Kunwari Bindi - 1 in Hindi Drama by Prem Shankar books and stories PDF | कुँवारी बिंदी - 1

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कुँवारी बिंदी - 1

       -  लेखक: प्रेम शंकर

✍️ लेखक का परिचय (Author Bio)
प्रेम शंकर हिंदी साहित्य जगत में एक उभरते हुए और भावुक लेखक हैं। अपनी अनूठी सोच, जादुई कल्पनाशीलता और मानवीय संवेदनाओं को शब्दों में पिरोने की कला के कारण उनकी लेखन शैली पाठकों को सीधे अपनी ओर आकर्षित करती है। 'कुंवारी बिंदी' उनका एक बेहद महत्वाकांक्षी उपन्यास है, जिसमें उन्होंने प्यार की पराकाष्ठा और विरह के दर्द को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया है।



अनुक्रमणिका (Index)
1. अध्याय 1: धरती पर आगमन और खुशबू परी का बचपन
2. अध्याय 2: मेले में खो जाना और परिवार का प्यार
3. अध्याय 3: बचपन की शर्तें और पैर में लगी चोट
4. अध्याय 4: दोस्तों की जुदाई और घायल खरगोश
5. अध्याय 5: मामा का गाँव और 'प्रेम' से पहली मुलाकात
6. अध्याय 6: सच्चा प्यार और खुशियों का खजाना
7. अध्याय 7: गलतफहमियों का जाल और अधूरा प्यार (अंत)

📜 अध्याय १: धरती पर आगमन और खुशू परी का बचपन
शाम का समय था। आसमान में सिंदूरी और सुनहरी रंगत बिखरी हुई थी। गीता हमेशा की तरह अपने घर के आंगन में बैठी तुलसी के पौधे के पास दीया जला रही थी। उसी पल, अचानक वातावरण में एक अजीब सी शांति छा गई, जैसे हवाओं ने बहना रोक दिया हो। आसमान से दूधिया रोशनी की एक किरण सीधे गीता के आंगन में उतरी। जब रोशनी कुछ कम हुई, तो गीता की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके सामने साक्षात एक अलौकिक परी खड़ी थी। वह परी कोई और नहीं, बल्कि आकाशलोक से आई गीता की वही सहेली थी, जिसके साथ उसका पुराना और गहरा नाता था।परी के चेहरे पर एक दिव्य चमक थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी व्याकुलता और ममता साफ झलक रही थी। उसकी गोद में मखमली कपड़ों में लिपटी एक नन्हीं, बेहद खूबसूरत बच्ची थी।"गीता..." परी की आवाज़ में एक अजीब सी खनक और भारीपन था।"तुम... यहाँ? और यह नन्हीं जान?" गीता ने आश्चर्य से पूछा।परी ने आगे बढ़कर वह कोमल सी गुड़िया जैसी बच्ची गीता की बाहों में सौंप दी। परी की आँखों से एक आँसू टपक कर बच्ची के गाल पर गिरा। उसने कहा, "गीता, इसे अपने पास रख लो। यह मेरी बेटी है, लेकिन आकाशलोक की कुछ मजबूरियों के कारण मैं इसे अपने साथ नहीं रख सकती। मुझे पता है कि इस पूरी धरती पर तुमसे बेहतर इसका पालन-पोषण कोई नहीं कर सकता। इसे अपनी ही संतान मानकर बड़ा करना।"इससे पहले कि गीता कुछ कह पाती, वह परी भारी मन से विदा होकर वापस बादलों की ओट में ओझल हो गई। गीता उस नन्हीं परी जैसी बच्ची को पाकर भावुक हो उठी। उसकी गोद आज पूरी हो गई थी। अब गीता का पूरा दिन और रात उस बच्ची की निश्चल मुस्कान और उसकी देखभाल में बीतने लगा। समय अपनी रफ्तार से बढ़ता गया और वह जाजुई बच्ची धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। वह गीता को ही अपनी असली माँ समझती थी और अपनी तुतली आवाज़ में जब भी उसे 'अम्मा' कहकर पुकारती, तो गीता का दिल खुशियों से भर जाता।उस बच्ची में एक बहुत ही अनोखी बात थी। उसके शरीर से किसी महंगे इत्र की