Anuragini ka rashmya vachan - 1 in Hindi Horror Stories by Demon Lord books and stories PDF | अनुरागिनी का रहस्यमय वचन - 1

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अनुरागिनी का रहस्यमय वचन - 1

अनुरागिनी का रहस्यमय वचन 

अध्याय 1: पीपल का चबूतरा, हुक्के की गुड़गुड़ और वहम की रात

उस रात मोनू सिर्फ अपनी माँ की आवाज़ सुनना चाहता था।

उसे नहीं पता था कि उस एक आवाज़ की तलाश उसे ऐसी चीज़ के सामने खड़ा कर देगी, जो शायद बहुत पहले से उसी पर नज़र रखे हुए थी।

चैत का महीना बीतने को था। शाम ढलते ही गाँव की पगडंडियों पर एक अजीब-सी सिहरन रेंगने लगती थी।

गाँव के बीचों-बीच पुराने शिव मंदिर के बाहर पीपल का विशाल पेड़ था। उसके नीचे बने चबूतरे पर रोज़ की तरह अलाव जल रहा था। बूढ़े-बुजुर्ग अपनी मैली धोतियों को घुटनों तक समेटे, सुलगती लकड़ियों के इर्द-गिर्द बैठे थे।

हुक्के की गुड़-गुड़ की भारी आवाज़ के साथ तंबाकू के धुएँ के छल्ले हवा में तैर रहे थे। हर कश के साथ कोई न कोई पुराना किस्सा फिर से जिंदा हो रहा था।

चौदह साल का मोनू अपनी फटी आस्तीन वाले कुर्ते में हाथ समेटे, चबूतरे की सबसे निचली सीढ़ी पर अँधेरे की ओट में चुपचाप बैठा था।

घर का खाली कच्चा कमरा उसे काटने दौड़ता था।

चार महीने पहले तक इसी वक्त माँ चूल्हे की आँच पर रोटियाँ सेंका करती थीं।

जब कभी रात को बिजली चली जाती और मोनू डरकर लालटेन के पास सिमटता, तो माँ उसका माथा अपनी सूती साड़ी के पल्लू से पोंछकर कहती थीं—

डर मत लल्ला... जब तक तेरी महतारी जिंदा है, कोई बला तेरी परछाईं भी नहीं छू सकती।

लेकिन अब न वो महतारी बची थी, न बापू।

एक ही हफ्ते के भीतर उस अनजान बीमारी ने दोनों को उससे छीन लिया था।

गाँव के श्मशान में जब दो चिताएँ अगल-बगल धधक रही थीं, तब आग की लपटों के सामने खड़े लोग पीछे हटकर फुसफुसा रहे थे—

माते के खानदान पर कोई पुराना साया था... ख़ून पीकर ही माना।

श्मशान से पैरों में चिता की राख लपेटे जब मोनू घर लौटा था, तो उसने कमरे के कोने में बने पूजा-घर का मैला लाल पर्दा झटके से खींच दिया था।

ताक पर रखा पीतल का दीया औंधा गिर गया था।

जिस चौखट पर माँ की साँसें नहीं बची थीं, वहाँ अब हाथ जोड़ने का कोई मतलब नहीं बचा था।

तभी चबूतरे पर बैठे लल्लन ने खैनी मलते हुए हँसकर कहा,

अरे काका, तुम तो हवा में तीर छोड़ रहे हो! भला मरे हुए लोग भी कभी किसी से बात करते हैं?

हुक्के की नली मुँह से निकालते हुए अस्सी साल के सुखराम बाबा ने खाँसकर अपनी बूढ़ी, पथराई आँखें लल्लन पर तरेरीं।

हवा में तीर हम नहीं, तुम्हारी अक्ल छोड़ रही है लल्लन!

बाबा ने हुक्के का एक और कश लिया।

आज से चालीस बरस पहले जब हमारे सगे ताऊ अचानक खेत में गिरकर मरे, तो उनकी बात अधूरी रह गई थी। हमारे बापू चैन से बैठ नहीं पाए। गाँव के बाहर जो सूखा नाला है, उसके पार वाले वीरान टीले पर तब एक कापालिक बाबा डेरा डाले हुए था।

अलाव की आग अचानक चट से चटकी।

पास बैठे दो छोटे बच्चे सहमकर अपनी माँ के आँचल में और दुबक गए।

लल्लन के चेहरे की हँसी धीरे-धीरे गायब हो गई।

फिर... फिर क्या हुआ था काका?

सुखराम बाबा ने धुएँ का घूँट छोड़ा और धीमी आवाज़ में बोले,

फिर क्या...

उन्होंने चारों तरफ देखा, जैसे यह सुनिश्चित कर रहे हों कि कोई अनजान कान उनकी बात नहीं सुन रहा।

उस कापालिक ने ताऊ की पहनी हुई पुरानी धोती का एक टुकड़ा लिया और नाले की रेत पर श्मशानी राख से एक चक्र बनाया। ताड़पत्र पर कोई पुराना मंत्र लिखा था। आधी रात को जब उसने वो मंत्र फूँका ना...

बाबा कुछ पल के लिए चुप हो गए।

तो बबूल के पेड़ ऐसे झुके जैसे कोई आँधी आ गई हो।

चबूतरे पर बैठे लोगों की निगाहें अब बाबा पर टिक चुकी थीं।

और उसी राख के चक्र के बीचों-बीच...

बाबा की आवाज़ और धीमी हो गई।

ताऊ की परछाईं आ खड़ी हुई थी।

लल्लन के चेहरे से रंग उतर गया।

साफ-साफ बोले थे वो। खलिहान के नीचे जो पीतल की गागर गड़ी है, उसे निकाल लो। हमारे बापू ने अपनी आँखों से देखा था... अपने कानों से बात की थी!

चौपाल पर ऐसा सन्नाटा छा गया कि अब सिर्फ अलाव की लकड़ियों के सुलगने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

बाबा...

अँधेरे कोने से एक काँपती हुई, लेकिन बेहद गंभीर आवाज़ आई।

सबने मुड़कर देखा।

चौदह साल का मोनू मैला कुर्ता पहने, कंधे पर नौवीं का बस्ता लटकाए, अलाव की पीली रोशनी में खड़ा था।

अरे, ये तो माते का लड़का है...

सुखराम बाबा का लहज़ा अचानक नरम पड़ गया।

काहे रे मोनू, इतनी रात को यहाँ क्या कर रहा है? घर नहीं जाना?

मोनू ने बस्ते के फीते को इतनी जोर से भींचा कि उसकी उँगलियों के पोर सफेद पड़ गए।

बाबा...

वो सूखा नाला... और वो कापालिक...

क्या वो अब भी वहीं रहता है?

सुखराम बाबा का माथा ठनका।

उन्होंने हुक्का जमीन पर पटका।

खबरदार जो उस तरफ पैर भी बढ़ाया!

बाबा की आवाज़ पहले से ज्यादा सख्त थी।

वो तांत्रिक तो कब का मर-खप गया, पर वो जगह आज भी ठीक नहीं है। पुराने मंदिर के पीछे जहाँ बबूल का घना जंगल शुरू होता है, वहाँ की हवा भी भारी रहती है।

उन्होंने मोनू की आँखों में देखते हुए कहा,

चल। चुपचाप घर जा और अपनी पढ़ाई कर। ये मरे हुओं की बातें तेरे काम की नहीं हैं।

मोनू ने कोई बहस नहीं की।

उसने चुपचाप सिर झुकाया और गाँव की उस वीरान पगडंडी पर चल पड़ा, जो उसके अकेले घर की तरफ जाती थी।

लेकिन उसके सीने के भीतर एक ज़िद सुलग चुकी थी।

अगर सुखराम बाबा के बापू अपने भाई से बात कर सकते हैं...

तो मैं अपनी माँ से क्यों नहीं पूछ सकता कि मुझे ऐसे अकेला क्यों छोड़ गईं?

एक बार...

सिर्फ एक बार उनकी आवाज़ सुन लूँ।

उस रात मोनू घर पर नहीं रुका।

गाँव जब गहरी नींद में डूब गया, तब चौदह साल का वह लड़का हाथ में तीन सेल वाली पुरानी लोहे की टॉर्च लिए बबूल की कंटीली झाड़ियों को चीरता हुआ गाँव की सरहद के पार निकल गया।

सामने वही सूखा नाला था।

सफेद, मरी हुई रेत का फैलाव।

और नाले के पार...

काले पत्थरों का वह वीरान, मनहूस टीला।

हवा इतनी ठंडी थी कि मोनू के होंठ नीले पड़ने लगे थे।

टीले पर चढ़ते ही चारों तरफ ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो हवा ने भी दम साध लिया हो।

अचानक...

पत्थरों के पीछे से किसी सूखी लकड़ी के टूटने की चटाक आवाज़ आई।

मोनू की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

उसने झटके से टॉर्च घुमाई।

पीछे सिर्फ कंटीली झाड़ियाँ थीं।

कोई नहीं था।

उसने आगे कदम बढ़ाया ही था कि टॉर्च की पीली रोशनी दो बार झपझपाई।

टिक!

और बुझ गई।

घुप अँधेरा।

मोनू का दिल पसलियों पर हथौड़े की तरह बजने लगा।

उसने काँपते हाथों से टॉर्च को अपनी हथेली पर दो-तीन बार पटका।

रोशनी फिर से जली।

और सामने...

पत्थरों की एक ढही हुई कोठरी दिखाई दी।

ज़मीन पर टूटे घड़े और जानवरों की सफेद हड्डियाँ बिखरी थीं।

लेकिन हैरान करने वाली बात कुछ और थी।

कोठरी के मलबे पर बरसों की धूल और मकड़ी के जाले जमे थे, लेकिन काले पत्थरों के बीच एक संकरी दरार ऐसी थी जहाँ से धूल बिल्कुल साफ थी।

मानो किसी ने अभी कुछ ही देर पहले वहाँ से अपने हाथ हटाए हों।

मोनू कुछ पल उस दरार को देखता रहा।

फिर उसने हाथ भीतर डाल दिया।

दरार के अंदर एक मैले काले कपड़े में कुछ लिपटा हुआ था।

मोनू ने डर को परे धकेला और काँपते हाथों से उस कपड़े को बाहर खींच लिया।

कपड़े की गाँठ खुली।

भीतर से भोजपत्र का एक सूखा, पीला टुकड़ा निकला।

ताज्जुब की बात यह थी कि उस सीलन भरे खंडहर में भी वह भोजपत्र बिल्कुल सूखा और सुरक्षित था।

जैसे कोई उसे सदियों से बचाकर रखे हुए हो।

या...

जैसे कोई सदियों से सिर्फ उसके आने का इंतज़ार कर रहा हो।

भोजपत्र पर भस्म जैसी स्याही से एक चक्र बना था।

और नीचे टूटे-फूटे अक्षरों में लिखा था—

आवाहन...

प्रत्यक्ष दर्शन...

मोनू की साँस अटक गई।

उसने एक पल भी नहीं गँवाया।

भोजपत्र जेब में ठूँसा और उल्टे पाँव अपने कच्चे घर की तरफ दौड़ लगा दी।

उसे लगा कि वह उस सन्नाटे से बचकर अकेला भाग रहा है।

लेकिन वह गलत था।

टीले के ऊपर खड़े सूखे, कंकाली बरगद की एक नंगी डाल पर पत्तों की सरसराहट अचानक पूरी तरह थम चुकी थी।

अँधेरे के भीतर से दो अलौकिक, दहकती हुई सुनहरी आँखें उभरीं।

वे आँखें भागते हुए मोनू की पीठ को घूर रही थीं।

न गुस्सा...

न वहशीपन...

सिर्फ एक बहुत पुराना, गहरा दर्द।

कमरे में पहुँचकर मोनू ने किवाड़ की भारी लकड़ी की सांकल चढ़ा दी।

उसकी छाती धौंकनी की तरह फूल-पिचक रही थी।

लालटेन की पीली रोशनी में उसने भोजपत्र मेज़ पर पटका।

हाथ पसीने से भीगे थे।

उसने चूल्हे की ठंडी, सफेद राख मुट्ठी में उठाई और फर्श पर ठीक वैसा ही गोल घेरा खींच दिया।

फिर काँपते होंठों से उसने आँखें बंद कीं और भोजपत्र पर लिखे उन टूटे-फूटे शब्दों को बुदबुदाना शुरू किया—

ॐ क्रीं... परलोकाय... पितृप्रत्यक्षं कुरु...

पहला जाप पूरा होते ही कमरे की कच्ची खिड़की का पट अचानक धड़ाम से दीवार से टकराया।

कमरे की सारी गरमाहट एक झटके में गायब हो गई।

ऐसा लगा मानो किसी ने हवा में बर्फ घोल दी हो।

मोनू के मुँह से सफेद भाप निकलने लगी।

बाहर बबूल के पेड़ पर दर्जनों चमगादड़ एक साथ फड़फड़ाए।

गाँव के आवारा कुत्तों ने एक सुर में रोने जैसी आवाज़ में भौंकना शुरू कर दिया।

मोनू का हलक सूख गया।

कमरे के चारों कोनों से एक भारी, घुरघुराती हुई साँस खिंचने लगी।

जैसे फर्श के नीचे से कोई भूखा, विकराल साया धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रहा हो।

मोनू पीछे हटना चाहता था।

लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।

तभी...

कमरे के उस बंद पूजा-घर के भीतर से, जहाँ माँ काली की सिंदूरी मूर्ति ढकी हुई थी...

एक अदृश्य, प्रचंड लाल कौंध उठी।

कोई धमाका नहीं हुआ।

बस एक पल के लिए पूरा कमरा लाल रोशनी से भर गया।

और अगले ही क्षण वह भयानक घुरघुराहट ऐसे कटकर बिखर गई, जैसे किसी ने हवा के भीतर ही उस काली ताकत का रास्ता रोक दिया हो।

मोनू के जिस्म पर एक खरोंच तक नहीं आई।

लेकिन ठीक उसी पल...

उस जमा देने वाली ठंड के बीच कमरे में ताज़ा मोगरे और कस्तूरी की एक बेहद मीठी, अजीब तरह से सुकून देने वाली खुशबू घुल गई।

कमरे की हवा अचानक कोमल हो गई।

अँधेरे कोने से एक बहुत मद्धम पायल की रुनझुन सुनाई दी।

मोनू ने साँस रोक ली।

फिर उसकी गर्दन के पीछे रेशम जैसी नर्म हवा का एक झोंका महसूस हुआ।

कोई उसके बेहद पास था।

इतना पास कि वह उसकी मौजूदगी को देखे बिना भी महसूस कर सकता था।

और तभी उसके कान के पास एक बहुत धीमी, मीठी आवाज़ फुसफुसाई—

इतने नादान हो मोनू...

अभी संभलना सीखे भी नहीं...

मोनू के पूरे बदन में बिजली दौड़ गई।

वह बदहवास होकर पीछे पलटा।

कोई नहीं था।

सिर्फ हवा में तैरती मोगरे की वह महक थी...

जिसे इस पूरे इलाके में किसी के पास नहीं होना चाहिए था।

मोनू जमीन पर बैठ गया।

उसका माथा पसीने से तर था।

दिल सीने से बाहर आने को बेताब था।

उसने काँपते हाथों से भोजपत्र उठाया और उसे मेज़ की सबसे निचली दराज़ में, गणित की पुरानी कॉपियों के नीचे दबा दिया।

यह सिर्फ मेरा वहम है...

उसने हाँफते हुए खुद को समझाया।

दिन भर खेत में काम किया था... टीले पर गया तो डर बैठ गया। मुझे चक्कर आ रहे हैं...

मैं बस थक गया हूँ।

वह लड़खड़ाते कदमों से चारपाई पर गिरा और फटी रजाई सिर तक खींचकर आँखें बंद कर लीं।

कुछ देर बाद उसकी साँसें सामान्य होने लगीं।

उसे लगा...

वह उस वीरान कमरे में बिल्कुल अकेला है।

लेकिन वह अकेला नहीं था।

कमरे की छत की पुरानी शहतीर के घने अँधेरे में...

दो सुनहरी आँखें बिना पलक झपकाए उसे देख रही थीं।

पूरी रात।

लेखक की डायरी - अध्याय 1

मोनू जिसे सिर्फ अपना वहम समझ रहा है... क्या वह सचमुच केवल डर था?

उस बंद कमरे में मोनू की जान बचाने वाली वो लाल कौंध क्या थी?

और कान में फुसफुसाने वाली वो मोगरे की खुशबू...

किसकी थी?

अगर मोनू ने सिर्फ एक पुराना भोजपत्र उठाया था, तो फिर कोई पहले से उसका इंतज़ार क्यों कर रहा था?

अगले अध्याय में इस रहस्य का पहला निशान सामने आएगा।

अगर आपको लगता है कि मोनू ने बहुत बड़ी गलती कर दी है, तो अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।

और कहानी को लाइब्रेरी में जोड़ना मत भूलिए।


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