Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 74

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 74

अधूरी किताब
एपिसोड 74— हवेली में इंतज़ार करती माँ
हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में खड़ी वह औरत लगातार अनन्या को देख रही थी।
उसकी कलाई पर बना निशान दूर से भी साफ दिखाई दे रहा था।
वही निशान...
जो अनन्या की कलाई पर बचपन से था।
अनन्या की आँखें उसी पर टिक गईं।
“माँ...”
उसके मुँह से अपने आप निकला।
लेकिन उसके सामने खड़ी औरत मुस्कुरा दी।
वह मुस्कान माँ जैसी थी।
बिल्कुल वैसी ही...
जैसी अनन्या को अपनी बचपन की यादों में दिखाई देती थी।
नैना ने अनन्या का हाथ पकड़ लिया।
“दीदी, रुको।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“वो मेरी माँ हैं।”
“लेकिन अगर वो तुम्हारी माँ हैं तो यहाँ कैसे?”
अनन्या के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
उसके सामने हवेली खड़ी थी।
वही हवेली...
जिसे उसने सिर्फ अपनी यादों में देखा था।
लेकिन आज वह सच में उसके सामने थी।
हवेली के आसपास कोई घर नहीं था।
न कोई इंसान।
न कोई आवाज।
बस चारों तरफ घना जंगल और पेड़ों के बीच से आती ठंडी हवा।
अर्णव ने धीरे से कहा—
“हमें अंदर जाने से पहले सोचना चाहिए।”
अनन्या ने पूछा—
“किस बारे में?”
“हो सकता है ये भी कहानीकार का जाल हो।”
कबीर ने सिर हिलाया।
“है।”
सब उसकी तरफ देखने लगे।
“तुम्हें यकीन है?”
“हाँ।”
कबीर ने हवेली की तरफ देखा।
“लेकिन जाल होने का मतलब ये नहीं कि अंदर कोई सच नहीं है।”
अर्णव ने पूछा—
“और अगर अंदर कहानीकार हुआ?”
कबीर ने कहा—
“तो इस बार उसे भागने नहीं देंगे।”
अनन्या ने आगे कदम बढ़ाया।
“मैं अंदर जाऊँगी।”
नैना भी उसके साथ चल पड़ी।
“मैं भी।”
अर्णव ने कहा—
“तो हम चारों साथ जाएँगे।”
कबीर ने कुछ नहीं कहा।
बस अपनी चाँदी जैसी चमकती हथेली को कसकर बंद कर लिया।
हवेली का मुख्य दरवाजा अपने आप खुल गया।
कrrrr...
जंग लगा दरवाजा धीरे-धीरे पीछे सरक गया।
अंदर घुप अँधेरा था।
लेकिन अजीब बात यह थी कि हवेली के अंदर कदम रखते ही अनन्या को डर नहीं लगा।
उसे ऐसा लगा जैसे वह पहले भी यहाँ आ चुकी है।
बहुत बार।
उसने दीवार को छुआ।
उँगलियों के नीचे पुराने निशान महसूस हुए।
उसने धूल साफ की।
दीवार पर तीन छोटे हाथों के निशान बने थे।
एक अनन्या का।
एक नैना का।
और एक तीसरा...
जिसे देखकर अनन्या का दिल जोर से धड़क उठा।
“आर्या।”
नैना ने धीरे से पूछा—
“तुम्हें कैसे पता?”
अनन्या ने हाथ के निशान पर अपनी हथेली रख दी।
“क्योंकि यह मेरा हाथ नहीं है।”
“ये बहुत छोटा है।”
“और मुझे याद है...”
वह रुक गई।
उसके सामने अचानक एक पुराना दृश्य उभरा।
तीन छोटी बच्चियाँ इसी दीवार के सामने खड़ी थीं।
आर्या ने अपने हाथ पर स्याही लगाई और दीवार पर छाप दिया।
फिर अनन्या और नैना ने भी वैसा ही किया।
आर्या ने कहा था—
“अब चाहे जो हो जाए, हम तीनों एक साथ रहेंगे।”
छोटी नैना ने पूछा था—
“अगर कोई हमें अलग कर दे तो?”
आर्या हँसी थी।
“तो दीवार हमें याद रखेगी।”
दृश्य खत्म हो गया।
अनन्या ने आँखें खोल दीं।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“मैंने ये सब भुला दिया था।”
कबीर ने कहा—
“तुमने नहीं भुलाया।”
“तुमसे भुलवाया गया।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“किसने?”
कबीर ने जवाब नहीं दिया।
तभी ऊपर से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।
धड़ाम!
नैना चौंक गई।
अर्णव ने तुरंत उसे अपने पीछे कर लिया।
“सब पीछे रहो।”
ऊपर की मंजिल से कदमों की आवाज आने लगी।
धीरे-धीरे।
एक...
दो...
तीन...
फिर सीढ़ियों पर किसी के उतरने की आवाज आई।
अनन्या ने साँस रोक ली।
सीढ़ियों के मोड़ पर एक परछाई दिखाई दी।
वह धीरे-धीरे नीचे आई।
और फिर सामने आ गई।
अनन्या की आँखें फैल गईं।
वह वही औरत थी जिसे उसने खिड़की में देखा था।
उसका चेहरा...
बिल्कुल उसकी माँ जैसा।
वही आँखें।
वही मुस्कान।
वही आवाज—
“अनन्या।”
अनन्या की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“माँ...”
वह उसकी तरफ बढ़ी।
लेकिन कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको।”
अनन्या ने झटके से हाथ छुड़ाया।
“वो मेरी माँ हैं!”
औरत ने मुस्कुराते हुए कहा—
“आने में बहुत देर कर दी।”
अनन्या उसके सामने जाकर रुक गई।
“आप... जिंदा हैं?”
औरत ने हाथ बढ़ाया।
“मुझे छुओ।”
अनन्या ने धीरे से उसकी हथेली पकड़ ली।
उसके शरीर में एक गर्म लहर दौड़ गई।
और अचानक...
एक याद उसके सामने खुल गई।
वह रात।
आग से घिरा घर।
माँ अनन्या को कमरे से बाहर निकाल रही थीं।
लेकिन इस बार दृश्य अलग था।
माँ अकेली नहीं थीं।
उनके सामने वही आदमी खड़ा था...
जिसे अनन्या ने अपने पिता समझा था।
और उसके पीछे एक काली आकृति थी।
माँ ने कहा था—
“मैं अपनी बेटी तुम्हें नहीं दूँगी।”
उस आदमी ने कहा—
“वह तुम्हारी बेटी नहीं है।”
माँ ने गुस्से में कहा—
“वह मेरी बच्ची है।”
काली आकृति आगे बढ़ी।
“वह आर्या है।”
माँ ने अनन्या को पीछे कर लिया।
“उसका नाम अब अनन्या है।”
“और तुम उसका नाम बदल नहीं सकते।”
आदमी हँसा।
“नाम बदलने से कहानी नहीं बदलती।”
फिर उसने कलम उठाई।
“आज इसका अंत लिख दिया जाएगा।”
माँ ने अपनी पूरी ताकत से उसके हाथ से कलम छीन ली।
और उसी समय...
आग भड़क उठी।
दृश्य अचानक टूट गया।
अनन्या ने हाथ छोड़ दिया।
वह हाँफने लगी।
“ये सच था...”
नैना उसके पास आई।
“क्या देखा?”
अनन्या ने काँपते हुए कहा—
“उस रात माँ कहानीकार से लड़ रही थीं।”
कबीर ने कहा—
“मैंने कहा था।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन एक बात समझ नहीं आई।”
“क्या?”
“अगर माँ उस रात मर गई थीं... तो आज यहाँ कैसे हैं?”
कबीर चुप हो गया।
उसकी नजर सामने खड़ी औरत पर थी।
फिर उसने कहा—
“क्योंकि वह उस रात मरी नहीं थीं।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“तो?”
कबीर ने धीरे से कहा—
“वह कहानी में कैद कर दी गई थीं।”
अर्णव के पिता अचानक आगे आए।
“यह संभव है।”
सबने उनकी तरफ देखा।
उन्होंने कहा—
“कहानीकार किसी इंसान को मारता नहीं था।”
“वह उसकी कहानी खत्म कर देता था।”
नैना ने पूछा—
“तो फिर माँ की कहानी?”
“अधूरी छोड़ दी।”
माँ जैसी दिखने वाली औरत की आँखों से आँसू निकल आए।
“क्योंकि उसने आखिरी पन्ना लिखने से पहले मुझे रोक दिया था।”
अनन्या उसके पास गई।
“तो आपको बाहर आने से किसने रोका?”
औरत ने कबीर की तरफ देखा।
“वही।”
कबीर के चेहरे पर दर्द उतर आया।
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“कबीर?”
वह चुप रहा।
औरत ने कहा—
“उसने मुझे कहानी से बाहर निकालने की कोशिश की थी।”
“लेकिन असफल रहा।”
कबीर ने धीमे से कहा—
“मैंने कोशिश की थी।”
“और तुमने मेरी यादें मिटा दीं।”
कबीर ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
अनन्या के अंदर गुस्सा भर गया।
“तुमने ऐसा क्यों किया?”
कबीर ने कहा—
“क्योंकि अगर तुम्हें याद रहता कि तुम्हारी माँ कहाँ है, तो तुम बचपन में ही यहाँ वापस आ जातीं।”
“और कहानीकार तुम्हें ढूँढ लेता।”
अनन्या ने पूछा—
“तो तुमने मुझे बचाने के लिए मेरी यादें छीन लीं?”
“हाँ।”
“और नैना?”
कबीर ने नैना की तरफ देखा।
“उसे इसलिए बचाया क्योंकि वह कहानी का सबसे कमजोर हिस्सा थी।”
नैना ने कहा—
“मैं कमजोर नहीं हूँ।”
कबीर मुस्कुराया।
“अब नहीं।”
अचानक हवेली के अंदर जोरदार कंपन हुआ।
दीवारों पर लिखे सारे नाम चमकने लगे।
अर्णव ने अपनी हथेली देखी।
काला निशान तेजी से फैल रहा था।
“कुछ हो रहा है।”
कबीर ने कहा—
“कहानीकार हवेली के अंदर आ चुका है।”
अनन्या ने पूछा—
“कहाँ?”
कबीर ने ऊपर देखा।
“सबसे ऊपर।”
“वहीं जहाँ पहली कहानी लिखी गई थी।”
अर्णव ने कहा—
“तो चलते हैं।”
वे सब सीढ़ियों की तरफ बढ़े।
लेकिन माँ ने अनन्या को रोक लिया।
“तुम अकेली जाओ।”
अनन्या ने चौंककर पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि कहानीकार सिर्फ तुम्हें बुला रहा है।”
नैना ने तुरंत कहा—
“नहीं।”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें नीचे रहना होगा।”
“क्यों?”
माँ ने कहा—
“क्योंकि अगर तुम ऊपर गईं तो वह तुम्हारी खाली जगह का इस्तेमाल करेगा।”
नैना चुप हो गई।
अर्णव ने कहा—
“मैं अनन्या के साथ जाऊँगा।”
कबीर ने भी कहा—
“मैं भी।”
माँ ने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
वे तीनों सीढ़ियों से ऊपर जाने लगे।
हर सीढ़ी पर एक नया दृश्य दिखाई दे रहा था।
पहली सीढ़ी—
अनन्या का बचपन।
दूसरी—
नैना का जन्म।
तीसरी—
अर्णव का बचपन।
चौथी—
कबीर का पहला दिन।
पाँचवीं—
वह रात जब आग लगी थी।
और छठी सीढ़ी पर...
एक दृश्य था जिसे देखकर अनन्या रुक गई।
उसमें उसकी माँ एक नवजात बच्ची को गोद में लिए थीं।
लेकिन बच्ची अनन्या नहीं थी।
वह नैना थी।
और उसके बगल में दूसरी नवजात बच्ची थी।
अनन्या।
दोनों रो रही थीं।
माँ दोनों को देख रही थीं।
तभी एक तीसरी बच्ची की आवाज आई—
“मुझे क्यों नहीं उठातीं?”
अनन्या ने देखा।
आर्या वहाँ खड़ी थी।
लेकिन वह नवजात नहीं थी।
वह पहले से पाँच साल की थी।
अनन्या ने हैरानी से पूछा—
“ये कैसे हो सकता है?”
कबीर ने कहा—
“क्योंकि आर्या पहले पैदा हुई थी।”
अर्णव ने पूछा—
“और अनन्या और नैना?”
“बाद में।”
अनन्या ने सिर पकड़ लिया।
“तो हम तीनों बहनें नहीं...”
कबीर ने कहा—
“नहीं।”
“हम तीनों एक ही कहानी की अलग-अलग रचनाएँ हैं।”
ऊपर से एक आवाज आई—
“आखिर तुम समझ ही गई।”
तीनों ने ऊपर देखा।
सीढ़ियों के आखिरी छोर पर वही काली आकृति खड़ी थी।
इस बार उसका चेहरा साफ था।
वह मुस्कुरा रहा था।
“मेरा स्वागत नहीं करोगी?”
अनन्या ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
वह धीरे-धीरे नीचे आया।
“जिसे तुमने इतने सालों तक पिता समझा।”
अनन्या की आँखों में गुस्सा भर गया।
“तुम मेरे पिता नहीं हो।”
वह हँसा।
“नहीं।”
“मैं तुम्हारा निर्माता हूँ।”
अर्णव उसके सामने आ गया।
“तुम्हें मुझसे क्या चाहिए?”
उस आदमी ने अर्णव की हथेली देखी।
“तुमसे?”
“कुछ नहीं।”
फिर उसकी नजर अनन्या पर गई।
“मुझे सिर्फ अपनी कहानी चाहिए।”
कबीर ने कहा—
“तुम्हारी कहानी खत्म हो चुकी है।”
वह आदमी मुस्कुराया।
“मेरी नहीं।”
“अब तुम्हारी शुरू होगी।”
उसने उँगली उठाई।
अचानक अर्णव जमीन पर गिर पड़ा।
उसकी हथेली से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।
कबीर उसे रोकने दौड़ा।
लेकिन आदमी ने सिर्फ एक शब्द कहा—
“लिखो।”
अर्णव की उँगलियाँ अपने आप हिलने लगीं।
हवा में एक अदृश्य कलम चलने लगी।
अनन्या चीख उठी—
“अर्णव!”
अर्णव ने खुद को रोकने की कोशिश की।
“मैं... नहीं...”
उसकी आँखों में आँसू थे।
“मेरे हाथ... मेरे नहीं हैं।”
हवा में एक वाक्य बनने लगा।
“अनन्या का अंत...”
अनन्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
कबीर चिल्लाया—
“अर्णव! कलम तोड़ दो!”
अर्णव ने पूरी ताकत से अपनी हथेली जमीन पर मारी।
सुनहरी रोशनी फट पड़ी।
अदृश्य लेखन रुक गया।
लेकिन उसी क्षण उस आदमी ने मुस्कुराकर कहा—
“बहुत अच्छा।”
“अब मुझे यकीन हो गया।”
अनन्या ने पूछा—
“किस बात का?”
उसने उसकी तरफ देखा।
“तुम दोनों साथ मिलकर ही अंतिम कहानी लिख सकते हो।”
फिर उसने हाथ उठाया।
और अचानक हवेली की पूरी छत खुल गई।
आसमान के बीच एक विशाल काली किताब दिखाई देने लगी।
उसके पन्ने हवा में पलट रहे थे।
एक पन्ना नीचे गिरा।
अनन्या ने उसे उठाया।
उस पर लिखा था—
“अंतिम अध्याय शुरू।”
नीचे सिर्फ दो नाम थे—
अनन्या + अर्णव
और सबसे नीचे...
“एक को कहानीकार बनना होगा।”
अनन्या ने अर्णव की तरफ देखा।
अर्णव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
अनन्या ने धीरे से कहा—
“और मैं तुम्हें कहानीकार नहीं बनने दूँगी।”
लेकिन तभी पीछे से नैना की चीख सुनाई दी—
“दीदी!”
तीनों ने नीचे देखा।
नैना के चारों तरफ काली स्याही फैल चुकी थी।
और उसके बीच खड़ी थी...
आर्या।
आर्या ने नैना के कान के पास जाकर कहा—
“अब तुम्हारी बारी है।”
क्रमशः...