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“ओह प्रभु। यह कैसे हो गया?”
वह सरिता की तरफ मुड़ा। उसे सचेत करने का प्रयास करने लगा। कुछ प्रयासों के पश्चात वह रुक गया। युवक अभी भी वहीं खड़ा था। अभी भी सूर्योदय नहीं हुआ था किन्तु प्रकाश में थोड़ी वृद्धि हो गई थी।
शैल ने युवक को ऊपर से नीचे तक देखा। पूरा निरीक्षण किया, “तुम कौन हो? यहाँ क्या कर रहे थे?”
युवक ने मंद स्वर में धीरे धीरे बोलना प्रारंभ किया, “मैं यहाँ के मंदिर के पुजारी का पुत्र हूँ। प्रात: काल मैं ब्रह्म स्नान के लिए नदी में उतरा तब मैंने इन्हें देखा। वह डूब रही थी। उसे बचाकर मैं यहाँ ले आया। तब वह सचेत थी। आपका नाम लेकर, आपकी दिशा में संकेत कर रही थी। पश्चात शीघ्र ही वह अचेत हो गई। आपको ढूँढता हुआ मैं आपके पास आ गया।”
‘ओह, यह बात है? इतनी भोर में सरिता जी नदी में क्यों गई? कहीं उनका पैर तो फिसला नहीं था?’
शैल स्वयं से बात कर रहा था तभी सरिता ने कहा, “शैल, तुम आ गए?”
शैल सरिता की तरफ मुड़ा। सरिता आँखें खोल कर तट पर बैठ गई थीं।
“हे मैया, तुमने सरिता जी को बचा लिया।” शैल ने सतलज नदी का अभिवादन किया, धन्यवाद किया।
“मैया की कृपा से आप सुरक्षित हैं। क्या हुआ था आपके साथ? यह हुआ कैसे?”
“बताती हूँ, शैल। बैठो यहाँ।” शैल बैठ गया। “आप भी बैठिए।” युवक भी बैठ गया।
“कल रात सपन निहारिका की बातें सुनकर मैं विचलित हो गई थी। मैं अपना धैर्य खो बैठी थी। रात्री भर उन्ही विचारों से ग्रस्त रही। लाख प्रयास करने पर भी मुझे निद्रा नहीं आई। तब मन में विचार आया कि सारी समस्याओं का मूल मेरा यह शरीर ही है। शरीर है तो कष्ट है, पीड़ा है, अपमान है, सपन-निहारिका -नदीम की कुदृष्टि है। शरीर है तो उसे ही पाकिस्तान जैसे नरकागार में लौटना है। यदि यह शरीर ही न रहे तो सारी समस्याएं भी नहीं रहेगी। ऐसा विचार कर मैं नदी में डूब जाने का निश्चय कर बैठी। रात्री के अंतिम प्रहर में जब मैंने देखा कि तुम गहन निद्रा में हो, नदी में डूबकर आत्महत्या करने चल पड़ी। नदी की गहराई में जाने लगी। प्रवाह के कारण मैं पानी में ही गिर पड़ी। बहने लगी। तभी सांसें रुँधने लगी। उसे मैं सह न सकी। मैं बचने के लिए प्रयास करने लगी। तभी इस युवक ने आकर बचा लिया। वह मुझे तट तक ले आया। यहाँ आकर मैं लेट गई। मैंने उसे तुम्हारा नाम देकर संकेत किया कि वह तुम्हें लेकर आए। तुम्हारे आने से पूर्व ही मैं अचेत हो गई। आप दोनों की बातें मेरे अचेत कानों पर पड रही थी और धीरे धीरे मैं सचेत होने लगी।”
“अब आप पूर्ण सचेत हैं न?”
“हां, हां।”
“थोड़ा विश्राम कर लो, पश्चात चलते हैं।”
“आप दोनों अविलंब यहाँ से दूर कहीं चले जाओ। मैं जानता हूँ कि सपन और निहारिका बड़े ही धूर्त हैं। उनके साथ आपका जाना ठीक नहीं। सारा गाँव रात्री से ही जान गया है कि आप उनके साथ जाने वाली हो।”
“सरिता जी, यह युवक ठीक कह रहा है। हमें यहाँ से शीघ्र ही चलना होगा, उठो।”
दोनों उठे।
“सरिता जी, कितना भी कष्ट क्यों न हो, कभी आत्महत्या नहीं करनी है। भगवान ने जो यह शरीर दिया है उसके द्वारा उसकी कोई न कोई योजना होती है। भगवान की योजना का विरोध नहीं करते हैं। यह शरीर बड़ा मूल्यवान है। इसकी सुरक्षा करें, इसका सम्मान करें।”
“क्या है इस शरीर में विशेष? गिद्ध जैसे मनुष्य इस शरीर को छिन्न भिन्न करने के लिए लालायित हैं। मैं तो इस शरीर का मूल्य नहीं जानती, तुम तो विद्वान हो। तुम बताओ इस शरीर का क्या मूल्य है?”
“इस विषय में चर्चा करने का यह समय नहीं है। आपको यहाँ से त्वरित निकलना चाहिए। वैसे यह विषय बड़ा गहन है। मेरे पिताजी बड़े शास्त्रज्ञ हैं।”
“तो ले चलो उसके पास।”
“पिताजी काशी गए हैं। बीस दिन पश्चात लौटेंगे।”
“अभी कैसे जानूँगी इस शरीर का मूल्य?”
“किसी शास्त्र के जानकार से यह प्रश्न करना। उचित उत्तर मिल जाएगा। तब तक अपने शरीर को संभाल कर रखना।”
“अब इस समय शास्त्रज्ञ को कहाँ ढूंढें?”
“यह समय यहाँ से दूर कहीं भाग जाने का है। अभी आठ बजने में समय है। आप दोनों पूर्व दिशा में थोड़ा चलकर जाइए। पश्चात गहन जंगल आएगा। उसमें नदी के प्रवाह से बनी कंदराएं हैं। उनमें से किसी में छिप जाना। गाँव की दृष्टि से, सपन निहारिका की दृष्टि से बचने का यही उपाय है।”
दोनों ने हाथ जोड़कर ब्राह्मण युवक का धन्यवाद किया। युवक चला गया।
“चलो सामान ले लो। भाग जाते हैं।”
“नहीं सरिता जी। सामान यहीं रहने दो। रुपये और मोबाइल साथ ले लो। बाकी सब यहीं छोड़ दो।”
“सामान क्यों छोड़ना है? बिना सामान हम क्या करेंगे?”
“अभी समान की चिंता छोड़ो। जीवित रहेंगे तो नया समान खरीद लेंगे।”
“इसे कहीं छिपा देते हैं।”
“इसे यहीं रहने दो। सामान देखकर वे दोनों को भ्रम रहेगा कि हम दोनों यहीं कहीं हैं। वे हमारी प्रतीक्षा करते रहेंगे और हम कहीं दूर निकाल जाएंगे।”
“तुम्हारी यह योजना अच्छी है।”
“किन्तु...।”