एआई और लोन ऐप्स की नई ब्लैकमेलिंग से सावधान करती गाथा
कच्छ की शाम हमेशा से शांत होती है, लेकिन कबीर के दिल में आज एक अलग ही हलचल थी। कबीर, जो दिन-रात अपनी मेहनत से एक छोटा सा लॉजिस्टिक्स का बिजनेस खड़ा करने में जुटा था, स्वभाव से बेहद सीधा और ईमानदार इंसान था। उसकी जिंदगी में तकनीक सिर्फ काम के लिए थी, भावनाओं के लिए नहीं। लेकिन दो महीने पहले इंस्टाग्राम पर मिली 'आस्था' ने उसकी इस सूनी जिंदगी में जैसे रंग भर दिए थे।
आस्था की प्रोफाइल बेहद सलीकेदार थी—सादगी से भरी तस्वीरें, समाज सेवा के पोस्ट और एक सफल बिजनेस कंसलटेंट का टैग। बातचीत शुरू हुई तो कबीर को लगा कि आस्था उसे दुनिया में सबसे बेहतर समझती है। वह कबीर के संघर्षों को सुनती, उसके माता-पिता की सेहत का हाल पूछती और हर मुश्किल वक्त में उसका हौसला बढ़ाती। कबीर को लगने लगा था कि उसे जीवनसाथी मिल गया है।
एक शाम, जब कबीर अपने बिजनेस के घाटे को लेकर परेशान था, आस्था ने बेहद सहानुभूति के साथ कहा:
"कबीर, तुम इतनी मेहनत करते हो, फिर भी ट्रेडिशनल बिजनेस तुम्हें वो रिटर्न नहीं दे रहा। मैं एक नए डीसेंट्रलाइज्ड क्रिप्टो माइनिंग प्लेटफॉर्म में इन्वेस्ट करती हूँ। 2026 में स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए इसमें कोई रिस्क नहीं है। मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी सारी परेशानियां खत्म हो जाएं। तुम बस मेरे कहने पर ₹50,000 से शुरुआत करो।"
प्यार और भरोसे में डूबे कबीर ने बिना सोचे समझे आस्था के भेजे लिंक पर क्लिक किया। ऐप का इंटरफेस बिल्कुल असली लग रहा था। कबीर ने पैसे डाले और अगले ही दिन उसके डैशबोर्ड पर ₹5,000 का प्रॉफिट दिखने लगा। उसने आस्था के कहने पर क्रेडिबिलिटी देखकर ₹2 लाख और लगा दिए। कबीर खुश था कि उसका भविष्य सुरक्षित हो रहा है।
तीन दिन बाद, जब कबीर को अपने बिजनेस के लिए पैसों की सख्त जरूरत पड़ी, उसने ऐप से विड्रॉल (पैसे निकालने) की कोशिश की। स्क्रीन पर एक एरर आया—"अकाउंट फ्रीज्ड। कृपया 20% सिक्योरिटी टैक्स जमा करें।"
कबीर के पैर के नीचे से जमीन खिसक गई। उसने तुरंत आस्था को कॉल किया, लेकिन नंबर स्विच ऑफ था। टेलीग्राम, इंस्टाग्राम, हर जगह से उसकी प्रोफाइल गायब हो चुकी थी। कबीर समझ गया कि जिस 'आस्था' को वह अपनी जिंदगी मान बैठा था, वह सिर्फ एक एआई-जनरेटेड चेहरा और एक शातिर धोखेबाज थी, जिसने उसकी मेहनत की कमाई पर डाका डाल दिया था। कबीर अकेले कमरे में बैठकर रो पड़ा, उसे पैसों से ज्यादा अपनी टूटी हुई उम्मीदों का दर्द था। क्रिप्टो स्कैम के सदमे से कबीर अभी पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था। आस्था के धोखे ने उसे आर्थिक रूप से तो तोड़ा ही था, मानसिक रूप से भी वह अंदर से खोखला हो चुका था। वह दिन-रात बस यही सोचता कि आखिर कोई किसी के भरोसे का ऐसा कत्ल कैसे कर सकता है। लेकिन 2026 की इस डिजिटल दुनिया में अपराधियों के पास कबीर के जख्मों पर मरहम लगाने का वक्त नहीं था, वे उसके दूसरे घाव की तैयारी कर चुके थे।
बुधवार की सुबह, कबीर अपने दफ्तर में बैठकर अकाउंट्स देख रहा था कि तभी उसके फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आई। दूसरी तरफ से एक गंभीर, रोबोटिक और आधिकारिक आवाज गूंजी:
"क्या मैं कबीर सोधा से बात कर रहा हूँ? मैं फेडेक्स कूरियर हेड ऑफिस मुंबई से बोल रहा हूँ। आपके नाम का एक पार्सल, जो मुंबई से ताइवान जा रहा था, उसे सीमा शुल्क विभाग (कस्टम) ने जब्त कर लिया है। उसमें 5 अवैध पासपोर्ट, 20 ग्राम एमडीएमए (ड्रग्स) और एक लैपटॉप मिला है।"
कबीर के हाथ से पेन छूट गया। उसने घबराकर कहा, "सर, मैंने तो ऐसा कोई पार्सल नहीं भेजा। मैं गांधीधाम में रहता हूँ, मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं है।"
सामने वाले ने कड़क आवाज में कहा, "आपका आधार कार्ड इस पार्सल से लिंक है। यह एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। मैं आपकी कॉल तुरंत सीबीआई (CBI) साइबर सेल को ट्रांसफर कर रहा हूँ। लाइन पर रहिए।"
कबीर को संभलने का मौका ही नहीं मिला। फोन तुरंत स्काइप वीडियो कॉल पर शिफ्ट हो गया। स्क्रीन चालू होते ही कबीर के होश उड़ गए। सामने एक पुलिस स्टेशन जैसा सेटअप था। वहां भारतीय पुलिस की वर्दी पहने एक सख्त चेहरे वाली महिला अधिकारी बैठी थी, जिसके पीछे सरकारी बोर्ड और फाइलें दिख रही थीं। उस महिला ने कबीर का नाम, आधार नंबर और पता जोर से पढ़ा, जो बिल्कुल सही थे।
महिला अधिकारी (जो असल में एक शातिर जालसाज थी) ने डांटते हुए कहा:
"कबीर, तुम पर मनी लॉन्ड्रिंग और ड्रग स्मगलिंग का केस दर्ज हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, तुम अभी इसी वक्त से 'डिजिटल अरेस्ट' हो। तुम यह फोन काट नहीं सकते, किसी को मैसेज नहीं कर सकते और इस कमरे से बाहर नहीं जा सकते। अगर तुमने कैमरे के सामने से हटने की कोशिश की, तो लोकल पुलिस 10 मिनट में तुम्हें गिरफ्तार कर लेगी।"
कमरे में सन्नाटा था। कबीर का गला सूख चुका था, उसकी छाती में डर का एक ऐसा तूफान उठा कि उसे सांस लेना भारी हो गया। उसे अपने बूढ़े माता-पिता का चेहरा याद आया—अगर पुलिस घर आई तो समाज में उनकी क्या इज्जत रह जाएगी? बदनामी के इसी डर ने कबीर की सोचने-समझने की शक्ति छीन ली।
अगले तीन घंटों तक, उस महिला ने कबीर को मानसिक रूप से बुरी तरह प्रताड़ित किया। उसने कबीर से कहा कि अगर वह निर्दोष है, तो उसे अपनी 'वित्तीय शुद्धता' साबित करनी होगी। इसके लिए उसे अपने बैंक अकाउंट का सारा बैलेंस (जो करीब ₹1,50,000 था) आरबीआई के एक 'सेफ वेरिफिकेशन अकाउंट' में ट्रांसफर करना होगा। जांच पूरी होते ही पैसे आधे घंटे में वापस आ जाएंगे।
डर और घबराहट के चरम पर पहुंचे कबीर ने बिना सोचे-समझे अपनी बची-कुची पूंजी उस बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दी। जैसे ही ट्रांजैक्शन 'सक्सेसफुल' हुआ, स्काइप कॉल अचानक कट गई। कबीर ने दोबारा कॉल करने की कोशिश की, लेकिन वह अकाउंट डिलीट हो चुका था।
कबीर कमरे के फर्श पर बैठ गया। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। कानून की रक्षा करने वालों के नाम पर, कानून के ही डर का इस्तेमाल करके, उसे एक बार फिर सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया गया था।
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पिछले दो धोखों ने कबीर को अंदर से एक जिंदा लाश बना दिया था। वह अब हर अनजान कॉल को काटने लगा था और सोशल मीडिया से उसने पूरी तरह दूरी बना ली थी। लेकिन कबीर यह नहीं जानता था कि अपराधी उसकी खामोशी का भी फायदा उठा सकते हैं। 2026 की तकनीक ने स्कैमर्स को यह ताकत दे दी थी कि वे बिना कबीर से बात किए, सिर्फ उसके करीबियों के सोशल मीडिया वीडियो से उनकी आवाज चुरा सकते थे।
शनिवार की दोपहर, कबीर अपने दफ्तर में बैठा था। तभी उसके फोन पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आई। कबीर ने पहले तो उसे नजरअंदाज किया, लेकिन जब वही नंबर लगातार तीन बार बजा, तो किसी अनहोनी के डर से उसने फोन उठा लिया।
जैसे ही उसने फोन कान से लगाया, दूसरी तरफ से चीखने और रोने की आवाज आई। वह आवाज कबीर के छोटे भाई 'रोहन' की थी, जो अहमदाबाद में रहकर कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था।
रोहन की कांपती और रोती हुई आवाज गूंजी:
"भैया... बचा लो भैया! मेरा बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया है। मुझसे एक गाड़ी टकरा गई है... सामने वाले को बहुत गंभीर चोट आई है और उसके घर वाले मुझे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। पुलिस भी मुझे लॉकअप में डाल रही है... भैया, मुझे बहुत डर लग रहा है, ये लोग मुझे मार डालेंगे!"
कबीर के दिल की धड़कन जैसे रुक गई। वह रोहन की आवाज को दुनिया के किसी भी कोने में पहचान सकता था—वही लहजा, वही घबराहट और वही 'भैया' कहने का अंदाज। कबीर की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। उसने घबराकर पूछा, "रोहन! शांत हो जा छोटे, तू कहाँ है? मुझे जगह बता, मैं अभी आता हूँ!"
तभी फोन दूसरी तरफ से किसी भारी और कड़क आवाज वाले व्यक्ति ने ले लिया, जिसने खुद को लोकल पुलिस का सिपाही बताया:
"देखो कबीर, तुम्हारे भाई ने एक रईस आदमी के बेटे को टक्कर मारी है। अगर कोर्ट-कचहरी का मामला बना तो इसका करियर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। सामने वाली पार्टी ₹2,00,000 में मामला रफा-दफा करने को तैयार है। अगर अपने भाई का भविष्य बचाना चाहते हो, तो तुरंत इस नंबर पर ₹1,00,000 एडवांस ट्रांसफर करो, वरना हम इसे सीधे जेल भेज रहे हैं। तुम्हारे पास सिर्फ 15 मिनट हैं।"
बैकग्राउंड में रोहन के रोने और "भैया, प्लीज बचा लो" की आवाजें लगातार आ रही थीं। कबीर का दिमाग सुन्न हो चुका था। पिछला सारा कड़वा अनुभव इस सगे भाई के खून के रिश्ते और उसकी जान के डर के आगे फीका पड़ गया। एक भाई के लिए उसका छोटा भाई उसकी जान था। कबीर ने बिना एक पल गंवाए, अपने बिजनेस के इमरजेंसी फंड से ₹1,00,000 उस दिए गए यूपीआई नंबर पर ट्रांसफर कर दिए।
पैसे ट्रांसफर होते ही फोन कट गया। कबीर ने हांफते हुए तुरंत उसी नंबर पर वापस कॉल की, लेकिन वह नंबर अमान्य बताने लगा।
घबराहट में कबीर ने रोहन के असली नंबर पर फोन लगाया। तीन घंटियां गईं और रोहन ने बेहद शांत आवाज में फोन उठाया, "हाँ भैया, बोलिए। क्या हुआ? मैं तो कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठा हूँ।"
कबीर के हाथ से फोन छूटकर टेबल पर गिर गया। उसके कानों में अभी भी रोहन की वही रोती हुई आवाज गूंज रही थी। वह अपनी जगह पर बैठ गया और अपना सिर पकड़ लिया। एआई ने आज तकनीक की सारी सीमाएं लांघकर एक भाई के दिल की सबसे नाजुक भावना का शिकार किया था। रोहन की वह आवाज पूरी तरह से नकली थी, जिसे इंटरनेट पर मौजूद उसके एक पुराने कॉलेज वीडियो से सिर्फ 3 सेकंड का ऑडियो सैंपल लेकर एआई टूल द्वारा तैयार किया गया था।आज के दौर में स्कैमर्स सोशल मीडिया (रिल्स, यूट्यूब वीडियो) से आपके करीबियों की आवाज चुराकर एआई टूल्स के जरिए हूबहू नकली ऑडियो जनरेट कर लेते हैं, जो रोने, चीखने या डरने का बिल्कुल असली अहसास कराता है।
बचाव: जब भी ऐसी कोई 'इमरजेंसी' कॉल आए, तो घबराने के बजाय सबसे पहले कॉल काटें और अपने उस रिश्तेदार के मूल नंबर पर सीधे फोन करके सच्चाई का पता लगाएं। अपने परिवार के बीच एक 'सीक्रेट कोड वर्ड' तय करके रखें, जिससे मुसीबत के समय असली और नकली की पहचान हो सके।
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पिछले तीन हादसों ने कबीर को मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था। वह अब हर पल एक अनजाने खौफ में जीता था। कबीर का दफ्तर जाना भी अब सिर्फ एक मजबूरी बन चुका था, उसका मन कहीं नहीं लगता था। उसने अपने घर में माता-पिता को सख्त हिदायत दे रखी थी कि वे किसी भी अजनबी पर भरोसा न करें। लेकिन कबीर यह भूल गया था कि स्कैमर्स केवल फोन के जरिए नहीं, बल्कि उसके नाम का मुखौटा पहनकर सीधे उसके घर के दरवाजे तक दस्तक दे सकते हैं।
गुरुवार की दोपहर, कबीर दफ्तर में एक जरूरी मीटिंग में व्यस्त था। इसी दौरान गांधीधाम में उसके घर के बाहर एक नामी कूरियर कंपनी की टी-शर्ट पहने एक युवक मोटरसाइकिल पर आया। उसने कबीर के घर की घंटी बजाई। कबीर के बूढ़े पिता ने दरवाजा खोला।
बाहर खड़े युवक के हाथ में एक चमचमाता हुआ, अच्छे से पैक किया गया बॉक्स था। उस युवक ने बहुत ही पेशेवर और विनम्र लहजे में पूछा:
"नमस्ते अंकल, क्या यह कबीर सोधा जी का घर है? सर का एक इम्पोर्टेड गैजेट का पार्सल आया है, जिसे उन्होंने 'कैश ऑन डिलीवरी' (COD) पर बुक किया था। इसकी कुल रकम ₹4,999 है।"
कबीर के पिता ने चश्मा ठीक करते हुए पार्सल को देखा। डिब्बे के ऊपर कबीर का नाम, उसका बिल्कुल सही मोबाइल नंबर और घर का पता साफ-साफ प्रिंटेड था। पिता को लगा कि शायद कबीर ने अपने बिजनेस या घर के लिए कोई जरूरी चीज मंगवाई होगी। उन्होंने सोचा कि कबीर को फोन करके पूछ लें, लेकिन डिलीवरी बॉय ने कलाई घड़ी देखते हुए हड़बड़ी दिखाई:
"अंकल, मुझे आगे बहुत सारे पार्सल देने हैं। कबीर सर का नंबर अभी बिजी आ रहा है, मैंने ट्राई किया था। अगर आप पेमेंट नहीं करेंगे, तो यह पार्सल रिटर्न हो जाएगा और सर को इसकी बहुत अर्जेंट जरूरत थी।"
पिता को याद आया कि कबीर पिछले कुछ दिनों से वैसे ही बहुत परेशान चल रहा था। उन्होंने सोचा कि क्यों न पैसे देकर पार्सल रख लिया जाए, ताकि बेटे का काम न रुके। कबीर के पिता ने अपनी अलमारी से अपनी पेंशन के पैसों में से ₹5,000 निकाले और उस युवक को दे दिए। युवक ने ₹1 वापस किया, पार्सल थमाया और तुरंत मोटरसाइकिल स्टार्ट करके रफूचक्कर हो गया।
शाम को जब कबीर थका-हारा घर लौटा, तो उसके पिता ने मुस्कुराते हुए वह चमचमाता डिब्बा उसके सामने रख दिया और कहा, "कबीर, दोपहर को तुम्हारा यह कूरियर आया था। तुम मीटिंग में थे तो मैंने ₹4,999 देकर इसे रख लिया।"
पार्सल देखते ही कबीर के माथे पर पसीना आ गया। उसने हाल-फिलहाल में ऑनलाइन कोई भी चीज ऑर्डर नहीं की थी। एक गहरे डर के साथ कबीर ने कटर से उस डिब्बे की सील काटी। जैसे ही डिब्बा खुला, कबीर और उसके पिता के होश उड़ गए। उस कीमती दिखने वाले डिब्बे के अंदर कोई गैजेट नहीं था—बल्कि अखबार के रद्दी टुकड़े और एक साधारण सा मिट्टी का पत्थर रखा हुआ था।
कबीर के पिता अपनी जगह सन्न रह गए। उनकी आंखों में अपनी मेहनत की पेंशन के पैसे गंवाने का दुख और बेटे की मदद न कर पाने का पछतावा साफ दिख रहा था। कबीर ने अपने रोते हुए पिता को गले से लगा लिया। वह समझ गया था कि अपराधियों ने किसी डार्क वेब या लीक हुए डेटाबेस से उसका नाम, पता और फोन नंबर खरीदा था और इसी सटीक जानकारी का फायदा उठाकर उसके बूढ़े पिता के भोलेपन को ठग लिया था।स्कैमर्स लीक हुए ई-कॉमर्स डेटा का इस्तेमाल करके आपके नाम और पते के नकली पार्सल तैयार करते हैं। वे जानबूझकर ऐसे समय पर घर आते हैं जब कमाने वाला व्यक्ति बाहर हो, ताकि घर के बुजुर्ग या बच्चे बिना जांचे पैसे दे दें।
बचाव: घर के सदस्यों को सख्त निर्देश दें कि बिना आपकी पुष्टि के कोई भी कैश ऑन डिलीवरी पार्सल स्वीकार न करें। अगर कोई कूरियर आए, तो पहले सीधे उस व्यक्ति से फोन पर बात करें जिसने ऑर्डर किया है। डिलीवरी बॉय के कहने पर कभी भी जल्दबाजी में आकर भुगतान न करें।
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कूरियर स्कैम के बाद कबीर का पूरा परिवार सहमा हुआ था। कबीर ने तय कर लिया था कि अब वह घर की हर छोटी-बड़ी चीज पर खुद नजर रखेगा। मई का महीना था और कच्छ की गर्मी अपने चरम पर थी। दोपहर के समय सूरज आग उगल रहा था और बिना पंखे या एसी के घर में एक मिनट भी बैठना दूभर था। कबीर दफ्तर से घर लौटा ही था और अपने माता-पिता के साथ चाय पी रहा था।
तभी उसकी मां के फोन पर एक मैसेज आया। मैसेज देखते ही मां के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने घबराकर फोन कबीर के हाथ में थमा दिया। मैसेज में लिखा था:
"ALERT: प्रिय उपभोक्ता, आपके पिछले महीने का बिजली बिल अपडेट नहीं हुआ है। आज रात 9:30 बजे आपके घर की बिजली काट दी जाएगी। असुविधा से बचने के लिए तुरंत हमारे बिजली अधिकारी से इस नंबर पर संपर्क करें: 987X-XXXXXX।"
मां ने डरते हुए कहा, "कबीर, इस भयंकर गर्मी में अगर रात को बिजली कट गई, तो तुम्हारे पिताजी की तबीयत बिगड़ जाएगी। उन्हें सांस की तकलीफ है, वे बिना पंखे-कूलर के नहीं रह पाएंगे। जरा देखो तो, बिल तो हमने समय पर भरा था।"
कबीर ने तुरंत अपनी रसीदें चेक कीं। बिल सचमुच भरा जा चुका था। लेकिन मैसेज इतना आधिकारिक लग रहा था और रात को बिजली कटने का डर इतना बड़ा था कि कबीर ने बिना सोचे-समझे उसी दिए गए नंबर पर कॉल लगा दी।
दूसरी तरफ से एक बेहद प्रोफेशनल आवाज आई, "पश्चिम गुजरात विज कंपनी लिमिटेड कस्टमर केयर में आपका स्वागत है। बताइए मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?"
कबीर ने कहा, "सर, मेरा बिल तो भरा हुआ है, फिर भी बिजली काटने का मैसेज आया है।"
फर्जी अधिकारी ने बहुत ही सहानुभूति दिखाते हुए कहा:
"सर, घबराइए मत। दरअसल हमारे नए 2026 के डिजिटल सिस्टम अपडेट के कारण कुछ बिल पेंडिंग दिख रहे हैं। मैं इसे अभी सिस्टम में ऑनलाइन क्लियर कर देता हूँ। इसके लिए आपको अपने फोन में हमारे विभाग की सपोर्ट ऐप डाउनलोड करनी होगी, और केवल ₹10 का 'सिस्टम अपडेट शुल्क' देना होगा। आपकी बिजली नहीं कटेगी।"
उस व्यक्ति ने कबीर को व्हाट्सएप पर एक लिंक भेजा। कबीर ने जैसे ही उस लिंक पर क्लिक किया, एक ऐप डाउनलोड हो गई (जो वास्तव में एक स्क्रीन-शेयरिंग मालवेयर ऐप थी)। उस ऐप के इंस्टॉल होते ही कबीर के फोन की स्क्रीन का पूरा लाइव एक्सेस उस हैकर के पास चला गया।
अधिकारी ने कहा, "अब आप ऐप खोलकर अपना नेट बैंकिंग या यूपीआई पिन डालकर ₹10 का भुगतान कीजिए।"
कबीर ने जैसे ही अपना यूपीआई ऐप खोला और अपना सीक्रेट पिन दर्ज किया, हैकर ने कबीर के स्क्रीन पर उसके पिन को लाइव देख लिया। कबीर को लगा कि वह ₹10 ट्रांसफर कर रहा है, लेकिन अगले ही पल उसके फोन पर एक के बाद एक तीन मैसेज आए:
₹50,000 डेबिटेड...
₹30,000 डेबिटेड...
₹20,000 डेबिटेड...
कबीर के बैंक अकाउंट में जमा आखिरी ₹1,00,000 भी गायब हो चुके थे। कबीर ने चिल्लाते हुए कहा, "हेलो! हेलो! ये मेरे पैसे क्यों कट रहे हैं?" लेकिन फोन कट चुका था।
कबीर ने अपना सिर पकड़ लिया। कमरे में उसकी मां और बीमार पिता उसे बेबसी से देख रहे थे। घर की बिजली तो नहीं कटी, लेकिन कबीर की जिंदगी में एक बार फिर अंधेरा छा गया था। सिर्फ ₹10 के फेर में और बिजली कटने के डर में आकर उसने अपराधियों को अपने फोन की चाबी खुद सौंप दी थी।कोई भी बिजली बोर्ड, गैस कंपनी या सरकारी विभाग कभी भी किसी व्यक्तिगत नंबर से बिजली काटने की धमकी भरा मैसेज नहीं भेजता। ना ही वे कभी फोन पर कोई अनजान ऐप डाउनलोड करने को कहते हैं। जब आप किसी अज्ञात लिंक से ऐप डाउनलोड करते हैं, तो वह आपके फोन की स्क्रीन को हैकर्स को दिखा देती है। आपके पासवर्ड, ओटीपी और पिन सब कुछ उनके सामने आ जाते हैं।
लगातार पांच धोखों ने कबीर की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी थी। उसका लॉजिस्टिक्स का बिजनेस ठप होने की कगार पर था, बैंक अकाउंट खाली थे और माता-पिता के सामने आंखें मिलाने में उसे शर्मिंदगी महसूस होती थी। कबीर हर कीमत पर अपने खोए हुए पैसे वापस कमाना चाहता था ताकि वह अपने परिवार को एक सुरक्षित जिंदगी दे सके। उसकी इसी मजबूरी और मानसिक लाचारी को अपराधियों ने ताड़ लिया था।
शनिवार की सुबह, जब कबीर उदास बैठा इंटरनेट पर 'वर्क फ्रॉम होम' के मौके ढूंढ रहा था, उसके व्हाट्सएप पर 'नेहा' नाम की एक लड़की का मैसेज आया। उसने लिखा था:
"नमस्ते कबीर जी, मैं 'ग्लोबल डिजिटल मीडिया' कंपनी से एचआर नेहा बात कर रही हूँ। हमारे पास एक बहुत ही आसान पार्ट-टाइम काम है। आपको बस रोज़ाना कुछ यूट्यूब वीडियोज को लाइक करना है और उनके स्क्रीनशॉट हमें भेजने हैं। आप घर बैठे अपने फोन से रोज़ाना ₹3,000 से ₹5,000 कमा सकते हैं। क्या आप रुचि रखते हैं?"
कबीर ने पहले तो सोचा कि यह भी कोई धोखा होगा, लेकिन फिर उसने सोचा कि सिर्फ वीडियो लाइक करने में उसका क्या नुकसान है? उसने लिख दिया—"हाँ, मुझे काम करना है।"
नेहा ने तुरंत उसे तीन यूट्यूब लिंक्स भेजे। कबीर ने उन वीडियोज को खोला, लाइक किया और स्क्रीनशॉट नेहा को व्हाट्सएप कर दिए। 10 मिनट के अंदर कबीर के फोन पर मैसेज आया: "₹150 क्रेडिटेड टू योर बैंक अकाउंट।"
कबीर की आंखों में चमक आ गई। पैसे सचमुच उसके खाते में आ चुके थे। उसे लगा कि शायद यह कंपनी असली है और उसकी किस्मत अब बदलने वाली है। इसके बाद नेहा ने कहा, "बहुत अच्छे कबीर! अब आपको और बड़े टास्क मिलेंगे। इसके लिए आपको हमारे ऑफिशियल टेलीग्राम ग्रुप 'VIP अर्नर्स' से जुड़ना होगा।"
कबीर जैसे ही टेलीग्राम ग्रुप में शामिल हुआ, उसने देखा कि वहां करीब 500 लोग जुड़े थे जो लगातार अपने स्क्रीनशॉट्स भेज रहे थे कि कैसे उन्होंने ₹10,000 या ₹20,000 कमाए। (कबीर यह नहीं जानता था कि उस ग्रुप के 90% सदस्य नकली थे, जो स्कैमर्स के ही आदमी थे)।
अगले दिन, ग्रुप के एडमिन ने एक 'प्रीपेड टास्क' की घोषणा की। उसने कहा:
"यह एक मर्चेंट इन्वेस्टमेंट टास्क है। अगर आप ₹2,000 जमा करेंगे, तो आपको 15 मिनट में ₹2,800 वापस मिलेंगे। यह हमारी कंपनी की रेटिंग बढ़ाने के लिए जरूरी है।"
कबीर ने भरोसा करके ₹2,000 ट्रांसफर कर दिए। 15 मिनट बाद उसके खाते में सचमुच ₹2,800 आ गए। कबीर का भरोसा अब अंधविश्वास में बदल चुका था। उसे लगा कि वह अपने पुराने सारे घाटे यहाँ से पूरे कर लेगा।
अगले ही पल, एडमिन ने बड़ा टास्क दिया: "अब वीआईपी टास्क है। ₹10,000 जमा करने पर ₹15,000 मिलेंगे।" कबीर ने अपनी दुकान के गल्ले से निकालकर ₹10,000 भेज दिए। लेकिन इस बार पैसे वापस नहीं आए। एडमिन ने मैसेज किया: "सिस्टम एरर! इस पैसे को निकालने के लिए आपको ₹30,000 का 'रिकवरी टास्क' पूरा करना होगा, वरना आपके ₹10,000 भी डूब जाएंगे।"
कबीर घबरा गया। डूबे हुए पैसों को बचाने के चक्कर में उसने अपने एक दोस्त से उधार मांगकर ₹30,000 और भेज दिए। जैसे ही उसने पैसे भेजे, एडमिन ने एक और बहाना बनाया: "अंतिम चरण—₹50,000 का टैक्स जमा करें, तब आपका कुल ₹95,000 आपके खाते में ट्रांसफर होगा।"
कबीर का सिर घूमने लगा। उसने नेहा और एडमिन दोनों को मैसेज किए, रोया, अपनी लाचारी की भीख मांगी, लेकिन दूसरी तरफ से सिर्फ एक ही जवाब आ रहा था—"पैसे जमा करो, वरना पुराना पैसा भूल जाओ।" 5 मिनट बाद, कबीर को उस टेलीग्राम ग्रुप से ब्लॉक कर दिया गया और नेहा ने उसे व्हाट्सएप पर बैन कर दिया।
कबीर अपने दफ्तर की टेबल पर सर रखकर फफक-फफक कर रो पड़ा। सिर्फ कुछ सौ रुपये के लालच और अपनी मजबूरी के कारण, उसने अपनी इज्जत और दोस्तों का भरोसा भी दांव पर लगा दिया था। अपराधी शुरुआत में ₹100-₹500 देकर आपका भरोसा जीतते हैं। इसके बाद वे 'टास्क' के नाम पर पैसे जमा करवाना शुरू करते हैं। जब आप बड़ी रकम जमा कर देते हैं, तो वे आपको ब्लॉक करके गायब हो जाते हैं।
बचाव: कोई भी वैध कंपनी कभी भी आपको काम देने के बदले पैसे जमा करने को नहीं कहती। अगर कोई नौकरी की शुरुआत में ही पैसे मांगे, तो समझ जाएं कि वह 100% फ्रॉड है।
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लगातार छह धोखों ने कबीर के स्वाभिमान को मिट्टी में मिला दिया था। वह अपने ही शहर गांधीधाम में खुद को अकेला महसूस करने लगा था। बिजनेस बंद होने की कगार पर था और उसे लगने लगा था कि उसकी किस्मत ही खराब है। ऐसे अकेलेपन के दौर में इंसान अक्सर किसी ऐसे सहारे की तलाश करता है जो उसे यह अहसास दिला सके कि वह भी इस दुनिया में मायने रखता है। कबीर की इसी मानसिक अकेलेपन की कमजोरी को इस बार एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क ने निशाना बनाया।
इंस्टाग्राम पर कबीर को 'एलिसा' नाम की एक लड़की की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई, जिसकी प्रोफाइल के मुताबिक वह लंदन की एक फैशन डिजाइनर थी। एलिसा दिखने में बेहद खूबसूरत थी और उसकी लाइफस्टाइल बहुत रईस थी। कबीर ने जब उसकी रिक्वेस्ट स्वीकार की, तो एलिसा ने खुद मैसेज करके बातचीत शुरू की।
वह कबीर की सादगी की तारीफ करती, उसके संघर्षों के प्रति हमदर्दी जताती और उसे लंदन आने का न्योता देती। कबीर को लगा कि शायद किस्मत अब उस पर मेहरबान हो रही है। कोई इतनी अमीर और खूबसूरत लड़की उसकी दोस्त जो बन गई थी।
करीब तीन हफ्ते की बातचीत के बाद, एलिसा ने व्हाट्सएप पर कबीर को एक वीडियो भेजा। वीडियो में एक आलीशान मॉल दिख रहा था। एलिसा ने कहा:
"कबीर, तुम मेरे सबसे अच्छे भारतीय दोस्त हो। मैंने तुम्हारे लिए और तुम्हारे माता-पिता के लिए कुछ गिफ्ट्स खरीदे हैं। इसमें एक लेटेस्ट आईफोन, एक सोने की चेन, ब्रांडेड घड़ियाँ और तुम्हारी मदद के लिए कुछ ब्रिटिश पाउंड्स (विदेशी मुद्रा) हैं। मैंने इसे कूरियर से इंडिया भेज दिया है, दो दिन में तुम्हें मिल जाएगा।"
अगले ही दिन, एलिसा ने कबीर को एक कूरियर की रसीद और ट्रैकिंग नंबर व्हाट्सएप किया, जिस पर कबीर का नाम और पता बिल्कुल सही लिखा था। कबीर खुशी और झिझक के मिले-जुले अहसास में था कि उसने मना करने के बावजूद इतना महंगा तोहफा क्यों लिया।
दो दिन बाद, सुबह-सुबह कबीर को दिल्ली से एक अनजान नंबर से फोन आया। दूसरी तरफ एक महिला की आवाज थी, जो बेहद सख्त और अंग्रेजी मिश्रित हिंदी में बात कर रही थी:
"क्या मैं कबीर सोधा जी से बात कर रही हूँ? मैं दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट के कस्टम डिपार्टमेंट (सीमा शुल्क विभाग) से सीनियर ऑफिसर सरिता शर्मा बोल रही हूँ। लंदन से आपकी दोस्त एलिसा ने आपके नाम एक पार्सल भेजा है। स्कैनिंग में पता चला है कि इस पार्सल में ₹5 लाख के कीमती सामान के साथ भारी मात्रा में विदेशी करेंसी भी है।"
कबीर ने घबराकर कहा, "जी हाँ, मेरी दोस्त ने भेजा है।"
महिला अधिकारी ने कड़क आवाज में कहा:
"सुनिए कबीर जी, भारत के कानून के अनुसार आप बिना घोषणा के इस तरह विदेशी मुद्रा और इतने महंगे सामान कूरियर से नहीं मंगा सकते। यह 'एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग' और स्मगलिंग के तहत एक गंभीर अपराध है। अगर आप जेल जाने और कानूनी कार्रवाई से बचना चाहते हैं, तो आपको इस पार्सल की सरकारी 'कस्टम ड्यूटी' और 'पेनल्टी फीस' के रूप में ₹35,000 अभी इसी वक्त जमा करने होंगे। पैसे मिलते ही हम पार्सल को दिल्ली से आपके पते पर रिलीज कर देंगे।"
कबीर के होश उड़ गए। जेल और पुलिस का नाम सुनते ही उसके पुराने जख्म हरे हो गए। उसने तुरंत एलिसा को व्हाट्सएप पर मैसेज किया। एलिसा ने रोने का नाटक करते हुए कहा, "ओह गॉड कबीर! मेरे पाउंड्स की वजह से तुम मुसीबत में आ गए। प्लीज, तुम वो फीस पे कर दो, पार्सल मिलते ही तुम उन पाउंड्स को कैश कराकर अपने पैसे वापस ले लेना। प्लीज मेरी इज्जत का सवाल है!"
कबीर ने एलिसा की बात पर और कानून के डर से, अपनी दुकान का आखिरी स्टॉक औने-पौने दामों में बेचकर ₹35,000 का इंतजाम किया और उस महिला अधिकारी के दिए गए बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए।
पैसे भेजने के एक घंटे बाद, उसी कथित कस्टम अधिकारी का फिर से फोन आया: "कबीर जी, आपके पार्सल की कीमत ज्यादा है, इसलिए अब आरबीआई (RBI) के क्लीयरेंस सर्टिफिकेट के लिए ₹50,000 और लगेंगे।"
कबीर को अब जाकर झटका लगा। उसने समझ लिया कि वह एक बार फिर बहुत बड़े जाल में फंस चुका है। उसने गुस्से में कहा कि उसे पार्सल नहीं चाहिए, उसके पैसे वापस किए जाएं। दूसरी तरफ से फोन काट दिया गया। जब कबीर ने एलिसा की प्रोफाइल चेक की, तो उसने कबीर को हर जगह से ब्लॉक कर दिया था। वह कूरियर रसीद, वह एलिसा और वह कस्टम अधिकारी—सब कुछ एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा थे।
कबीर अपने खाली दफ्तर की दीवार से सटकर बैठ गया। उसने सिर्फ पैसों की ठगी नहीं झेली थी, बल्कि उसकी सादगी और दोस्ती की भावना का एक बार फिर क्रूरता से मजाक उड़ाया गया था। विदेशी दोस्त बनकर महंगे तोहफे या विदेशी मुद्रा भेजने का नाटक करना एक बहुत पुराना और शातिर फ्रॉड है। अपराधी खुद ही कस्टम अधिकारी बनकर फोन करते हैं और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पैसे ऐंठते हैं। भारत का कोई भी कस्टम विभाग या सरकारी एजेंसी कभी भी किसी नागरिक को व्यक्तिगत बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। कूरियर कंपनियों या कस्टम की सभी फीस आधिकारिक सरकारी चालान के जरिए ही भरी जाती है। किसी भी सोशल मीडिया के अनजान दोस्त के महंगे गिफ्ट्स के दावों पर भरोसा न करें।
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एक के बाद एक सात करारे थप्पड़ खाने के बाद कबीर का आत्मविश्वास पूरी तरह जमींदोज हो चुका था। दुकान का किराया बाकी था, लेनदारों के फोन आ रहे थे और घर का खर्च चलाना भारी हो रहा था। इस बेहद कड़े आर्थिक संकट से निकलने के लिए कबीर ने अपने घर की पुरानी चीजों को बेचने का फैसला किया। उसने अपने दादाजी की अलमारी से उनके जमाने के कुछ पुराने चांदी के सिक्के, एक पुराना पीतल का दीया और घर का एक पुराना लकड़ी का सोफा निकाला।
कबीर ने इन सभी चीजों की तस्वीरें लीं और उन्हें ओएलएक्स तथा फेसबुक मार्केटप्लेस पर बिक्री के लिए पोस्ट कर दिया। उसने सोफे की कीमत ₹8,000 और उन ऐतिहासिक सिक्कों की कीमत ₹15,000 रखी। कबीर को उम्मीद थी कि इन ₹23,000 से वह दुकान का इस महीने का किराया चुका देगा।
पोस्ट डालने के महज आधे घंटे के भीतर कबीर के फोन पर एक कॉल आई। दूसरी तरफ से एक बहुत ही अनुशासित, कड़क और संस्कारी आवाज गूंजी:
"जय हिंद कबीर जी! मैं सूबेदार विक्रम सिंह बात कर रहा हूँ, अभी भुज मिलिट्री कैंप में तैनात हूँ। मैंने ओएलएक्स पर आपका सोफा और वो पुराने सिक्के देखे। मुझे वो दोनों चीजें अपने सरकारी क्वार्टर के लिए बहुत पसंद आई हैं। मैं इनके लिए आपको पूरी कीमत यानी ₹23,000 देने को तैयार हूँ। कोई मोल-भाव नहीं।"
कबीर के दिल को बहुत तसल्ली हुई। एक तो उसकी चीजें तुरंत बिक रही थीं, और ऊपर से खरीदने वाला देश का एक फौजी जवान था। कबीर ने कहा, "जय हिंद सर! आप कब आकर सामान ले जाएंगे?"
नकली फौजी (जो असल में एक बेहद शातिर ठग था) ने कहा:
"कबीर जी, मेरी अभी ड्यूटी चल रही है, इसलिए मैं खुद तो नहीं आ सकता। मैं शाम को मिलिट्री का ट्रक भेजकर सामान उठवा लूँगा। लेकिन आर्मी के नियमों के मुताबिक, मुझे अकाउंट्स क्लोज करने के लिए पेमेंट अभी ऑनलाइन करनी होगी। मैं आपको हमारे 'मिलिट्री मर्चेंट वॉलेट' से पैसे भेज रहा हूँ।"
कबीर ने कहा, "ठीक है सर, आप मेरा यूपीआई नंबर ले लीजिए।"
कुछ ही सेकंड में कबीर के व्हाट्सएप पर उस व्यक्ति ने एक क्यूआर कोड भेजा। उस कोड के ऊपर भारतीय सेना का लोगो छपा हुआ था, जिससे वह बिल्कुल असली लग रहा था। विक्रम सिंह ने फोन पर कहा:
"कबीर जी, सुरक्षा कारणों से मिलिट्री के खाते से डायरेक्ट ट्रांसफर नहीं होता। मैंने इस क्यूआर कोड में ₹23,000 डिजिटल रूप से लोड कर दिए हैं। आप बस अपने गूगल पे या फोनपे ऐप से इस कोड को स्कैन कीजिए, अपना यूपीआई पिन डालिए और यह पूरी रकम तुरंत आपके बैंक खाते में जमा हो जाएगी।"
कबीर पिछले धोखों की वजह से थोड़ा हिचकिचाया। उसने पूछा, "सर, पिन तो पैसे भेजने के लिए डाला जाता है ना?"
विक्रम सिंह ने तुरंत थोड़े गुस्से और कड़क लहजे में कहा:
"कबीर जी, आप एक फौजी की नीयत पर शक कर रहे हैं? यह सामान्य अकाउंट नहीं है, यह गवर्नमेंट का 'आर्मी गेटवे' है। यहाँ पैसे रिसीव करने के लिए भी पिन डालकर खुद को वेरिफाई करना पड़ता है। अगर आपको भरोसा नहीं है, तो मैं डील कैंसिल कर देता हूँ।"
एक फौजी के गुस्से और अपनी मजबूरी को देखकर कबीर का संशय दूर हो गया। उसे लगा कि वह एक सच्चे देशभक्त पर शक करके गलती कर रहा है। पैसों की सख्त जरूरत ने उसकी तार्किक सोच पर पर्दा डाल दिया। कबीर ने तुरंत अपना यूपीआई ऐप खोला, उस क्यूआर कोड को स्कैन किया और अपना गुप्त पिन दर्ज कर दिया।
जैसे ही कबीर ने 'सबमिट' पर क्लिक किया, उसके फोन पर पैसे आने का कोई मैसेज नहीं आया। इसके बजाय, उसकी स्क्रीन पर एक लाल रंग का पॉप-अप चमका:
₹23,000 डेबिटेड (कट गए) फ्रॉम योर अकाउंट।
कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने चिल्लाकर फोन पर कहा, "सर! यह क्या हुआ? मेरे खाते से ₹23,000 कट गए, आए नहीं!"
सामने से नकली फौजी ने बहुत ही चालाकी से कहा, "ओह! लगता है आर्मी सॉफ्टवेयर में कुछ गड़बड़ हो गई। आपके पैसे हमारे पास होल्ड हो गए हैं। घबराइए मत, मैं आपको एक और 'रिकवरी क्यूआर कोड' भेज रहा हूँ। इस बार आप स्कैन करेंगे तो आपके कटे हुए ₹23,000 और सोफे के ₹23,000—यानी कुल ₹46,000 एक साथ वापस आ जाएंगे।"
कबीर को अब पूरी हकीकत समझ आ चुकी थी। उसने गुस्से में कहा, "तुम फौजी नहीं हो, तुम धोखेबाज हो!" इतना सुनते ही दूसरी तरफ से फोन काट दिया गया। कबीर ने दोबारा कॉल की तो नंबर ब्लॉक लिस्ट में जा चुका था। कबीर ने बेबसी में अपने दादाजी के उन सिक्कों को देखा। सामान तो घर में ही रह गया, लेकिन दुकान के किराए के लिए बचाकर रखे आखिरी ₹23,000 भी उस क्यूआर कोड के जरिए हवा हो चुके थे। अपराधी ओएलएक्स जैसी साइटों पर खुद को सेना या अर्धसैनिक बलों का जवान बताकर लोगों का भरोसा जीतते हैं। वे कभी सामान देखने नहीं आते और बिना मोल-भाव किए तुरंत पैसे भेजने का नाटक करते हैं।
क्यूआर कोड का नियम: हमेशा याद रखें कि क्यूआर कोड सिर्फ और सिर्फ पैसे भेजने के लिए स्कैन किया जाता है। पैसे प्राप्त करने करने) के लिए कभी भी क्यूआर कोड स्कैन करने या यूपीआई पिन डालने की जरूरत नहीं होती।
आठ करारे धोखे खाने के बाद कबीर का पूरा वजूद बिखर चुका था। लेनदारों के तगादे इतने बढ़ गए थे कि उसने लाज के मारे दुकान पर जाना ही छोड़ दिया था। दोस्त, रिश्तेदार और पड़ोसी—सब उसे एक नाकाम इंसान की नजर से देखने लगे थे। कबीर रातों को सो नहीं पाता था। वह बस भगवान से यही प्रार्थना करता कि कोई ऐसा चमत्कार हो जाए, जिससे उसका सारा कर्ज उतर जाए और वह फिर से सिर उठाकर जी सके। इसी लाचारी के बीच, उसके फोन पर एक और जाल फेंका गया।
सोमवार की दोपहर, कबीर के व्हाट्सएप पर एक चमचमाता हुआ डिजिटल पोस्टर आया। उस पोस्टर पर 'कौन बनेगा करोड़पति' का लोगो लगा था, अमिताभ बच्चन की तस्वीर थी और बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था: "बधाई हो! ऑल इंडिया सिम कार्ड लकी ड्रा में आपके नंबर ने ₹25,00,000 (25 लाख रुपये) का जैकपॉट जीता है।"
पोस्टर के साथ एक ऑडियो रिकॉर्डिंग भी थी। कबीर ने जैसे ही उसे प्ले किया, एक बेहद सलीकेदार और संस्कारी आवाज गूंजी:
"नमस्कार! मैं केबीसी के मुख्य कार्यालय मुंबई से लॉटरी मैनेजर राणा प्रताप सिंह बात कर रहा हूँ। आपके इस मोबाइल नंबर ने 25 लाख रुपये की लॉटरी जीती है। यह पैसा आपके बैंक खाते में भेजने के लिए फाइल तैयार हो चुकी है। अपनी लॉटरी का पैसा प्राप्त करने के लिए तुरंत नीचे दिए गए नंबर पर केवल व्हाट्सएप कॉल करें। ध्यान रहे, नॉर्मल कॉल नहीं लगेगी।"
कबीर ने गहरा सांस लिया। उसने खुद से कहा, "कबीर, संभल जाओ। यह पक्का कोई नया फ्रॉड है।" उसने मैसेज को नजरअंदाज करने की कोशिश की। लेकिन रात को जब उसने अपने बीमार पिता को दवाइयों के बिना खांसते हुए देखा, तो उसका दिल बैठ गया। उसने सोचा, "अगर यह सच हुआ तो? अगर सचमुच भगवान ने मेरी सुन ली हो तो? सिर्फ व्हाट्सएप कॉल करके पूछने में क्या हर्ज है?"
अगली सुबह कबीर ने उस नंबर पर व्हाट्सएप कॉल की। दूसरी तरफ से वही राणा प्रताप सिंह बोला, "बधाई हो कबीर जी! आपका नाम और नंबर हमारे सिस्टम में अप्रूव्ड है। ₹25 लाख का चेक बिल्कुल तैयार है। लेकिन कबीर जी, आप तो जानते ही हैं कि इतनी बड़ी रकम पर भारत सरकार का टैक्स लगता है।"
कबीर ने डरते हुए कहा, "सर, मेरे पास तो पैसे नहीं हैं। आप उस 25 लाख में से ही टैक्स काट कर मुझे बाकी के पैसे दे दीजिए।"
राणा प्रताप सिंह ने बहुत ही व्यावहारिक लहजे में समझाया:
"कबीर जी, काश ऐसा हो पाता। लेकिन सरकारी नियम के मुताबिक, लॉटरी का पैसा आरबीआई के लॉकर में सील है। उसे खोलने और आपकी फाइल को प्रोसेस करने के लिए भारत सरकार की 'जीएसटी और फाइलिंग फीस' के रूप में ₹12,500 अलग से सरकारी खाते में जमा करने होंगे। जैसे ही आप इस फीस की रसीद भेजेंगे, अगले 10 मिनट में ₹25 लाख आपके खाते में ट्रांसफर हो जाएंगे। अगर आप आज शाम तक यह नहीं करते, तो यह पैसा किसी और को ट्रांसफर कर दिया जाएगा।"
कबीर के दिमाग पर ₹25 लाख की रकम हावी हो चुकी थी। उसे लगा कि ₹25 लाख के आगे ₹12,500 कुछ भी नहीं हैं। उसने अपनी मां के सोने के झुमके, जो आखिरी बचे हुए गहने थे, उन्हें पास के एक सुनार के पास गिरवी रखा और ₹12,500 लेकर राणा प्रताप सिंह के दिए गए खाते में ट्रांसफर कर दिए।
पैसे भेजने के बाद कबीर दिल थामकर बैठा रहा। 15 मिनट बाद फिर फोन आया। राणा प्रताप सिंह ने कहा, "कबीर जी, बहुत बढ़िया। आपकी फाइल दिल्ली पहुंच गई है। लेकिन अब इनकम टैक्स विभाग ने इस पर आपत्ति जताई है। आपको ₹25,000 का 'एंटी-करप्शन क्लीयरेंस' देना होगा, वरना पुराना ₹12,500 भी जब्त हो जाएगा।"
कबीर के सिर पर जैसे बिजली गिर गई। उसने रोते हुए कहा, "सर, मैंने मां के गहने गिरवी रखकर पैसे दिए थे। अब मेरे पास कुछ नहीं है, प्लीज मेरे पैसे लौटा दो।" लेकिन दूसरी तरफ से आवाज बदल चुकी थी, "पैसे जमा करो, नहीं तो सीधे जेल जाओगे।" और इसके साथ ही कबीर का नंबर ब्लॉक कर दिया गया।
कबीर घर के कोने में बैठकर अपनी मां के सूने कान देखने लगा। चमत्कार की आस में उसने अपने परिवार की आखिरी बची हुई आबरू भी दांव पर लगा दी थी। लॉटरी के उस झूठे पोस्टर ने कबीर को एक ऐसे अंधेरे में धकेल दिया था जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। कोई भी वैध कंपनी या सरकारी संस्था किसी भी नागरिक को इस तरह के 'सिम कार्ड लकी ड्रा' के जरिए लॉटरी नहीं देती। अपराधियों द्वारा केबीसी (KBC) और नामी हस्तियों की तस्वीरों का इस्तेमाल सिर्फ भरोसा जीतने के लिए किया जाता है। भारत सरकार के नियमों के अनुसार, किसी भी पुरस्कार या लॉटरी की राशि पर टैक्स हमेशा मुख्य राशि में से काटकर ही दिया जाता है। कोई भी वैध संस्था पुरस्कार देने से पहले अपने पास से पैसे जमा करने को नहीं कहती।
7
लॉटरी फ्रॉड में मां के आखिरी गहने गंवाने के बाद कबीर एक गहरे अवसाद (डिप्रेशन) में चला गया था। वह अपने ही घर में किसी से आंखें नहीं मिला पा रहा था। अब उसकी जिंदगी का एकमात्र सहारा उसका मोबाइल फोन था, जिसके जरिए वह अपने लॉजिस्टिक्स बिजनेस के बचे-कुचे ग्राहकों से संपर्क करने की कोशिश कर रहा था। कबीर को लगता था कि अब वह हर फ्रॉड को पहचान सकता है, लेकिन वह यह नहीं जानता था कि इस बार स्कैमर उसके फोन पर कोई वार नहीं करेंगे, बल्कि उसका फोन नंबर ही उससे हमेशा के लिए छीन लेंगे।
गुरुवार की सुबह कबीर अपने दफ्तर की टेबल पर बैठा था, तभी उसके मोबाइल पर एक टेक्स्ट मैसेज आया। मैसेज की हेडिंग में किसी नामी टेलीकॉम कंपनी का नाम लिखा था। मैसेज में चेतावनी दी गई थी:
प्रिय उपभोक्ता, आपके सिम कार्ड का वेरिफिकेशन अधूरा है। सरकारी नियमों के अनुसार आपका सिम कार्ड आज रात 8:00 बजे स्थायी रूप से ब्लॉक कर दिया जाएगा। अपने सिम को चालू रखने और मुफ्त 5G/6G सेवाओं में अपग्रेड करने के लिए तुरंत नीचे दिए गए लिंक पर अपनी जानकारी दर्ज करें।"
कबीर ने मैसेज पढ़ा और डर गया। उसका बैंक अकाउंट, उसकी यूपीआई आईडी और उसके बिजनेस के सारे कॉन्टैक्ट्स इसी एक नंबर से जुड़े थे। अगर यह नंबर बंद हो जाता, तो कबीर पूरी दुनिया से कट जाता। उसने बिना वक्त गंवाए उस मैसेज में दिए गए लिंक पर क्लिक कर दिया।
लिंक खुलते ही कबीर के सामने एक वेबसाइट आई, जो हूबहू उसकी टेलीकॉम कंपनी के असली पोर्टल जैसी दिख रही थी। वहां एक फॉर्म था जिसमें कबीर से उसका नाम, आधार नंबर, जन्मतिथि और सबसे नीचे 'सिम कार्ड नंबर' - जो सिम के पीछे छपा होता है) मांगा गया था। कबीर ने सोचा कि कंपनी अपनी वेरिफिकेशन कर रही है, इसलिए उसने अपने फोन से सिम निकालकर उसके पीछे लिखा हुआ वो गुप्त नंबर भी फॉर्म में भर दिया और 'सबमिट' कर दिया।
वेबसाइट पर लिखकर आया: "आपका वेरिफिकेशन सफल रहा। नेटवर्क अपडेट के लिए आपका फोन अगले 2 घंटे के लिए बंद रह सकता है।"
करीब आधे घंटे बाद, कबीर के फोन के सिग्नल (नेटवर्क टावर) अचानक पूरी तरह गायब हो गए। स्क्रीन पर 'नो सर्विस' लिखा आ गया। कबीर को लगा कि यह वही नेटवर्क अपडेट है जिसके बारे में वेबसाइट पर लिखा था, इसलिए वह शांत बैठा रहा।
लेकिन कबीर यह नहीं जानता था कि गांधीधाम से दूर किसी दूसरे शहर के एक कोने में बैठे स्कैमर ने कबीर की दी हुई जानकारियों और सिम नंबर का इस्तेमाल करके टेलीकॉम कंपनी के स्टोर पर एक फर्जी आईडी दिखाई थी और कबीर के नाम का 'डुप्लिकेट सिम कार्ड' चालू करवा लिया था। जैसे ही अपराधियों का वह नकली सिम चालू हुआ, कबीर का असली सिम कार्ड हमेशा के लिए डिएक्टिवेट (बंद) हो गया।
अब कबीर का नंबर अपराधियों के फोन में चल रहा था। कबीर के बैंक अकाउंट्स के सारे ट्रांजैक्शन अलर्ट और ओटीपी अब सीधे स्कैमर्स के फोन पर जा रहे थे।
कबीर दफ्तर में बैठा रहा और वहां दूसरी तरफ अपराधियों ने कबीर के नेट बैंकिंग का पासवर्ड रीसेट किया। कबीर के फोन पर कोई मैसेज नहीं आया क्योंकि उसका सिम बंद था। अपराधियों ने कबीर के बिजनेस अकाउंट में बची हुई आखिरी लिमिट और उसकी क्रेडिट कार्ड की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करके कुल ₹1,80,000 साफ कर दिए।
शाम को जब कबीर परेशान होकर टेलीकॉम कंपनी के असली स्टोर पर पहुंचा और उसने शिकायत की, तो वहां के मैनेजर ने सिस्टम चेक करके कहा, "सर, आपका यह सिम तो दोपहर को ही ब्लॉक हो चुका है क्योंकि आपने खुद ही दूसरी दुकान से नया डुप्लिकेट सिम जारी करवाया है।"
कबीर का सिर चकरा गया। उसने तुरंत अपने दोस्त के फोन से अपना बैंक बैलेंस चेक करने के लिए कस्टमर केयर को फोन किया। जब बैंक अधिकारी ने बताया कि उसके खाते से सारे पैसे निकल चुके हैं, तो कबीर के हाथों से फोन छूटकर गिर गया। कबीर सड़क के किनारे घुटनों के बल बैठ गया। इस डिजिटल दुनिया ने कबीर से सिर्फ उसके पैसे नहीं छीने थे, उसकी पूरी डिजिटल पहचान और उसका नंबर भी चुरा लिया था। इस फ्रॉड में अपराधी आपके सिम के पीछे लिखे यूनिक नंबर और आपकी व्यक्तिगत जानकारी को चुराकर आपके नाम का दूसरा सिम कार्ड चालू करवा लेते हैं। इसके बाद आपके फोन का नेटवर्क गायब हो जाता है और सारे ओटीपी अपराधियों के पास जाने लगते हैं। कोई भी टेलीकॉम कंपनी कभी भी एसएमएस (SMS) पर दिए गए किसी अज्ञात लिंक के जरिए सिम की केवाईसी नहीं करती। सिम अपग्रेड या केवाईसी के लिए हमेशा आधिकारिक स्टोर पर जाकर बायोमेट्रिक (अंगूठे का निशान) देना अनिवार्य होता है।अगर आपके फोन का नेटवर्क बिना किसी कारण के अचानक गायब हो जाए और कई घंटों तक न आए, तो इसे हल्के में न लें। तुरंत अपनी टेलीकॉम कंपनी और अपने बैंक से संपर्क करके अपने अकाउंट्स को सुरक्षित करें। कभी भी अपने सिम कार्ड के पीछे लिखा नंबर किसी से शेयर न करें।
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सिम स्वैप फ्रॉड ने कबीर को पूरी तरह सड़क पर ला दिया था। लेनदारों के ताने और हर दिन घर पर आकर पैसे मांगने वालों की भीड़ ने कबीर का जीना हराम कर दिया था। बाजार में उसकी साख खत्म हो चुकी थी, इसलिए कोई भी उसे एक रुपया उधार देने को तैयार नहीं था। कबीर पूरी तरह टूट चुका था। वह दिन-रात इंटरनेट पर कर्ज चुकाने का कोई रास्ता ढूंढता रहता। इसी हताशा के बीच, एक रात फेसबुक स्क्रॉल करते हुए उसकी नजर एक विज्ञापन पर पड़ी:
"क्रेडिट किंग ऐप: बिना किसी सिबिल स्कोर बिना किसी कागजी कार्रवाई के सिर्फ 2 मिनट में ₹50,000 का लोन सीधे अपने बैंक खाते में पाएं। आसान किश्तें, कम ब्याज।"
कबीर को लगा कि यह भगवान का भेजा हुआ कोई करिश्मा है। उसने बिना एक पल गंवाए विज्ञापन पर क्लिक करके 'क्रेडिट किंग' नाम की ऐप डाउनलोड कर ली। ऐप इंस्टॉल होते ही स्क्रीन पर कुछ परमिशन (अनुमतियां) मांगी गईं—"अलाउ एक्सेस टू कॉन्टैक्ट्स", "अलाउ एक्सेस टू गैलरी", "अलाउ एक्सेस टू कैमरा"। कबीर को उस वक्त सिर्फ पैसों की धुन सवार थी, उसने बिना पढ़े सब पर 'Allow' (अनुमति) पर क्लिक कर दिया। उसने अपना आधार और पैन नंबर डाला।
लोन तो ₹50,000 का अप्लाई हुआ था, लेकिन महज 2 मिनट के भीतर कबीर के खाते में सिर्फ ₹3,500 क्रेडिट हुए। कबीर हैरान रह गया। उसने ऐप में चेक किया तो पता चला कि ₹1,500 'प्रोसेसिंग फीस' के नाम पर काट लिए गए थे और लोन की अवधि सिर्फ 7 दिन की थी। कबीर ने सोचा कि वह ये पैसे जैसे-तैसे करके लौटा देगा।
लेकिन असली नरक छठे दिन से शुरू हुआ।
कबीर के फोन पर सुबह-सुबह एक अनजान इंटरनेशनल नंबर से व्हाट्सएप कॉल आई। दूसरी तरफ से एक शख्स ने बेहद अभद्र और गाली-गलौज वाली भाषा में बात की:
"अबे कबीर! तेरी लोन की तारीख कल खत्म हो रही है। चुपचाप ₹8,000 जमा कर, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रह।"
कबीर ने कांपते हुए कहा, "भाई, मैंने तो सिर्फ ₹3,500 लिए थे, और तारीख कल है। मैं कल पैसे दे दूँगा।" लेकिन सामने वाले ने फोन काट दिया।
अगले दिन सुबह 9:00 बजे तक कबीर पैसों का इंतजाम नहीं कर पाया। तभी उसके व्हाट्सएप पर एक मैसेज आया जिसे देखकर उसके दिल की धड़कन रुक गई। उस मैसेज में कबीर की एक तस्वीर थी, जिसे एआई टूल के जरिए किसी अश्लील और आपत्तिजनक फोटो के साथ जोड़ दिया गया था। नीचे कबीर के मोबाइल की पूरी कॉन्टैक्ट लिस्ट का स्क्रीनशॉट था, जिसमें उसके पिता, उसकी बहन, उसके दोस्तों और बिजनेस के क्लाइंट्स के नंबर साफ दिख रहे थे।
नीचे एक धमकी भरा वॉयस नोट था:
"अगर अगले 10 मिनट के अंदर हमारे अकाउंट में ₹15,000 ट्रांसफर नहीं हुए, तो यह न्यूड (अश्लील) फोटो तेरे खानदान के एक-एक बंदे को व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर भेज दी जाएगी। तेरी बहन और तेरे बाप को बताएंगे कि तू कैसा अय्याश इंसान है।"
कबीर के सिर पर जैसे वज्रपात हो गया। उसकी रीढ़ में एक ठंडा खौफ दौड़ गया। वह कमरे में बंद होकर रोने लगा, हांफने लगा। उसे अपनी सामाजिक इज्जत मिट्टी में मिलती दिख रही थी। अपनी बदनामी और परिवार की लाज बचाने के लिए कबीर ने अपने दोस्त से हाथ-पैर जोड़कर ₹15,000 उधार लिए और उस अपराधी को भेज दिए।
कबीर ने सोचा कि अब सब खत्म हो गया। लेकिन आधे घंटे बाद एक दूसरे नंबर से मैसेज आया: "यह तो सिर्फ एक ऐप का था, हमारे पास तेरी दूसरी फाइल भी है। अब ₹20,000 और दे वरना फोटो अभी वायरल करते हैं।"
कबीर को समझ आ गया कि यह कभी न खत्म होने वाला दलदल है। ऐप इंस्टॉल करते ही अपराधियों ने उसके फोन की पूरी गैलरी और कांटेक्ट लिस्ट चुरा ली थी। वे पैसे लेकर भी रुकने वाले नहीं थे। कबीर अकेले अंधेरे कमरे में बैठकर पंखे की तरफ देखने लगा। उसकी आंखों के सामने अपनी बूढ़ी मां और पिता का चेहरा घूम गया। वह इस कदर मानसिक रूप से प्रताड़ित हो चुका था कि उसके मन में जिंदगी खत्म करने का विचार आने लगा था। ये चीनी और अंतरराष्ट्रीय अपराधियों के नेटवर्क होते हैं जो बिना किसी नियम के तुरंत लोन देने का लालच देते हैं। इनका मुख्य मकसद लोन देना नहीं, बल्कि आपके फोन का डेटा (गैलरी और कॉन्टैक्ट्स) चुराकर आपको ब्लैकमेल करना होता है।
बचाव: कभी भी प्ले स्टोर या किसी अज्ञात लिंक से अनधिकृत लोन ऐप डाउनलोड न करें। हमेशा सुनिश्चित करें कि लोन देने वाली ऐप आरबीआई के पास रजिस्टर्ड बैंक या एनबीएफसी से जुड़ी हो। ऐप इंस्टॉल करते समय कभी भी अपनी गैलरी या कॉन्टैक्ट्स का एक्सेस न दें।
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लोन ऐप के ब्लैकमेलर्स से जैसे-तैसे पीछा छुड़ाने और साइबर सेल में शिकायत करने के बाद कबीर पूरी तरह सहम गया था। उसके दिल और दिमाग पर एक गहरा सदमा लगा था। वह रात-रात भर जागता रहता, कमरे की दीवारों को तकता और अपनी किस्मत पर रोता। जब इंसान मानसिक रूप से इतना टूट जाता है, तो वह हर पल एक अनजाने तनाव में जीता है। इसी तनाव और भारी अकेलेपन के बीच, एक रात उसके साथ वो हुआ जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।
मंगलवार की रात के करीब 11:30 बज रहे थे। कबीर बिस्तर पर लेटा हुआ था कि अचानक उसके व्हाट्सएप पर एक अनजान नंबर से वीडियो कॉल आने लगी। प्रोफाइल पिक्चर में एक बेहद शालीन और खूबसूरत लड़की की तस्वीर लगी थी। कबीर ने पहले तो कॉल नजरअंदाज की, लेकिन जब दोबारा कॉल आई, तो कबीर ने सोचा कि शायद बिजनेस का कोई क्लाइंट होगा या कोई रास्ता भूल गया होगा। उसने अनमने मन से हरी बटन दबाकर कॉल उठा ली।
जैसे ही कबीर ने अपना फ्रंट कैमरा ऑन किया, स्क्रीन के दूसरी तरफ का नजारा देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
सामने कोई साधारण लड़की बात करने के लिए नहीं बैठी थी। स्क्रीन पर एक युवती बिना कपड़ों के खड़ी थी और बेहद आपत्तिजनक हरकतें कर रही थी। कबीर का दिमाग सुन्न हो गया। वह कुछ समझ पाता या फोन काट पाता, उससे पहले ही मात्र 5 सेकंड के भीतर दूसरी तरफ से कॉल खुद-ब-खुद कट गई। कबीर का दिल जोर से धड़क रहा था, उसने डरकर तुरंत उस नंबर को ब्लॉक कर दिया और फोन साइड में रख दिया।
लेकिन खेल तो अब शुरू होना था।
महज 10 मिनट बाद, कबीर के फोन पर एक दूसरे नंबर से एक वीडियो और कुछ स्क्रीनशॉट्स आए। कबीर ने जैसे ही वीडियो प्ले किया, उसके जिस्म का खून जम गया। उस वीडियो में स्क्रीन-रिकॉर्डिंग के जरिए कबीर का चेहरा साफ़-साफ़ दिख रहा था, और उसके ठीक बगल में वही नग्न लड़की दिख रही थी। अपराधियों ने चालाकी से कबीर के चेहरे का वो हिस्सा रिकॉर्ड कर लिया था जब वह हैरान होकर स्क्रीन को देख रहा था। वीडियो ऐसा लग रहा था जैसे कबीर खुद उस अश्लील वीडियो कॉल का हिस्सा था।
मैसेज के तुरंत बाद एक कॉल आई। दूसरी तरफ से एक बेहद सख्त और डरावनी आवाज गूंजी:
"हाँ भाई कबीर सोधा! वीडियो देख लिया अपना? अब सीधे-सीधे बात सुन। हमारे अकाउंट में ₹50,000 ट्रांसफर कर, वरना यह वीडियो अगले आधे घंटे में फेसबुक और यूट्यूब पर अपलोड कर दिया जाएगा। और हाँ, तेरी प्रोफाइल से तेरे जितने भी रिश्तेदार और दोस्त हैं, उनके व्हाट्सएप नंबर हमारे पास हैं, सबको यह वीडियो टैग कर दिया जाएगा।"
कबीर का पूरा शरीर थरथर कांपने लगा। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। लोन ऐप वाले मामले में तो सिर्फ फोटो थी, लेकिन यहाँ उसका अपना वीडियो था। वह सोचने लगा कि अगर यह वीडियो उसके माता-पिता, उसके समाज या दोस्तों के पास पहुँच गया, तो वह किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेगा। वह रोते हुए फोन पर गिड़गिड़ाने लगा:
"भाई, मेरी माँ-बहन की इज्जत का सवाल है, मैं बर्बाद हो जाऊँगा। प्लीज ऐसा मत करो, मैंने तो कुछ किया भी नहीं है। मेरे पास पैसे नहीं हैं, मेरा सब कुछ पहले ही लुट चुका है।"
ब्लैकमेलर ने हंसते हुए कहा, "हमें तेरी कहानी से कोई मतलब नहीं है। इज्जत प्यारी है तो 15 मिनट में ₹50,000 का इंतजाम कर, वरना यूट्यूब का लिंक देखने के लिए तैयार रह।"
कबीर ने अपनी अलमारी खोली, अपनी बची-कुची आखिरी जमापूंजी और अपनी कलाई घड़ी, जो उसके दादाजी ने उसे दी थी, उसे याद किया। उसने अपने एक दूर के दोस्त को फोन लगाया और कोई भी झूठा बहाना बनाकर ₹30,000 उधार मांगे। कबीर ने वो ₹30,000 उस ठग के दिए गए यूपीआई अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए।
पैसे जाते ही कबीर ने राहत की सांस लेने की कोशिश की, लेकिन 5 मिनट बाद एक और कॉल आई। इस बार सामने वाले ने खुद को 'यूट्यूब का सीनियर डिजिटल ऑफिसर' बताया:
"कबीर जी, साइबर सेल से आपका एक अश्लील वीडियो यूट्यूब पर अपलोड होने के लिए आया है। हमारे पास ऊपर से आदेश है। अगर आप इस वीडियो को सर्वर से हमेशा के लिए डिलीट करवाना चाहते हैं, तो आपको ₹40,000 की 'गूगल सर्वर डिलीशन फीस' भरनी होगी, वरना यह वीडियो पब्लिक हो जाएगा।"
कबीर बिस्तर पर गिर पड़ा। उसे समझ आ गया कि यह एक अंतहीन कुआं है। ये लोग पैसे लेकर भी कभी रुकेंगे नहीं, क्योंकि उनके पास उसका वीडियो सुरक्षित है। शर्मिंदगी, डर और घबराहट के इस चरम पर कबीर को समझ नहीं आ रहा था कि वह जिए या अपनी जिंदगी यहीं खत्म कर ले। अपराधी नकली लड़कियों की प्रोफाइल बनाकर रात के समय पुरुषों को निशाना बनाते हैं। वे वीडियो कॉल उठाते ही अश्लील क्लिप चला देते हैं और पीड़ित के चेहरे को रिकॉर्ड करके ब्लैकमेल करते हैं। इसके बाद वे फर्जी पुलिस या यूट्यूब अधिकारी बनकर और पैसे ऐंठते हैं। बचाव: सबसे पहला नियम—कभी भी किसी अज्ञात नंबर से आने वाली व्हाट्सएप या सोशल मीडिया वीडियो कॉल न उठाएं। अगर गलती से कॉल उठ भी जाए, तो तुरंत अपने फोन के फ्रंट कैमरे पर उंगली रख लें या कैमरा छुपा लें।
पिछले सभी हादसों ने कबीर को मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह निचोड़ दिया था। अब उसके पास खोने के लिए लगभग कुछ नहीं बचा था। इसी दौरान, कबीर ने अपने पुराने टूटे हुए बिजनेस को संभालने के लिए एक वेंडर को ₹15,000 का ऑनलाइन पेमेंट ट्रांसफर किया था। लेकिन नेटवर्क की खराबी के कारण वह पैसा कबीर के खाते से तो कट गया, पर वेंडर के पास नहीं पहुंचा। बैंक अकाउंट में स्टेटस 'पेंडिंग' दिखा रहा था।
कबीर पहले ही पाई-पाई के लिए तरस रहा था, इसलिए ₹15,000 का इस तरह फंस जाना उसके लिए एक नया सिरदर्द बन गया। वह घबरा गया और उसने तुरंत समाधान के लिए अपने मोबाइल पर गूगल खोला और सर्च किया: "गूगल के सर्च रिजल्ट में सबसे ऊपर एक विज्ञापन (Ad) के रूप में एक नंबर चमक रहा था—1800-XXX-XXXX (24x7 हेल्प डेस्क)। कबीर को लगा कि गूगल पर सबसे ऊपर दिख रहा है, तो यह बिल्कुल सही और आधिकारिक नंबर ही होगा। उसने बिना सोचे-समझे उस नंबर पर डायल कर दिया।
दो घंटियां जाते ही दूसरी तरफ से एक बहुत ही संस्कारी और पेशेवर आवाज आई:
"नमस्कार, डिजिटल सपोर्ट कोर बैंकिंग में आपका स्वागत है। मैं सीनियर कस्टमर एसोसिएट राहुल शर्मा बात कर रहा हूँ। बताइए सर, आज मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ?"
कबीर ने राहत की सांस ली और कहा, "सर, मैंने ₹15,000 ट्रांसफर किए थे। पैसे कट गए हैं लेकिन सामने वाले को नहीं मिले। प्लीज मेरा रिफंड करवा दीजिए, मैं बहुत मुसीबत में हूँ।"
नकली कस्टमर केयर अधिकारी ने कबीर के खाते की डिटेल्स चेक करने का नाटक किया और कंप्यूटर की कुछ आवाजें बैकग्राउंड में सुनाई दीं। फिर उसने बेहद हमदर्दी भरे लहजे में कहा:
"कबीर जी, बिल्कुल घबराइए मत। आपका पैसा नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन के सर्वर पर अटका हुआ है। 2026 के नए बैंकिंग नियमों के अनुसार, इसे मैन्युअल रूप से रिफंड करने के लिए मुझे आपके फोन को हमारे रिफंड सर्वर से लिंक करना होगा। इसके लिए आप तुरंत प्ले स्टोर खोलें और वहां से 'AnyDesk' (या TeamViewer) नाम की एक छोटी सी सरकारी सपोर्ट ऐप डाउनलोड कर लीजिए।"
कबीर ने सोचा कि कस्टमर केयर वाले उसकी मदद कर रहे हैं, इसलिए उसने तुरंत उस ऐप को इंस्टॉल कर लिया। ऐप खुलते ही स्क्रीन पर 9 अंकों का एक कोड आया। राहुल शर्मा ने कहा, "कबीर जी, अपनी स्क्रीन को हमारे सर्वर से जोड़ने के लिए वो 9 अंकों का कोड मुझे लिखवा दीजिए।" कबीर ने कोड बता दिया।
कोड बताते ही कबीर के फोन की स्क्रीन पर एक पॉप-अप आया जिसमें रिमोट कंट्रोल की अनुमति मांगी गई थी। कबीर ने जैसे ही पर क्लिक किया, खेल पूरी तरह पलट गया।
अब कबीर का फोन उसके हाथ में तो था, लेकिन उसका पूरा नियंत्रण मीलों दूर बैठे उस ठग के कंप्यूटर पर चला गया था। राहुल ने कहा, "अब कबीर जी, वेरिफिकेशन के लिए आप अपना नेट बैंकिंग या कोई भी यूपीआई ऐप खोलिए।"
कबीर ने जैसे ही अपना बैंकिंग ऐप खोला, उसकी स्क्रीन पर जो कुछ भी हो रहा था, वह सब राहुल अपने कंप्यूटर पर लाइव देख रहा था। कबीर ने अपना पासवर्ड और पिन डाला। राहुल ने कबीर के फोन का एक्सेस लेकर कबीर की आंखों के सामने ही उसके बिजनेस क्रेडिट लाइन की बची हुई ₹45,000 की लिमिट को एक अज्ञात मर्चेंट अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया।
कबीर ने देखा कि उसके फोन का कर्सर अपने आप हिल रहा है और पैसे ट्रांसफर हो रहे हैं। उसने चिल्लाकर कहा, "अरे! यह अपने आप क्या हो रहा है? मेरा फोन काम क्यों नहीं कर रहा? तुम मेरे पैसे कहाँ भेज रहे हो?"
राहुल ने ठंडे लहजे में कहा, "कबीर जी, यह रिफंड की प्रक्रिया है, स्क्रीन को छुए मत।" लेकिन अगले ही पल कबीर का फोन पूरी तरह ब्लैक आउट हो गया और कॉल कट गई। जब कबीर ने फोन दोबारा चालू किया, तो उसके खाते से ₹45,000 साफ हो चुके थे और गूगल से वह फर्जी नंबर भी गायब हो चुका था। കबीर अपनी ही टेबल पर सिर मारकर रोने लगा। उसने अपनी मदद के लिए खुद अपराधियों को बुलाया था और अपने फोन की पूरी चाबी उनके हाथों में सौंप दी थी।
कस्टमर केयर स्कैम में अपने बचे-कुचे बिजनेस के ₹45,000 गंवाने के बाद कबीर अब पूरी तरह से टूट चुका था। लेनदारों के दबाव और घर की तंगहाली के कारण उसके घर में हर दिन उदासी छाई रहती थी। कबीर की मां और बीमार पिता अब दिन-रात भगवान से प्रार्थना करते थे कि किसी भी तरह से घर का गुजर-बसर हो जाए। जब इंसान घोर दरिद्रता और तंगी से गुजर रहा होता है, तो सरकार की तरफ से मिलने वाली छोटी से छोटी मदद भी उसे बहुत बड़ी संजीवनी जैसी लगती है।
बुधवार की दोपहर, कबीर की मां रसोई में सूखी रोटियां बना रही थीं कि तभी उनके साधारण से मोबाइल फोन पर एक मैसेज आया। मां ने कबीर को आवाज दी, "कबीर, बेटा देखना जरा! सरकार की तरफ से कोई मैसेज आया है।"
कबीर ने मां के हाथ से फोन लिया। मैसेज में लिखा था: भारत सरकार की 'पीएम मुफ्त सोलर पैनल और गैस सब्सिडी योजना' के अंतर्गत आपके परिवार को ₹5,000 की नकद सब्सिडी और मुफ्त सोलर पैनल स्वीकृत किया गया है। अपनी राशि सीधे बैंक खाते में प्राप्त करने और सोलर पैनल की बुकिंग के लिए तुरंत नीचे दिए गए सरकारी राष्ट्रीय पोर्टल पर अपना फॉर्म दर्ज करें:
मैसेज के अंत में राष्ट्रीय चिह्न (अशोक स्तंभ) का छोटा सा लोगो बना हुआ था और वेबसाइट के नाम में 'gov' शब्द का इस्तेमाल किया गया था, जिससे वह पूरी तरह से असली सरकारी वेबसाइट जैसी प्रतीत हो रही थी।
कबीर की मां की आंखों में एक उम्मीद की किरण चमक उठी। उन्होंने कबीर की तरफ देखते हुए कहा, "बेटा, अगर ये ₹5,000 मिल जाएं तो तुम्हारे पिताजी के इस महीने की दवाइयां आ जाएंगी और बिजली का बिल भी थोड़ा संभल जाएगा। सरकार सचमुच हम जैसे गरीबों की मदद कर रही है।"
कबीर खुद भी बेहद लाचार था। उसे लगा कि सरकारी वेबसाइट है, तो कोई रिस्क नहीं होगा। उसने जैसे ही उस लिंक पर क्लिक किया, उसके फोन के ब्राउज़र में एक पेज खुला। पेज के ऊपर भारत सरकार के गृह मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय के बड़े-बड़े बैनर लगे थे। वहां एक फॉर्म खुला, जिसमें कबीर से कुछ जानकारियां मांगी गईं:
लाभार्थी का नाम और आधार नंबर।
बैंक खाता संख्या और आईएफएससी कोड।
नेट बैंकिंग का यूजरनेम या यूपीआई आईडी।
कबीर ने सोचा कि सब्सिडी सीधे बैंक में ट्रांसफर होनी है, इसलिए बैंक डिटेल्स मांगना स्वाभाविक है। उसने पूरी ईमानदारी से अपनी मां के बैंक खाते की सारी जानकारी फॉर्म में भर दी और 'सबमिट' बटन दबा दिया।
जैसे ही कबीर ने सबमिट किया, स्क्रीन पर लिखकर आया: "सत्यापन प्रक्रिया चालू है। सब्सिडी ट्रांसफर करने के लिए आपके मोबाइल पर भेजा गया 6 अंकों का 'वेरिफिकेशन कोड' यहां दर्ज करें।"
उसी वक्त मां के फोन पर एक ओटीपी आया। कबीर ने बिना पढ़े वह ओटीपी उस नकली सरकारी वेबसाइट के बॉक्स में दर्ज कर दिया और 'कन्फर्म' कर दिया। कबीर यह देखना भूल गया कि जो मैसेज आया था, वह सब्सिडी देने के लिए नहीं, बल्कि मां के खाते से पैसे निकालने का 'यूपीआई रजिस्ट्रेशन ओटीपी' था।
जैसे ही कबीर ने ओटीपी डाला, पेज पर एक गोल पहिया घूमने लगा और स्क्रीन अचानक सफेद हो गई। अगले ही पल कबीर की मां के फोन पर एक के बाद एक दो मैसेज आए:
₹14,500 डेबिटेड (कट गए) फ्रॉम योर सेविंग्स अकाउंट।
कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी मां का वह बैंक खाता, जिसमें उन्होंने अपनी जीवनभर की छोटी-छोटी बचतों से पाई-पाई जोड़कर ₹14,500 जमा कर रखे थे, वह पूरी तरह से खाली हो चुका था।
कबीर की मां रसोई की चौखट पर बैठ गईं। उनके हाथ का बेलन जमीन पर गिर गया। उनके आंसू सूखी रोटियों पर टपक रहे थे। कबीर ने अपना सिर दोनों हाथों में जकड़ लिया। उसे अपनी नासमझी पर इतना गुस्सा आ रहा था कि वह चिल्ला उठना चाहता था। अपराधियों ने इस बार कबीर की गरीबी और सरकार के प्रति उसके अटूट भरोसे का फायदा उठाकर उसके घर का आखिरी निवाला भी छीन लिया था।
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घर के सारे पैसे खत्म हो चुके थे। मां के बैंक खाते के ₹14,500 भी सरकारी योजना के नाम पर ठगे जा चुके थे। कबीर के ऊपर अब न सिर्फ अपना पेट भरने की जिम्मेदारी थी, बल्कि अपनी मां के आंसुओं का कर्ज और बीमार पिता के इलाज का भारी बोझ भी था। कबीर रात-रात भर जागकर सोचता कि काश कहीं से कोई छोटा सा चमत्कार हो जाए, जिससे घर की रसोई चल सके।
तभी शुक्रवार की शाम, कबीर के फोन पर एक मैसेज फ्लैश हुआ। यह मैसेज ठीक उसी फॉर्मेट में था जैसा उसके बैंक से अक्सर आया करता था:
"प्रिय ग्राहक, आपके क्रेडिट कार्ड पर संचित ₹8,500 के रिवॉर्ड पॉइंट्स आज रात 11:59 बजे एक्सपायर (बेकार) होने वाले हैं। इन्हें तुरंत कैश में बदलकर अपने बैंक खाते में ट्रांसफर करने के लिए नीचे दिए गए बैंक के रिडेम्पशन लिंक पर क्लिक करें: कबीर ने मैसेज को दो बार पढ़ा। उसने सोचा, "मैंने पिछले दो सालों में इस कार्ड से कई बार पेमेंट किए हैं। यह ₹8,500 मेरे खुद के खर्च किए हुए पैसों के पॉइंट्स हैं। यह कोई भीख नहीं है, मेरा हक है। अगर यह पैसा मिल जाए, तो कम से कम मां के खाते में कुछ पैसे वापस डाल सकूंगा और घर का राशन आ जाएगा।"
तंगी में इंसान का दिमाग तर्कों से ज्यादा उम्मीदों पर चलने लगता है। कबीर ने बिना वक्त गंवाए उस लिंक पर क्लिक कर दिया।
सामने जो वेबसाइट खुली, वह बिल्कुल उसके बैंक के क्रेडिट कार्ड पोर्टल जैसी दिखती थी। उसमें बैंक का लोगो, सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे और नीले-सफेद रंग का वही जाना-पहचाना लेआउट था।
वेबसाइट पर एक बटन था—"क्लेम नाउ" कबीर ने जैसे ही उस पर क्लिक किया, एक फॉर्म खुला जिसमें निम्नलिखित जानकारियां मांगी गईं:
क्रेडिट कार्ड नंबर
कार्ड की एक्सपायरी डेट (MM/YY)
कार्ड के पीछे लिखा 3 अंकों का सीवीवी (CVV) नंबर
कार्ड से लिंक मोबाइल नंबर
कबीर को लगा कि रिवॉर्ड पॉइंट्स को वैलिडेट (सत्यापित) करने के लिए बैंक को यह सब चाहिए होगा। उसने कांपती उंगलियों से अपने क्रेडिट कार्ड की सारी डिटेल्स भर दीं। जैसे ही उसने 'सबमिट' किया, स्क्रीन पर लिखकर आया: "आपके मोबाइल पर भेजा गया वन-टाइम पासवर्ड दर्ज करें ताकि राशि आपके सीधे खाते में भेजी जा सके।"
तभी कबीर के फोन की स्क्रीन पर एक ओटीपी का मैसेज आया। कबीर ने घबराहट और जल्दबाजी में सिर्फ 'ओटीपी' के 6 अंक देखे, लेकिन मैसेज के नीचे लिखी उस बेहद जरूरी लाइन को पढ़ना भूल गया जिसमें लिखा था: "
कबीर ने वो ओटीपी उस नकली वेबसाइट पर डाला और 'कन्फर्म' कर दिया।
दो सेकंड का सन्नाटा छा गया। कबीर स्क्रीन को देखता रहा कि कब ₹8,500 क्रेडिट होने का मैसेज आता है। लेकिन तभी जो मैसेज आया, उसने कबीर के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसका दी:
"अलर्ट: आपके क्रेडिट कार्ड से ₹49,990 का ऑनलाइन ट्रांजैक्शन सफल रहा। आपकी बची हुई क्रेडिट लिमिट अब ₹10 है।"
कबीर की सांसें अटक गईं। उसने अपने सिर को दीवार से दे मारा। वह चिल्लाया, "नहीं! यह नहीं हो सकता! भगवान, मैंने क्या कर दिया!"
अपराधियों ने कबीर को ₹8,500 का लालच देकर उसके क्रेडिट कार्ड की पूरी की पूरी लिमिट (₹49,990) एक झटके में साफ कर दी थी। अब कबीर के पास न तो बैंक में पैसे बचे थे, और जो क्रेडिट कार्ड उसकी आखिरी उम्मीद था, उस पर भी ₹50,000 का नया कर्ज चढ़ चुका था, जिसे उसे अगले महीने बैंक को ब्याज समेत चुकाना था। कबीर अपने कमरे के कोने में घुटनों के बल बैठ गया। उसका अपनी ही नजरों में आत्मसम्मान पूरी तरह मर चुका था। वह सोचने लगा कि क्या वह वाकई इतना मूर्ख है, या यह दुनिया इतनी जालिम हो चुकी है कि किसी मजबूर की सांसें भी छीन लेना चाहती है।
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क्रेडिट कार्ड के फ्रॉड ने कबीर को मानसिक रूप से मृतप्राय कर दिया था। उस पर अब पचास हजार का ऐसा नया कर्ज था जिसका कोई ठिकाना नहीं था। लेनदारों के फोन लगातार आ रहे थे। घर में रसोई बंद होने की नौबत आ गई थी। कबीर ने तय किया कि वह कोई भी छोटा-मोटा काम करने को तैयार है, बस उसे तुरंत कुछ पैसे मिल जाएं। वह रात-रात भर इंटरनेट पर "वर्क फ्रॉम होम" या "पार्ट-टाइम जॉब" खोजता रहता।
शनिवार की सुबह, कबीर के व्हाट्सएप पर एक अज्ञात नंबर से मैसेज आया। मैसेज भेजने वाले की प्रोफाइल पिक्चर में एक पेशेवर एचआर महिला की तस्वीर लगी थी। मैसेज में लिखा था:
"नमस्ते! मैं 'ग्लोबल मीडिया सॉल्यूशंस' से नेहा बात कर रही हूँ। हमारे पास आपके लिए एक बेहद आसान पार्ट-टाइम जॉब है। आपको बस हमारे द्वारा दिए गए यूट्यूब वीडियो को लाइक करना है और उसका स्क्रीनशॉट भेजना है। हर एक लाइक के लिए आपको ₹50 मिलेंगे। आप घर बैठे रोजाना ₹3,000 से ₹5,000 कमा सकते हैं। क्या आप रुचि रखते हैं?"
कबीर को लगा कि वीडियो लाइक करने में क्या बुराई है। इसमें कोई पैसा भी नहीं लगाना है और न ही कोई रिस्क है। उसने तुरंत रिप्लाई किया, "हाँ, मैं यह काम करना चाहता हूँ।"
नेहा ने कबीर को तीन यूट्यूब वीडियो के लिंक भेजे। कबीर ने लिंक खोले, वीडियो को लाइक किया और उनका स्क्रीनशॉट नेहा को व्हाट्सएप पर भेज दिया। 5 मिनट के भीतर नेहा ने कहा, "बहुत बढ़िया! अपना यूपीआई आईडी दीजिए ताकि हम आपकी पहली सैलरी भेज सकें।"
कबीर ने अपनी यूपीआई आईडी दी और अगले ही पल उसके फोन पर मैसेज आया: "₹150 क्रेडिटर" (जमा हो गए)।
कबीर की आंखों में चमक आ गई। उसे अपनी जिंदगी में पहली बार लगा कि सचमुच कोई काम आसान और असली है। उसने सोचा कि अगर वह दिनभर में 50 वीडियो भी लाइक करेगा, तो उसके ₹2,500 पक्के हो जाएंगे।
इसके बाद नेहा ने कबीर से कहा, "कबीर जी, आपके अच्छे काम को देखते हुए हम आपको अपने 'वीआईपी टेलीग्राम चैनल' में प्रमोट कर रहे हैं, जहां आपको बड़े टास्क मिलेंगे और आपकी कमाई दोगुनी हो जाएगी।" कबीर तुरंत टेलीग्राम ऐप पर उस ग्रुप में शामिल हो गया।
उस टेलीग्राम ग्रुप में करीब 200 लोग जुड़े थे। वहां हर थोड़ी देर में लोग स्क्रीनशॉट डाल रहे थे: "मुझे आज ₹8,000 मिले", "इस टास्क से मैंने ₹15,000 कमाए, थैंक यू मैम!"। यह सब देखकर कबीर का भरोसा और मजबूत हो गया। उसे नहीं पता था कि उस ग्रुप में मौजूद 90% लोग ठगों के ही साथी थे जो फर्जी स्क्रीनशॉट डाल रहे थे।
तभी ग्रुप के 'ट्यूटर' ने एक नया टास्क घोषित किया जिसे 'कल्याणकारी टास्क' या 'प्रीपेड मर्चेंट टास्क' कहा गया। ट्यूटर ने कहा:
"दोस्तों, अब हमारे पास क्रिप्टो ट्रेडिंग और मर्चेंट बुकिंग के टास्क हैं। इसमें आपको पहले थोड़ा पैसा जमा करना होगा, और हमारी कंपनी उस पर आपको 30% का सीधा कमीशन देगी। उदाहरण के लिए, अगर आप ₹1,000 जमा करते हैं, तो आपको 10 मिनट में ₹1,300 वापस मिलेंगे।"
कबीर ने शुरुआत में डरते हुए ₹1,000 ट्रांसफर कर दिए। उसने ट्यूटर के कहे अनुसार एक नकली वेबसाइट पर अपना अकाउंट बनाया। वहां स्क्रीन पर उसका बैलेंस ₹1,300 दिखने लगा। कबीर ने विथड्रॉ (निकासी) की रिक्वेस्ट डाली और सचमुच ₹1,300 उसके बैंक खाते में आ गए।
कबीर का लालच और विश्वास अब सातवें आसमान पर था। उसे लगा कि यही वह रास्ता है जिससे वह अपना सारा पुराना कर्ज चुका सकता है।
अगले दिन ट्यूटर ने बड़ा टास्क दिया: "सुपर वीआईपी टास्क—निवेश ₹50,000, रिटर्न ₹75,000"।
कबीर के पास पैसे नहीं थे। उसने अपनी मां के सोने के झुमके, जो उसकी आखिरी उम्मीद थे, उन्हें पड़ोस के एक सुनार के पास गिरवी रख दिया और ₹50,000 लेकर उस ठग के बताए अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए।
वेबसाइट पर कबीर का बैलेंस ₹75,000 दिखने लगा। कबीर खुश हो गया और उसने विथड्रॉ करने की कोशिश की। लेकिन स्क्रीन पर एरर (त्रुटि) आ गया। कबीर ने तुरंत ट्यूटर को मैसेज किया। ट्यूटर ने कहा:
"कबीर जी, आपका क्रेडिट स्कोर थोड़ा कम हो गया है। इस पैसे को निकालने के लिए आपको 'सिस्टम टैक्स' के रूप में ₹30,000 और जमा करने होंगे, वरना आपके ₹50,000 हमेशा के लिए फ्रीज हो जाएंगे।"
कबीर घबरा गया। उसने रोते-बिलखते हुए अपने एक पुराने दोस्त से हाथ-पैर जोड़कर ₹30,000 उधार लिए और वह भी ट्रांसफर कर दिए। अब वेबसाइट पर बैलेंस ₹1,15,000 दिखा रहा था। लेकिन जब कबीर ने फिर से निकालने की कोशिश की, तो ट्यूटर ने एक नया बहाना बना दिया: "आपका अकाउंट ब्लॉक हो गया है, इसे अनब्लॉक करने के लिए ₹50,000 और लगेंगे।"
कबीर का दिमाग सुन्न हो गया। उसे समझ आ गया कि वह एक बहुत बड़े और सुनियोजित जाल में फंस चुका है। उसने मां के आखिरी गहने भी खो दिए थे और अपने दोस्त का भी कर्जदार बन चुका था। जब कबीर ने ग्रुप में रोना-धोना शुरू किया, तो एडमिन ने उसे तुरंत ग्रुप से बाहर निकाल दिया और उसका टेलीग्राम अकाउंट ब्लॉक कर दिया। कबीर अपने खाली हाथ और मां के सूने कानों को देखकर फर्श पर बैठ गया। वह पूरी तरह तबाह हो चुका था।
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मां के झुमके गिरवी रखने और पार्ट-टाइम जॉब के नाम पर अस्सी हजार रुपये गंवाने के बाद कबीर जीवित लाश बन चुका था। वह दिनभर अपने बिस्तर पर पड़ा रहता, उसकी आंखें सूज चुकी थीं और चेहरे का तेज पूरी तरह गायब हो चुका था। वह खुद को अपराधी मानने लगा था कि उसकी वजह से उसका पूरा परिवार सड़क पर आ गया। लेकिन किस्मत को अभी कबीर की परीक्षा का सबसे खौफनाक इम्तिहान लेना बाकी था।
सोमवार की सुबह करीब 10:00 बजे कबीर के फोन पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आई। कबीर ने बेमन से फोन उठाया। दूसरी तरफ से एक रोबोटिक कंप्यूटर जनित आवाज सुनाई दी:
"नमस्कार, फेडएक्स कूरियर सर्विसेज से बात कर रहे हैं। आपके नाम से भेजा गया एक अंतरराष्ट्रीय पार्सल मुंबई कस्टम विभाग द्वारा जब्त कर लिया गया है। अधिक जानकारी के लिए तुरंत 9 दबाएं।"
कबीर ने घबराकर तुरंत 9 दबा दिया। कॉल तुरंत एक कस्टमर केयर एजेंट को ट्रांसफर हो गई। कबीर ने कहा, "हेलो, मैंने तो कोई पार्सल नहीं भेजा है।"
सामने से एजेंट ने बेहद गंभीर आवाज में कहा, "सर, आपका नाम कबीर सोधा है? आपका आधार कार्ड नंबर XXXX-XXXX-XXXX है? आपके इसी आधार कार्ड पर मुंबई से ताइवान के लिए एक पार्सल बुक किया गया था। कस्टम चेकिंग के दौरान उस पार्सल में से 5 जाली पासपोर्ट, 3 अवैध लैपटॉप और 150 ग्राम एमडीएमए यानी नशीला ड्रग्स) बरामद हुआ है। यह एक गैर-जमानती संगीन अपराध है। हमने इस मामले को मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दिया है। आप लाइन पर रहिए, मैं आपकी कॉल सीधे मुंबई पुलिस मुख्यालय ट्रांसफर कर रहा हूँ।"
कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। ड्रग्स? जाली पासपोर्ट? उसने तो कभी मुंबई का रुख भी नहीं किया था। वह कुछ बोल पाता, उससे पहले ही फोन पर पुलिस के वायरलेस सेट की आवाजें गूंजने लगीं।
एक भारी और रोबीली आवाज आई:
"मैं मुंबई क्राइम ब्रांच से इंस्पेक्टर विजय राठौड़ बात कर रहा हूँ। कबीर सोधा, तुम पर ड्रग्स तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। तुम्हारी गिरफ्तारी का वारंट जारी हो चुका है।"
कबीर रोने लगा, "सर! मैं कसम खाता हूँ, मैंने कुछ नहीं किया! मैं तो अपने घर गुजरात में हूँ। मेरा आधार कार्ड किसी ने मिसयूज किया होगा।"
नकली इंस्पेक्टर ने कबीर को डांटते हुए कहा, "चुप रहो! कोर्ट के आदेश के अनुसार हमें तुम्हारी बात पर भरोसा करने के लिए तुरंत तुम्हारा 'लिखित बयान' और 'पहचान का सत्यापन' करना होगा। तुम तुरंत अपने फोन में 'स्काइप' ऐप डाउनलोड करो और हमारी आईडी पर वीडियो कॉल करो। याद रहे, अगर तुमने यह बात अपने परिवार को बताई या कॉल काटी, तो तुम्हें देशद्रोह के आरोप में तुरंत जेल भेज दिया जाएगा।"
कबीर इस कदर डर गया कि उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया। उसने तुरंत स्काइप डाउनलोड किया और वीडियो कॉल की।
वीडियो कॉल शुरू होते ही कबीर ने देखा कि सामने पुलिस की वर्दी पहने एक शख्स बैठा है। उसके पीछे पुलिस स्टेशन का पूरा सेटअप था, दीवार पर भारत का नक्शा और राजकीय चिह्न टंगे थे। वहां पुलिस की वर्दी में दो-तीन और लोग फाइलें पलटते नजर आ रहे थे। पूरा माहौल इतना असली था कि कोई भी धोखा खा जाए।
फर्जी इंस्पेक्टर राठौड़ ने कबीर को घूरते हुए कहा:
"कबीर सोधा! जब तक सुप्रीम कोर्ट से तुम्हारी बेगुनाही का सर्टिफिकेट नहीं आ जाता, तुम 'डिजिटल अरेस्ट' के तहत हमारी निगरानी में हो। तुम अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लो। कैमरा चालू रहेगा। तुम कैमरे के सामने से एक सेकंड के लिए भी नहीं हटोगे। अगर तुम कमरे से बाहर गए या किसी से बात की, तो तुम्हारी मां और पिता को भी सह-आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया जाएगा।"
कबीर के लिए वह कमरा एक जेल बन चुका था। वह कैमरे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गया। दोपहर से शाम हो गई, कबीर को न तो पानी पीने की इजाजत थी और न ही शौचालय जाने की। अपराधियों ने उसे मानसिक रूप से पूरी तरह पंगु बना दिया था।
रात के 8:00 बजे, नकली इंस्पेक्टर ने कबीर से कहा:
"कबीर, तुम्हारी बेगुनाही साबित करने के लिए हमें तुम्हारे बैंक खातों की जांच करनी होगी। तुम्हें अपने खाते में मौजूद सारा पैसा हमारे 'सरकारी सरकारी सुरक्षा खाते' में ट्रांसफर करना होगा। अगर तुम बेकसूर निकले, तो आधे घंटे में कोर्ट के आदेश के साथ तुम्हारा पैसा वापस ट्रांसफर कर दिया जाएगा।"
कबीर ने रोते हुए कहा, "सर, मेरे खाते में सिर्फ ₹12,000 बचे हैं। मेरे पास और कुछ नहीं है।"
अपराधी ने चिल्लाकर कहा, "तो अपने दोस्तों से मांगो! अगर तुमने ₹2 लाख का सिक्योरिटी डिपॉजिट नहीं किया, तो हम अभी तुम्हारी बहन को थाने उठा लाएंगे।"
कबीर अपनी बहन का नाम सुनकर कांप उठा। उसने अपनी जिंदगी की सारी लाज-शर्म ताक पर रखकर अपने तीन-चार दोस्तों को फोन किया, गिड़गिड़ाया और उनसे हाथ जोड़कर ₹1,50000 का इंतजाम किया। कबीर ने वह पूरा पैसा अपराधियों के बताए 'सरकारी सुरक्षा खाते' (जो वास्तव में एक फर्जी मर्चेंट अकाउंट था) में ट्रांसफर कर दिया।
जैसे ही पैसा ट्रांसफर हुआ, वीडियो कॉल अचानक कट गई। कबीर ने दोबारा कॉल करने की कोशिश की, तो वह आईडी डिलीट हो चुकी थी। कबीर कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर भागा और फर्श पर गिरकर जोर-जोर से रोने लगा। उसने अपनी जान और इज्जत बचाने के लिए खुद को एक ऐसे कमरे में बंधक बना लिया था, जहां बिना किसी दीवार के उसे लूट लिया गया था।
डिजिटल अरेस्ट के सदमे से कबीर अभी उबर भी नहीं पाया था कि उसके दोस्तों ने अपने दिए हुए पैसे वापस मांगने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। कबीर का अपना कोई वजूद नहीं बचा था। वह हर दिन अपनी इस बदहाली से निकलने का कोई न कोई रास्ता ढूंढता रहता था। इसी दौरान, फेसबुक पर स्क्रॉल करते हुए उसकी नजर एक जाने-माने और भरोसेमंद भारतीय बिजनेसमैन के वीडियो पर पड़ी। वीडियो में वह बिजनेसमैन कह रहा था:
"अगर आप भी शेयर मार्केट से हर दिन बिना किसी रिस्क के 20% से 50% का मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो हमारे विशेष वीआईपी ग्रुप से जुड़ें। हम आपको सीधे अपर सर्किट वाले स्टॉक्स और वीआईपी आईपीओ अलॉटमेंट की गुप्त जानकारी देंगे।"
कबीर को नहीं पता था कि यह वीडियो असली नहीं था, बल्कि एआई डीपफेक तकनीक के जरिए उस मशहूर बिजनेसमैन की आवाज और चेहरे को नकली रूप से तैयार किया गया था। कबीर ने नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक किया और वह तुरंत एक व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल हो गया जिसका नाम था—"एक्सीलेंस वेल्थ क्लब - सर्किट गेंस"।
ग्रुप में खुद को एक बड़ी वित्तीय संस्था का सीनियर पोर्टफोलियो मैनेजर बताने वाला व्यक्ति हर सुबह स्टॉक मार्केट के विश्लेषण और बड़ी-बड़ी बातें शेयर करता था। ग्रुप के बाकी सदस्य (जो कि वास्तव में स्कैमर्स के ही नकली रोबोटिक अकाउंट्स थे) हर रोज अपने मुनाफे के स्क्रीनशॉट डालते थे: "आज मैंने इस ग्रुप की मदद से ₹2 लाख कमाए!", "मुझे वीआईपी कोटा से टाटा के नए आईपीओ में सीधे अलॉटमेंट मिल गया!"।
कबीर ने ग्रुप के एडमिन से संपर्क किया। एडमिन ने कबीर से कहा:
"कबीर जी, अगर आप साधारण ब्रोकर ऐप से ट्रेडिंग करेंगे तो आपको कभी बड़ा मुनाफा नहीं मिलेगा। हमारी संस्था का सीधे विदेशी निवेशकों के साथ टाई-अप है। आप तुरंत हमारे द्वारा दिए गए लिंक से 'वेल्थ-मैक्स' ऐप को डाउनलोड करें। हम आपको वीआईपी संस्थागत कोटा प्रदान करेंगे, जिससे आपको हर शेयर पर पहले ही दिन से 40% का मुनाफा होगा।"
कबीर ने उस लिंक से ऐप डाउनलोड कर ली। ऐप का लेआउट इतना शानदार और पेशेवर था कि वहां लाइव शेयर बाजार के चार्ट्स, निफ्टी, सेंसेक्स और ग्लोबल मार्केट्स के आंकड़े बिल्कुल असली तरीके से चल रहे थे।
एडमिन के कहने पर कबीर ने शुरुआत में केवल ₹10,000 उस ऐप के वॉलेट में लोड किए। ट्यूटर के बताए अनुसार उसने एक पेनी स्टॉक (कम कीमत वाले शेयर) में पैसे लगाए। अगले ही दिन, उस ऐप के डैशबोर्ड पर कबीर का पोर्टफोलियो ₹10,000 से बढ़कर ₹15,000 दिखने लगा। कबीर ने जब ₹5,000 निकालने की रिक्वेस्ट डाली, तो वह पैसा तुरंत उसके बैंक खाते में आ गया।
कबीर को लगा कि भगवान ने उसकी सुन ली है। यह ऐप बिल्कुल असली है और यहां सचमुच जादुई मुनाफा हो रहा है।
अगले हफ्ते ग्रुप के ट्यूटर ने घोषणा की:
"एक बहुत बड़ा ब्लॉक डील होने वाला है। जो भी सदस्य इसमें ₹5 लाख का निवेश करेगा, उसे तीन दिनों के भीतर ₹12 लाख का रिटर्न पक्का मिलेगा। यह मौका साल में सिर्फ एक बार आता है।"
कबीर के सिर पर कर्जदारों का कर्ज चुकाने का भूत सवार था। उसने सोचा कि अगर वह ₹12 लाख कमा लेता है, तो उसका सारा कर्ज खत्म हो जाएगा और वह दोबारा अपनी इज्जत के साथ जी सकेगा। उसने अपने माता-पिता के नाम पर बने पुश्तैनी मकान के कागजात एक स्थानीय साहूकार के पास गिरवी रख दिए और ₹5 लाख का कर्ज उठा लिया। कबीर ने वह पूरे ₹5 लाख उस नकली ऐप के वीआईपी अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए।
दो दिनों के भीतर कबीर की स्क्रीन पर उसका बैलेंस बढ़कर ₹11,80,000 दिखाने लगा। कबीर की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसने कांपते हाथों से पूरे पैसे को अपने बैंक खाते में ट्रांसफर करने के लिए 'विथड्रॉ' बटन दबाया।
लेकिन पैसा खाते में नहीं आया। स्क्रीन पर लिखकर आया: "ट्रांजैक्शन पेंडिंग"।
कबीर ने तुरंत एडमिन को मैसेज किया। एडमिन ने बेहद ठंडा और प्रोफेशनल जवाब दिया:
"कबीर जी, आपका मुनाफा ₹6 लाख से अधिक हो चुका है। भारतीय आयकर विभाग के नियमों के अनुसार, आपको इस मुनाफे पर पहले 30% का 'कैपिटल गेंस टैक्स' चुकाना होगा। आपको ₹2,04,000 हमारे टैक्स अकाउंट में अलग से जमा करने होंगे, तभी आपका फंड रिलीज किया जाएगा। आप अपने मुख्य बैलेंस से यह टैक्स नहीं काट सकते।"
कबीर पूरी तरह सन्न रह गया। उसने कहा, "सर, मेरे पास अब एक रुपया भी नहीं बचा है। आप मेरे मुनाफे में से ही टैक्स काट लीजिए और बाकी पैसे मुझे दे दीजिए।"
एडमिन ने सख्त लहजे में कहा, "यह सिस्टम के नियमों के खिलाफ है। अगर आपने कल शाम तक टैक्स नहीं भरा, तो सेबी आपका अकाउंट मनी लॉन्ड्रिंग के शक में सीज कर देगी और आपके ₹5 लाख हमेशा के लिए डूब जाएंगे।"
कबीर पूरी तरह बर्बाद हो चुका था। वह समझ गया कि वह एक ऐसी आभासी दुनिया के जाल में फंस चुका था जहां स्क्रीन पर दिख रहे आंकड़े तो सच थे, लेकिन वे कभी हकीकत में उसके बैंक खाते तक नहीं पहुँचने वाले थे। उसने अपना पुश्तैनी घर भी गंवा दिया था। वह बेदम होकर फर्श पर गिर पड़ा। अपराधियों ने उसकी हर सांस, उसकी हर उम्मीद और उसके परिवार की आखिरी छत को भी अपनी तिजोरी में बंद कर लिया था। अपराधी सोशल मीडिया पर डीपफेक विज्ञापनों और प्रसिद्ध पोर्टफोलियो मैनेजरों के नाम का सहारा लेकर लोगों को झांसा देते हैं। वे पीड़ित से एक नकली ऐप डाउनलोड करवाते हैं जो बिल्कुल असली दिखती है। ऐप में दिखने वाला मुनाफा और ट्रेडिंग ग्राफ पूरी तरह से फर्जी और प्रोग्राम्ड (प्रोग्राम किया हुआ) होता है। जब पीड़ित पैसा निकालने की कोशिश करता है, तो ठग टैक्स, सेबी पेनल्टी, ट्रांसफर फीस या एक्टिवेशन चार्ज के नाम पर और अधिक पैसों की मांग करते हैं। वे कभी भी आपका पैसा वापस नहीं करते, क्योंकि वह पैसा कभी किसी शेयर बाजार में लगा ही नहीं था, बल्कि सीधे अपराधियों के बैंक खातों में जा चुका था। कभी भी व्हाट्सएप या टेलीग्राम ग्रुप के सुझावों पर किसी अनजान लिंक से ट्रेडिंग ऐप डाउनलोड न करें। भारत में केवल सेबी द्वारा रजिस्टर्ड ब्रोकर्स (जैसे ज़ेरोधा, ग्रो, एंजल वन आदि) के माध्यम से ही आधिकारिक प्ले स्टोर से ऐप डाउनलोड करके निवेश करें। निवेश करने से पहले हमेशा ब्रोकर का सेबी रजिस्ट्रेशन नंबर जरूर सत्यापित करें।
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शेयर बाजार के फर्जी ऐप में अपने पिता का पुश्तैनी मकान गिरवी रखकर पांच लाख रुपये गंवाने के बाद कबीर के घर में जैसे मातम छा गया था। साहूकार हर दिन घर के बाहर आकर मकान खाली करने की धमकियां दे रहा था। घर में दो वक्त की रोटी के लाले पड़े थे। कबीर के बीमार पिता की दवाइयां खत्म हो चुकी थीं और उनकी हालत नाजुक होती जा रही थी। कबीर ने जैसे-तैसे अपनी अलमारी के सबसे सुरक्षित कोने से अपनी मां के बचे हुए कुछ पुराने चांदी के सिक्के निकाले और उन्हें पास के एक सुनार को बेचकर ₹8,000 का इंतजाम किया।
सुनार ने कबीर के बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर कर दिए थे। अब कबीर को डॉक्टर की फीस और पिता की जीवन रक्षक दवाइयां खरीदने के लिए नकद पैसों की सख्त जरूरत थी। रात के करीब 9:30 बज रहे थे। कबीर दौड़ता हुआ गली के नुक्कड़ पर बने एक सुनसान एटीएम केबिन की तरफ गया। उस केबिन के बाहर कोई गार्ड तैनात नहीं था और वहां की लाइट भी थोड़ी मद्धम थी।
कबीर केबिन के भीतर गया। उसके पीछे ही एक और व्यक्ति, जिसने सिर पर टोपी पहनी हुई थी, केबिन के अंदर घुस आया और कबीर के ठीक पीछे खड़ा होकर फोन पर बात करने का नाटक करने लगा। कबीर उस समय अपने पिता की बीमारी की चिंता में इतना खोया हुआ था कि उसने अपने पीछे खड़े उस अजनबी पर कोई ध्यान नहीं दिया।
कबीर ने अपना एटीएम कार्ड निकाला और मशीन के कार्ड स्लॉट (जहां कार्ड डाला जाता है) में डाल दिया। लेकिन कार्ड स्लॉट के भीतर जाते ही अटक गया। कबीर ने उसे खींचने की कोशिश की, पर वह बाहर नहीं आ रहा था। मशीन की स्क्रीन पर भी कोई हलचल नहीं हो रही थी। कबीर घबरा गया और मशीन के बटनों को बेतरतीब ढंग से दबाने लगा।
तभी पीछे खड़े उस अजनबी ने बेहद मददगार लहजे में कहा:
"अरे भाई साहब, परेशान मत होइए। इस मशीन का कार्ड रीडर थोड़ा ढीला है। आप एक काम करिए, अपना पिन नंबर डालकर 'कैंसिल' का बटन दो बार दबाइए, कार्ड अपने आप बाहर आ जाएगा।"
कबीर घबराहट में था, उसने बिना सोचे-समझे उस व्यक्ति के सामने ही कीपैड पर अपना गुप्त चार अंकों का पिन नंबर दबा दिया। पीछे खड़े ठग की नजरें कबीर की उंगलियों पर टिकी थीं। उसने कबीर का पिन कोड पूरी तरह से अपने दिमाग में दर्ज कर लिया (इसे शोल्डर सर्फिंग कहते हैं)।
कबीर ने पिन डाला, लेकिन कार्ड फिर भी बाहर नहीं आया। तभी उस अजनबी ने कहा, "लाइए, मैं थोड़ा खींचकर देखता हूँ।" उसने कबीर को थोड़ा पीछे धकेला और मशीन के स्लॉट में उंगली डालकर बहुत ही चालाकी और फुर्ती से कबीर का असली एटीएम कार्ड अपनी जेब में रख लिया और उसकी जगह अपनी जेब से निकाला हुआ उसी बैंक का एक दूसरा बंद पड़ा नकली कार्ड मशीन के स्लॉट में फंसा दिया।
उसने कबीर से कहा, "भाई साहब, यह कार्ड तो बहुत बुरी तरह फंसा है। आप एक काम करिए, कल सुबह बैंक जाकर ही इसे निकलवाइएगा। अभी घर जाइए, रात बहुत हो गई है।"
कबीर को लगा कि वह सही कह रहा है। उसने मशीन में फंसे उस नकली कार्ड को अपना ही कार्ड समझकर वहीं छोड़ दिया और भारी मन से खाली हाथ केबिन से बाहर निकल आया। वह सोच रहा था कि अब वह दवाइयां कैसे खरीदेगा।
लेकिन कबीर जैसे ही एटीएम केबिन से बाहर निकलकर सड़क पर कुछ कदम आगे बढ़ा, उसके फोन पर एक के बाद एक लगातार मैसेज आने शुरू हो गए:
अलर्ट: आपके खाते से ₹5,000 नकद निकाले गए हैं।
अलर्ट: आपके खाते से ₹2,500 की शॉपिंग की गई है।
अलर्ट: आपके खाते से ₹500 का ऑनलाइन ट्रांजैक्शन सफल रहा।
कबीर के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसका एटीएम कार्ड तो मशीन में फंसा हुआ था, फिर पैसे कैसे निकल रहे थे? उसने तुरंत अपने बटुए में हाथ डाला, लेकिन वहां कार्ड नहीं था। वह भागता हुआ वापस एटीएम केबिन के अंदर गया। केबिन खाली था, वह अजनबी जा चुका था और मशीन में जो कार्ड फंसा था, वह किसी दूसरे व्यक्ति के नाम का था।
अपराधियों ने कबीर के साथ दोहरा खेल खेला था। एटीएम मशीन के कार्ड स्लॉट के ऊपर उन्होंने पहले से ही एक बेहद पतली 'स्कीमर डिवाइस' लगा रखी थी, जो कार्ड डालते ही उसके भीतर की सारी मैग्नेटिक जानकारी कॉपी कर लेती है। साथ ही, उस अजनबी ने कबीर के पीछे खड़े होकर उसका पिन देख लिया और पलक झपकते ही कबीर का असली कार्ड बदलकर उसे नकली कार्ड का धोखा दे दिया। कबीर के पिता की दवाइयों के लिए लाया गया आखिरी ₹8,000 भी अपराधियों की जेब में जा चुका था। कबीर सड़क के किनारे बैठकर अपनी बेबसी पर फूट-फूट कर रोने लगा। ठग एटीएम मशीन के कार्ड रीडर के ऊपर एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक चिप (स्कीमर) लगा देते हैं, जो कार्ड का डेटा चुरा लेती है। इसके साथ ही वे एटीएम के कीपैड के ऊपर एक छोटा गुप्त कैमरा लगा देते हैं या आपके पीछे खड़े होकर आपका पिन चुरा लेते हैं। बाद में वे आपके कार्ड का हुबहू नकली कार्ड (क्लोन) बनाकर आपके खाते से पैसे साफ कर देते हैं। मदद करने के बहाने अपराधी बहुत ही सफाई से आपका असली कार्ड बदल लेते हैं और आपको उसी बैंक का कोई पुराना या ब्लॉक कार्ड थमा देते हैं।
जब भी आप एटीएम केबिन में जाएं, तो कार्ड डालने से पहले कार्ड स्लॉट को थोड़ा खींचकर देखें कि उस पर कोई अतिरिक्त डिवाइस तो नहीं चिपकी है। अपना पिन नंबर दर्ज करते समय हमेशा दूसरे हाथ से कीपैड को पूरी तरह छुपा लें (कवर करें)। केबिन के भीतर किसी भी अजनबी को अपने करीब न आने दें और न ही किसी से मदद लें। यदि आपका कार्ड मशीन में फंस जाता है, तो तुरंत अपने बैंक के कस्टमर केयर ऐप या टोल-फ्री नंबर पर कॉल करके कार्ड को ब्लॉक करवाएं, मशीन के पास खड़े किसी अजनबी पर भरोसा न करें।
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एटीएम पर हुई ठगी के बाद कबीर के पास अपने पिता की दवाइयों के लिए एक रुपया भी नहीं बचा था। मकान गिरवी रखने के कारण साहूकार ने घर के बाहर 'यह मकान बिकाऊ है' का बोर्ड टांग दिया था। पूरा परिवार पाई-पाई को मोहताज था। तभी कबीर को याद आया कि गांव के बाहर उसकी एक छोटी सी पुश्तैनी बंजर जमीन का टुकड़ा खाली पड़ा है। वह उस जमीन को बेचने या उससे कुछ आमदनी करने के रास्ते तलाशने लगा।
ठीक उसी दौरान, कबीर के फोन पर एक कॉल आई। फोन करने वाले ने खुद को देश की एक बहुत बड़ी टेलीकॉम कंपनी का 'नोडल ऑफिसर' बताया। उसने बेहद गंभीर और प्रोफेशनल आवाज में कहा:
"नमस्कार कबीर जी, हमारी कंपनी आपके इलाके में नेटवर्क क्षमता बढ़ाने के लिए एक नया 5G मोबाइल टावर स्थापित कर रही है। हमारी सैटेलाइट मैपिंग में आपकी खाली पड़ी जमीन इस टावर के लिए बिल्कुल सही पाई गई है। अगर आप राजी हों, तो हमारी कंपनी आपको ₹30 लाख का एडवांस एग्रीमेंट अमाउंट और हर महीने ₹50,000 का किराया देगी। इसके अलावा आपके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी।"
कबीर को लगा जैसे उसकी डूबती हुई कश्ती को किनारा मिल गया हो। ₹30 लाख एडवांस और हर महीने ₹50,000 का किराया! कबीर ने बिना सोचे-समझे तुरंत हां कर दी।
अगले ही दिन कबीर के व्हाट्सएप पर सरकारी मुहर लगे हुए फर्जी एग्रीमेंट पेपर्स, कंपनी के लेटरहेड पर बकायदा अप्रूवल लेटर और भारत सरकार के दूरसंचार मंत्रालय के नाम का एक जाली एनओसी सर्टिफिकेट भेजा गया। कबीर इन कागजातों की चमक देखकर पूरी तरह उनके झांसे में आ गया।
तभी उस कथित अधिकारी का दोबारा फोन आया:
"कबीर जी, आपके सारे पेपर्स मंजूर हो चुके हैं। अब टावर की मशीनरी आपके पते पर भेजने के लिए आपको सरकारी टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस के रूप में ₹45,000 जमा करने होंगे। यह पैसा रिफंडेबल है, जो आपके ₹30 लाख के एडवांस के साथ वापस मिल जाएगा।"
कबीर के पास पैसे नहीं थे, लेकिन इस बार उसने सोचा कि ₹30 लाख मिलने वाले हैं, तो यह घाटे का सौदा नहीं है। उसने अपनी मां का बचा हुआ आखिरी छोटा सा आभूषण पड़ोसियों से मिन्नतें करके बेचा और ₹45,000 उस ठग के बताए खाते में ट्रांसफर कर दिए।
पैसे ट्रांसफर होते ही ठग का लहजा बदल गया। उसने कहा, "सर, एनओसी के लिए ₹60,000 और लगेंगे, वरना आपका पुराना पैसा भी फंस जाएगा।" कबीर को तुरंत समझ आ गया कि उसके साथ फिर से वही पुराना धोखा हुआ है। उसने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा, "मुझे कोई टावर नहीं लगवाना, मेरे ₹45,000 वापस करो वरना मैं पुलिस में शिकायत कर दूँगा!"
ठग ने बिना डरे बहुत ही ठंडी आवाज में कहा, "अच्छा, तुम पुलिस में जाओगे? अब देखो हम क्या करते हैं।" और उसने फोन काट दिया।
कबीर गुस्से में कांप रहा था। तभी अचानक उसके मोबाइल के नेटवर्क गायब हो गए। स्क्रीन पर 'नो सर्विस' लिख कर आने लगा। कबीर को लगा कि शायद कोई साधारण नेटवर्क की समस्या होगी। वह पास के एक मोबाइल स्टोर पर गया।
तभी कबीर के व्हाट्सएप पर एक नया मैसेज आया। वह उसी नोडल ऑफिसर का था:
"कबीर, तुम्हारा फोन अब हमारे कब्जे में है। अब तुम्हारी सारी पहचान हमारी हो चुकी है।"
कबीर सन्न रह गया। उसने मोबाइल स्टोर वाले को अपना फोन दिखाया। स्टोर वाले ने चेक करके बताया, "भाई साहब, आपका यह फिजिकल सिम कार्ड बंद कर दिया गया है। आपकी कंपनी से इस नंबर को 'ई-सिम' में अपग्रेड कर दिया गया है और वह ई-सिम किसी दूसरे डिवाइस में एक्टिवेट हो चुकी है।"
कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। अपराधियों ने कबीर के आधार कार्ड का विवरण, जो उसने टावर एग्रीमेंट के लिए भेजा था, उसका इस्तेमाल करके टेलीकॉम कंपनी की वेबसाइट पर जाकर कबीर के नंबर को ई-सिम में बदलने की रिक्वेस्ट डाल दी थी। उन्होंने टेलीकॉम कंपनी के प्रतिनिधि बनकर कबीर को एक फर्जी ईमेल भेजा था, जिसे कबीर ने बिना पढ़े 'कन्फर्म' कर दिया था।
जैसे ही कबीर के फोन से नेटवर्क गायब हुए, कबीर का पूरा मोबाइल नंबर अपराधियों के नए फोन में ई-सिम के रूप में चालू हो चुका था। अब कबीर के बैंक खातों के सारे ओटीपी कबीर के बजाय सीधे अपराधियों के पास जा रहे थे।
अगले ही आधे घंटे के भीतर, कबीर की ईमेल आईडी पर उसके बचे-कुचे अन्य बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर होने के अलर्ट आने लगे। अपराधियों ने कबीर के नंबर का इस्तेमाल करके उसके नाम पर तीन अलग-अलग डिजिटल लोन ऐप्स से ₹3 लाख का इंस्टेंट पर्सनल लोन भी ले लिया और उस पैसे को भी तुरंत गायब कर दिया। कबीर के पास न तो उसका फोन काम कर रहा था, न उसका नंबर उसके पास था, और अब वह बिना कोई पैसा छुए ₹3 लाख के एक नए कर्ज के जाल में फंस चुका था। वह अपने ही देश में, अपने ही घर में अपनी डिजिटल पहचान खोकर पूरी तरह बेबस खड़ा था।
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ई-सिम हाईजैक होने और अपने नाम पर हुए तीन लाख रुपये के फर्जी लोन के बाद कबीर पूरी तरह से कर्ज के ऐसे दलदल में धंस चुका था जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। पुलिस और साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद जांच की प्रक्रिया बहुत धीमी थी। इधर घर पर उसके पिता की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि अगर अगले चौबीस घंटे के भीतर पिता का ऑपरेशन नहीं हुआ, तो उनकी जान बचाना मुश्किल हो जाएगा। ऑपरेशन के लिए तुरंत पचास हजार रुपये की जरूरत थी।
हताशा और घबराहट में कबीर ने अपने घर के आखिरी कीमती सामानों पर नजर दौड़ाई। उसे लिविंग रूम में रखा अपना पुराना फ्रिज, वाशिंग मशीन और सोफा सेट दिखाई दिया। कबीर ने भारी मन से इन चीजों की तस्वीरें खींचीं और उन्हें तुरंत ओएलएक्स ऐप पर बेचने के लिए बहुत ही कम कीमत में डाल दिया। उसने विज्ञापन के शीर्षक में लिखा—"एमरजेंसी सेल, पैसों की सख्त जरूरत है।"
विज्ञापन पोस्ट करने के मात्र दस मिनट के भीतर कबीर के फोन पर एक कॉल आई। दूसरी तरफ से बेहद कड़क, अनुशासित और रोबीली आवाज सुनाई दी:
"जय हिंद कबीर जी। मैं भारतीय सेना में सूबेदार विक्रम सिंह बात कर रहा हूँ। अभी मेरी पोस्टिंग आपके नजदीकी आर्मी बेस पर हुई है। मुझे अपने नए क्वार्टर के लिए तुरंत फ्रिज और सोफे की जरूरत है। आपका सामान तस्वीरों में बहुत अच्छा दिख रहा है। मैं इसे बिना किसी मोलभाव के पैंतीस हजार रुपये में खरीदने के लिए तैयार हूँ।"
जैसे ही कबीर ने 'जय हिंद' और 'भारतीय सेना' का नाम सुना, उसके मन में उस व्यक्ति के प्रति गहरा सम्मान और विश्वास पैदा हो गया। उसने सोचा कि देश की रक्षा करने वाला एक फौजी कभी उसके साथ धोखा नहीं कर सकता।
कबीर ने कहा, "सर, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आप कब आकर सामान ले जाएंगे? मुझे पैसों की बहुत सख्त और तुरंत जरूरत है।"
फर्जी फौजी विक्रम सिंह ने कहा:
"कबीर भाई, मैं अभी ड्यूटी पर हूँ और आर्मी कैंप से बाहर नहीं आ सकता। मैं सामान उठाने के लिए शाम को सेना की गाड़ी भेज दूँगा। लेकिन पैसों का भुगतान मैं अभी ऑनलाइन कर देता हूँ ताकि डील पक्की हो जाए। सेना के सख्त नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के कारण हम सीधे बैंक ट्रांसफर या नकद लेनदेन नहीं कर सकते। हमारा पेमेंट केवल सेना के 'मर्चेंट गेटवे' के जरिए ही होता है।"
कबीर को सेना के नियमों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए उसने उसकी बात मान ली।
कुछ ही मिनटों में कबीर के व्हाट्सएप पर एक क्यूआर कोड आया। उस कोड के ऊपर बड़े अक्षरों में 'आर्मी मर्चेंट पे' और भारतीय सेना का नकली लोगो बना हुआ था।
विक्रम सिंह ने कॉल पर कहा, "कबीर जी, मैंने आपको हमारे मर्चेंट अकाउंट का एक रिसीविंग क्यूआर कोड भेजा है। आप अपने फोन-पे या गूगल-पे ऐप को खोलें, इस कोड को स्कैन करें और अपना यूपीआई पिन दर्ज करें। जैसे ही आप पिन डालेंगे, हमारी तरफ से भेजा गया पैंतीस हजार रुपया सीधे आपके खाते में क्रेडिट (जमा) हो जाएगा।"
कबीर ने घबराकर कहा, "सर, मैंने तो सुना है कि पिन डालने से पैसे खाते से कटते हैं, आते नहीं हैं।"
ठग ने जोर से हंसते हुए कहा, "अरे कबीर भाई, आप भारतीय सेना के जवान पर शक कर रहे हैं? यह कोई साधारण बैंक खाता नहीं है, यह डिफेंस का स्पेशल मर्चेंट गेटवे है। इसमें पैसे प्राप्त करने के लिए भी सुरक्षा कारणों से पिन डालना पड़ता है। अगर आपको यकीन नहीं है, तो मैं पहले आपको दो रुपये का टेस्ट कोड भेजता हूँ।"
ठग ने कबीर को दो रुपये का एक दूसरा कोड भेजा। कबीर ने उसे स्कैन किया और अपना पिन डाला। आश्चर्यजनक रूप से कबीर के खाते में दो रुपये जमा हो गए। वास्तव में, ठग ने कबीर का भरोसा जीतने के लिए खुद अपने पास से दो रुपये उसके खाते में भेजे थे।
अब कबीर का संदेह पूरी तरह खत्म हो चुका था। उसके सिर पर पिता के ऑपरेशन की घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
ठग ने कहा, "देखा कबीर जी? अब आप बिना डरे उस पैंतीस हजार रुपये वाले मुख्य कोड को स्कैन कीजिए और पिन डालिए।"
कबीर ने तुरंत अपनी यूपीआई ऐप खोली, उस मुख्य क्यूआर कोड को स्कैन किया और बिना पढ़े अपना गुप्त यूपीआई पिन दर्ज कर दिया।
पिन दर्ज करते ही कबीर के मोबाइल पर मैसेज आया:
अलर्ट: आपके खाते से ₹35,000 की राशि सफलतापूर्वक डेबिट (कट) कर ली गई है।
कबीर के सीने पर जैसे वज्रपात हुआ। उसने चिल्लाकर कहा, "सर! यह क्या हुआ? मेरे खाते से पैंतीस हजार रुपये कट गए! आने के बजाय पैसे चले गए!"
ठग ने बहुत ही सफाई से कहा, "अरे! बेहद खेद है कबीर जी। लगता है सिस्टम में कोई तकनीकी खराबी आ गई है। हमारे सर्वर ने इसे 'डबल पेमेंट' के रूप में ले लिया है। आप घबराइए मत, मैं तुरंत रिफंड कोड भेज रहा हूँ। इस बार आप इसे स्कैन करेंगे तो आपके कटे हुए पैंतीस हजार और सामान के पैंतीस हजार, यानी कुल सत्तर हजार रुपये एक साथ वापस आ जाएंगे। जल्दी कीजिए, सर्वर टाइमआउट होने वाला है।"
कबीर उस समय गहरे मानसिक तनाव और हड़बड़ाहट में था। उसका दिमाग काम करना बंद कर चुका था। कटे हुए पैसों को वापस पाने की बेताबी में उसने बिना सोचे-समझे उस दूसरे रिफंड कोड को भी स्कैन कर दिया और दोबारा पिन डाल दिया।
इस बार कबीर के खाते में बचे हुए आखिरी ₹15,000 भी साफ हो गए। कबीर के बैंक खाते का बैलेंस अब शून्य हो चुका था।
कबीर ने रोते हुए फोन पर कहा, "सर, प्लीज मेरे पैसे वापस कर दीजिए! मेरे पिता अस्पताल में हैं, वे मर जाएंगे!"
दूसरी तरफ से ठग ने एक क्रूर अट्टहास किया और कहा, "चलो भाई, जय हिंद!" और फोन काट दिया। कबीर ने दोबारा फोन मिलाया तो वह नंबर बंद आ रहा था। कबीर अपने खाली घर के फर्श पर माथा पीट-पीट कर रोने लगा। अपराधियों ने न केवल उसकी बची-कुची आखिरी संपत्ति छीन ली थी, बल्कि देश की सेना के प्रति उसके पवित्र विश्वास का भी बेरहमी से कत्ल कर दिया था।
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रात के नौ बज रहे थे। कबीर के घर में सन्नाटा था। उसके पिता की हालत गंभीर थी और डॉक्टर ने उन्हें चौबीसों घंटे ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखने की सख्त हिदायत दी थी। घर में बिजली की एक छोटी सी खराबी भी पिता की सांसों को रोक सकती थी। कबीर अभी उस सदमे से बाहर नहीं आया था जिसमें उसने ओएलएक्स फ्रॉड में अपनी आखिरी बचत खो दी थी।
तभी उसके फोन पर एक संदेश आया:
"प्रिय उपभोक्ता, आपके पिछले महीने का बिजली बिल अपडेट नहीं हुआ है। आज रात नौ बजकर तीस मिनट पर आपके घर की बिजली काट दी जाएगी। अपना बिल अपडेट करने के लिए तुरंत नीचे दिए गए नंबर पर संपर्क करें: [एक मोबाइल नंबर दिया गया था]।"
कबीर का कलेजा मुंह को आ गया। उसने तुरंत देखा कि घर की लाइटें ठीक से जल रही हैं या नहीं। उसने सोचा, "अगर बिजली कट गई तो पापा का ऑक्सीजन सपोर्ट बंद हो जाएगा।" उसने बिना एक पल गंवाए उस नंबर पर फोन लगा दिया।
फोन उठाने वाले व्यक्ति की आवाज बेहद सरकारी और सख्त थी। उसने कहा:
"बिजली विभाग से बोल रहा हूँ। आपका पिछला बिल तकनीकी कारणों से अपडेट नहीं हुआ है। अगर आप चाहते हैं कि बिजली न कटे, तो आपको तुरंत इसे अभी अपडेट करना होगा। मैं आपको हमारे विभाग का एक 'बिल अपडेट एप्लीकेशन' भेज रहा हूँ, इसे अभी डाउनलोड करके इंस्टॉल करें ताकि सर्वर से आपका बिल सिंक हो सके।"
कबीर ने घबराहट में पूछा, "सर, क्या मैं पैसे जमा कर दूँ? मेरे पास पैसे नहीं हैं, लेकिन मैं इंतजाम कर सकता हूँ।"
उस व्यक्ति ने डांटते हुए कहा, "पैसे की बात बाद में होगी, पहले आप ऐप डाउनलोड करके कनेक्शन तो बचा लीजिए। अगर 9:30 बजे तक बिल अपडेट नहीं हुआ, तो सिस्टम अपने आप कनेक्शन काट देगा, फिर हमें कॉल मत कीजिएगा।"
कबीर ने बिना सोचे उस लिंक पर क्लिक करके एक एप्लिकेशन डाउनलोड कर ली। वह वास्तव में एक 'स्क्रीन साझा करने वाला सॉफ्टवेयर' (स्क्रीन शेयरिंग ऐप) था। जैसे ही कबीर ने उसे इंस्टॉल किया, उस व्यक्ति ने कहा:
"अब अपने फोन में विभाग की आईडी डालें जो मैंने आपको दी है।"
जैसे ही कबीर ने वह आईडी डाली, कबीर के फोन की पूरी स्क्रीन उस ठग के कंप्यूटर से जुड़ गई। कबीर को लगा कि वह बिल अपडेट कर रहा है, जबकि वह ठग कबीर के फोन की हर गतिविधि देख रहा था। उस व्यक्ति ने कहा, "अब आप बैंक ऐप खोलिए और मामूली सा 'अपडेट शुल्क' यानी दस रुपये जमा कीजिए।"
कबीर ने जैसे ही अपने बैंक की एप्लिकेशन खोली, वह ठग कबीर की स्क्रीन देखकर उसका लॉगिन पिन और पासवर्ड सब देख चुका था। उसने पलक झपकते ही कबीर के फोन का एक्सेस अपने पास ले लिया। कबीर की स्क्रीन उसके हाथ से निकल चुकी थी। वह फोन पर कुछ भी दबा रहा था, लेकिन कुछ नहीं हो रहा था।
अगले ही चंद मिनटों में कबीर के बैंक खाते से एक के बाद एक कई ट्रांजैक्शन होने लगे। कबीर को समझ आ गया कि वह क्या कर बैठा है। वह चीखता रहा, "सर, यह क्या कर रहे हैं? प्लीज मेरे पिता का इलाज चल रहा है, ये पैसे मत काटिए!"
लेकिन दूसरी तरफ से वह ठग हंसते हुए बोला, "तुम्हारे पिता मरें या जिएं, हमें उससे मतलब नहीं है। यह तो तुम्हारी नादानी की सजा है।" और उसने फोन काट दिया। कबीर का फोन अब पूरी तरह से ठगों के कब्जे में था। वे कबीर के मोबाइल से ही उसके दोस्तों और रिश्तेदारों को भी मैसेज भेजकर उनसे भी पैसे की मांग करने लगे। कबीर ने बिजली कटने के डर में उस अंधेरे को अपने घर में खुद ही आमंत्रित कर लिया था।
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पिछले फ्रॉड में अपने बैंक खाते का आखिरी रुपया गंवाने के बाद कबीर पूरी तरह से टूट चुका था। उसके पिता अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे। कबीर का अपना मोबाइल नंबर भी ई-सिम फ्रॉड के कारण बंद हो चुका था, जिसके कारण वह न तो किसी को फोन कर पा रहा था और न ही अपने बैंक या पुलिस से संपर्क कर पा रहा था।
कबीर को किसी भी तरह इंटरनेट की जरूरत थी ताकि वह अपनी ईमेल आईडी खोलकर बैंक को आपातकालीन संदेश भेज सके, पुलिस की ऑनलाइन वेबसाइट पर शिकायत दर्ज करा सके और अपने किसी दूर के रिश्तेदार से मदद की गुहार लगा सके। वह भागता हुआ पास के रेलवे स्टेशन पर गया, क्योंकि उसे पता था कि वहां रेलवे का मुफ्त वाई-फाई मिलता है।
स्टेशन के प्रतीक्षालय में बैठकर कबीर ने अपने मोबाइल का वाई-फाई चालू किया। स्क्रीन पर कई नेटवर्क दिखाई देने लगे। उनमें से एक नेटवर्क का नाम था—"मुफ्त सरकारी रेलवे वाई-फाई"। इस नेटवर्क से जुड़ने के लिए किसी पासवर्ड की जरूरत नहीं थी।
कबीर ने बिना सोचे-समझे उस पर क्लिक कर दिया। वह तुरंत जुड़ गया। कबीर को लगा कि उसकी समस्या का समाधान हो गया है, लेकिन वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि अपराधियों ने वहीं पास की बेंच पर बैठकर एक छोटा सा नकली वाई-फाई डिवाइस चालू कर रखा था। अपराधियों ने इस डिवाइस का नाम जानबूझकर सरकारी वाई-फाई जैसा रखा था ताकि लोग धोखे से इससे जुड़ जाएं। कबीर ने जैसे ही इस नकली नेटवर्क से अपने फोन को जोड़ा, कबीर के फोन और इंटरनेट के बीच होने वाली हर बातचीत अब उस अपराधी के डिवाइस से होकर गुजरने लगी।
कबीर ने सबसे पहले अपनी मुख्य ईमेल आईडी और पासवर्ड डालकर लॉगिन करने की कोशिश की। जैसे ही उसने पासवर्ड दर्ज किया, वह पासवर्ड इंटरनेट पर जाने से पहले उस अपराधी के कंप्यूटर स्क्रीन पर साफ-साफ दिखाई दे गया। अपराधी ने कबीर की ईमेल का एक्सेस अपने हाथ में ले लिया।
इसके बाद, कबीर ने घबराहट में अपनी ऑनलाइन बैंकिंग वेबसाइट खोलने की कोशिश की। चूंकि उसका अपना सिम बंद था, उसने सोचा कि वह ईमेल ओटीपी के जरिए लॉगिन कर लेगा। उसने जैसे ही बैंक का यूजरनेम और पासवर्ड डाला, अपराधी ने उसे भी चुरा लिया।
यही नहीं, उस नकली वाई-फाई नेटवर्क ने कबीर के फोन में बैकग्राउंड में एक छोटा सा जासूसी सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर दिया। इस सॉफ्टवेयर ने कबीर के फोन की गैलरी में मौजूद उसके जरूरी दस्तावेज जैसे आधार कार्ड, पैन कार्ड और उसके परिवार की निजी तस्वीरें चुपचाप अपराधियों के सर्वर पर अपलोड करना शुरू कर दिया।
कबीर स्टेशन की बेंच पर बैठा सोच रहा था कि इंटरनेट धीमा चल रहा है, लेकिन वास्तव में उसके जीवन का बचा-कुचा सारा गोपनीय डेटा चोरी हो चुका था। कुछ ही मिनटों में कबीर की ईमेल आईडी का पासवर्ड बदल दिया गया और वह अपनी ही आईडी से बाहर हो गया। अब कबीर के पास न तो उसका फोन नंबर था, न उसकी ईमेल आईडी थी और न ही उसके निजी दस्तावेज सुरक्षित थे। अपराधियों ने उसकी डिजिटल पहचान को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया था और कबीर बिल्कुल असहाय होकर रह गया था।
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कबीर का डिजिटल वजूद पूरी तरह से मिट चुका था। न फोन, न बैंक खाता और न ही कोई पहचान पत्र उसके पास सुरक्षित बचा था। अस्पताल में उसके पिता की सांसें उखड़ रही थीं और डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि अगर तीन दिनों के भीतर बड़ी रकम का इंतजाम नहीं हुआ, तो वे हाथ खड़े कर देंगे। कबीर अपनी लाचारी पर रोने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा था। वह काम की तलाश में पागलों की तरह भटक रहा था।
तभी उसकी मुलाकात एक पुराने परिचित से हुई, जिसने खुद को एक अंतरराष्ट्रीय प्लेसमेंट एजेंसी का एजेंट बताया। उसने कबीर की हालत देखकर बड़े ही हमदर्दाना लहजे में कहा:
"कबीर, तुम यहाँ चंद रुपयों के लिए दर-दर भटक रहे हो, जबकि थाईलैंड की एक बहुत बड़ी तकनीकी कंपनी में डेटा एंट्री ऑपरेटर की जगह खाली है। वहां सिर्फ कंप्यूटर पर टाइपिंग का काम करना है। कंपनी तुम्हें रहने के लिए शानदार फ्लैट, मुफ्त खाना और हर महीने एक लाख बीस हजार रुपये का वेतन देगी। तुम्हारे जैसे पढ़े-लिखे लड़के के लिए यह अपनी किस्मत बदलने का सबसे बड़ा मौका है।"
एक लाख बीस हजार रुपये महीना! कबीर को लगा कि भगवान ने खुद उसके पिता की जान बचाने के लिए यह रास्ता भेजा है। उसने बिना कोई जांच-पड़ताल किए तुरंत हामी भर दी।
उस एजेंट ने कहा, "देखो कबीर, वीजा, मेडिकल चेकअप और हवाई टिकट का खर्चा तुम्हें ही उठाना होगा। इसके लिए कुल सत्तर हजार रुपये लगेंगे। नौकरी ज्वाइन करते ही कंपनी यह सारा पैसा तुम्हें वापस लौटा देगी।"
कबीर के पास एक रुपया भी नहीं था। उसने अपने एक करीबी दोस्त के आगे हाथ फैलाए, रोया-गिड़गिड़ाया और हाथ जोड़कर सत्तर हजार रुपये उधार लिए। उसने वह रकम उस एजेंट को सौंप दी। तीन दिन के भीतर कबीर के हाथ में थाईलैंड का टूरिस्ट वीजा और हवाई टिकट थमा दिया गया। कबीर ने रोती हुई मां को गले लगाया और अपने पिता के ठीक होने की उम्मीद लिए हवाई जहाज में बैठ गया। वह सोच रहा था कि वह एक महीने बाद पैसे भेजकर अपने पिता का बड़ा ऑपरेशन करवाएगा।
जैसे ही कबीर बैंकॉक के हवाई अड्डे पर उतरा, वहां पहले से मौजूद दो अजनबी आदमियों ने उसका स्वागत किया। वे कबीर को एक आलीशान गाड़ी में बैठाकर ले गए। लेकिन गाड़ी शहर की तरफ जाने के बजाय जंगलों और अनजान रास्तों की तरफ बढ़ने लगी। कबीर को थोड़ा अजीब लगा, उसने पूछा, "भाई साहब, कंपनी का दफ्तर कितनी दूर है?" लेकिन उन आदमियों ने कोई जवाब नहीं दिया।
लगभग सात घंटे के सफर के बाद, गाड़ी म्यांमार और थाईलैंड की सीमा पर स्थित एक बेहद सुनसान और कंटीले तारों से घिरे बड़े से परिसर (कैंप) के भीतर रुकी। वहां चारों तरफ बंदूकधारी गार्ड तैनात थे।
कबीर को गाड़ी से उतारा गया और एक बड़े से कमरे में ले जाया गया। वहां एक क्रूर दिखने वाले आदमी ने कबीर को देखते ही कहा, "अपना पासपोर्ट और फोन टेबल पर रख दो।"
कबीर ने घबराकर कहा, "क्यों? मैं तो यहाँ डेटा एंट्री की नौकरी करने आया हूँ। मेरा पासपोर्ट आप क्यों ले रहे हैं?"
उस आदमी ने कबीर के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा मारा। कबीर जमीन पर गिर पड़ा। उस आदमी ने कबीर के बाल पकड़कर खींचते हुए कहा:
"सुन बे लड़के, यहाँ कोई डेटा एंट्री की नौकरी नहीं है। हमने तुझे उस एजेंट से खरीदा है। अब तू हमारा गुलाम है। यह एक साइबर फ्रॉड कैंप है। अब तुझे रोज चौदह घंटे कंप्यूटर पर बैठकर भारत के सीधे-सादे लोगों को फर्जी इनवेस्टमेंट और क्रिप्टो के जाल में फंसाकर ठगी करनी होगी। अगर तूने भागने की कोशिश की या पुलिस को बताने की सोची, तो इस जंगल में तेरी लाश भी किसी को नहीं मिलेगी।"
कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे एक बड़े से हॉल में ले जाया गया, जहां उसके जैसे सैकड़ों भारतीय और एशियाई युवा कंप्यूटर स्क्रीन के सामने रोते हुए बैठे थे और बंदूक की नोक पर भारत में रहने वाले अपने ही देशवासियों को ठगने वाले फोन कॉल्स कर रहे थे। कबीर जिसे अपनी किस्मत बदलने का रास्ता समझ रहा था, वह वास्तव में एक आधुनिक गुलामी और अपराध का ऐसा नर्क था, जहां से वापस लौटने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। कबीर की आंखों के सामने उसके बीमार पिता का चेहरा घूम गया, और वह सोच रहा था कि वह अपनों को बचाने के चक्कर में खुद किस खौफनाक दलदल में फंस चुका है।
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म्यांमार के जंगलों में स्थित उस अवैध फ्रॉड कैंप में कबीर को बंधक बने हुए दो हफ्ते बीत चुके थे। हर दिन उसके सामने बंदूक की नोक पर भारतीय लोगों को फोन करके क्रिप्टो करेंसी के नाम पर ठगने का दबाव बनाया जाता था। कबीर ने काम करने से मना किया, तो उसे तीन दिनों तक एक अंधेरे कमरे में भूखा-प्यासा रखकर बेल्टों से पीटा गया। उसकी पीठ पर नीले निशान पड़ चुके थे, लेकिन उसका जमीर अभी मरा नहीं था। वह हर पल बस वहां से भागने की योजना बना रहा था।
वहां उसकी मुलाकात राघव नाम के एक अन्य भारतीय युवक से हुई, जो पिछले छह महीनों से वहां कैद था। राघव को वहां की सुरक्षा और भौगोलिक स्थिति का थोड़ा अंदाजा था। दोनों ने तय किया कि वे इस घिनौने दलदल में घुट-घुट कर मरने के बजाय भागने की कोशिश करेंगे, चाहे उसमें उनकी जान ही क्यों न चली जाए।
आधी रात को, जब मूसलाधार बारिश हो रही थी और बिजली गुल थी, कबीर और राघव ने अपनी योजना को अंजाम दिया। वे बैरक की ढीली खिड़की को तोड़कर बाहर निकले। चारों तरफ घुप्प अंधेरा था। वे कीचड़ और कंटीले तारों की परवाह किए बिना ऊंची दीवार को फांदकर घने जंगलों की तरफ भागने लगे।
पीछे से सायरन की आवाजें गूंजने लगीं। अपराधियों के सुरक्षा गार्ड टॉर्च लेकर और खूंखार कुत्तों को साथ लेकर उनके पीछे लग चुके थे। कबीर और राघव बिना पीछे मुड़े कटीली झाड़ियों और पथरीले रास्तों पर नंगे पैर भागते रहे। भागते-भागते राघव का पैर एक गहरी खाई में फिसल गया, लेकिन कबीर ने अपनी जान की बाजी लगाकर उसे ऊपर खींच लिया।
दो दिनों तक वे दोनों बिना कुछ खाए-पिए, केवल पत्तों का पानी पीकर उस अनजान देश के खौफनाक जंगलों में भटकते रहे। कबीर के पास न तो मोबाइल था, न कोई डिजिटल नक्शा और न ही कोई पहचान पत्र। वह तकनीक की दुनिया से पूरी तरह कट चुका था। इसे ही कहते हैं मजबूरन किया गया डिजिटल डिटॉक्स, जहां गूगल मैप नहीं बल्कि इंसान की अपनी अंतरात्मा और जीवित रहने की बुनियादी सूझबूझ रास्ता दिखाती है। उन्हें न तो वहां की भाषा आती थी और न ही रास्तों का पता था।
तीसरे दिन की सुबह, दोनों जैसे-तैसे घिसटते हुए म्यांमार की सीमा पार कर वापस थाईलैंड के एक छोटे से सीमावर्ती कस्बे के मुख्य मार्ग तक पहुँचे। कबीर ने एक राहगीर को देखा और हाथ जोड़कर रोने लगा। उसने टूटी-फूटी भाषा में 'इंडिया' और 'पुलिस' शब्द कहे। उस भले राहगीर ने उनकी हालत देखकर उन्हें अपनी गाड़ी में बिठाया और सीधे बैंकॉक में स्थित भारतीय दूतावास (इंडियन एम्बेसी) के सामने ले जाकर छोड़ दिया।
तिरंगे झंडे को देखते ही कबीर की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। वह घिसटता हुआ दूतावास के भीतर गया और अधिकारियों के सामने गिर पड़ा। उसने अपनी पूरी आपबीती सुनाई।
भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने तुरंत हरकत में आते हुए दोनों को सुरक्षित आश्रय दिया, उन्हें भोजन और प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराई। चूंकि कबीर का पासपोर्ट अपराधियों ने छीन लिया था, इसलिए दूतावास ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करके कबीर के लिए एक 'आपातकालीन प्रमाणपत्र' (इमरजेंसी सर्टिफिकेट) जारी किया, जो बिना पासपोर्ट के स्वदेश लौटने का एक वैध जरिया होता है। सरकारी अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों से संपर्क करके कबीर और राघव को सुरक्षित हवाई जहाज में बिठाकर भारत के लिए रवाना कर दिया।
जब हवाई जहाज ने दिल्ली के हवाई अड्डे पर लैंड किया, तो कबीर ने जमीन पर झुककर अपने देश की मिट्टी को चूमा। वह आजाद हो चुका था, लेकिन उसके मन में एक बहुत बड़ा डर था कि इन दो हफ्तों में उसके पीछे उसके बीमार पिता और लाचार मां का क्या हुआ होगा। वह अपनी टूटी हुई जिंदगी को समेटने के लिए अपने गांव की तरफ दौड़ा।
विदेश के उस नर्क जैसे साइबर कैंप से बचकर जब कबीर अपने गांव लौटा, तो घर के दरवाजे पर ताला लटका था। पड़ोसियों से पूछने पर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। कबीर की गैरमौजूदगी में उसके पिता की हालत इतनी बिगड़ गई थी कि उन्हें शहर के एक बड़े निजी अस्पताल के सघन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में भर्ती कराना पड़ा था। कबीर की मां अस्पताल के गलियारे में बैठकर दिन-रात आंसू बहा रही थी।
कबीर भागता हुआ अस्पताल पहुँचा। अपनी मां को बदहवास हालत में देखकर उसने उसे गले से लगा लिया। मां ने रोते हुए कहा, "कबीर, तेरे पिता वेंटिलेटर पर हैं। हर दिन का खर्चा हजारों में है। हमारे पास जो कुछ था, सब खत्म हो चुका है। डॉक्टर कह रहे हैं कि अगर आज रात तक दवाइयों का बिल नहीं चुकाया गया, तो वे इलाज रोक देंगे।"
कबीर अपनी मां को सांत्वना दे ही रहा था कि तभी उसके मोबाइल पर (जो उसने भारत आकर एक पुराना फोन मांगकर चालू किया था) एक अंजान नंबर से कॉल आई। दूसरी तरफ से किसी ने बेहद पेशेवर और घबराए हुए लहजे में बात की:
"क्या आप कबीर जी बोल रहे हैं? मैं सिटी लाइफलाइन अस्पताल के अकाउंट्स डिपार्टमेंट से सीनियर मैनेजर शर्मा बात कर रहा हूँ। आपके पिता वार्ड नंबर चार के बेड नंबर बारह पर भर्ती हैं और उनकी हालत बहुत नाजुक है। डॉक्टर ने तुरंत एक जीवन रक्षक इंजेक्शन और कुछ दवाइयां लिखी हैं, जिनकी कीमत पैंतालीस हजार रुपये है। अगर अगले एक घंटे के भीतर यह पैसा जमा नहीं हुआ, तो फार्मेसी दवाइयां नहीं देगी और हमें मजबूरन वेंटिलेटर सपोर्ट हटाना पड़ेगा।"
कबीर ने घबराकर कहा, "सर, मैं अभी अस्पताल के गलियारे में ही खड़ा हूँ। मैं तुरंत नीचे काउंटर पर आकर कैश जमा करता हूँ।"
उस फर्जी मैनेजर ने तुरंत टोकते हुए कहा:
"नहीं-नहीं! काउंटर पर बहुत लंबी लाइन है और वहां कैश क्लियर होने में दो घंटे का समय लगेगा। डॉक्टर के पास इतना वक्त नहीं है। आप तुरंत हमारे अस्पताल के इस ऑफिशियल यूपीआई नंबर पर पैंतालीस हजार रुपये ट्रांसफर कीजिए और मुझे व्हाट्सएप पर रसीद भेजिए। मैं सीधे आईसीयू में दवाइयां भिजवा रहा हूँ। एक-एक सेकंड कीमती है, अगर देरी हुई तो आपके पिता की जान जा सकती है।"
कबीर के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। उसने वार्ड नंबर और बेड नंबर सुना तो उसे पूरा यकीन हो गया कि यह कॉल अस्पताल के अंदर से ही है। वह यह नहीं जानता था कि इन अपराधियों के मुखबिर अस्पतालों के अंदर भी होते हैं, जो गंभीर मरीजों के परिवारों का डेटा और फोन नंबर इन ठगों को बेच देते हैं।
अपने पिता को खोने के डर से कांपते हुए कबीर ने अपने उसी दोस्त को फोन मिलाया जिससे उसने विदेश जाने के लिए पैसे लिए थे। उसने हाथ जोड़कर भीख मांगी, "भाई, मेरे पापा मर जाएंगे, मुझे आखिरी बार पैंतालीस हजार रुपये दे दे, मैं पैर पड़ता हूँ तुम्हारे।" दोस्त ने उसकी हालत देखकर जैसे-तैसे पैसे उसके खाते में ट्रांसफर किए।
कबीर ने बिना एक पल गंवाए उस कथित मैनेजर के भेजे गए यूपीआई नंबर पर पैंतालीस हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए।
पैसे भेजने के बाद कबीर राहत की सांस लेते हुए सीधे आईसीयू के दरवाजे पर गया और वहां तैनात डॉक्टर से बोला, "डॉक्टर साहब, मैंने मैनेजर शर्मा जी के कहने पर दवाइयों के पैंतालीस हजार रुपये ऑनलाइन भेज दिए हैं, प्लीज मेरे पापा को वह इंजेक्शन तुरंत लगा दीजिए।"
डॉक्टर ने हैरान होकर कबीर की तरफ देखा और कहा, "कौन शर्मा? हमारे अस्पताल में इस नाम का कोई मैनेजर नहीं है। और हमने तो अभी कोई नया इंजेक्शन नहीं लिखा है। आपके पिता की स्थिति स्थिर है। बिल का भुगतान केवल नीचे मेन काउंटर पर ही होता है, हम कभी किसी को ऑनलाइन या पर्सनल नंबर पर पैसे भेजने के लिए फोन नहीं करते।"
कबीर के सिर पर जैसे आसमान टूट पड़ा। वह भागकर नीचे काउंटर पर गया, तो वहां के स्टाफ ने साफ कह दिया कि उनके पास ऐसा कोई पैसा नहीं पहुँचा है और वह नंबर अस्पताल का नहीं है। कबीर अस्पताल के ठंडे फर्श पर बैठकर जोर-जोर से चीखने लगा। अपराधियों ने एक मरते हुए बाप की सांसों का सौदा करके एक असहाय बेटे को एक बार फिर से लूट लिया था।
अस्पताल के फर्श पर बैठकर कबीर अभी अपने पिता के नाम पर हुई ठगी के आंसू बहा ही रहा था कि उसके फोन पर एक अनजान नंबर से वीडियो कॉल आई। कबीर ने जैसे ही कॉल उठाई, सामने का दृश्य देखकर उसके होश उड़ गए। स्क्रीन पर पुलिस की नीली वर्दी पहने एक बेहद सख्त दिखने वाला अधिकारी बैठा था। उसके पीछे एक बड़ा सा बोर्ड लगा था जिस पर 'केंद्रीय जांच ब्यूरो' (सीबीआई) लिखा था और राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह भी बना हुआ था। वहां का माहौल बिल्कुल किसी असली सरकारी दफ्तर जैसा लग रहा था।
उस कथित अधिकारी ने कबीर का पूरा नाम, उसका आधार कार्ड नंबर और उसकी फोटो स्क्रीन पर दिखाते हुए बेहद कड़क आवाज में कहा:
"कबीर, तुम्हारे नाम पर ताइवान से आया एक अवैध कूरियर कस्टडी में लिया गया है। इस कूरियर के भीतर पांच ग्राम प्रतिबंधित नशीले पदार्थ (ड्रग्स), पांच फर्जी पासपोर्ट और भारी मात्रा में जाली भारतीय करेंसी मिली है। तुम्हारे बैंक खातों का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग (काले धन को सफेद करने) के लिए किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तुम्हें तुरंत 'डिजिटल अरेस्ट' किया जाता है।"
कबीर ने घबराकर चिल्लाते हुए कहा, "नहीं सर! यह झूठ है। मैं एक सीधा-साधा लड़का हूँ, मेरे पिता अस्पताल में वेंटिलेटर पर हैं। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया!"
उस फर्जी अधिकारी ने टेबल पर हाथ मारते हुए डांटा:
"चुप रहो! अपराधियों के हौसले ऐसे ही होते हैं। तुम्हारी वजह से देश की सुरक्षा खतरे में है। अब तुम अपने घर के एक बंद कमरे में जाओ। जब तक हमारी यह ऑनलाइन सरकारी जांच चल रही है, तुम इस वीडियो कॉल को काट नहीं सकते। तुम कैमरे के सामने से एक सेकंड के लिए भी नहीं हटोगे। अगर तुमने फोन काटा, किसी को आवाज दी, या कमरे से बाहर निकलने की कोशिश की, तो पुलिस की गाड़ी तुरंत तुम्हारे घर पहुंचकर तुम्हें तिहाड़ जेल में डाल देगी और तुम्हारे बूढ़े माता-पिता को भी सह-आरोपी बनाकर सलाखों के पीछे बंद कर दिया जाएगा।"
बदनामी और जेल जाने का डर, और सबसे बढ़कर अपने मरते हुए पिता को बेसहारा छोड़ देने का खौफ—कबीर का दिमाग पूरी तरह सुन्न हो गया। वह अस्पताल के एक कोने में बने खाली कमरे में घुस गया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। ठगों ने उसे लगातार तीन घंटे तक कैमरे के सामने बिठाकर रखा। वे उसे पानी पीने या शौचालय जाने की इजाजत भी नहीं दे रहे थे ताकि उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाए।
कॉल पर मौजूद दूसरा अपराधी, जो खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बता रहा था, उसने एक फर्जी अरेस्ट वारंट स्क्रीन पर दिखाया। फिर उसने कबीर को एक कथित 'रास्ता' दिखाते हुए कहा:
"देखो कबीर, तुम्हारी हालत देखकर लगता है कि तुम शायद किसी बड़े गिरोह के शिकार हुए हो। अगर तुम अपनी बेगुनाही साबित करना चाहते हो, तो तुम्हें सरकारी जांच में सहयोग करना होगा। तुम्हारे पास जितने भी पैसे बचे हैं या तुम इंतजाम कर सकते हो, उसे तुरंत हमारे 'सरकारी एस्क्रो अकाउंट' (सुरक्षित खाते) में जमा कराओ। हमारी आरबीआई की टीम आधे घंटे में इस पैसे की जांच करेगी कि यह काला धन है या नहीं। अगर तुम बेगुनाह साबित हुए, तो यह पैसा तुम्हारे खाते में तुरंत वापस आ जाएगा और तुम्हारी डिजिटल अरेस्ट खत्म कर दी जाएगी। यह पूरी जांच पूरी तरह गोपनीय है, अगर किसी तीसरे इंसान को पता चला तो तुम सीधे जेल जाओगे।"
कबीर उस वक्त सोचने-समझने की हालत में नहीं था। उसके दोस्त ने जो पैसे उसकी मां के हाथ में अस्पताल के खर्च के लिए दिए थे, कबीर ने रोते हुए मां को फोन किया और किसी तरह वह पैसे अपने खाते में मंगवाए। उसने अपनी मां से झूठ बोला कि वह अस्पताल का ही कोई काम कर रहा है। कबीर ने अपनी बची-खुची आखिरी उम्मीद, वह अस्सी हजार रुपये, ठगों के बताए गए उस 'सरकारी खाते' में ट्रांसफर कर दिए।
जैसे ही पैसे ट्रांसफर हुए, उस कथित सीबीआई अफसर ने कहा, "ठीक है, हम वेरिफिकेशन कर रहे हैं, लाइन पर रहो।" और अगले ही पल वीडियो कॉल कट गई। कबीर ने दोबारा उस नंबर पर कॉल करने की कोशिश की, लेकिन वह नंबर बंद हो चुका था।
कबीर ने कमरे का दरवाजा खोला और बाहर आकर सर पकड़कर बैठ गया। उसकी आंखों के आंसू सूख चुके थे। कानून का डर दिखाकर अपराधियों ने उसे अपने ही देश में, अपने ही सामने एक बंद कमरे में कैदी बना दिया था और उसके पास इलाज के लिए बचा आखिरी रुपया भी लूट लिया था।
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अस्पताल के आईसीयू के बाहर बैठा कबीर अब पूरी तरह से तबाह हो चुका था। उसकी जेब में एक रुपया भी नहीं बचा था। अस्पताल के प्रशासनिक स्टाफ ने आकर साफ कह दिया था कि अगर शाम तक पिछले सारे बिलों का भुगतान नहीं हुआ, तो मरीज को डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। कबीर की मां डॉक्टरों के पैर पकड़कर रो रही थी। कबीर ने अपनी सुध-बुध खो दी थी। वह अपने मोबाइल की स्क्रीन पर हताशा में बस कोई रास्ता ढूंढ रहा था।
तभी फेसबुक पर स्क्रॉल करते हुए उसकी नजर एक विज्ञापन पर पड़ी। उस पर लिखा था—"आपातकालीन लोन सेवा: बिना किसी गारंटी, बिना सिविल स्कोर और बिना किसी कागजी कार्रवाई के, सिर्फ 2 मिनट में एक लाख रुपये तक का लोन सीधे अपने बैंक खाते में पाएं। अभी नीचे दिए गए लिंक से ऐप डाउनलोड करें।"
कबीर के लिए यह डूबते को तिनके का सहारा था। उसने बिना सोचे-समझे उस लिंक पर क्लिक किया और एक अनजान ऐप को अपने फोन में इंस्टॉल कर लिया। जैसे ही ऐप खुला, उसने कुछ अनुमतियां (परमिशन) मांगी—"क्या आप इस ऐप को अपने कॉन्टैक्ट्स, गैलरी, लोकेशन और मैसेज का एक्सेस देना चाहते हैं?" कबीर उस वक्त इतनी जल्दबाजी और तनाव में था कि उसने बिना पढ़े सब पर 'अलाउ' (सहमति) पर क्लिक कर दिया। वह यह नहीं जानता था कि ऐसा करते ही उसके फोन में मौजूद सभी दोस्तों, रिश्तेदारों के फोन नंबर और उसकी निजी तस्वीरें सीधे उन अपराधियों के सर्वर पर अपलोड हो गई थीं।
कबीर ने ऐप में पचास हजार रुपये के लोन के लिए आवेदन किया। लेकिन उसके खाते में सिर्फ पांच हजार रुपये आए। कबीर हैरान रह गया। उसने ऐप पर कस्टमर केयर को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन वहां कोई नंबर नहीं था। उसने सोचा कि शायद कोई तकनीकी खराबी होगी। लेकिन असली नर्क तो अगले दिन सुबह शुरू होना था।
सुबह होते ही कबीर के फोन पर एक अनजान विदेशी नंबर से कॉल आई। दूसरी तरफ से एक आदमी बेहद अभद्र और हिंसक भाषा में बात कर रहा था:
"सुन बे कबीर! तूने जो लोन लिया है, उसके पैंतीस हजार रुपये आज दोपहर बारह बजे तक वापस आ जाने चाहिए। अगर पांच मिनट भी लेट हुआ, तो तेरा हश्र बहुत बुरा होगा।"
कबीर के होश उड़ गए। उसने कांपते हुए कहा, "भाई साहब, मेरे खाते में तो सिर्फ पांच हजार रुपये आए थे, और अभी तो सिर्फ चौबीस घंटे हुए हैं। लोन की अवधि तो सात दिन की थी!"
उस ठग ने जोर से हंसते हुए कहा:
"हमें इससे कोई मतलब नहीं है कि तेरे खाते में क्या आया। हमारे सिस्टम में पैंतीस हजार का बकाया दिख रहा है। अगर पैसे नहीं आए, तो तेरे फोन की जो पूरी कॉन्टैक्ट लिस्ट हमारे पास है, हम उन सभी पांच सौ लोगों को फोन करके बताएंगे कि तू एक नंबर का चोर और जालसाज है। और सुन, तेरी गैलरी से जो तेरी मां और बहन की तस्वीरें हमारे पास आई हैं, उन्हें हम अश्लील तरीके से एडिट (मॉर्फ) करके इंटरनेट पर डाल देंगे और तेरे सभी रिश्तेदारों को व्हाट्सएप पर भेज देंगे।"
कबीर का पूरा शरीर पसीने से भीग गया। दोपहर के बारह बजते ही अपराधियों ने अपनी धमकी को सच कर दिखाया। कबीर के चाचा, उसके मकान मालिक, उसके कॉलेज के दोस्तों और उसकी बहन की सहेलियों के मोबाइल पर एक व्हाट्सएप मैसेज पहुंचने लगा। उस मैसेज में कबीर की बहन की चेहरे को एक बेहद आपत्तिजनक तस्वीर के साथ जोड़कर (मॉर्फ करके) भेजा गया था, और नीचे लिखा था कि "इस परिवार ने लोन लिया है और यह लड़की कर्ज चुकाने के लिए भागी हुई है।"
कबीर को एक-एक करके उसके रिश्तेदारों के फोन आने लगे। हर कोई उसे जलील कर रहा था, उस पर थू-थू कर रहा था। उसकी बहन रोते-रोते बेहोश हो गई। कबीर अस्पताल की छत पर भागा। उसे लगा कि उसके कारण उसके पूरे परिवार की इज्जत सरेबाजार नीलाम हो गई है। समाज में मुंह दिखाने लायक कुछ नहीं बचा था। वह छत की मुंडेर पर खड़ा हो गया और नीचे देखने लगा। उसका दिमाग चीख-चीख कर कह रहा था कि इस बदनामी से बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है—छत से कूदकर अपनी जान दे देना। अपराधियों ने महज कुछ हजार रुपयों के जाल में फंसाकर एक हंसते-खेलते परिवार को खुदकुशी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था।
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अस्पताल की ठंडी छत की मुंडेर पर खड़ा कबीर नीचे कंक्रीट की सड़क को देख रहा था। हवा के तेज झोंके उसके चेहरे पर लग रहे थे। उसकी आंखों के सामने अपनी बहन का रोता हुआ चेहरा और समाज के ताने गूंज रहे थे। उसने अपनी आंखें बंद कीं और जैसे ही अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाया, अचानक एक मजबूत हाथ ने उसकी कमीज को पीछे से पकड़ा और एक झटके के साथ उसे फर्श पर खींच लिया।
कबीर हांफते हुए जमीन पर गिरा। उसके सामने सफेद बालों वाले एक साठ वर्षीय बुजुर्ग खड़े थे, जिनकी आंखों में गजब की चमक और अनुशासन था। उनका नाम रघुनाथ प्रसाद था, जो राज्य पुलिस के साइबर सेल विभाग से वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे और अस्पताल में अपनी पत्नी के इलाज के लिए आए थे।
रघुनाथ जी ने कबीर को डांटते हुए लेकिन बेहद वात्सल्य भरे लहजे में कहा:
"कायरों की तरह जान देना बहुत आसान है लड़के! लेकिन जिन अपराधियों ने तुम्हारी बहन की अस्मत को सरेबाजार नीलाम किया है, वे इस वक्त जश्न मना रहे होंगे। क्या तुम अपनी मौत से उन्हें जिताना चाहते हो? उठो और अपनी इस लाचारी को एक हथियार में बदलो।"
कबीर रो पड़ा और उसने अस्पताल के फ्रॉड से लेकर फर्जी लोन ऐप की ब्लैकमेलिंग तक की अपनी पूरी कहानी उन्हें सुना दी। रघुनाथ जी ने उसकी पीठ पर हाथ रखा और कहा, "कबीर, तुमने तकनीक की मार झेली है, अब तुम तकनीक और कानून की ताकत देखोगे। ये ब्लैकमेलर्स सिर्फ तुम्हारे डर पर जिंदा हैं। जैसे ही तुम डरना बंद करोगे, इनका साम्राज्य ढह जाएगा।"
रघुनाथ जी कबीर को तुरंत अस्पताल के एक खाली केबिन में ले गए। उन्होंने कबीर का फोन लिया और सबसे पहले उस फर्जी लोन ऐप को अनइंस्टॉल किया। इसके बाद उन्होंने कबीर के फोन की सेटिंग्स में जाकर सभी अनजान कॉल को ब्लॉक करने का विकल्प चालू कर दिया।
उन्होंने कबीर को बिठाकर समझाया कि कैसे ये गिरोह काम करते हैं:
"ये फर्जी लोन ऐप असल में भारत के बाहर बैठे आकाओं द्वारा संचालित होते हैं, जो भारत में मौजूद कुछ लालची युवाओं को कमीशन पर रखकर इन कॉल सेंटरों को चलाते हैं। इनके पास कोई कानूनी लाइसेंस नहीं होता। ये तुम्हें कभी अदालत नहीं ले जा सकते क्योंकि ये खुद गैरकानूनी हैं।"
रघुनाथ जी के मार्गदर्शन में कबीर ने एक सक्रिय कदम उठाया। उसने अपने फोन से राष्ट्रीय साइबर अपराध शिकायत पोर्टल पर लॉगिन किया। कबीर ने उन सभी नंबरों की सूची, उनके द्वारा भेजे गए धमकी भरे मैसेज और उस फर्जी ऐप का डाउनलोड लिंक पोर्टल पर अपलोड कर दिया। इसके साथ ही उसने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सचेत पोर्टल पर भी उस अनधिकृत डिजिटल ऋण प्रदाता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।
रघुनाथ जी ने कबीर से एक बेहद हिम्मत भरा काम करवाया। उन्होंने कबीर के सभी व्हाट्सएप ग्रुप और सोशल मीडिया हैंडल पर एक स्पष्ट संदेश लिखवाया:
"सभी मित्रों और रिश्तेदारों को सूचित किया जाता है कि मेरा फोन एक अंतरराष्ट्रीय साइबर ठग गिरोह द्वारा हैक कर लिया गया है। वे मेरी संपर्क सूची का दुरुपयोग करके जाली और छेड़छाड़ की गई (मॉर्फ्ड) तस्वीरों के माध्यम से धन उगाही की कोशिश कर रहे हैं। इस संबंध में साइबर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करा दी गई है। कृपया ऐसे किसी भी कॉल या मैसेज पर ध्यान न दें और उसे तुरंत ब्लॉक करें।"
जैसे ही यह संदेश कबीर के रिश्तेदारों तक पहुँचा, ब्लैकमेलरों की शक्ति आधी रह गई। समाज का जो डर कबीर को मार रहा था, वह सहानुभूति और अपराधियों के प्रति गुस्से में बदल गया।
इतना ही नहीं, रघुनाथ जी ने अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके स्थानीय साइबर सेल की टीम को सक्रिय किया। कबीर द्वारा दिए गए बैंक खातों के विवरण (जिनमें उसने पैसे ट्रांसफर किए थे) के आधार पर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन खातों को तुरंत फ्रीज (लेन-देन पर रोक) करवा दिया। पुलिस ने जब उन खातों के आईपी एड्रेस (इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस) को ट्रैक किया, तो पता चला कि यह गिरोह दिल्ली के पास एक किराए के मकान से एक फर्जी कॉल सेंटर चला रहा था।
अगली ही सुबह, पुलिस ने उस ठिकाने पर छापेमारी करके पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया, जिनके पास से सैकड़ों मोबाइल फोन और भारतीय नागरिकों का चुराया गया डेटा बरामद हुआ। कबीर, जो कल तक आत्महत्या करने जा रहा था, आज उसकी सूझबूझ और हिम्मत के कारण एक बहुत बड़े गिरोह का पर्दाफाश हो चुका था। अस्पताल प्रशासन को भी जब पुलिस की इस कार्रवाई और कबीर के साथ हुए फ्रॉड का पता चला, तो उन्होंने मानवीय आधार पर उसके पिता के इलाज का खर्च माफ कर दिया और उनके बेहतर इलाज की जिम्मेदारी ली। कबीर की आंखों में अब लाचारी के आंसू नहीं थे, बल्कि एक नया आत्मविश्वास था। वह समझ चुका था कि डिजिटल युग की लड़ाइयां डरकर नहीं, बल्कि जागरूक होकर जीती जाती हैं।
27
कबीर के जीवन का सबसे कठिन संघर्ष अब अपनी जीत की दहलीज पर था। अस्पताल के डॉक्टरों की बेहतरीन कोशिशों और कबीर की अटूट हिम्मत के कारण उसके पिता पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद, कबीर अपने पिता का हाथ थामे और अपनी मां को साथ लेकर एक ऑटो रिक्शा में बैठकर वापस अपने प्यारे घर की ओर लौट रहा था। ऑटो की खड़खड़ाहट के बीच कबीर के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। उसे लग रहा था कि उसने जिंदगी की सबसे बड़ी जंग जीत ली है।
तभी अचानक उसकी मां के साधारण कीपैड वाले फोन पर एक अनजान नंबर से घंटी बजी। मां ने जैसे ही फोन उठाकर कान से लगाया, उनका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया। उनके हाथ कांपने लगे और फोन सीधे उनके हाथ से नीचे गिर गया।
कबीर ने घबराकर फोन उठाया और मां से पूछा, "क्या हुआ मां? किसका फोन है?"
मां ने बदहवास होकर बगल में बैठे कबीर को देखा और फिर फोन की तरफ इशारा करते हुए कांपती आवाज में कहा, "कबीर... फोन पर तू रो रहा है! तू कह रहा है कि तेरा बहुत बुरा एक्सीडेंट हो गया है और तू सड़क पर तड़प रहा है!"
कबीर ने तुरंत फोन को अपने कान से लगाया। फोन के स्पीकर से जो आवाज आ रही थी, उसे सुनकर खुद कबीर के रोंगटे खड़े हो गए। वह आवाज किसी और की नहीं, बल्कि खुद कबीर की थी। वही लहजा, वही घबराहट, वही भारीपन और वही रोने की आवाज:
"मां! बचा लो मुझे मां! मैं शहर के बाईपास हाईवे पर तड़प रहा हूँ। एक तेज रफ्तार ट्रक ने मेरी बाइक को टक्कर मार दी है। मेरा पैर टूट गया है और बहुत खून बह रहा है। यहां के लोग मुझे अस्पताल ले जाने के लिए एक लाख रुपये तुरंत मांग रहे हैं। मां, तुम इसी वक्त इस नंबर पर एक लाख रुपये भेज दो, नहीं तो मैं मर जाऊंगा मां! प्लीज जल्दी करो!"
कबीर दंग रह गया। वह खुद अपनी मां के बगल में सुरक्षित बैठा था, लेकिन फोन पर उसकी अपनी ही आवाज में कोई मौत की भीख मांग रहा था। कबीर ने गहरी सांस ली और फोन पर बहुत शांत होकर पूछा, "तुम कौन बोल रहे हो?"
जैसे ही कबीर की असली आवाज फोन के उस पार पहुँची, वहां कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया। फिर एक भारी, कर्कश आवाज गूंजी, "अरे यार, ये तो खुद ही लाइन पर आ गया!" और फोन तुरंत कट गया।
कबीर समझ गया कि यह एआई डीपफेक वॉइस क्लोनिंग (कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित आवाज की नकल) का खेल था। उसने अपनी मां को गले से लगाया और उनके बहते आंसुओं को पोंछते हुए शांत कराया, "मां, डरो मत। मैं आपके पास बिल्कुल ठीक बैठा हूँ। यह मेरी आवाज नहीं थी, बल्कि कंप्यूटर से बनाई गई मेरी नकली आवाज थी।"
कबीर ने अपनी मां और पिता को विस्तार से समझाया कि यह तकनीक कैसे काम करती है:
"आजकल इंटरनेट पर ऐसे कई एआई टूल्स मौजूद हैं जो किसी भी इंसान की केवल तीन सेकंड की आवाज का नमूना (ऑडियो सैंपल) सुनकर उसकी हूबहू नकल तैयार कर सकते हैं। अपराधियों ने मेरे यूट्यूब वीडियो या सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए मेरे किसी पुराने वीडियो से मेरी आवाज का टुकड़ा चुराया और सॉफ्टवेयर में डालकर यह नकली रोने वाली आवाज तैयार कर ली। वे जानते थे कि एक्सीडेंट की खबर सुनकर कोई भी मां बिना सोचे-समझे तुरंत पैसे ट्रांसफर कर देगी।"
कबीर ने तुरंत उस नंबर को ब्लॉक किया और स्थानीय साइबर पुलिस स्टेशन को सूचित किया। कबीर ने महसूस किया कि इस पूरे सफर में उसने जितने भी दुखों और ठगियों का सामना किया था, वे सभी केवल उसकी अज्ञानता और डर के कारण सफल हुए थे। उसने तय किया कि वह अब कभी किसी को डिजिटल दुनिया का शिकार नहीं बनने देगा।
कबीर ने अपने घर पहुंचकर अपने कमरे में बैठकर एक बड़ा संकल्प लिया। उसने एक डायरी निकाली और पूरे समाज के लिए डिजिटल सुरक्षा का एक अंतिम नियम (गोल्डन रूल) लिखा:
"जब भी कोई तकनीक आपको डराए, आपको बहुत बड़ी रकम का लालच दे, या आपके अपनों की जान का वास्ता देकर तुरंत पैसे मांगे, तो सबसे पहले अपने कदम रोकिए। तीन मिनट का सन्नाटा रखिए, सीधे संबंधित व्यक्ति से संपर्क कीजिए और ठंडे दिमाग से जांच कीजिए। आपका डर ही अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत है।"
कबीर अब एक साधारण पीड़ित नहीं था। वह एक ऐसा सजग नागरिक बन चुका था जिसने तकनीक के हर काले चेहरे को बेनकाब किया था। उसने अपने पिता की मुस्कुराती आंखों और मां के माथे की शिकन के मिटने में ही अपनी असली जीत देखी। डिजिटल के इस चक्रव्यूह से कबीर पूरी तरह बाहर आ चुका था—जागरूक, निडर और सुरक्षित।
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सुबह की ताजी धूप कबीर के छोटे से घर के आंगन में बिखरी हुई थी। तुलसी के पौधे के पास बैठी उसकी मां आज बहुत दिनों बाद चैन से पूजा की थाली सजा रही थी। बरामदे में बैठे कबीर के पिता हाथ में चाय का प्याला थामे अखबार पढ़ रहे थे। उनके चेहरे की झुर्रियों में अब बीमारी का पीलापन नहीं, बल्कि एक गरिमापूर्ण सुकून था। अपने पिता को इस तरह स्वस्थ और सुरक्षित देखना कबीर के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी थी।
लेकिन कबीर की मंजिल सिर्फ अपने परिवार को बचाने तक सीमित नहीं थी। उसने जो जख्म सहे थे, वे उसे सोने नहीं दे रहे थे। वह जानता था कि इस देश में न जाने कितने ही कबीर रोज इन अदृश्य अपराधियों के हाथों अपनी इज्जत, अपना पैसा और कभी-कभी अपनी जान भी गंवा देते हैं। कबीर ने अपनी मेज पर बैठकर एक बड़ा संकल्प पूरा किया। उसने पिछले छह महीनों में अपने साथ हुए हर एक फ्रॉड—चाहे वह विदेश का साइबर कैंप हो, फर्जी पार्सल घोटाला हो, अस्पताल का बिल फ्रॉड हो, डिजिटल अरेस्ट हो, या एआई वॉइस क्लोनिंग हो—इन सभी का एक-एक बारीक ब्योरा अपनी डायरी में दर्ज किया।
कबीर ने इस डायरी को एक बेहद सरल और गहरी मार्गदर्शिका (मैनुअल) का रूप दिया, जिसका शीर्षक उसने रखा: 'डिजिटल चक्रव्यूह और अभिमन्यु'। इस किताब में उसने केवल अपनी आपबीती नहीं लिखी थी, बल्कि हर एक अपराध के पीछे का विज्ञान, अपराधियों की मनोवैज्ञानिक चालें और उनसे बचने के अचूक कानूनी और तकनीकी रास्ते लिखे थे। यह किताब विशेष रूप से उन युवाओं, विद्यार्थियों और सिविल सेवा परीक्षा (यूपीएससी) की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए थी, जो देश की प्रशासनिक व्यवस्था को संभालने वाले हैं और जिन्हें इन खतरों की सबसे गहरी समझ होनी चाहिए।
कबीर के इस काम की गूंज राज्य के गृह मंत्रालय और साइबर पुलिस विभाग तक पहुँची। कबीर के गुरु और मार्गदर्शक, सेवानिवृत्त पुलिस अधीक्षक रघुनाथ प्रसाद ने इस पूरी मार्गदर्शिका को सरकार के सामने प्रस्तुत किया। सरकार दंग रह गई कि एक आम लड़के ने इतनी गहराई और सटीकता के साथ पूरे देश के सामने आने वाले सबसे बड़े खतरे का समाधान लिख दिया था।
एक दिन कबीर के पास राज्य के मुख्यमंत्री कार्यालय से सीधा आमंत्रण आया। शहर के सबसे बड़े सभागार में एक भव्य राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा सम्मेलन का आयोजन किया गया था। कबीर को वहां मुख्य वक्ता और सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।
सभागार खचाखच भरा हुआ था। सामने देश के बड़े-बड़े पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक सेवा के अफसर, न्यायविद् और हजारों की संख्या में युवा और छात्र बैठे थे। जब कबीर का नाम पुकारा गया, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कबीर अपनी मां और पिता का आशीर्वाद लेकर मंच पर पहुँचा। उसके चेहरे पर कोई अहंकार नहीं था, बल्कि एक गंभीर जिम्मेदारी का भाव था।
कबीर ने पोडियम पर खड़े होकर सीधे दर्शकों की आंखों में देखते हुए अपनी बात शुरू की:
"मेरे आदरणीय बुजुर्गों और मेरे युवा साथियों, जब हम 'डिजिटल इंडिया' की बात करते हैं, तो हमें गर्व होता है कि आज देश का आखिरी नागरिक भी तकनीक से जुड़ चुका है। लेकिन इस चमकते हुए डिजिटल सूरज के पीछे एक बहुत गहरा अंधेरा भी है। अपराधी आपके घरों की दीवारें लांघकर आपके कमरों में नहीं आते, वे आपके हाथों में मौजूद इस छोटे से मोबाइल स्क्रीन के जरिए आपके दिमाग में घुसते हैं। वे आपकी ममता को लूटते हैं, आपके पिता के बुढ़ापे की लाचारी का सौदा करते हैं, और कानून का खौफ दिखाकर आपको अपने ही घर में नजरबंद कर देते हैं।"
पूरे सभागार में सन्नाटा छा गया। हर कोई कबीर की एक-एक बात को अपने दिल से महसूस कर रहा था। कबीर ने आगे कहा:
"तकनीक बुरी नहीं है, लेकिन हमारी अज्ञानता और हमारा डर बुरा है। आज मैं आप सभी से यह वादा लेने आया हूँ कि जब भी कोई अनजान कॉल आपको डराए या लालच दे, तो घबराइए मत। सवाल पूछिए, पुष्टि कीजिए और याद रखिए कि भारत का कानून आपकी सुरक्षा के लिए है। अगर हम जागरूक हैं, तो कोई भी अपराधी हमें हमारे ही देश में बंधक नहीं बना सकता। आइए मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करें जो डिजिटल भी हो और पूरी तरह सुरक्षित भी हो।"
जैसे ही कबीर का भाषण समाप्त हुआ, मंच पर खुद राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और गृह मंत्री आए। उन्होंने कबीर को अंगवस्त्र पहनाकर और 'राज्य मानद साइबर सुरक्षा दूत' (स्टेट ऑनररी साइबर सिक्योरिटी एंबेसडर) की उपाधि से सम्मानित किया। सरकार ने कबीर की लिखी इस मार्गदर्शिका को राज्य के सभी स्कूलों, कॉलेजों और प्रशासनिक प्रशिक्षण अकादमियों में अनिवार्य रूप से वितरित करने का निर्णय लिया।
कबीर ने मंच से नीचे उतरकर सबसे पहले अपनी मां और पिता के पैर छुए। उसकी मां ने रोते हुए उसके माथे को चूम लिया। कबीर के पिता ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, "बेटा, आज तूने सिर्फ हमारा सिर गर्व से ऊंचा नहीं किया, बल्कि तूने लाखों परिवारों के चिरागों को बुझने से बचा लिया है। तूने अपनी हार को देश की जीत बना दिया।"
कबीर ने मुस्कुराते हुए आसमान की तरफ देखा। उसे लगा कि उसकी आत्मा पर लगा हर एक घाव आज पूरी तरह भर चुका था। वह समझ चुका था कि जब इंसान दूसरों के आंसुओं को पोछने का बीड़ा उठा लेता है, तो कुदरत खुद उसके सारे दुखों का अंत कर देती है। कबीर की यह यात्रा अब एक महा-अभियान का रूप ले चुकी थी।
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कबीर को 'मानद साइबर सुरक्षा दूत' बने अभी कुछ ही हफ्ते बीते थे। उसकी लिखी मार्गदर्शिका पूरे देश के युवाओं के लिए एक ढाल बन रही थी। वह लगातार अलग-अलग राज्यों में जाकर पुलिस अकादमियों और विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दे रहा था। कबीर की यह कामयाबी सरहद पार बैठे उस शख्स को चुभ रही थी, जो इस पूरे काले साम्राज्य का बेताज बादशाह था।
कंबोडिया और म्यांमार के जंगलों में फैले उस कुख्यात चीनी साइबर कैंप का मुख्य सरगना, जिसका नाम श्याओ था, अपनी आलीशान बंकरनुमा कोठरी में बैठा कबीर की तस्वीरें स्क्रीन पर देख रहा था। कबीर वही लड़का था जो उसके चंगुल से जिंदा भाग निकलने में कामयाब रहा था और अब उसकी ही वजह से भारत में श्याओ के दर्जनों फर्जी कॉल सेंटर बंद हो चुके थे और उसके सैकड़ों बैंक खाते फ्रीज हो चुके थे।
श्याओ ने गुस्से में अपने हाथ में पकड़ा कांच का गिलास दीवार पर दे मारा और अपने भारतीय गुर्गे से गुर्राते हुए कहा:
"यह लड़का हमारे लिए वायरस बन चुका है। इसने हमारे धंधे को करोड़ों का नुकसान पहुँचाया है। इसे शारीरिक रूप से मारना बहुत आसान है, लेकिन मैं इसे ऐसे नहीं मरने दूंगा। मैं इसकी देशभक्ति, इसके चरित्र और इसकी आत्मा को पूरे भारत के सामने इस कदर बदनाम कर दूंगा कि यह खुद अपने हाथों अपनी जिंदगी खत्म करने पर मजबूर हो जाए।"
अगले ही दिन, कबीर की दुनिया एक बार फिर पूरी तरह पलट गई। कबीर सुबह जब सोकर उठा, तो उसके घर के बाहर मीडिया कर्मियों की भारी भीड़ जमा थी। पुलिस की दो गाड़ियां सायरन बजाती हुई उसके दरवाजे पर आकर रुकीं। कबीर के पिता ने घबराकर दरवाजा खोला, तो सामने स्थानीय पुलिस बल के साथ केंद्रीय खुफिया विभाग के अधिकारी खड़े थे।
अधिकारी ने कबीर को आगे धकेलते हुए बेहद सख्त लहजे में कहा:
"कबीर, तुम्हें देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने, देशद्रोही ताकतों के साथ मिलकर भारत के संवेदनशील डेटा को सरहद पार बेचने और विदेशी ताकतों से अवैध रूप से करोड़ों रुपये की फंडिंग लेने के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है।"
कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने चिल्लाकर कहा, "सर! यह नामुमकिन है। मैं तो खुद देश को साइबर अपराधों से बचाने का काम कर रहा हूँ!"
अधिकारी ने एक टैबलेट कबीर के सामने किया, जिस पर साइबर पुलिस के मुख्यालय की फॉरेंसिक रिपोर्ट खुली हुई थी। उस रिपोर्ट को देखकर कबीर का गला सूख गया। अपराधियों ने कबीर के खिलाफ एक ऐसा अचूक और बेहद जटिल डिजिटल चक्रव्यूह रचा था जिसे काटना लगभग नामुमकिन था:
जाली बैंक खाते और विदेशी फंडिंग: कबीर के पैन कार्ड और आधार कार्ड का दुरुपयोग करके अपराधियों ने रात ही रात में तीन फर्जी शेल कंपनियां (कागजी कंपनियां) बनाई थीं, जिनके जरिए कबीर के असली बैंक खाते में कंबोडिया और म्यांमार के संदेहास्पद खातों से सीधे पचास लाख रुपये ट्रांसफर किए गए थे।
छेड़छाड़ की गई चैट (मॉर्फ्ड चैट): कबीर के सोशल मीडिया अकाउंट को हैक करके उसमें एआई टूल्स के जरिए फर्जी चैट हिस्ट्री (बातचीत का ब्योरा) डाल दी गई थी, जिसमें यह दिखाया गया था कि कबीर कंबोडिया के उसी कुख्यात साइबर कैंप के मालिकों के साथ संपर्क में था और उन्हें भारतीय नागरिकों का गोपनीय डेटा बेच रहा था।
डीपफेक वीडियो का जाल: इंटरनेट पर कबीर का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा था, जिसमें वह देश के सुरक्षा तंत्र का मजाक उड़ाते हुए देश विरोधी बातें कह रहा था। वह वीडियो कबीर के चेहरे और उसकी आवाज को एआई की मदद से इतनी बारीकी से जोड़कर बनाया गया था कि कोई भी आम इंसान उसे नकली नहीं कह सकता था।
कबीर के पिता अपनी छाती पकड़कर बैठ गए और उसकी मां दहाड़ें मारकर रोने लगी। कबीर को पुलिस की गाड़ी में बिठाया गया। जो मीडिया कल तक कबीर को देश का नायक बता रहा था, आज वही उसे 'साइबर गद्दार' और 'विदेशी एजेंट' घोषित कर चुका था।
कबीर को सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया। जेल की उस अंधेरी कोठरी में बैठकर कबीर को समझ आ गया कि यह श्याओ का अंतिम और सबसे क्रूर वार था। श्याओ ने कबीर को उसी तकनीक से मारने की साजिश रची थी जिसका मुकाबला करना कबीर दूसरों को सिखा रहा था।
लेकिन कबीर इस बार टूटने वाला नहीं था। उसने अपनी बंद आंखें खोलीं और खुद से कहा, "श्याओ, तुमने कबीर को बदनाम करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया है, लेकिन तुम भूल गए कि तकनीक का हर कदम अपने पीछे एक डिजिटल फुटप्रिंट (निशान) छोड़ जाता है। मैं हार नहीं मानूंगा।"
कबीर ने जेल के भीतर से ही अपने गुरु रघुनाथ प्रसाद से मिलने की गुहार लगाई। जब रघुनाथ जी उससे मिलने जेल पहुँचे, तो कबीर की आंखों में खौफ नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। कबीर ने उनके कान में कहा, "सर, यह हमला हमारे ऊपर नहीं हुआ है, यह अपराधियों ने खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी है। उन्होंने कबीर को फंसाने की जल्दबाजी में कंबोडिया के मुख्य सर्वर का जो एक्सेस कोड इस्तेमाल किया है, वही कोड अब उनके विनाश का कारण बनेगा।" कबीर ने रघुनाथ जी को एक बेहद गुप्त डिजिटल योजना समझाई, जो सीधे श्याओ के साम्राज्य की जड़ तक पहुँचने वाली थी। आखिरी जंग शुरू हो चुकी थी।
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जेल की कालकोठरी की सलाखों के पीछे कबीर जमीन पर घुटने टेके बैठा था। उसके दोनों हाथ पीछे बंधे थे और सामने एक छोटा सा लैपटॉप रखा था, जिसे केंद्रीय जांच एजेंसी के विशेष साइबर दस्ते के प्रमुख और रघुनाथ जी ने एक गुप्त समझौते के तहत वहां पहुँचाया था। कबीर की बेगुनाही साबित करने का यही आखिरी मौका था। बाहर मीडिया कबीर को देश का सबसे बड़ा गद्दार घोषित कर चुका था, लेकिन कोठरी के भीतर का सन्नाटा एक बड़े तूफान की गवाही दे रहा था।
कबीर ने अपनी बंद आंखें खोलीं। उसने गहरी सांस ली और रघुनाथ जी की तरफ देखकर सिर हिलाया। रघुनाथ जी ने तुरंत जांच एजेंसी के सर्वर से कबीर के लैपटॉप को जोड़ दिया। कबीर की उंगलियां कीबोर्ड पर बिजली की गति से चलने लगीं।
कबीर जानता था कि श्याओ ने उसे फंसाने के लिए जिस सर्वर का उपयोग किया था, वह कंबोडिया के जंगलों में स्थित उसके गुप्त बंकर से संचालित हो रहा था। कबीर ने सीधे श्याओ के मुख्य नेटवर्क पर हमला करने के बजाय एक बेहद चालाक चाल चली, जिसे तकनीकी भाषा में 'हनीपॉट' (अपराधियों को लालच देकर फंसाने वाला जाल) कहा जाता है।
कबीर ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक नकली वीडियो संदेश अपलोड किया, जिसे केवल श्याओ के सर्वर के आईपी एड्रेस पर ही देखा जा सकता था। उस वीडियो में कबीर ने बेहद लाचार और हारा हुआ बनकर कहा:
"श्याओ, तुम जीत गए। भारत सरकार मुझे फांसी देने जा रही है। मेरे पास अब खोने के लिए कुछ नहीं है। अगर तुम मुझे इस देश से सुरक्षित बाहर निकाल सको, तो मैं भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसी का वह पूरा गोपनीय डेटा तुम्हें सौंप दूंगा जो मैंने पुलिस के सर्वर से चुराकर एक गुप्त ड्राइव में रखा है। इस डेटा को डाउनलोड करने की चाबी (डिक्रिप्शन की) केवल मेरे पास है।"
कंबोडिया के बंकर में बैठा श्याओ इस झांसे में आ गया। भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा डेटा हासिल करने का लालच उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ। उसने बिना सोचे-सामझे उस गुप्त ड्राइव के लिंक पर क्लिक कर दिया।
जैसे ही श्याओ ने उस लिंक को खोला, कबीर के लैपटॉप पर लाल बत्ती जल उठी। कबीर के चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान तैर गई। उसने कहा, "पकड़े गए श्याओ!"
श्याओ के क्लिक करते ही कबीर द्वारा बनाया गया एक अत्यंत शक्तिशाली 'रिवर्स ट्रैकिंग पेलोड' (उल्टा रास्ता ढूंढने वाला डिजिटल कोड) श्याओ के मुख्य कंप्यूटर में प्रवेश कर गया। इस कोड ने पलक झपकते ही श्याओ के सर्वर के सभी सुरक्षा घेरों (फायरवॉल) को तोड़ दिया और उसका पूरा कच्चा-चिट्ठा बाहर निकाल लिया:
सच्चाई का पर्दाफाश: कबीर के खाते में ट्रांसफर किए गए पचास लाख रुपये और सोशल मीडिया पर बनाई गई नकली चैट का असली सोर्स (उत्पत्ति का स्थान) सीधे श्याओ के बंकर का कंप्यूटर साबित हो गया। कबीर के चेहरे और आवाज का जो डीपफेक वीडियो बनाया गया था, उसका मूल एआई प्रोजेक्ट डेटा भी कबीर ने वहीं से सीधे डाउनलोड कर लिया।
अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का खुलासा: कबीर ने न केवल अपनी बेगुनाही के सबूत हासिल किए, बल्कि श्याओ के सर्वर में मौजूद उन सभी भारतीय खातों, फर्जी कंपनियों और स्लीपर सेल के एजेंटों की सूची भी निकाल ली जो देश के भीतर बैठकर देशवासियों को लूट रहे थे।
कबीर ने इस पूरे लाइव डिजिटल ऑपरेशन को सीधे भारत के राष्ट्रीय टेलीविजन और सरकार के मुख्य सुरक्षा पोर्टल पर प्रसारित (लाइव ब्रॉडकास्ट) कर दिया। पूरे देश के सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। जो मीडिया कबीर को गद्दार कह रहा था, वह लाइव स्क्रीन पर कबीर की देशभक्ति और उसकी बुद्धिमत्ता देखकर अवाक रह गया।
उसी समय, कबीर द्वारा ट्रैक किए गए सटीक भौगोलिक निर्देशांक (जीपीएस कोऑर्डिनेट्स) के आधार पर कंबोडियाई सरकार और अंतरराष्ट्रीय पुलिस बल (इंटरपोल) ने श्याओ के बंकर पर चारों तरफ से धावा बोल दिया। बंकर के दरवाजे टूट गए और श्याओ को उसके दर्जनों गुर्गों के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया। उसका पूरा अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट हमेशा-हमेशा के लिए जमींदोज हो गया।
अगले ही पल, जेल का मुख्य दरवाजा खुला। केंद्रीय गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी खुद कबीर के पास आए। उन्होंने सम्मानपूर्वक कबीर के हाथों की हथकड़ी खोली और कबीर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। अधिकारी ने कहा:
"कबीर, इस देश ने तुम्हें पहचानने में भूल की। तुमने न केवल अपना खोया हुआ सम्मान वापस पाया है, बल्कि आज अपनी जान दांव पर लगाकर इस पूरे देश को एक बहुत बड़े खतरे से बचा लिया है। भारत सरकार और देश का हर नागरिक तुम्हारा कर्जदार रहेगा।"
कबीर जब जेल से बाहर निकला, तो फूलों की बारिश हो रही थी। हजारों की भीड़ उसके नाम के नारे लगा रही थी। कबीर ने भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़कर अपनी मां और पिता को गले से लगा लिया। उसके पिता की आंखों में गर्व के आंसू बह रहे थे, और मां ने कबीर के चेहरे को चूमते हुए कहा, "मेरा बेटा निर्दोष है, मेरा बेटा सच्चा है।"
कुछ महीनों बाद, कबीर को भारत के राष्ट्रपति द्वारा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक से सम्मानित किया गया। कबीर को सरकार द्वारा नवगठित 'राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा और अनुसंधान संस्थान' का मुख्य निदेशक नियुक्त किया गया।
कबीर ने इस संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर देश के नाम अपना अंतिम संदेश दिया:
"यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं है। यह कहानी हर उस नागरिक की है जो तकनीक के इस दौर में सांस ले रहा है। याद रखिएगा, इंटरनेट एक समंदर है, जहाँ ज्ञान के मोती भी हैं और खतरों की शार्क मछलियां भी। जब तक आप जागरूक हैं, जब तक आप अपने अधिकारों को जानते हैं, और जब तक आप डरने से इनकार करते हैं, तब तक दुनिया की कोई भी ताकत आपको अपना शिकार नहीं बना सकती। तकनीक को अपनी कमजोरी मत बनने दीजिए, इसे अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाइए। सुरक्षित रहिए, सजग रहिए। जय हिंद, जय भारत।"
कबीर की यह महा-यात्रा आज पूरी तरह से सफल हो चुकी थी। कबीर ने अपने जीवन की राख से उठकर एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार किया था, जो आने वाले समय में करोड़ों भारतीयों के जीवन और सम्मान की रक्षा करता रहेगा।
Sodha Iqbal Kasam from India