🌹समय 🌹
बहुत कुछ सहारा होगा लेखक ने, तभी वो समय को जान सका शायद यही एक कारण होगा। एक मुस्कुराहट के पीछे कितने दुख होंगे... कोई नहीं जान सकता... खुशी किसे कहते हो... लूट जाने के बाद ---शायद हर कोई हार को ही जीत समझ रहा होगा। मै दूर हुँ काफ़ी, शहर से दूर... वहा सिर्फ ऐटिटूडही है बंदे की कोई नेकी नहीं देखि जाती... याद रखो जो इनसे दूर है उसको कया कहते होगे... सिर्फ बहुत कुछ सहारा होगा लेखक ने, तभी वो समय को जान सका शायद यही एक कारण होगा। एक मुस्कुराहट के पीछे कितने दुख होंगे... कोई नहीं जान सकता... खुशी किसे कहते हो... लूट जाने के बाद ---शायद हर कोई हार को ही जीत समझ रहा होगा। मै दूर हुँ काफ़ी, शहर से दूर... वहा सिर्फ ऐटिटूडही है बंदे की कोई नेकी नहीं देखि जाती... याद रखो जो इनसे दूर है उसको कया कहते होगे... सिर्फ विच्छे हुए काटे जो चुभ जाये तो बहुत दर्द देता है... इस झझलाहट को तुम कोई नाम नहीं दे सकते। देने का अर्थ जानते हो दुख बे अंत दुख। कया सोचते हो जज्बाती हो तो कोई मित्र मत रखू... नहीं रखता जाओ। एक कमरे मे बैठा लाला करोड़ी मल वेयाज लेने के लिये तीस सीढिया चढ़ कर बलराज के घर आया था... वो गांव मे बैठा बलराज हाथ पसीने की रोटी खाता था दो किले खेत के हल से झोत कर आया था। 🌹 हुए काटे जो चुभ जाये तो बहुत दर्द देता है... इस झझलाहट को तुम कोई नाम नहीं दे सकते। देने का अर्थ जानते हो दुख बे अंत दुख। कया सोचते हो जज्बाती हो तो कोई मित्र मत रखू... नहीं रखता जाओ। बलराज ने करोड़ी मल को देख कर माथे पे सलवटे डाल ली थी " करोड़ी मल जी आप... बिना बताये यहां... " "यहां से जा रहा था एक नयी आयी लक्ष्मी तेरी बच्ची को आशीर्वाद देता जाऊ ---" करोड़ी मल ने माथे का पसीना पुझते कहा। तुमने मुझे शादी पे तो नहीं बुलाया... जानता हुँ, अगर तुम्हारे बापू की डेथ नहीं होई होती तो बात ही और होनी थी... " बलराज थोड़ा गम मे मुस्करा पड़ा... "दो साल की बात करोड़ी जी अभी भी नहीं भूले --""--करोड़ी जी आप कब तक ये ताना मुझे देते रहेंगे... हमें अब बताही दो -----" करोड़ी को ये बात पर शर्मिंदा होना पड़ा। गंगा घाट पर अंदर से एक लम्बी पथरो से बनी सड़क एक तरफ शिव जी महाराज का मंदिर की घंटिया थी दूसरी तरफ गंगा की शांत लहरे थी... साथ दूसरी तरफ मंदिर के साथ ही खाली खेत मे सोना भूया हुआ था.. बलराज ने.. तगड़ी मेहनत से। वो जानता था यही मेरी रोजी रोटी है साल की... ट्रेक्टर की किश्त दे कर करोड़ी मल को हसते हुए उसने विदा किया। फिर उसने आपनी पत्नी वदना को कहा ---" वदना आज की तारीख कलेडर पर डाल देना.. " रुक कर बोला बलराज " मै ठहरा अनपढ़ ग्वार.. तुम तो बीए पास हो। " दोनों एक दूसरे के सामने थे। वदना का चेहरा गोल और गर्दन मोरनी सी थी... जवानी उस पर ऐसे जैसे चाद करवाचौथ का नहा कर आया था। बच्ची का नाम करण हो गया था वो किया था मामा ने वदना के नाम राजकुमारी रखा गया छोटा नाम सुरभि था। एक बाजु पर बलराज सर रख के थोड़ा सो रहा था... पर वदना ने सिर नीचे तकिया रख दिया था दुपहर के सवा एक हो गए थे। वदना रसोई घर मे दाल बनाने चली गयी थी... आग पाथी को लगा कर लकड़ चूले मे देने लगी तो बलराज उसके पास आकर बैठ गया कब ? ये वोह जान न पायी। एक दम हैरत मे बोली " जी आप ---" बलराज मुस्करा पड़ा। " भागवान कया बना रही हो... " उसने शर्माते हुए कहा " जी आप मूग की दाल खुशी से खाते है " वो इतना सुनते 'हस ' पड़ा। फिर बोला " बहुत ख्याल रखती हो --आपने ग्वार पती का " फिर वो गुस्से मे बोली ---" ग्वार आपको कौन कहता है... मेरे को आगे से ऐसा नहीं कहना, आप प्यार करने वाले मेरे को, फिर ऐसा बोल कर मेरा मूड खराब कयो करते हो.... "अच्छा बाबा, मुझे माफ कर दो... " नहीं किया जाओ जो मर्जी कर लो.... " बलराज को मुस्कराते देख " अच्छा जो मर्जी कर लू। " उसने दो सडोल बाहो मे उसे वैसे ही उठा लिया ----उसके हाथ मे चमटा था.. वो साथ ही आ गया और उसने जोर से फेका.... फिर हसने लगे।कब सब सिमट गया जैसे खुशी के पल ठहर गए, चिड़िया रखे बाहर बर्तन से पानी पी कर उड़ गयी। -------***-----------