Khaki Bindiya - Part 3 in Hindi Women Focused by Shilpy Aggarwal books and stories PDF | ख़ाकी बिंदिया - भाग 3

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ख़ाकी बिंदिया - भाग 3

अगली सुबह मृदुला ने अभिनव से छुट्टी की अर्ज़ी के बारे में पूछा। अभिनव कुछ खोया-खोया-सा था, मानो उसने उसकी बात सुनी ही न हो। बिना कोई उत्तर दिए वह बाहर निकल गया।

मृदुला भी समाचारों में बॉर्डर पर बढ़ते तनाव की ख़बरें देख रही थी। उसे भी अंदेशा हो रहा था कि हालात जल्द ही बदलने वाले हैं।

कुछ ही दिनों बाद वॉर मोबिलाइज़ेशन शुरू हो गया।

अभिनव ने मृदुला को परिस्थितियों की गंभीरता समझाई।

दोनों ने ज़रूरत का सामान छोड़कर बाकी सामान पैक कर लिया।

अभिनव को अड़तालीस घंटों के भीतर यूनिट में उपस्थित होने का आदेश मिला। उसने पापा को फ़ोन करके पूरी स्थिति की जानकारी दे दी।

दोनों कार से राजस्थान के लिए रवाना हो गए। घर पहुँचकर अभिनव ने माँ-पापा और अदिति को हालात की गंभीरता समझाई और उनका ढाँढस बँधाया।

अगले दिन सुबह तैयार होकर वह कुछ देर के लिए बाहर गया। जब लौटा, तब उसके निकलने का समय हो चुका था।

मृदुला अपने कमरे में ही थी। वह जानती थी कि यह पल आएगा, फिर भी उसका सामना करने का साहस नहीं जुटा पा रही थी।

अभिनव उसके पास गया और कुछ काग़ज़ उसकी ओर बढ़ा दिए।

“ये क्या है?” मृदुला ने पूछा।

“तुम्हारे एडमिशन के पेपर्स हैं। आराम से देखकर निर्णय ले लेना।”

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

फिर अभिनव ने उसे बाँहों में भर लिया। बिना कुछ कहे दोनों एक-दूसरे को थामे खड़े रहे।

कुछ देर बाद उसने मृदुला का चेहरा अपनी हथेलियों में लिया, उसके माथे को चूमा और एक लिफ़ाफ़ा उसके हाथ में रखते हुए बस इतना कहा—

“अपना ख़याल रखना।”

वह कमरे से बाहर निकल गया।

मृदुला भी उसके पीछे-पीछे चली आई।

अभिनव माँ-पापा और अदिति से मिला। इससे पहले कि उसके जज़्बात उसकी मुश्किलें बढ़ा देते, उसने अपना बैग उठाया और घर से बाहर निकल गया।

उस दिन सिर्फ़ अभिनव जंग लड़ने नहीं गया था। उन चारों के जीवन में भी एक ऐसी जंग शुरू हो चुकी थी, जिससे हर किसी को अकेले ही जूझना था।

मृदुला कमरे में बैठी अपने बिखरे मन को समेटने की कोशिश कर रही थी। आँसू लगातार बह रहे थे और उसकी नज़र दीवार पर टँगी अपनी शादी की तस्वीर पर टिकी हुई थी।

काफ़ी देर बाद जब मन थोड़ा संभला, तो टेबल पर रखे उन काग़ज़ों पर उसकी नज़र गई, जो जाते समय अभिनव उसे देकर गया था।

उसने आँसुओं से धुँधली आँखों से एडमिशन के पेपर्स खोले।

वह एम.एससी. इन फ़ूड एंड न्यूट्रीशन का प्रवेश फ़ॉर्म था। उस पर केवल मृदुला के हस्ताक्षर होने बाकी थे। साथ में फ़ीस की राशि और ज़रूरी निर्देश भी रखे थे।

शायद सामान्य परिस्थितियों में यह उसके जीवन का एक बहुत मूल्यवान क्षण होता, लेकिन उस समय इन सबका उसके भीतर कोई स्पंदन नहीं हुआ।

उसने दूसरा लिफ़ाफ़ा खोला।

उसमें एक पत्र था… और एक छोटा-सा बिंदिया का पत्ता।

उसने बिंदिया का पत्ता बिना खोले ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया और पत्र पढ़ने लगी—

मेरी प्यारी-सी मृदुला,

अब भी रो रही हो…

चलो, पहले आँसू पोंछ लो।

अच्छा बताओ, आँखों में आँसू रहेंगे तो मेरा पत्र कैसे पढ़ पाओगी? कहीं अर्थ का अनर्थ न हो जाए…

अरे! देखो, पत्र पर ही आँसू गिरा रही हो। बिना पढ़े ही उसे अपने आँसुओं से धो देना चाहती हो क्या?

मृदुला के होंठों पर अनायास मुस्कान आ गई। उसने आँसू पोंछे और आगे पढ़ने लगी।

तुमने एडमिशन के पेपर्स देखे?

अगर तुम्हें ठीक लगे तो कॉलेज जाकर एडमिशन फ़ॉर्म और फ़ीस जमा कर देना, और अपनी अधूरी रह गई पढ़ाई पूरी करना।

क्या सोच रही हो? मुझे कैसे पता चला कि तुम कौन-सा कोर्स करना चाहती हो?

देखा मेरा जादू…

तुम्हारी स्क्रैप बुक देखते ही समझ गया था।

अब जो कहने जा रहा हूँ, चाहता हूँ उसे ध्यान से पढ़ना।

तुमने न जाने क्यों अपने जीवन को इतना कम आँका।

आज मेरी नज़र से अपने जीवन को देखो—

जिस दिन तुमने एक फ़ौजी के साथ विवाह करने का निर्णय लिया था, उसी दिन तुमने अपना जीवन और अपने सारे सुख दूसरों के नाम कर दिए थे। और तुम कहती हो कि तुम सिर्फ़ अपने लिए ही जीए जा रही हो?

यह तो न्याय नहीं है।

मैं वर्दी पहनता हूँ, पर तुम बिना वर्दी पहने ही उसका सारा भार उठाती हो।

क्या तुम्हारे सुखों की आहुति के बिना मैं इस वर्दी का अधिकारी होता?

तुमने सिर्फ़ अभिनव से विवाह नहीं किया, इस वर्दी से भी विवाह किया है।

यदि मेरी वर्दी मेरे जीवन का गौरव है, तो मृदुला, तुम इस वर्दी का गौरव हो।

जितना गर्व मैं तुम पर करता हूँ, उतना ही गर्व तुम भी स्वयं पर करो।

आज मैं तुमसे एक वादा चाहता हूँ।

अब से जब भी बिंदिया लगाना, उसे अपने जीवन की ऊँचाई का प्रतीक मानकर खाकी बिंदिया ही लगाना।

तुम्हें खाकी बिंदिया में देखने की आशा में,

तुम्हारा

अभिनव

अब मृदुला के हाथों में बिंदिया का वही पत्ता था।

वह उसे उसी सम्मान से निहार रही थी, जिस सम्मान से कभी अभिनव की वर्दी को निहारा करती थी।

उसने एक खाकी बिंदिया उठाई।

धीरे से अपने माथे पर सजा ली।

फिर आईने में ख़ुद को देखा।

इस बार अपनी नहीं, अभिनव की नज़र से।