last letter in Hindi Motivational Stories by Subhan Khan books and stories PDF | आखिरी चिट्ठी

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आखिरी चिट्ठी

आखिरी चिट्ठी

शहर के किनारे बसे एक छोटे-से गाँव में सिया नाम की सत्रह साल की लड़की रहती थी। उसका परिवार बहुत साधारण था। पिता खेती करते थे और माँ घर के साथ-साथ सिलाई का काम भी करती थीं। सिया पढ़ाई में बहुत अच्छी थी और उसका सपना था कि वह आगे पढ़कर अपने माता-पिता का सहारा बने।

लेकिन पिछले कुछ महीनों से घर की परिस्थितियाँ ठीक नहीं थीं। बारिश कम होने के कारण फसल खराब हो गई थी। पिता पर पहले से ही कुछ कर्ज था और अब घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया था।

एक शाम सिया ने पिता को आँगन में चुपचाप बैठे देखा। उनके हाथ में कुछ कागज थे।

“पापा, क्या हुआ?” सिया ने पास बैठते हुए पूछा।

पिता ने मुस्कुराने की कोशिश की।

“कुछ नहीं बेटा, बस खेती का हिसाब देख रहा था।”

सिया समझ गई कि बात कुछ और है, लेकिन उसने उस समय कुछ नहीं पूछा।

अगले दिन स्कूल में अध्यापिका ने बताया कि शहर के एक अच्छे कॉलेज में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति का फॉर्म आया है। जिन विद्यार्थियों के अंक अच्छे होंगे, उन्हें पढ़ाई का पूरा खर्च मिलने वाला था।

सिया की आँखों में उम्मीद चमक उठी।

उसने घर आकर फॉर्म पिता को दिखाया।

“पापा, अगर मुझे यह छात्रवृत्ति मिल गई तो मेरी पढ़ाई का खर्च नहीं आएगा।”

पिता ने फॉर्म देखा और कहा, “जरूर भरना बेटा। तुम्हें अपनी पढ़ाई नहीं छोड़नी है।”

सिया ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

कुछ दिनों बाद उसने परीक्षा दी। उसे पूरा विश्वास था कि वह अच्छा करेगी। लेकिन परिणाम आने से पहले ही घर की समस्या बढ़ गई।

एक दिन पिता ने कहा, “सिया, शायद अब तुम्हें आगे पढ़ाई रोकनी पड़े।”

यह सुनकर सिया कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गई।

“लेकिन पापा…”

“मुझे पता है तुम्हारा सपना क्या है,” पिता ने धीमी आवाज में कहा, “लेकिन घर की हालत…”

सिया की आँखों में आँसू आ गए।

उसने उस रात अपनी किताबें बंद कर दीं। उसे लगा जैसे उसका सपना उससे दूर जा रहा है।

अगली सुबह स्कूल जाते समय उसे रास्ते में एक पुराना डाकिया मिला। वह गाँव में कई सालों से चिट्ठियाँ बाँटता था। उसने सिया को एक लिफाफा दिया।

“तुम्हारे नाम है।”

सिया ने लिफाफा खोला।

अंदर छात्रवृत्ति कार्यालय की चिट्ठी थी।

उसका चयन छात्रवृत्ति के लिए हो गया था।

सिया खुशी से घर की ओर दौड़ी।

“पापा! पापा! मेरा चयन हो गया!”

पिता ने चिट्ठी पढ़ी तो उनकी आँखें भर आईं।

“मैंने कहा था ना बेटा, तुम्हें अपनी पढ़ाई नहीं छोड़नी है।”

सिया ने पिता को गले लगा लिया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

शहर जाने के लिए सिया को कुछ पैसे चाहिए थे। छात्रवृत्ति में कॉलेज की फीस और किताबों का खर्च शामिल था, लेकिन यात्रा और रहने के लिए थोड़े पैसे अलग से चाहिए थे।

सिया ने तय किया कि वह गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों को पढ़ाएगी और जो पैसे मिलेंगे, उन्हें बचाएगी।

गाँव के कुछ बच्चों ने उससे पढ़ना शुरू किया। शुरुआत में केवल दो बच्चे आए, फिर धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई।

सिया रोज सुबह खेत में माँ की मदद करती और शाम को बच्चों को पढ़ाती।

कुछ लोग उसका मजाक भी उड़ाते।

“इतनी पढ़ाई करके क्या मिलेगा? आखिर गाँव की लड़की ही तो है।”

सिया मुस्कुराकर कहती, “मुझे नहीं पता कि मुझे क्या मिलेगा, लेकिन मैं कोशिश करना नहीं छोड़ूँगी।”

कुछ महीनों बाद वह शहर के कॉलेज चली गई।

शुरुआत में उसे बहुत मुश्किल हुई। गाँव की शांत जिंदगी से निकलकर शहर की भीड़ और नए लोगों के बीच रहना आसान नहीं था। कई बार उसे घर की याद आती। वह रात में माँ-पिता से फोन पर बात करती और फिर अपनी किताबें खोलकर पढ़ने बैठ जाती।

समय बीतता गया।

तीन साल बाद सिया ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई।

पहली तनख्वाह मिलने पर उसने सबसे पहले अपने पिता का कर्ज चुकाया और माँ के लिए एक नई सिलाई मशीन खरीदी।

फिर वह गाँव वापस आई।

जिस स्कूल में वह कभी पढ़ती थी, उसी स्कूल के बाहर बच्चे उसका इंतजार कर रहे थे।

अध्यापिका ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखा सिया, तुम्हारा सपना सिर्फ तुम्हारा नहीं था। तुम्हारी मेहनत ने पूरे गाँव को उम्मीद दी है।”

सिया ने स्कूल की ओर देखा।

उसे उस दिन की वह पुरानी चिट्ठी याद आ गई जिसने उसकी जिंदगी बदल दी थी।

उसने गाँव के बच्चों से कहा, “सपने हमेशा बड़े होने चाहिए, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत उससे भी बड़ी होनी चाहिए। परिस्थितियाँ हमें रोक सकती हैं, लेकिन अगर हम कोशिश करना बंद कर दें, तभी हम सच में हारते हैं।”

उस दिन सिया ने फैसला किया कि वह गाँव में गरीब बच्चों के लिए एक छोटी-सी पढ़ाई की जगह बनाएगी।

कुछ साल बाद उसी जगह पर एक छोटा पुस्तकालय और पढ़ाई केंद्र बन गया।

दरवाजे पर एक बोर्ड लगा था—

“उम्मीद की पाठशाला — जहाँ सपनों को पढ़ना सिखाया जाता है।”

सिया हर बार उस बोर्ड को देखकर मुस्कुराती।

उसे पता था कि उसकी जिंदगी बदलने वाली वह चिट्ठी सिर्फ कागज का एक टुकड़ा नहीं थी।

वह उसके लिए उम्मीद की पहली किरण थी।