Time travel in Hindi Classic Stories by Vijay Erry books and stories PDF | समय की यात्रा

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समय की यात्रा


समय की यात्रा

समय… एक अदृश्य नदी है जो कभी रुकती नहीं। कुछ लोग इसे सिर्फ जीते हैं, कुछ इसे मापते हैं, और कुछ… उसमें डूबकर खो जाते हैं।
यह कहानी है आदित्य की — एक साधारण युवक की, जिसने समय की उस नदी में उतरने की हिम्मत की… और फिर कभी पहले जैसा नहीं रह सका।
अध्याय 1: पुरानी घड़ी
दिल्ली के पुराने इलाके चांदनी चौक में एक छोटी सी घड़ी की दुकान थी — “कालचक्र वाच कंपनी”। दुकान का मालिक बुजुर्ग रामप्रसाद जी था। उसकी आँखों में हमेशा एक अजीब सी चमक रहती थी, जैसे वह किसी रहस्य को छिपाए बैठा हो।
आदित्य इतिहास का छात्र था। वह अक्सर पुरानी चीजें खरीदने आता था। एक दिन बारिश के कारण वह दुकान में घुस गया। रामप्रसाद जी ने मुस्कुराते हुए एक पुरानी चाँदी की पॉकेट वॉच निकाली।
“यह घड़ी सिर्फ समय नहीं बताती बेटा… यह समय दिखाती है।”
आदित्य ने हँसते हुए घड़ी खरीद ली। घर आकर उसने घड़ी खोली। अंदर एक छोटा सा नोट था:
“जो तारीख लिखेगा, वही समय देखेगा। पर याद रखना — समय बदलना मत, सिर्फ देखना।”
आदित्य ने मजाक में घड़ी के पीछे लिख दिया — 15 अगस्त 1947।
तुरंत कमरा घूमने लगा। आँखों के सामने सफेद रोशनी फैल गई।
जब आँखें खुलीं, तो वह लाल किले के सामने खड़ा था। चारों ओर भीड़ थी। झंडे लहरा रहे थे। आकाश में आजादी की गूंज थी। महात्मा गांधी की आवाज दूर से सुनाई दे रही थी।
आदित्य काँप उठा। वह सचमुच 1947 में पहुँच चुका था।
अध्याय 2: अतीत की आग
वह भीड़ में खो गया। लोगों के चेहरे पर खुशी और डर दोनों थे। विभाजन की खबरें फैल रही थीं। एक युवक ने आदित्य का हाथ पकड़ लिया।
“भाई, कहाँ से आए हो? कपड़े तो बहुत अजीब हैं तुम्हारे!”
आदित्य ने कुछ नहीं कहा। उसने घड़ी खोली और जल्दी से वर्तमान तारीख लिख दी। पल भर में वह अपने कमरे में वापस आ गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
अगले दिन वह फिर गया — इस बार 1857।
वह मेरठ के मैदान में पहुँचा। सिपाहियों की चीखें, तोपों की गर्जना, और अंग्रेजों की गोलीबारी। एक घायल सिपाही उसके पास गिर पड़ा।
“पानी… पानी…”
आदित्य ने अपनी बोतल से पानी पिलाया। सिपाही ने आखिरी साँस लेते हुए कहा, “बेटा… आजादी सस्ती नहीं मिलती…”
आदित्य रो पड़ा। इतिहास की किताबों में जो पढ़ा था, वह अब मांस और खून बनकर सामने था।
अध्याय 3: भविष्य का अकेलापन
अब आदित्य को रोकना मुश्किल हो गया। उसने 2050 लिख दिया।
वह एक चमकदार शहर में पहुँचा। सड़कों पर उड़ने वाली कारें, हवा में होलोग्राम विज्ञापन, और लोग सिर में चिप लगे हुए चल रहे थे। कोई एक-दूसरे से बात नहीं कर रहा था। सब अपनी स्क्रीन में खोए हुए थे।
एक रोबोट ने आकर पूछा, “आपका सिटीजन कोड?”
आदित्य भाग निकला। उसने देखा कि बच्चे खेल नहीं रहे थे। बूढ़े लोग अकेले पार्क में बैठे थे। एक बड़ी स्क्रीन पर लिखा था — “इमोशन कंट्रोल ऐप डाउनलोड करें। दुख अब वैकल्पिक है।”
आदित्य का दिल बैठ गया। वह सोचने लगा — क्या भविष्य इतना ठंडा होगा?
अध्याय 4: वह रात जो बदल गई
एक रात आदित्य ने गलती से अपने बचपन की तारीख लिख दी — जब वह 8 साल का था।
वह अपने पुराने घर पहुँचा। छोटी सी आदित्य अपनी माँ के साथ बैठा था। माँ बीमार थी। छोटी आदित्य रो रही थी, “माँ, तुम ठीक हो जाओगी न?”
माँ ने सिर सहलाते हुए कहा, “हाँ बेटा… पर अगर मैं चली भी गई, तो याद रखना — समय कभी किसी को वापस नहीं लाता। इसलिए जो पल मिलें, उन्हें अच्छे से जीना।”
आदित्य (वर्तमान वाला) छिपकर सुन रहा था। आँसू रुक नहीं रहे थे। उसने उस दिन याद किया जब माँ सचमुच चली गई थीं… और वह माँ से बात करने का मौका कभी नहीं लौटा सका।
उस रात वापस आकर आदित्य ने घड़ी को एक तरफ रख दिया। पहली बार उसे लगा कि समय यात्रा वरदान नहीं, अभिशाप है।
अध्याय 5: वह आदमी जो इंतजार कर रहा था
कुछ दिनों बाद आदित्य फिर घड़ी लेकर बैठा। उसने सोचा — अगर मैं वापस जाऊँ और माँ को बचा लूँ?
उसने माँ की मृत्यु से एक दिन पहले की तारीख लिखी।
लेकिन जैसे ही वह पहुँचा, सामने एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था। वही रामप्रसाद जी!
“तुम आ ही गए बेटा,” रामप्रसाद जी ने धीरे से कहा। “हर समय यात्री एक बार यही गलती करने आता है।”
आदित्य हैरान रह गया। “आप… आप यहाँ कैसे?”
“क्योंकि मैं भी कभी तुम्हारी तरह था। मैंने भी अपनी पत्नी को बचाने की कोशिश की थी। और समय ने मुझे सजा दी। अब मैं कालचक्र का रक्षक हूँ। मैं उन लोगों को रोकता हूँ जो समय को बदलना चाहते हैं।”
आदित्य ने पूछा, “क्या मैं माँ को नहीं बचा सकता?”
रामप्रसाद जी ने सिर हिलाया। “नहीं। क्योंकि अगर तुम बचा लोगे, तो तुम वह आदमी नहीं बनोगे जो आज यहाँ खड़ा है। तुम्हारा पूरा जीवन बदल जाएगा। तुम्हारे दोस्त, तुम्हारी प्रेमिका, तुम्हारी सारी यादें… सब गायब हो जाएँगी। क्या तुम इसके लिए तैयार हो?”
आदित्य चुप रहा।
अध्याय 6: अंतिम यात्रा
आदित्य ने आखिरी बार घड़ी खोली। उसने एक नई तारीख लिखी — आज से बीस साल बाद।
वह एक शांत घर में पहुँचा। बरामदे में एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था — वही आदित्य, बस बाल सफेद हो चुके थे। उसके पास एक छोटी लड़की खेल रही थी।
बूढ़े आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा, “आ गए हो? मैं जानता था तुम आओगे।”
युवा आदित्य हैरान रह गया। “तुम… मैं?”
“हाँ। और मैं तुम्हें सिर्फ एक बात बताने आया हूँ। समय यात्रा करने के बाद मैंने समझा कि असली शक्ति समय में घूमने की नहीं, बल्कि वर्तमान को पूरा जीने की है। मैंने माँ को नहीं बचाया। मैंने भविष्य नहीं बदला। मैंने सिर्फ हर पल को महसूस करना सीखा। और देखो… आज मेरे पास एक बेटी है, एक घर है, और मन की शांति है।”
बूढ़े आदित्य ने घड़ी युवा आदित्य के हाथ में थमा दी।
“अब फैसला तुम्हारा है। या तो तुम समय के गुलाम बनो… या समय के मालिक।”
अध्याय 7: वापसी
आदित्य अपनी आँखें खोलकर अपने कमरे में था। घड़ी अब नहीं चल रही थी। वह बंद हो चुकी थी।
उसने खिड़की खोली। बाहर सुबह की धूप थी। गली में बच्चे खेल रहे थे। पड़ोस की औरतें हँस रही थीं। दूर से माँ की याद आई… पर अब दर्द कम था।
उसने घड़ी को एक लकड़ी के बक्से में रख दिया और ताला लगा दिया।
फिर वह बाहर निकला। पहली बार उसने आसमान को इतनी देर तक देखा। पहली बार उसने गली के कुत्ते को प्यार से सहलाया। पहली बार उसने अपने दोस्त को फोन करके कहा, “यार, आज मिलते हैं। बहुत दिन हो गए।”
उपसंहार
समय की सबसे बड़ी सच्चाई यही है —
वह कभी किसी का इंतजार नहीं करता।
न अतीत का, न भविष्य का।
वह सिर्फ वर्तमान में बहता है।
और जो व्यक्ति वर्तमान को पूरे दिल से जी लेता है…
वही सच्चा समय यात्री होता है।
लेखक
Vijay Sharma Erry