DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 2 Scene 2

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 2 Scene 2

SCENE 2

"पहले पहर का वक़्त था, ताज़ी ठंडी हवाएं पेड़ों को झूमने पर मजबूर कर रही थीं, सूरज आसमान पर धीरे धीरे चढ़ कर आसमान को पीले रंग से सजा चुका था, आसमान के गालों पर हल्की लालिमा भी छा गई। चिड़िया ने पेड़ो पर चहचहाना शुरू कर दिया। 

अम्हेल दरगाह के आंगन में चादर बिछा कर बैठी हुई क़ुदरत को देखते हुए आसमान की तरफ़ देखकर, आंखों में आंसू भरे दुआएं करती नज़र आई

"वो तो मालिक हैना, वो तो वो है जिसने क़ुदरत बानाया है, जिसने असमान और ज़मीन बिछाया, कहते हैं उसे सब मालूम है फिर क्यों उसे मेरे दिल का हाल मालूम नही होगा?...  अगर सच में मेरी ग़लती है तो सज़ा सही है मगर वो तो उन्हें भी जानता होगा, उनके दिल में क्या है हम नही जानते और मेरे मन में क्या है वो लोग नही जानते।

मेरे ख़ुदा, ऐ मेरे परवरदिगार, हम नही जानते हमसे क्या गुनाह हुआ है जाने या अनजाने में, मेरे मालिक मेरी गुनाहों के लिए हमें माफ करें, मेरी मुश्किलों और परेशानियों को आसान करें। मेरी मदद करें के हम वैसे बन सके जैसे बाबाजान ने चाहा। मेरी मदद करें मेरी तलाश को ख़त्म करने में। बेशक ये कुछ महीने मेरे लिए आसानी से गुज़रे और आपने ही हमें मुसीबत से बचाकर अपनी पनाह में लिया इसलिए हमने भी कभी हिम्मत नही हारी न ही कभी गिला किया, और इसी ज़मीन पर ये दिन गुज़ारे। हम जानते है मेरी मदद करने वाले, हमें रास्ता दिखाने वाले भी आप ही हैं।" उसने अपने दिल के दर्द बयान करते हुए बहुत से लम्हों को सोचा

"अम्हेल पीर बाबा तुम्हे बुला रहे है। उन्होंने कहा है सुबह से यहां बैठी हो चलकर अब नाश्ता कर लो।" दरगाह के दरवाज़े पर से दरगाह के पीर की ख़ादिमा अम्हेल के लिए उनका पैग़ाम हर रोज़ की तरह आज फिर ले आई।

"आप चलिए हम चादर समेट कर आते हैं।" आसमान के जानिब से मुंह नीचे करके अपने लिए हुए दुपट्टे से मुंह पोछते हुए अम्हेल ने जवाब दिया। 

"ख़ादिमा बिना कुछ कहे चली गई मगर पीर बाबा के हुक्म के मुताबिक़ दूर खड़ी होकर बिना आहट अम्हेल को देखने लगी। अम्हेल अपनी चादर समेटकर आंगन के उस पार रखे पानी के पास चली गई  और उसने अपना मुँह धोया। इतना देख कर खादिमा चली गई। अम्हेल भी चादर किनारे पर रखकर फ़ौरन चली गई।

पीर बाबा का घर दरगाह से लगकर 2 घर बाद है। ख़ादिमा फ़ौरन ही यहां पहुंच गई, पीर बाबा ने अपना सफ़ेद कुर्ता ठीक कर रहे थे उसे देखते पूछा

"अम्हेल कहां है?"

"दुआओं में थी, कहा है आ रही है।" 

"आज कुछ ख़ास बात?" पूछते हुए वो कुर्सी पर बैठ गए 

"हां बाबा शायद आज फिर रो रही थी, मैं गई तो दुआओं में थी मगर मेरी तरफ़ मुंह नही किया उसके बाद चादर उठाकर फिर मुंह धोने चली गई और फ़िर मैं चली आई।" ख़ादिमा ने जल्दी जल्दी एक सांस में सब बता दिया जैसे वो बस पूछने का इंतज़ार ही कर रही थी।

"अच्छा तुम जाओ, चाय बनाओ।" ज्यों ही वो अन्दर जाने को मुड़ी उसने पीछे से अम्हेल की आहट लगी वो ठहर गई

"बाबा हम आ गए।" अम्हेल ने दाख़िल होते ही आवाज़ लगाया

"आओ बेटा।" बाबा ने कहा

"हां तुम बैठो मैं यूं चाय के साथ आती हूं।" ख़ादिमा भी उससे मुख़ातिब हुई। अम्हेल पीर बाबा के पास रखी कुर्सी पर बैठ गई।

"आने में देर हो गई...क्यों?" पीर बाबा ने जुस्तुजू किया

"रास्ते में अफ़रोज़ चाची ने रोक लिया था।"

"क्यों, सब खैरियत?"

"कह रही थी काफ़ी दिन हो गए उनसे मुलाक़ात किए, इसलिए बुलाया है। हमने कहा आपके साथ जाएंगे।"

"सही कहा उन्होंने, तन्हाई में मत रहा करो, जाया करो सबसे मिला करो, शादी से पहले अनाया तो पूरे मोहल्ले में कूदती रहती थी।"

"नही ना बाबा, उनका बुलाने का मक़सद हमें उनके लोगों से मिलवाना है।" उसने पहलू को दबे लफ्ज़ों में समझाना चाहा

"अस्तग़फिरूल्लाह, तो तुम उनसे साफ़ लफ़्ज़ों में इनकार कर देती।.. अच्छा अब मैं ही उनसे बात करूंगा इस मसले पर।"

"नहीं बाबा आप रहने दीजिए, इस वजह से नजाने वो सारे मोहल्ले में क्या शोर मचाना शुरू कर दें।"

"ऐसे नही हल होते ऐसे मामले। तुमने मुझे पहले ये सारी बातें बताई होती तो अभी तक मैं सबको सीधा कर चुका होता।" इनके बातचीत में ख़ादिमा भी चाय लेकर आ गई

"नही बाबा बात बढ़ेगी नही क्योंकि मैंने सुना है उनका लड़का किसी और के इश्क़ में है और इस बात के लिए बिल्कुल राज़ी नहीं है, वो तो आफरोज़ ख़ाला ही ज़बरदस्ती ज़िद कर रही हैं।"

"चलो बेहतर है, मामला ही ख़त्म हो गया यहां।" पीर बाबा ने ठंडी सांस लिया और अम्हेल इन बातों को सुनकर अपने हाथ में चाय की प्याली लिए फिर से अंधेरे जंगल में भटकने लगी

"..........इसको इस हवेली में आना ही नहीं होना चाहिए था, बाबजान के बाद इसने हवेली के नाम को बे इज्ज़त करने में कोई कसर छोड़ी क्या, आप बताइए खुले आम किसी ग़ैर के साथ क्या बातें कर रही थी........ वजदान ने चिल्लाकर पूछा

.............बाबजान के बाद आपलोग का दिमाग़ सही नही रह गया है......... उसने जवाब दिया

.............तुम्हारा ठीक हैना, तुम्हारे लिए तो सबकुछ सही है..........."

"मैं अब चल रहा हूं.....बेटा.....मैं जा रहा हूं।" पीर बाबा की आवाज़ ने उसे दुबारा वही पर खींच लिया, वो चौंक कर खड़ी हो गई

"चल रहे है! अच्छा।" उसने हड़बड़ा कर कहा

"नजाने क्या बीती है कि ये मुरझा ही गई, और यहां भी कोई न कोई इसके सवाल में खड़ा हो जाता है। अफ़रोज़ का मामला हल हो गया लेकिन और भी लोग हैं इस सवाल के साथ। ये बच्ची इस जगह के लिए हरगिज़ नही है। मुझे इसके लिए कुछ करना होगा।"  उन्होंने काफ़ी गहराई से सोचा फ़िर कहा 

"नहीं, अभी बस मैं जा रहा हूं, तुम नौशीन के साथ आ जाना।" चाय की प्याली मेज़ पर से उठाकर बाबा ने उसे दोबार थमा दिया

"अच्छा!" आगे अम्हेल कुछ न कह सकी

"मैने कितनी दफ़ा कहा है बीती बातों को याद करके परेशान मत हुआ करो।" जाते जाते पीर बाबा उसे फ़िर समझाकर चले गए।

नौशीन उसे लेकर उसके कमरे में चली गई। 

"तयार हो जाइए आप, मेरा भी थोड़ा काम बचा है करके चलते हैं।" नौशीन ने कहा 

"हम्म ठीक है।" कमरे में रखे बक्स में से कपड़े निकालते हुए अम्हेल ने पूछा "यावर नज़र नहीं आ रहा आज, कहां है?"

"वो तो अपने अब्बा के साथ है, आज वो घर पर हीं हैंना।" 

"अच्छा... ये बताइए अगर इस बीच अनाया आ गई तो?" उसने कुछ बे-त अल्लुक़ी से पूछा

"अच्छा तो तुम ये सोचती रहती हो। ये सब अब तुम्हारा ही है, वो इस कमरे में अब नहीं आएगी, उसके लिए पीछे वाला कमरा सही करवाएंगे बाबा उन्होंने मुझसे ख़ुद कहा था।"

"अच्छा।" 

"मैं कहती हूं तुमसे कपड़े सही करवा लो मैं कर दूंगी, इतने ढीले आते है तुम्हे अनाया के कपड़े, तुम सुनती क्यों नहीं हो?" उसके हाथ में कपड़ो को देखकर नौशीन ने बोला

"क्योंकि आजकल ऐसेही पसंद आ रहे है हमें और वैसे भी देखिए ये ज़्यादा ढीले भी नही है।"

"ठीक है फिर आज नारंगी वाला पहनना, वो जचता है तुमपर।"

"पर क्यूं, वो क्यों?"

"आज यावर की सालगिरह हैना बस इसीलिए पहन लो। एक तो तुम सवाल बहुत करती हो।"

"अच्छा न, नही करेंगे सवाल, मानते है आपकी बात।" कपड़े लेकर वो चली गई और नौशीन भी अपना काम ख़त्म करने दूसरी तरफ़ चली गई।