We learned to fly in Hindi Motivational Stories by Vijay Erry books and stories PDF | हम ने उड़ना सीख लिया

Featured Books
Categories
Share

हम ने उड़ना सीख लिया

हम ने उड़ना सीख लिया
लेखक: विजय शर्मा एरी
हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से पहाड़ी गाँव चंबा की घाटी में, जहाँ सेब के बाग हवा में झूमते थे और रावी नदी गीत गाती हुई बहती थी, एक साधारण सा परिवार रहता था। परिवार का मुखिया रामलाल एक मेहनती किसान था। उसकी पत्नी सीता घर-गृहस्थी संभालती थी और उनके दो बेटे थे—बड़ा बेटा हौंसला और छोटा बेटा अरुण। हौंसला बारह साल का था, पतला-दुबला, लेकिन उसकी आँखों में सपनों की एक अलग ही चमक थी।
हर शाम जब पहाड़ों पर सूरज ढलता था, हौंसला छत पर बैठकर आसमान में उड़ते पक्षियों को देखता। चील, गिद्ध, छोटे-छोटे चिड़ियाँ—सब स्वतंत्रता से उड़ रहे होते। वह मन ही मन कहता, “एक दिन मैं भी उड़ूँगा।”
एक दिन उसने पिता से कहा, “पापा, मैं भी उड़ना चाहता हूँ।”
रामलाल हँसे, “बेटा, उड़ना तो पक्षियों का काम है। हम इंसान हैं। हमारा काम जमीन पर पैर जमाकर मेहनत करना है।”
लेकिन हौंसला का मन नहीं माना। गाँव के स्कूल में मास्टर जी ने एक दिन कहा था, “सपने देखना बुरी बात नहीं, लेकिन सपनों को साकार करने के लिए पंख चाहिए—मेहनत के पंख, हिम्मत के पंख।”
हौंसला ने उसी दिन तय कर लिया कि वह अपने सपनों के पंख बनाकर दिखाएगा।
गाँव में बिजली नहीं थी। रात को लालटेन की रोशनी में हौंसला पुरानी किताबें पढ़ता। स्कूल से दो किलोमीटर दूर पहाड़ी रास्ते पर पैदल जाता। बारिश हो या धूप, वह कभी नहीं रुका। कक्षा में हमेशा पहले आने की कोशिश करता। लेकिन गाँव के कुछ लड़के उसका मजाक उड़ाते, “देखो, उड़नेवाला आया! पंख कहाँ हैं तेरे?”
हौंसला चुप रहता। माँ सीता उसे समझाती, “बेटा, लोग जो कहते हैं सुनो मत। तुम्हारे अंदर जो है, वही असली है।”
एक दिन स्कूल में विज्ञान का पाठ चल रहा था। मास्टर जी ने हवाई जहाज के बारे में बताया। हौंसला की आँखें चमक उठीं। उसने पूछा, “सर, क्या कोई गरीब लड़का भी पायलट बन सकता है?”
मास्टर जी मुस्कुराए, “अगर हिम्मत हो और मेहनत हो, तो हाँ।”
उसी दिन से हौंसला का सपना स्पष्ट हो गया—वह पायलट बनेगा। आसमान में उड़ेगा।
लेकिन रास्ता आसान नहीं था। घर की हालत खराब थी। पिता की आय सिर्फ खेती से थी। एक साल सूखा पड़ गया। फसल खराब हो गई। परिवार को कठिनाई का सामना करना पड़ा। हौंसला ने स्कूल छोड़ने का फैसला किया ताकि घर का काम संभाल सके।
माँ ने मना किया, “नहीं बेटा। तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकेगी। हम कुछ न कुछ कर लेंगे।”
हौंसला ने रात-रात भर मजदूरी की। पड़ोस के बागों में सेब तोड़े, लकड़ियाँ काटीं, सामान ढोया। सुबह स्कूल जाता, शाम को काम करता। शरीर थक जाता, लेकिन मन नहीं थकता था।
एक दिन वह पहाड़ी पर बैठा आसमान देख रहा था। अचानक एक बड़ा चील उसके सिर के ऊपर से गुजरा। चील ने पंख फैलाए और ऊँचाई पर जाकर घूमने लगा। हौंसला ने फुसफुसाया, “तुम मुझे सिखाओगे उड़ना?”
उस रात उसने डायरी में लिखा—“उड़ना सीखने के लिए पहले डर को छोड़ना पड़ता है। डर ही असली जंजीर है।”
साल बीतते गए। हौंसला दसवीं पास कर गया। अच्छे अंकों से। अब उसे आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना था। लेकिन पैसे नहीं थे।
गाँव के मुखिया ने मदद की। कुछ लोगों ने चंदा दिया। हौंसला मंडी शहर चला गया। वहाँ एक छोटे से कमरे में रहता। कॉलेज जाता। साथ में ट्यूशन पढ़ाता। पेट भरने के लिए कभी-कभी होटल में बर्तन भी धोता।
शहर में लोग उसे गाँव का गंवार कहते। कपड़े फटे होते, जूते पुराने। लेकिन हौंसला चुपचाप अपना काम करता। लाइब्रेरी में बैठकर घंटों किताबें पढ़ता। खासकर विमानन से जुड़ी किताबें।
एक दिन कॉलेज में एयर फोर्स के बारे में जानकारी मिली। भर्ती परीक्षा की। हौंसला ने फॉर्म भरा। मेहनत और भी बढ़ गई। सुबह दौड़ता, शाम को पढ़ता, रात को सपने देखता।
परीक्षा का दिन आया। लिखित परीक्षा अच्छी हुई। फिर शारीरिक परीक्षा। फिर इंटरव्यू।
इंटरव्यू में अफसर ने पूछा, “तुम पहाड़ी गाँव से हो। उड़ना क्यों चाहते हो?”
हौंसला ने साफ आवाज में कहा, “सर, मैंने पक्षियों को उड़ते देखा है। मैंने महसूस किया है कि सीमाएँ सिर्फ दिमाग में होती हैं। अगर हिम्मत हो तो इंसान भी उड़ सकता है। मैं अपने गाँव के बच्चों को दिखाना चाहता हूँ कि सपने पूरे होते हैं।”
अफसर चुप रहे। फिर मुस्कुराए।
कुछ महीनों बाद परिणाम आया। हौंसला चयनित हो गया। ट्रेनिंग के लिए भेजा गया।
ट्रेनिंग कठिन थी। शारीरिक कसरत, पढ़ाई, उड़ान का अभ्यास। पहली बार जब वह ट्रेनर एयरक्राफ्ट में बैठा, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पायलट ने कहा, “डरो मत। पंख तुम्हारे अंदर हैं।”
जब विमान ने रनवे छोड़कर आसमान छुआ, हौंसला की आँखों में आँसू आ गए। नीचे गाँव, पहाड़, नदी—सब छोटे लग रहे थे। वह फुसफुसाया, “पापा, माँ… मैं उड़ रहा हूँ।”
ट्रेनिंग पूरी हुई। हौंसला फाइटर पायलट बन गया।
पहली सोलो उड़ान के दिन पूरा परिवार शहर आया था। माँ की आँखों में गर्व था, पिता के चेहरे पर मुस्कान। छोटा भाई अरुण हाथ हिला-हिलाकर चिल्ला रहा था।
जब हौंसला का विमान आसमान में गया और उसने सलामी दी, तो ऐसा लगा जैसे पूरा गाँव उड़ रहा हो।
बाद में हौंसला ने अपने गाँव में एक छोटा स्कूल खोला। गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाया। वह अक्सर आता और कहता, “देखो बच्चों, मैंने उड़ना सीख लिया। तुम भी सीख सकते हो। डर को छोड़ो, मेहनत करो, सपने देखो।”
एक दिन एक छोटी लड़की ने पूछा, “सर, उड़ना सीखने में सबसे जरूरी क्या है?”
हौंसला ने मुस्कुराते हुए कहा, “हिम्मत। और यह विश्वास कि तुम्हारे अंदर पंख हैं। बस उन्हें फैलाना है।”
सालों बाद जब हौंसला रिटायर हुआ, तो उसने एक किताब लिखी—“हम ने उड़ना सीख लिया”। किताब में उसने अपनी पूरी यात्रा लिखी। कैसे एक गाँव का लड़का आसमान छू पाया।
किताब के आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“उड़ना सिर्फ पंखों से नहीं होता।
उड़ना हिम्मत से होता है।
उड़ना सपनों से होता है।
उड़ना उस विश्वास से होता है जो कहता है—मैं कर सकता हूँ।
जब तुम डर को पीछे छोड़ देते हो,
जब तुम मेहनत को अपना हथियार बना लेते हो,
जब तुम हार को सबक समझ लेते हो,
तब तुम उड़ना सीख जाते हो।
हम सब उड़ सकते हैं।
बस पंख फैलाने की जरूरत है।
आज मैं आसमान में नहीं, दिलों में उड़ता हूँ।
क्योंकि सच्ची उड़ान वही है जो दूसरों को भी उड़ने के लिए प्रेरित करे।”
गाँव के लोग आज भी कहते हैं—हौंसला ने सिर्फ खुद नहीं उड़ाया, उसने पूरे गाँव को उड़ना सिखा दिया।
और जब शाम होती है, पहाड़ों पर सूरज डूबता है, तो बच्चे छत पर बैठकर आसमान देखते हैं और फुसफुसाते हैं—“एक दिन हम भी उड़ेंगे… हम ने उड़ना सीख लिया।”
(शब्द संख्या लगभग 2000)
यह कहानी उन सभी के लिए है जो सपने देखते हैं, लेकिन डर के कारण रुक जाते हैं। याद रखो—पंख तुम्हारे अंदर हैं। बस उड़ना शुरू करो।