Saarghaa - 4 in Hindi Love Stories by rakshita pal books and stories PDF | Saarghaa - 4

Featured Books
Categories
Share

Saarghaa - 4

Episode:-4  बातें जो दिल तक गईं


रात गहरी हो चुकी थी। बाहर बारिश अब तेज़ नहीं थी, बस धीरे-धीरे टपक रही थी। मिट्टी के घर की छत से पानी टपक कर कोने में रखी बाल्टी में गिर रहा था - टिप-टिप  अंदर चूल्हे में आग जल रही थी। उसकी लाल रोशनी में दोनों के चेहरे चमक रहे थे। अभ्यंकर और सारघा, दोनों ज़मीन पर बैठे थे, बीच में दो कुल्हड़ रखे थे, जिनसे हल्का-हल्का धुआँ उठ रहा था बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर अभ्यंकर ने ही चुप्पी तोड़ी। आज उसके अंदर कुछ था जो बाहर निकलना चाहता था।


"सारघा..."


"हाँ?"


"तुम्हें पता है मैं ज़्यादा बोलता नहीं हूँ। पुणे में सब कहते हैं, अभि तो एक-दो शब्द से ज़्यादा बोलता ही नहीं। ऑफिस में, दोस्तों में, हर जगह। पर आज... आज लग रहा है जैसे अगर अभी नहीं बोला तो कभी नहीं बोल पाऊँगा।"


सारघा ने उसकी तरफ देखा। पहली बार अभ्यंकर की आँखों में घबराहट नहीं, एक भरोसा था।


"तो बोल दो ना। आज रात बहुत लंबी है।"


अभ्यंकर ने दीवार से पीठ टिकाई। उसकी आवाज़ धीमी थी।


"मेरे बाप को जेल हुई थी सारघा। बहुत साल पहले। गाँव वालों ने कहा चोरी की है। पर मेरे बाप चोर नहीं थे। बस किस्मत खराब थी। उसके बाद से सब बदल गया। स्कूल में बच्चे कहते थे - इसके बाप चोर हैं, इससे दूर रहो। टीचर भी वही कहती थी।" मेरे पास सच्चाई सुनने वाले कोई नहीं था और मेरे दिल का हाल जानने वाला भी नहीं था 1-2 शब्द में ही बात खत्म कर देता था। धीरे-धीरे आदत हो गई। लोगों को लगा मैं घमंडी हूँ, पर मैं तो डरा हुआ था।"


सारघा चुप-चाप सुनती रही। उसने बीच में कुछ नहीं कहा। बस चूल्हे में एक लकड़ी और डाल दी, ताकि आग बुझे नहीं‌ "आज तक मैंने अपना दुख किसी को नहीं बताया। माँ को भी नहीं। माँ कहती थी - पुणे चला जा, वहाँ कोई नहीं जानता। मैं चला गया। पुणे में नौकरी है, घर है, पर कोई दोस्त नहीं जिसको ये सब बता सकूँ।"


तब सारघा बोली। और जैसे ही वो बोली, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास थी अभि, पता है बचपन में मैं कैसी थी? बहुत ज़िद्दी। बाबा जब खेत से आते थे, तो मैं उनकी उँगली पकड़ कर कहती थी - मुझे कंधे पर बिठाओ। बाबा थके होते थे, फिर भी बिठा लेते थे। कहते थे - सारघा तू तो मेरी चिड़िया है, उड़ जा।"


वो हल्का सा हँसी, उसकी चूड़ियाँ बजीं।


"एक बार मैं गुड़ की पूरी भेली चुरा कर खा गई थी। माँ ने देखा तो डाँटा नहीं, बोली - तू तो मीठी चोर निकली। और एक बार मेले में खो गई थी। बहुत रोई थी। माँ मिली तो बोली - खो जाना भी कभी-कभी अच्छा होता है, तभी पता चलता है कौन ढूँढने आता है।"


सारघा की हर बात, हर मीठा शब्द अभ्यंकर के कान से होते हुए, मीठे सुर बन कर सीधा उसके दिल तक पहुँच रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बचपन की लोरी गा रहा हो। पुणे के शोर में उसने ऐसी आवाज़ कभी नहीं सुनी थी‌ "तुम्हारी बातें..." अभ्यंकर ने कहा, "तुम्हारी बातें बहुत मीठी हैं सारघा। कान से होकर दिल तक जाती हैं।"


सारघा थोड़ा शर्मा गई। फिर उसने अपनी दो काली चूड़ियों को देखा "मीठी तो होनी ही है। मेरी माँ कहती थी - कड़वी से कड़वी बात भी मीठी तरह से बोलो, तो सामने वाले को चोट नहीं लगती। तुम्हारे दिल में तो पहले से ही चोट है ना, इसलिए मैं और मीठा बोल रही हूँ।"अभ्यंकर को लगा जैसे उसके अंदर का सारा दुख पिघल रहा हो।


"सारघा, मेरी भी एक अच्छी याद है। जब बाबा जेल नहीं गए थे, तब हम रात में खुले आसमान के नीचे सोते थे। बाबा कहानी सुनाते थे - राजा-रानी की नहीं, खेत-खलिहान की। कहते थे - अभि, पतंग को ढील देनी पड़ती है, तभी वो ऊपर जाती है। मैं समझता नहीं था। आज समझ रहा हूँ।"और एक याद है। जब मैं छोटा था, तो माँ मेरे लिए मिट्टी के खिलौने बनाती थी। मैं उन्हें तोड़ देता था। माँ फिर बनाती थी। कभी गुस्सा नहीं होती थी।"

सारघा ने कहा, "तो तुम तोड़ने वाले नहीं, बनाने वाले हो। देखो, आज तुम अपनी कहानी फिर से बना रहे हो  रात और गहरी हो गई थी। बारिश की आवाज़ तेज़ हो गई थी। पर घर के अंदर, दोनों के बीच की सारी खामोशी खत्म हो गई थी।


अभ्यंकर जो 1-2 शब्द में बात खत्म कर देता था, आज घंटों बोल रहा था। अपने बचपन की अच्छी यादें, पूरी यादें, अपने बाप की, अपने दुख की। ऐसे जैसे उसके अंदर का एक बंद दरवाज़ा खुल गया हो। जैसे आज अगर नहीं बोला तो कभी नहीं बोल पाएगा और सारघा... सारघा अपनी बचपन की बहुत सारी मीठी बातें बता रही थी। गुड़ की चोरी, मेले में खोना, बाबा के कंधे पर बैठना। हर बात में मिठास, हर बात में अपनापन।

अभ्यंकर ने आखिरी बार कहा, "सारघा, आज अगर मैंने ये सब नहीं बोला होता, तो शायद कभी नहीं बोल पाता।"


सारघा ने दो गरम कुल्हड़ फिर से भरे।


"तो मत बोलो अभी। चाय पियो। और सुनो, तुम्हारी ये सारी बातें मैंने यहीं रख ली हैं, इस चूल्हे के पास। जब भी याद आएगी, इसी आग में गरम कर लूँगी।"


दोनों ने कुल्हड़ टकराए। चूल्हे की आग में उनके चेहरे चमक रहे थे।



Next chapter ke liye follow kare?