसने खिड़की से बाहर देखा और बोली, “माँ, आज छतरी ले लूँ क्या?”
सुमित्रा ने हँसते हुए कहा, “ले ले बेटी। बादल देखकर लगता है आज पानी गिरेगा।”
अंजलि छतरी लेकर निकल पड़ी। स्कूल गाँव से करीब दो किलोमीटर दूर था। रास्ता खेतों के बीच से जाता था। रास्ते में एक पुराना बरगद का पेड़ था, जहाँ अक्सर बच्चे खेलते और बूढ़े बैठकर बातें करते।
स्कूल पहुँचते-पहुँचते आसमान और काला हो गया। पहली घंटी बजने से पहले ही हल्की-हल्की बूँदें गिरने लगीं। बच्चे खुशी से चिल्लाने लगे। अध्यापिका ने कहा, “आज क्लास शॉर्ट रखेंगे। बारिश तेज़ हुई तो घर चले जाना।”
दोपहर तक बारिश जोर पकड़ चुकी थी। पानी की धारें छतों से गिर रही थीं। आँगन में छोटे-छोटे गड्ढे बन गए थे। अंजलि की सहेली रीना ने कहा, “चल, आज छुट्टी हो गई। घर चलते हैं।”
दोनों छतरी लेकर निकलीं। रास्ते में पानी बह रहा था। कीचड़ में पैर धँस रहे थे। रीना का घर पहले पड़ता था। उसने अंजलि से कहा, “तू अकेली जा पाएगी न? बारिश और तेज़ हो रही है।”
अंजलि ने सिर हिलाया, “हाँ, कोई बात नहीं। बरगद के पेड़ तक पहुँच जाऊँगी तो छाँव मिल जाएगी।”
रीना घर चली गई। अंजलि अकेली आगे बढ़ी। बारिश अब मूसलधार हो चुकी थी। छतरी भी पूरी तरह बचा नहीं पा रही थी। कपड़े भीगने लगे। बाल चेहरे पर चिपक गए। तभी अचानक तेज़ हवा चली और छतरी उड़ गई। अंजलि ने दौड़कर पकड़ने की कोशिश की, पर छतरी खेत की ओर उड़ गई।
अब उसके पास कोई सहारा नहीं था। बारिश में पूरी तरह भीग चुकी थी। ठंड लगने लगी। वह दौड़ती हुई बरगद के पेड़ की ओर बढ़ी। पेड़ के नीचे पहुँचकर साँस ली। पानी टपक रहा था, पर थोड़ी राहत तो मिली।
तभी उसने देखा—पेड़ के दूसरी तरफ एक लड़का खड़ा था। उम्र करीब उन्नीस-बीस की। सिर पर गमछा बाँधे हुए, हाथ में एक पुरानी साइकिल। वह भी पूरी तरह भीगा हुआ था।
अंजलि चौंक गई। लड़के ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा, “तुम भी यहीं रुकी हो? बारिश थमने का नाम नहीं ले रही।”
अंजलि ने सिर हिलाया। बोली नहीं।
लड़के ने अपनी साइकिल एक तरफ लगाई और कहा, “मेरा नाम अरुण है। गाँव के उस पार से आता हूँ। आज बाजार गया था। वापस जाते समय बारिश ने घेर लिया।”
अंजलि ने धीरे से कहा, “मेरा नाम अंजलि है।”
दोनों चुपचाप खड़े रहे। बारिश की आवाज़ के अलावा और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। अरुण ने अपनी जेब से एक साफ रूमाल निकाला और अंजलि की ओर बढ़ाया, “लो, चेहरा पोंछ लो। पानी आँखों में जा रहा होगा।”
अंजलि ने हिचकिचाते हुए रूमाल लिया। पोंछा। फिर वापस करने लगी तो अरुण ने कहा, “रख लो। बाद में दे देना।”
थोड़ी देर बाद अरुण बोला, “तुम्हारा घर दूर है क्या?”
“नहीं, आधा किलोमीटर ही होगा। पर बारिश इतनी तेज़ है कि निकलने का मन नहीं कर रहा।”
अरुण मुस्कुराया, “मैं भी वही सोच रहा हूँ। लगता है आज रात यहीं कटानी पड़ेगी।”
अंजलि हँसी, “रात तो नहीं, पर शाम तक जरूर।”
बातें आगे बढ़ीं। अरुण ने बताया कि वह कॉलेज में पढ़ता है। शहर में रहता है, छुट्टियों में गाँव आता है। पिता किसान हैं, माँ घर संभालती हैं। अंजलि ने अपनी पढ़ाई के बारे में बताया। दोनों को आश्चर्य हुआ कि इतने करीब रहने के बावजूद कभी नहीं मिले थे।
बारिश थोड़ी हल्की हुई तो अरुण ने कहा, “चलो, मैं तुम्हें घर तक छोड़ दूँ। साइकिल पर बैठ जाओ।”
अंजलि ने इनकार किया, “नहीं… अकेली चली जाऊँगी।”
अरुण ने जोर दिया, “सड़क पर पानी बह रहा होगा। अकेली जाना मुश्किल है। मैं तुम्हें घर के पास छोड़ दूँगा।”
अंत में अंजलि मान गई। दोनों साइकिल पर बैठे। अरुण पैडल मार रहा था। बारिश अभी भी हो रही थी। रास्ते में दोनों हँसते-हँसते बातें करते रहे। अंजलि को लगा जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो।
घर पहुँचे तो सुमित्रा दरवाजे पर खड़ी थी। अंजलि को भीगा देखकर घबरा गईं, “बेटी! इतनी देर कहाँ थी? कपड़े बदल जल्दी।”
अरुण ने नमस्ते की और कहा, “आंटी, बारिश में फँस गई थी। मैंने छोड़ दिया।”
सुमित्रा ने आभार जताया, “बेटा, अंदर आ जाओ। चाय पी लो।”
अरुण ने इनकार किया, “नहीं आंटी, माँ परेशान होंगी। मैं चलता हूँ।”
चला गया। अंजलि ने दरवाजे से उसकी साइकिल को जाते देखा। दिल में अजीब-सी हलचल हुई।
रात को खाना खाते समय रामलाल ने पूछा, “कौन था वह लड़का?”
अंजलि ने बताया। रामलाल बोला, “अच्छा लड़का लगता है। शहर में पढ़ता है ना?”
सुमित्रा मुस्कुराईं, “हाँ, और हमारी बेटी को भीगने से बचाया।”
अगले दिन फिर बारिश हुई। और अगले दिन भी। मानो आसमान ने गाँव पर रहम कर दिया हो। खेत हरे होने लगे। नालों में पानी बहने लगा। बच्चे कागज की नावें बना-बनाकर छोड़ रहे थे।
अंजलि स्कूल जाते समय बरगद के पेड़ के पास रुकने लगी। कभी-कभी अरुण भी वहीं मिल जाता। दोनों बातें करते, हँसते, और फिर अपने-अपने रास्ते चले जाते।
एक दिन बारिश बहुत तेज़ थी। अंजलि स्कूल से लौट रही थी। रास्ते में पानी की धार तेज़ थी। पैर फिसल गया और वह गिर पड़ी। घुटने में चोट लग गई। खून निकलने लगा। वह उठ नहीं पा रही थी।
तभी अरुण साइकिल लेकर आया। उसने अंजलि को देखा तो तुरंत रोका। अंजलि को उठाया, अपनी साइकिल पर बैठाया और घर पहुँचाया। सुमित्रा और रामलाल दोनों बहुत घबराए। अरुण ने कहा, “आंटी, घबराने की बात नहीं। छोटी-सी चोट है। दवा लगा दूँ?”
रामलाल ने दवा का डिब्बा निकाला। अरुण ने सावधानी से घाव साफ किया और पट्टी बाँधी। अंजलि दर्द में थी, पर अरुण की बातों से मन हल्का हो रहा था।
उस दिन अरुण देर तक रुका। शाम को चाय पी, रामलाल से खेतों की बातें की, और फिर चला गया। जाते समय अंजलि से बोला, “कल मिलूँगा। ठीक हो जाना।”
रात को अंजलि ने डायरी खोली और लिखा—
“आज का दिन अजीब था। दर्द भी था, पर सुकून भी। लगता है बारिश सिर्फ पानी नहीं लाती, कुछ और भी लाती है…”
दिन बीतते गए। बारिश का मौसम चरम पर था। खेत लहलहा उठे थे। गाँव में हर तरफ हरियाली थी। अरुण और अंजलि की मुलाकातें नियमित हो गई थीं। कभी बरगद के नीचे, कभी नदी के किनारे, कभी स्कूल के रास्ते पर।
एक दिन अरुण ने कहा, “अंजलि, मैं शहर वापस जा रहा हूँ। कॉलेज खुलने वाला है।”
अंजलि चुप रह गई। दिल भारी हो गया।
अरुण बोला, “मैं पत्र लिखूँगा। तुम भी लिखना। और जब भी छुट्टियाँ होंगी, आऊँगा।”
अंजलि ने सिर हिलाया। आँखों में आँसू थे, पर उसने रोक लिया।
बिदाई के दिन बारिश हो रही थी। अरुण साइकिल पर बैठा था। अंजलि छतरी लेकर आई। दोनों ने कुछ देर देखा। फिर अरुण ने कहा, “यह रूमाल याद है? जो पहली बार दिया था? रख लेना। जब भी बारिश हो, याद करना कि एक दोस्त है जो तुम्हें भीगने नहीं देगा।”
अंजलि ने रूमाल लिया। बोली, “तुम भी लिखना। हर हफ्ते।”
अरुण चला गया। अंजलि देर तक खड़ी रही। बारिश की बूँदें उसके चेहरे पर गिर रही थीं, पर वह महसूस नहीं कर रही थी।
महीने बीत गए। पत्र आते रहे। अरुण अपनी पढ़ाई के बारे में लिखता, अंजलि गाँव और पढ़ाई की बातें। दोनों के पत्रों में बारिश का जिक्र जरूर होता।
एक साल बाद अरुण फिर गाँव आया। इस बार वह डिग्री लेकर आया था। अंजलि इंटर पास कर चुकी थी। दोनों मिले तो जैसे साल बीता ही न हो।
बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे। बारिश फिर से शुरू हो गई थी। अरुण ने कहा, “अंजलि, याद है वह पहला दिन? जब तुम्हारी छतरी उड़ गई थी?”
अंजलि मुस्कुराई, “हाँ। और तुमने रूमाल दिया था।”
अरुण बोला, “उस दिन बारिश ने हमें मिलाया था। आज भी वही बारिश है। मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ…”
अंजलि ने उसकी आँखों में देखा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
अरुण ने कहा, “मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। अगर तुम मानो तो…”
अंजलि की आँखें भर आईं। वह बोली, “बारिश की पहली मुलाकात से लेकर आज तक… मैंने भी यही सोचा है।”
दोनों हँसे। बारिश और तेज़ हो गई। पेड़ की पत्तियों से पानी टपक रहा था। दूर खेतों में मेंढक टर्र-टर्र कर रहे थे। हवा में मिट्टी की खुशबू घुली हुई थी।
गाँव में शादी हुई। साधारण, पर खुशियों भरी। रामलाल और सुमित्रा बहुत खुश थे। अरुण के माता-पिता भी आए। दोनों परिवार एक हो गए।
सालों बाद जब अंजलि और अरुण अपने बच्चों के साथ उसी बरगद के पेड़ के नीचे बैठते, तो अंजलि कहती, “देखो बच्चों, यही वह पेड़ है जहाँ तुम्हारे पापा और मैं पहली बार मिले थे। बारिश में।”
बच्चे पूछते, “माँ, बारिश में कैसे मिले?”
अंजलि मुस्कुराती, “बारिश सिर्फ पानी नहीं गिराती बेटा। कभी-कभी जिंदगी भी बदल देती है।”
और अरुण जोड़ता, “हाँ, और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो बूँदों के साथ शुरू होते हैं और जीवन भर चलते हैं।”
गाँव रामपुर आज भी हर साल बरसात का इंतजार करता है। खेत हरे होते हैं, नाले भर जाते हैं, और बरगद का पेड़ अपनी पुरानी कहानी दोहराता रहता है—उस कहानी की, जो एक भीगी दोपहर में शुरू हुई थी और आज भी जिंदा है।
बरसात का दिन सिर्फ एक मौसम नहीं होता। कभी-कभी वह जिंदगी का सबसे खूबसूरत अध्याय बन जाता है।
— विजय शर्मा एरी
(लगभग 2100 शब्द)