रात के ठीक ग्यारह बज चुके थे।
उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों को चीरती हुई बिहार की ओर बढ़ रही इस सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेन का बी-3 कोच (थर्ड एसी) अब लगभग पूरी तरह शांत हो चुका था। दिनभर की भागदौड़, चाय-पानी के शोर और सामान रखने की आपाधापी के बाद अब पूरे डिब्बे में केवल पहियों की पटरियों से टकराने वाली छुक-छुक की लयबद्ध आवाज़ और एयर कंडीशनर की एक धीमी, लगातार भिनभिनाहट ही गूंज रही थी।
छत पर लगी नीले रंग की हल्की नाइट-लाइट जल रही थी। यह फीकी नीली रोशनी डिब्बे के अंदर की परछाइयों को और गहरा कर रही थी, जिससे माहौल में एक अजीब सी उदासी और खामोशी घुल गई थी। ज़्यादातर मुसाफिर रेलवे के दिए मोटे कंबलों में खुद को सिर से पैर तक लपेटकर गहरी नींद में डूब चुके थे। कहीं किसी बुजुर्ग के भारी खर्राटों की आवाज़ आ रही थी, तो कहीं किसी बच्चे के नींद में करवट बदलने की हल्की सी सरसराहट।
लोअर बर्थ नंबर 42 पर लेटा कबीर अपनी पीठ को बर्थ की दीवार से टिकाए बैठा था। कबीर पेशे से एक खोजी पत्रकार था। उसकी उम्र यही कोई अट्ठाईस-तीस साल रही होगी—आँखों पर लगा चश्मा, बिखरे हुए बाल और चेहरे पर हमेशा बनी रहने वाली एक गहरी सोच। वह पिछले कई महीनों से एक पुराने जमीनी घोटाले की पड़ताल में लगा था और उसी सिलसिले में कुछ पुराने सरकारी कागजात जुटाने पटना जा रहा था। रात के सफर उसे हमेशा से पसंद थे क्योंकि रात में दिमाग बिना किसी बाहरी दखल के सोच सकता था। उसने अपनी गोद में रखी डायरी बंद की और खिड़की के शीशे से बाहर देखने लगा।
बाहर सिर्फ स्याह, गहरा अंधेरा था। जब ट्रेन किसी छोटे गाँव के पास से गुजरती, तो दूर खेतों में जलता हुआ कोई अकेला पीला बल्ब दिखाई देता और पलक झपकते ही पीछे छूट जाता। बाकी सब कुछ एक अंतहीन काले पर्दे जैसा था।
कबीर ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी—11:35 हो रहे थे। उसने पानी की बोतल उठाई, दो घूंट पानी पिया और सोने के इरादे से कंबल सीधा करने लगा।
तभी, बिना किसी पूर्व चेतावनी के, ट्रेन को एक जबरदस्त झटका लगा।
पहियों से लोहे के घिसने और पटरियों पर ब्रेक रगड़ने की एक दिल दहला देने वाली तीखी चीख गूंज उठी। झटके की तीव्रता इतनी तेज थी कि ऊपर की बर्थ पर सो रहे एक यात्री का तकिया नीचे आ गिरा। कोच के हुक पर लटके बैग जोर-जोर से झूलने लगे। सोए हुए कुछ लोग हड़बड़ाकर उठ बैठे। किसी ने नींद में ही पूछा, "अरे, क्या हुआ? वैक्यूम हुआ क्या?"
ट्रेन की रफ्तार बहुत तेजी से गिरने लगी। 60... 40... 20... और फिर एक भारी, अंतिम सिसकारी के साथ ट्रेन पूरी तरह से रुक गई। इंजन की घरघराहट भी बंद हो गई। कोच के अंदर एसी का पंखा अचानक धीमा पड़ते-पड़ते थम गया। एसी के बंद होते ही डिब्बे में ऐसा सन्नाटा पसर गया जैसे अचानक किसी ने आवाज़ का स्विच ही काट दिया हो।
"क्या हुआ भैया? कौन सा स्टेशन आ गया?" सामने वाली अपर बर्थ से एक नौजवान ने सिर बाहर निकाल कर पूछा।
"पता नहीं," कबीर ने कहा। "शायद आउटर पर सिग्नल न मिला हो।"
कबीर ने अपना मोबाइल निकाला। उसने स्क्रीन ऑन की। ऊपर जहाँ नेटवर्क बार होने चाहिए थे, वहाँ लाल रंग का क्रॉस बना था—'नो सर्विस'। बैटरी 72 प्रतिशत थी, लेकिन मोबाइल में एक भी सिग्नल नहीं था। घड़ी में समय था—11:45 PM।
कबीर ने खिड़की के शीशे पर अपनी हथेली रखी। बाहर की ठंडक की वजह से कांच पर भाप की एक मोटी परत जम चुकी थी। उसने अपनी आस्तीन से उस भाप को पोंछा और बाहर झांकने की कोशिश की।
जो कुछ उसने देखा, उसने उसकी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन दौड़ा दी।
ट्रेन किसी खुले खेत या जंगल के बीच नहीं खड़ी थी। ट्रेन एक प्लेटफार्म के किनारे खड़ी थी।
लेकिन वह कोई सामान्य रेलवे स्टेशन नहीं था। दूर-दूर तक कोई दूधिया हैलोजन लाइट नहीं थी, न कोई डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड था और न ही कोई लाउडस्पीकर। प्लेटफार्म का फर्श टूटा-फूटा था, जहाँ-तहाँ दरारें थीं और दरारों के बीच से जंगली झाड़ियाँ और घास बाहर निकली हुई थीं। पूरे प्लेटफार्म पर एक भारी, मटमैला पीला कोहरा तैर रहा था, मानो ज़मीन से ही धुआं उठ रहा हो।
प्लेटफार्म के बिल्कुल बीच में लोहे का एक पुराना, जंग लगा खंभा गड़ा था। उस खंभे पर एक तार के सहारे पुराना कांच वाला बल्ब लटक रहा था, जिसकी पीली रोशनी बार-बार झिलमिला रही थी। उस बल्ब के नीचे, लोहे की एक पुरानी प्लेट टंगी थी, जिस पर काले रंग से मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था:
कालाघाट जंक्शन
कबीर की आँखें उस बोर्ड पर टिक गईं। वह पिछले सात सालों से उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच लगातार ट्रेन से सफर कर रहा था। इस रूट का एक-एक छोटा-बड़ा स्टेशन, हाल्ट और केबिन उसकी उंगलियों पर रटे हुए थे। मुगलसराय (पंडित दीनदयाल उपाध्याय) और बक्सर के बीच ऐसा कोई स्टेशन कभी था ही नहीं।
कबीर ने तुरंत अपनी जेब से अपना कन्फर्म ई-टिकट निकाला। उसने टिकट के नीचे दिए गए रूट चार्ट को ध्यान से देखा। दिलदारनगर, गहमर, चौसा... फिर बक्सर। 'कालाघाट' नाम का कोई स्टेशन उस लिस्ट में दूर-दूर तक दर्ज नहीं था।
"ये कौन सा स्टेशन है?" कबीर ने खुद से फुसफुसाते हुए कहा।
तभी, कोच के मुख्य ऑटोमैटिक स्लाइडिंग दरवाजे के खुलने की आवाज़ आई—हिस्स... खट।
दरवाजा अपने आप आधा खुला रह गया। बाहर से बर्फीली हवा का एक ऐसा झोंका कोच के भीतर दाखिल हुआ, जिसने डिब्बे के पूरे तापमान को पल भर में गिरा दिया। वह सिर्फ ठंड नहीं थी; उस हवा के साथ एक बेहद अजीब, बासी और सड़ी हुई गंध अंदर आई—जैसी बरसों पुरानी सीलन भरी किताबों, जली हुई लकड़ी और गीली कब्र की मिट्टी से आती है।
कबीर का शरीर अकड़ गया। उसने अपनी सीट से गर्दन बाहर निकालकर गलियारे (Aisle) की तरफ देखा।
नीली नाइट-लाइट की मद्धिम रोशनी में उसने देखा कि खुले दरवाजे के पास एक साया खड़ा था।
वह एक बेहद लंबा इंसान था। उसने घुटनों से नीचे तक लंबा, पुराना काला ओवरकोट पहन रखा था, जिसका कॉलर ऊपर उठा हुआ था। उसका सिर नीचे की ओर झुका था, जिससे उसका चेहरा पूरी तरह अंधेरे में छिपा था। उसके पैर नंगे थे। वह बिल्कुल शांत खड़ा था, बिना हिले-डुले।
फिर, उसने एक कदम आगे बढ़ाया।
उसके चलने से फर्श पर कोई आवाज़ नहीं हुई। लेकिन जब कबीर ने नीचे देखा, तो उसके रोंगटे खड़े हो गए—वह शख्स जहाँ-जहाँ कदम रख रहा था, कोच के फर्श पर काले, बदबूदार कीचड़ के गीले निशान छपते जा रहे थे, मानो वह सीधे किसी गहरे दलदल से चलकर आ रहा हो।
और उस शख्स के दाहिने हाथ में एक पुरानी, फटी हुई लाल चमड़े की डायरी दबी हुई थी।
कालाघाट का बुलावा
कोच के भीतर का सन्नाटा इतना गहरा था कि कबीर को अपनी ही छाती के भीतर धड़कते दिल की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।
वह काला साया धीरे-धीरे गलियारे में आगे बढ़ रहा था। हर कदम के साथ उस सड़ांध भरी ठंड की तीव्रता बढ़ती जा रही थी। कबीर के मुंह से सांस लेते वक्त सफेद भाप निकल रही थी—थर्ड एसी के डिब्बे का तापमान अचानक शून्य के करीब पहुँच चुका था।
सामने वाली लोअर बर्थ पर सो रहे 60 साल के रिटायर्ड फौजी बलवंत सिंह अचानक करवट बदलकर खांसने लगे। ठंड ने उनकी नींद तोड़ दी थी। उन्होंने अपनी आंखें मलते हुए कंबल थोड़ा नीचे किया और कांपती आवाज़ में बोले, "अरे भाई... एसी वाले को बोलो ज़रा... इतनी ठंड क्यों कर दी इसने? हाथ-पैर जम रहे हैं बिल्कुल।"
लेकिन जैसे ही बलवंत सिंह की नज़र गलियारे में खड़े उस लंबे साए पर पड़ी, उनकी आवाज़ उनके गले में ही अटक गई। एक पूर्व सैनिक होने के नाते उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ देखा था, लेकिन इस लम्हे में उनके चेहरे पर भी खौफ की लकीरें साफ उभर आईं।
कबीर ने अपनी हिम्मत जुटाई। पत्रकारिता के दिनों में उसने कई खतरनाक अपराधियों और दंगों का सामना किया था। उसने खुद को समझाया कि यह कोई विक्षिप्त भिखारी या कोई भटका हुआ मुसाफिर हो सकता है।
कबीर अपनी सीट से थोड़ा आगे झुका और भर्राई हुई आवाज़ में बोला, "सुनिए... कौन हैं आप? और यह ट्रेन कहाँ रुकी है? आगे ड्राइवर का केबिन किस तरफ है?"
वह साया रुक गया। ठीक कबीर की बर्थ के सामने।
उसने बहुत धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। जब उसकी गर्दन मुड़ी, तो हड्डियों के चटकने जैसी हल्की सी आवाज़ आई।
कबीर की सांसें सीने में ही थम गईं।
उस शख्स का चेहरा किसी लाश की तरह पीला और सूखा हुआ था, जैसे उसमें खून की एक बूंद भी न बची हो। गाल अंदर धंसे हुए थे और होंठ पूरी तरह नीले पड़ चुके थे। लेकिन सबसे खौफनाक थीं उसकी आँखें। उसकी आँखों में कोई पुतली नहीं थी—न काली, न भूरी। उसकी आँखें एकदम सफेद, खाली और पथराई हुई थीं, जैसे किसी अंधे कुएं का पानी।
उसने अपने सूखे, फटे हुए होंठ खोले। जब वह बोला, तो आवाज़ किसी एक इंसान की नहीं लग रही थी; ऐसा लगा मानो किसी गहरे, खाली हॉल में कई लोग एक साथ फुसफुसा रहे हों:
"यहाँ ट्रेनें आती नहीं हैं... लाई जाती हैं।"
कबीर की जुबान सूख गई। "क्या... क्या मतलब?"
उस साए ने अपने हाथ में पकड़ी वह पुरानी लाल डायरी आगे बढ़ाई। डायरी का कवर पुराना, फटा हुआ और कोनों से जला हुआ था। उस पर किसी तीखी चीज़ से कुरेद कर लिखा गया था: 1974 - कालाघाट।
उसने कबीर की आँखों में अपनी पुतली-विहीन आँखें गड़ाते हुए कहा, "घड़ी में वक्त देखो, मुसाफिर। ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट। पचास साल से यह घड़ी यहीं रुकी है। जो इस स्टेशन पर उतर गया, वह अपनी पहचान और मंजिल भूल गया... और जो इस ट्रेन के अंदर बैठा रहा, वह कभी सुबह की धूप नहीं देख पाएगा। फैसला तुम्हारे हाथ में है।"
इतना कहकर उस साए ने वह लाल डायरी कबीर की बर्थ पर फेंक दी। जैसे ही डायरी बर्थ की चादर पर गिरी, चादर के उस हिस्से पर बर्फ जैसी सफेद फफूंद सी जमने लगी।
कबीर पीछे की ओर हटा। बलवंत सिंह ने चिल्लाकर कहा, "कौन है बे तू? नौटंकी बंद कर! सीधे बता क्या चाहता है!"
बलवंत सिंह अपनी सीट से उठने ही वाले थे कि अचानक पूरे डिब्बे में बिजली का एक भयानक झटका लगा। नीली नाइट-लाइट्स पागलों की तरह झपकने लगीं—टिक... टिक... टिक... भड़ाम!
एक तेज धमाके के साथ कोच की सारी बत्तियां एक साथ फूट गईं। कांच के बारीक टुकड़े फर्श पर बिखर गए।
पूरा थर्ड एसी कोच घुप, अंधेरे के समंदर में डूब गया। ऐसा अंधेरा जिसमें इंसान को अपना ही हाथ दिखाई न दे।
अंधेरा होते ही डिब्बे में कोहराम मच गया। महिलाएं चीखने लगीं, बच्चे रोने लगे। "लाइट किसने बंद की?", "अरे टीटीई कहाँ है?", "टॉर्च जलाओ कोई!", "मेरा हाथ किसने पकड़ा है?"—चारों तरफ से बदहवास आवाज़ें गूंजने लगीं।
कबीर ने कांपते हाथों से अपनी जेब से फोन निकाला और उसकी फ्लैशलाइट जलाई।
सफेद एलईडी रोशनी की पतली किरण जैसे ही गलियारे पर पड़ी, कबीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह काला साया वहाँ नहीं था। वह गायब हो चुका था।
लेकिन फर्श पर बने कीचड़ के वे काले निशान अब भी मौजूद थे। और वे निशान दरवाजे की तरफ जाने के बजाय, कोच के अंदर अलग-अलग बर्थों की तरफ फैले हुए थे—मानो कोई अदृश्य चीज़ अब डिब्बे के अंदर हर मुसाफिर के ठीक सिरहाने खड़ी हो।
"कबीर बाबू! इधर देखो!" बलवंत सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा। उनकी आवाज़ में पहली बार असली डर महसूस हो रहा था।
कबीर ने अपने फोन की रोशनी खिड़की के शीशे पर डाली।
बाहर का नजारा देखकर कबीर के हाथ से फोन लगभग छूटने ही वाला था।
प्लेटफार्म पर लगा वह अकेला पीला बल्ब अब भी झिलमिला रहा था। लेकिन अब प्लेटफार्म खाली नहीं था।
उस घने, मटमैले कोहरे के बीच से अनगिनत इंसानी साए निकलकर ट्रेन की तरफ बढ़ रहे थे। किसी के बदन पर फटे-पुराने कपड़े थे, किसी का आधा चेहरा जला हुआ था, तो कोई अजीब तरह से लंगड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था। उन सभी के चेहरों पर वही सफेद, पुतली-विहीन आँखें थीं। वे दर्जनों साए बिल्कुल खामोशी से, बिना कोई आवाज़ किए, बी-3 कोच की बंद खिड़कियों और दरवाजों की तरफ खिंचे चले आ रहे थे।
तभी, प्लेटफार्म के पुराने लोहे के खंभे पर टंगा विशाल पीतल का घंटा अपने आप हिलने लगा।
हवा में कोई नहीं था, रस्सी बंधी नहीं थी, फिर भी वह भारी हथौड़ा उस घंटे से टकराया।
पूरे वीराने को चीरती हुई एक गूंज उठी:
टॉन्ग...
पहली घंटी बज चुकी थी।
कबीर ने खिड़की से नज़र हटाकर अपनी बर्थ पर देखा। वहाँ रखी वह लाल डायरी अपने आप धीरे-धीरे खुल रही थी। हवा के किसी झोंके के बिना, उसके पन्ने एक-एक करके पलट रहे थे, और पहले पन्ने पर खून जैसी लाल स्याही से ताज़ा शब्द उभरने लगे थे:
"स्वागत है कालाघाट जंक्शन पर। इस ट्रेन का कोई भी मुसाफिर अब इस दुनिया का हिस्सा नहीं है।"
कबीर ने घबराकर बाहर देखा—उन सायों के ठंडे, सफेद हाथ अब ट्रेन की खिड़कियों के शीशों पर बाहर से चिपकने लगे थे। शीशे के पार से दर्जनों सफेद आँखें सीधे कबीर को घूर रही थीं।
रात के 11:46 हो चुके थे। और कालाघाट स्टेशन का खेल अब शुरू हो चुका था।