Ek Purush in Hindi Motivational Stories by Aloka Patel books and stories PDF | एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 5

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एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 5

भाग ५ — एक पति की खामोशी

उस रात मिहिर बहुत देर तक बालकनी में बैठा रहा।

शहर की सड़कें धीरे-धीरे शांत हो रही थीं। कुछ गाड़ियाँ अभी भी गुजर रही थीं, लेकिन उसके मन में चल रहा शोर उनसे कहीं ज्यादा तेज था।

निशा कमरे में जा चुकी थी।

माँ भी अपने कमरे में थीं।

पापा टीवी के सामने बैठे थे।

घर में सब लोग मौजूद थे…

फिर भी मिहिर को लग रहा था कि वह इस घर में अकेला है।

उसने मोबाइल उठाया।

ऑफिस के कुछ मैसेज पड़े थे।

उसने मोबाइल बंद कर दिया।

आज उसे किसी से बात करने का मन नहीं था।

तभी पीछे से निशा की आवाज आई—

“मिहिर…”

मिहिर ने मुड़कर देखा।

निशा दरवाजे के पास खड़ी थी।

“अभी तक सोए नहीं?”

“नींद नहीं आ रही।”

निशा कुछ पल चुप रही।

फिर उसके पास आकर कुर्सी पर बैठ गई।

“क्या हुआ है तुम्हें?”

मिहिर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“कुछ नहीं।”

निशा ने उसकी तरफ देखा।

“तुम हमेशा यही कहते हो—कुछ नहीं।”

मिहिर चुप रहा।

“लेकिन तुम्हारे चेहरे से साफ दिखाई देता है कि कुछ तो है।”

मिहिर ने गहरी साँस ली।

“निशा… कभी-कभी लगता है कि मैं सबके लिए सोचता हूँ, लेकिन मेरे लिए कोई नहीं सोचता।”

निशा कुछ बोल नहीं पाई।

मिहिर आगे बोला—

“माँ की चिंता है। पापा की जिम्मेदारी है। तुम्हारी जरूरतें हैं। बच्चों की पढ़ाई है। ऑफिस का काम है…”

वह कुछ पल रुका।

“लेकिन इन सबके बीच मैं कहाँ हूँ?”

निशा ने धीरे से कहा—

“तुम हमें अपना समझते हो, इसलिए इतना करते हो।”

“हाँ।”

मिहिर ने उसकी तरफ देखा।

“लेकिन अपना समझने का मतलब यह तो नहीं कि मैं खुद को ही भूल जाऊँ।”

निशा की आँखें झुक गईं।

कुछ देर दोनों के बीच खामोशी रही।

फिर निशा ने पूछा—

“क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें समझती नहीं?”

मिहिर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

उसने सामने अंधेरे आसमान की ओर देखा।

“तुम समझती हो निशा… लेकिन शायद उतना नहीं जितना मैं चाहता हूँ।”

निशा की आँखों में नमी आ गई।

“तो मुझे बताओ ना… मैं कैसे समझूँ?”

मिहिर ने पहली बार उसकी तरफ सीधे देखा।

“बस कभी-कभी मेरी तरफ भी देख लिया करो।”

निशा चुप रही।

उस रात दोनों ने बहुत बातें कीं।

पहली बार मिहिर ने अपनी सारी परेशानियाँ निशा के सामने रख दीं।

पैसों की चिंता।

पापा की उम्मीदें।

माँ की भावनाएँ।

ऑफिस का दबाव।

बच्चों का भविष्य।

और सबसे बड़ी बात—

हर किसी को खुश रखने की उसकी कोशिश।

निशा सुनती रही।

उसने बीच में एक बार भी उसे नहीं रोका।

बात खत्म होने के बाद निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मिहिर…”

“हम्म?”

“शायद मैं सच में तुम्हारी परेशानी समझ नहीं पाई।”

मिहिर कुछ नहीं बोला।

“लेकिन अब समझने की कोशिश करूँगी।”

मिहिर की आँखें भर आईं।

वह मुस्कुराया।

“बस यही चाहिए था।”

अगली सुबह मिहिर हमेशा की तरह जल्दी उठ गया।

लेकिन आज कुछ अलग था।

नाश्ते की टेबल पर निशा ने कहा—

“मिहिर, आज शाम जल्दी आ जाना।”

“क्यों?”

“बात करनी है।”

मिहिर ने सिर हिलाया।

“ठीक है।”

ऑफिस में पूरा दिन मिहिर काम में व्यस्त रहा।

लेकिन शाम को घर लौटते समय उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।

जब वह घर पहुँचा तो देखा कि माँ, पापा और निशा तीनों हॉल में बैठे थे।

मिहिर ने सबकी तरफ देखा।

“क्या हुआ?”

पापा ने कहा—

“बैठ बेटा।”

मिहिर बैठ गया।

कुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर पापा ने धीमी आवाज में कहा—

“हमें तुमसे कुछ कहना है।”

मिहिर का दिल तेज धड़कने लगा।

पापा ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

“बेटा, हमें लगता है कि हमने तुमसे बहुत ज्यादा उम्मीदें रख दीं।”

मिहिर हैरान रह गया।

माँ की आँखों में भी आँसू थे।

पापा आगे बोले—

“हमने हमेशा सोचा कि बेटा है तो सब संभाल लेगा।”

उन्होंने सिर झुका लिया।

“लेकिन यह कभी नहीं सोचा कि सब संभालते-संभालते वह खुद कितना थक जाता होगा।”

मिहिर की आँखों से आँसू निकल पड़े।

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“बेटा… तूने कभी शिकायत नहीं की। इसलिए हमें लगा कि तू खुश है।”

मिहिर ने माँ का हाथ पकड़कर कहा—

“मैं आप लोगों से नाराज़ नहीं हूँ माँ।”

“तो फिर?”

“बस… कभी-कभी मुझे भी बेटे की तरह रहने दो। हर समय घर का सहारा मत समझो।”

माँ रो पड़ीं।

पापा ने आगे बढ़कर मिहिर के कंधे पर हाथ रखा।

“अब से तू अकेला नहीं है।”

मिहिर ने पापा की तरफ देखा।

उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे।

निशा भी उसके पास आकर बैठ गई।

“हम सब मिलकर घर चलाएँगे।”

मिहिर ने सबकी तरफ देखा।

पहली बार उसे लगा कि शायद उसकी बात सुनी गई है।

उस दिन कोई बड़ी समस्या हल नहीं हुई थी।

पैसों की चिंता अभी भी थी।

जिम्मेदारियाँ अभी भी थीं।

ऑफिस का तनाव भी कम नहीं हुआ था।

लेकिन एक चीज बदल गई थी—

मिहिर अब अपनी परेशानियों को अकेले उठाने वाला नहीं था।

उसने समझ लिया था कि परिवार का मतलब सिर्फ दूसरों के लिए त्याग करना नहीं होता।

परिवार का मतलब यह भी होता है कि जब कोई थक जाए…

तो उसे सहारा दिया जाए।

जब कोई टूटने लगे…

तो उसका हाथ पकड़ा जाए।

और जब कोई चुप हो जाए…

तो उसकी खामोशी भी सुनी जाए।

मिहिर बालकनी में खड़ा था।

आज वही शहर था।

वही सड़कें थीं।

वही रात थी।

लेकिन आज उसके दिल में अकेलापन नहीं था।

निशा पीछे से आई और उसके कंधे पर हाथ रखा।

“चलो… चाय बना दी है।”

मिहिर मुस्कुराया।

“अभी आता हूँ।”

निशा जाने लगी।

मिहिर ने उसे आवाज दी—

“निशा…”

“हाँ?”

“धन्यवाद।”

निशा मुस्कुराई।

“पति को धन्यवाद नहीं… साथ चाहिए।”

मिहिर की आँखों में फिर से नमी आ गई।

उसने धीरे से कहा—

“हाँ… अब समझ गया हूँ।”

और उस रात—

बहुत दिनों बाद—

मिहिर ने खुद को सबके बीच अकेला नहीं, बल्कि सबके साथ महसूस किया।

लेकिन उसे यह नहीं पता था कि जिंदगी ने उसके लिए अभी एक और बड़ा मोड़ संभालकर रखा था…