haivan- episode 2 in Hindi Horror Stories by aakash kumar books and stories PDF | हैवान - एपिसोड 1

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हैवान - एपिसोड 1


​कमरे के पुराने शीशे के सामने खड़े नील का जिस्म आग की भट्टी की तरह दहक रहा था। खिड़की से छनकर आती पूरनमासी के चाँद की दुधिया रोशनी जैसे ही उसके बदन पर पड़ी, उसकी नसों में दौड़ता ज़हर खौल उठा।
​"अहहह... माँ!"
​नील के हलक से एक दर्दनाक चीख निकली, लेकिन अगले ही पल वह चीख किसी भारी, हिंसक गुर्राहट में बदल गई। उसकी रीढ़ की हड्डी चटकने लगी। हड्डियाँ टूटकर दोबारा जुड़ रही थीं, और उनका आकार दोगुना हो रहा था। उँगलियों के नाखून मांस चीरते हुए काले, नुकीले पंजों में तब्दील हो गए। उसके गोरे चेहरे और बदन पर घने, काले रोएँ तेज़ी से उग आए।
​आईने में अब कोई चौबीस साल का सीधा-सादा लड़का नहीं था। वहाँ खड़ा था सवा सौ किलो का एक विशाल, भयानक हैवान—जिसकी आँखें सुलगते हुए अंगारे थीं।
​इंसानी होश और यादें एक गहरे काले कुएँ में समाती चली गईं। अब उस जिस्म पर सिर्फ़ एक ही चीज़ का कब्ज़ा था—ताज़े मांस और ख़ून की बेकाबू भूख।
​खिड़की की लकड़ी की सलाखों को एक ही झटके में चकनाचूर करते हुए वह हैवान रात के घने सन्नाटे में कूद पड़ा।
​गाँव के बाहरी छोर पर, भैरव घाटी के मोड़ के पास, लक्खा अपनी बैलगाड़ी लेकर लौट रहा था। वह शराब के नशे में धुत था और अपने ही सुर में कोई पुराना लोकगीत गा रहा था। उसे गाँव के बुज़ुर्गों की चेतावनी याद नहीं थी कि आज की रात घरों से बाहर नहीं निकलना है।
​अचानक बैलों ने चलना बंद कर दिया। वे ज़ोर-ज़ोर से खुर पटकने लगे और उनकी आँखों में दहशत तैर गई।
​"चल! आगे बढ़ मनहूसों!" लक्खा ने चाबुक फटकारा।
​तभी सड़क के किनारे घने बाँस के झुरमुट में से एक भारी साया धीरे-धीरे बाहर निकला। ज़मीन पर पड़ते पंजों की थाप से हल्की सी धूल उड़ी। हवा में गीली मिट्टी और ख़ून की गंध तैर गई।
​लक्खा का नशा एक झटके में हवा हो गया। सामने दो लाल, दहकती हुई आँखें उसे घूर रही थीं। वह कोई आम जानवर नहीं था—दो पैरों पर सीधा खड़ा, इंसान और भेड़िये का एक खौफ़नाक मेल था।
​"हे... हे भगवान... ब-बचाओ..." लक्खा के मुँह से थूक के साथ सिर्फ़ इतना ही निकला। वह मुड़कर भागने ही वाला था कि हवा में एक काली बिजली कौंधी।
​एक ही झटके में हैवान ने लक्खा को ज़मीन पर पटक दिया। पंजों का एक क्रूर वार... और सन्नाटे को चीरती हुई लक्खा की आख़िरी चीख जंगल की वादियों में हमेशा के लिए दफ़न हो गई।
​चाँद की ठंडी रोशनी में चारों तरफ़ ताज़ा ख़ून बिखर गया।
​चिड़ियों की चहचहाहट के साथ जब सूरज की पहली लालिमा फूटी, तब नील की आँख खुली।
​उसका सिर फटा जा रहा था, जैसे किसी ने भारी हथौड़े से वार किया हो। वह अपने बिस्तर पर नहीं, बल्कि अपने कमरे के ठंडे, पथरीले फ़र्श पर औंधे मुँह पड़ा था। पूरा बदन ऐसे दुख रहा था मानो सौ लोगों ने मिलकर उसे पीटा हो।
​नील लड़खड़ाते हुए उठा। "क्या हुआ था कल रात...?" उसने अपना माथा पकड़ते हुए बड़बड़ाया। उसे कुछ भी याद नहीं था—बस एक भयानक सपना याद आ रहा था, जिसमें बहुत सारा ख़ून, हड्डियाँ टूटने की आवाज़ें और लाल चाँद था।
​उसने प्यास बुझाने के लिए पानी का लोटा उठाना चाहा, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र अपने हाथों पर पड़ी... उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
​उसके दोनों हाथ, हथेलियाँ और नाखूनों के कोने-कोने में सूखा हुआ, गाढ़ा ख़ून जमा था। उसकी कमीज़ के चिथड़े उड़ चुके थे और सीने पर ख़ून के बड़े-बड़े धब्बे लगे थे। मुँह का ज़ायका कड़वा और लोहे जैसा ताँबेदार था—इंसानी ख़ून का स्वाद।
​नील की साँसें अटक गईं। उसका पूरा जिस्म कांपने लगा।
​तभी बाहर गाँव की पगडंडी से दर्जनों लोगों के रोने-चीखने का शोर गूँज उठा:
​"अनर्थ हो गया! भैरव घाटी के मोड़ पर लक्खा की लाश मिली है... किसी जानवर ने उसे ज़िंदा चीर डाला! पूरा बदन नोंच खाया है!"
​नील ने बदहवास होकर अपने ख़ून से सने हाथों को देखा।
​कल रात का वो ख़ौफ़नाक मंज़र कोई बुरा सपना नहीं था। वह शिकारी... वो हैवान कोई और नहीं, खुद वही था।
​क्या नील अपने इस ख़ूनी सच को गाँव वालों और अपनी माँ से छुपा पाएगा? या अगली रात कोई और उसका शिकार बनेगा? जानने के लिए पढ़ते रहिए... 'हैवान' का एपिसोड 3