बनिए के नौकर तुरतई गोदाम में जा पहुँचे।
फिर का था—एक ने बोरा उठाया, दूसरे ने बोरा पकड़ा और तीसरे ने बैलगाड़ी में जमाना शुरू कर दियो।
गेहूँ ,चावल ,आटा ,दाल ,चीनी ,नमक ,तेल , घी,
गुड़ , ऊपर से घर-गृहस्थी का इतनो सामान भर दियो कि बैलगाड़ी भी मन ही मन बोली होगी—
"भाई, मुझसे जितनो काम है उतनोई लेवो, मुझे घर मत समझ लेयो!"
बैल बेचारे भी गाड़ी का वजन देखकर एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।
जब गाड़ी पूरी भर गई तो बनिया खुद आकर खडो हो गओ उसने एक-एक बोरे को देखो ओर र नौकरों से बोला—
"देखो, अम्मा के घर कोई चीज की कमी नई रहनी चाहिए। जो कहा है, सब पूरा पहुँचाना। बीच रास्ते में कुछ गायब-वायब हो गओ तो समझ लेना, तुम्हारी खैर नई।"
नौकरों ने एक साथ हाथ जोड़ दिए।
"जी मालिक!" बनिया बोला—
"और हाँ, अम्मा से पैसे माँगने की कोशिश मत करियो।"
एक नौकर धीरे से बोला—
"मालिक, पैसे तो माँगेंगे नई... पर इतना सामान देखकर अम्मा हमें ही दान न कर दें!"
बनिया ने घूरकर देखा।
"चल, बैलगाड़ी हाँक!"
नौकर चुप।बैलगाड़ी चल पड़ी।
बैलगाड़ी गाँव की गलियन से होती हुई रांड के संड के घर की तरफ चल दी।
उधर बूढ़ी माँ अभी बनिए की दुकान पर बैठी थी।
वो सोच रही थी—
"मैं तो दो-चार सेर अनाज माँगने आई थी, ये बनिया पूरा गाँव का राशन काहे भेज रओ है?"
कुछ देर बाद बैलगाड़ी घर के सामने जा रुकी।
गाँव के लोग बाहर निकल-निकलकर देखने लगे।
"अरे, का रांड के संड ने कोई राजपाट जीत लियो?"का --अरे "नई रे, वो तो पुलिया पर पड़ा होइगो।"
"फिर उसके घर इतनी बैलगाड़ी?"
एक बूढ़ा बोला—
"लगता है उसकी लट्ठ ने कोई खजाना पीटकर निकाल लियो!"
नौकर बोरे उतारने लगे।
एक
दूसरा
तीसरा
फिर
बोरा पे बोरा।
देखते-देखते आँगन में इतना अनाज जमा हो गओ कि घर का सूना आँगन फिर से गोदाम लगने लगा।
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उधर बनिए ने उस अद्भुत चूड़ी को बड़े आदर से चाँदी की थाली में रखो।
थाली में लाल रेशमी कपड़ा बिछाया।
ऊपर फूल चढ़ाए।
फिर चूड़ी को ऐसे उठाया जैसे कोई राजा-महाराजा का ताज हो।
और बनिया शहर की तरफ निकल पराे।
कई कोस चलने के बाद व राजा के महल पहुँचा।
दरबार में जाने की इजाजत मिली तो उसने दोनों हाथों से थाली उठाई और राजा के सामने रख दी।
सिर झुकाकर बोला—
"महाराज, यह चूड़ी बड़े अजीब संयोग से मेरे हाथ लगी है। ऐसी चीज साधारण आदमी के पास कहाँ शोभा देगी? यह तो आपके जैसे प्रतापी राजा के पास ही जँचेगी।"
राजा ने चूड़ी उठाई।
देखते ही उसकी आँखें चमक उठीं।
इतनी सुंदर चूड़ी उसने जीवन में नई देखी थी।
लेकिन तभी राजा को एक बड़ी चिंता सताने लगी।
राजा की सात रानियाँ थीं।
राजा मन में बोला—
"हाय दइया! अगर एक रानी को दे दी तो बाकी छः मेरी जान खा जाएँगी।"
उसे जैसे महल का पूरा दृश्य आँखों के सामने दिखाई देने लगा—
रानीआ मुँह फुलाए बैठी है।
"महाराज, हमसे तो प्रेम ही नई!"
"हमसे ज्यादा प्यारी वही है!"
"हम मायके चली जाएँगी!"
राजा ने मन ही मन कहा—
"नई भैया, एक चूड़ी के चक्कर में सातों के सातों से लड़ाई मोल नई लेनी!"
उसने चूड़ी वापस थाली में रख दी।
फिर बनिए की तरफ देखकर गंभीर आवाज में बोला—
"बनिए, एक चूड़ी मेरे का काम की?"
बनिया सकपका गया।
राजा बोला—
"मेरी सात रानियाँ हैं। एक को दूँगा तो बाकी छः नाराज़ हो गी ना। मुझे ऐसी और चूड़ियाँ चाहिए।" फिर राजा ने कहा—
"अगर ऐसी और चूड़ियाँ ला दिए तो मनचाहा इनाम मिलेगा। सोना, चाँदी, धन, जागीर—जो माँगोगे, मिलेगा।"
बनिए के चेहरे पर खुशी आई ही की राजा ने कहा ओर अगर नहीं ल पाओ "...तो ऐसी सजा मिलेगी कि जिंदगी भर याद रखेगो।"
बनिए के चेहरे का रंग उड़ गया।मन में बोला—
"अरे बनिए! तू तो सामान बेचने निकला था, यहाँ तो जान ही गिरवी पड़ गई!"
उसने हाथ जोड़ लिए।
"महाराज, हम ऐसी चूड़ियाँ कहाँ से लाएँ? ये तो संयोग से मिली है।"
राजा ने पूछा—"फिर मिली कहाँ से?"बनिया बोला—
"महाराज, हमारे गाँव में रांड का संड नाम का एक मोड़ा रहता है। उसकी बूढ़ी अम्मा ये चूड़ी लेकर मेरे पास सामान लेने आई थीं। उन्हें इसकी कीमत का जरा भी अंदाजा नई था।"
राजा ने पूछा—
"अच्छा?"
बनिया बोला—
"हाँ महाराज। ओर एक बात है।"
"क्या?"
"उस रांड के संड की तेल पिलाई लट्ठ में भी ऐसी ही एक चूड़ी बँधी है।"
राजा की आँखें चमक उठीं।
"क्या कहा?"
"जी महाराज।"
राजा सिंहासन पर तनकर बैठ गया।
"तो एक और चूड़ी भी है?"
बनिया बोला—
"जी।"
राजा ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया—
"जाओ! अभी के अभी उस रांड के संड को दरबार में लेकर आओ।"
सैनिक
"जो आज्ञा महाराज!"
वे घोड़ों पर सवार होकर निकल ने ही बाले हाते । तभी बनिया घबराकर बोला—
"महाराज... एक बात कहूँ?"
राजा ने पूछा—
"क्या?"
बनिया बोला—
"उसे सिर्फ बुलावा भेज दिया तो वो नई आएगा।"
राजा ने भौंहें चढ़ाईं।
"क्यों?"
बनिया बोला—
"महाराज, वो मोड़ा सीधा है... पर अपनी ही मर्जी का मलिक है ,बाय राजा का डर-वड़ नई हैं।"
दरबार में कुछ लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
बनिया बोला—
"आप उसे ये मत कहलवाइए कि राजा ने बुलाया है।"
"तो क्या कहलवाएँ?"
बनिया मुस्कुराया।
"कहना कि महाराज की शादी की सालगिरह है। खास लोगों को दावत है। उसका भी नाम है।"
राजा समझ गया।
बनिया बोला—
"ओर महाराज, पहले उसका पेट भरना।"
राजा ने पूछा—
"क्यों?"
बनिया बोला—
"महाराज, खाली पेट आदमी चिड़चिड़ा हो जाता है। लेकिन रांड का संड खाली पेट हो तो... वो आदमी नई रहता।"
दरबारियों ने गर्दन हिलाई।
बनिया आगे बोला—
"पहले गरमा-गरम भोजन कार्रवाइयों फिर कम की बात करियो।
फिर बनिया थोड़ा झिझका।
"लेकिन एक बात..."
राजा ने पूछा—
"अब का?"
"वो आपको गाली भी दे सकता है।"
दरबार में सन्नाटा छाई गया।
बनिया बोला—
"ओर अपनी तेल पिलाई लट्ठ लेकर आपके पीछे दौड़ भी सकता है।"
एक दरबारी ने धीरे से अपना मुकुट ठीक किया और दो कदम पीछे हो गया।
राजा बोला—
"इतना खतरनाक है?"
बनिया बोला—
"खतरनाक तो नई महाराज... बस लट्ठ थोड़ी बड़ी है।"
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राजा ने आखिर बनिए की बात मान ली।
सैनिक गाँव की ओर निकल पड़े।
घोड़े खेत, पगडंडी, कच्चे रास्ते पार करते हुए पुलिया तक पहुँचे।
वहाँ रांड का संड रोज की तरह पड़ा था।
लट्ठ सिरहाने।
मुँह खुला।
खर्राटे चालू हते
"खर्रर्र... खर्रर्र..."
एक सैनिक बोला—
"यही है?"
"हाँ।"
"जगाएँ?"जाए
सैनिक पीछे हट गए "पागल है का? बनिए ने क्या कहा था भूल गओ?"
राजा की आज्ञा थी—
सोते हुए मत जगाना।
इसलिए सैनिक दूर बैठ गए।
एक घंटा बीत गया पर बने करबट भी नहीं बदली ।
बेट बेट सूरज ढलने लगा। एक सैनिक बोला—
"भैया, ये सो रओ है या मर गओ?"
दूसरा बोला—
"मर गओ होता तो खर्राटे कैसे मारता?"
सब फिर चुप होगे।
आखिर एक सैनिक से रहा नई गया।
वो धीरे-धीरे दबे पाँव गया।
कंधा हिलाया।
"भैया..."
रांड के संड ने आँख खोली।
पहली नजर लट्ठ पर पड़ी।
उसने बिना कुछ पूछे लट्ठ उठाई—
धड़ाम!
सैनिक—
"अरे!"
दूसरा वार—
धप्प!
"अरे बचाओ!"
"अम्मा!"
सैनिक चारों तरफ भागने लगे।
लेकिन राजा की आज्ञा थी—पलटकर वार नई करना।
बेचारे सैनिक मार खाते रहे।
एक सैनिक पेड़ के पीछे जा छिपा।
मन में बोला—
"राजा की नौकरी में आज पहली बार समझ आया कि तनख्वाह कम है और लट्ठ ज्यादा!"
रांड का संड कुछ देर तक सबको दौड़ाता रहा।
जब हाँफ गया तो लट्ठ जमीन पर टिकाई।
तभी पेड़ के पीछे छिपा सैनिक धीरे-धीरे बाहर आया।
हाथ जोड़कर बोला—
"भैया... अब मेरी बात सुन लो।"
रांड का संड उसे घूरने लगा।
सैनिक बोला—
"महाराज ने आपको दावत पर बुलाया है।"
रांड का संड चुप।
सैनिक ने जल्दी से कहा—
"महाराज की शादी की सालगिरह है। खास लोगों को बुलाया है। आपका भी नाम है।"
रांड का संड अब भी चुप।
सैनिक ने आखिरी दाँव खेला—
"और भैया... तरह-तरह के पकवान बने हैं। पूड़ी, कचौड़ी, सब्जी, दाल, मिठाई..."
रांड के संड की आँखें पहली बार चमकीं।
उसने लट्ठ कंधे पर रखी।
सैनिक ने राहत की साँस ली।
रांड का संड बोला—
"कितनी मिलेगी पूरी
सैनिक कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
"जितनी तुम खा सको।"
रांड का संड बोला—
"अच्छा..."
फिर उसने लट्ठ उठाई और बोला—
"चल!"
सैनिक के चेहरे पर खुशी आ गई।
मन में बोला—
"जय हो पूड़ी महारानी की! राजा के सैनिकों से जो काम न हुआ, वो चार पूड़ी के नाम ने कर दिया!"
और दोनों राजा के महल की ओर चल पड़े।