डाक्टर अरुण को हँसता हुआ देखकर जयन्त बोला...."डाक्टर साहब! मेरी बहन को भी ऐसे ही हँसाते रहिएगा,कभी भी उसका साथ मत छोड़िएगा","आप बेफिक्र रहे जयन्त बाबू! ऐसी नौबत कभी नहीं आऐगी कि आपको शिकायत करने का मौका मिले" डाक्टर अरुण बोले..."मैं ऐसी ही आशा रखता हूँ आपसे",जयन्त बोला..."जी! और मैं आपकी आशाओं पर सदैव खरा उतरने की कोशिश करूँगा",डाक्टर अरुण बोले..."अच्छा! एक बात तो बताइए",जयन्त ने डाक्टर अरुण से पूछा..."जी! कहिए",डाक्टर अरुण बोले...."आपके माता पिता तो स्वीकार कर लेगें ना मेरी बहन को,कहीं आपकी माता जी मेरी बहन को ये कहकर ना ठुकरा दें कि हमारे ब्राह्मण परिवार में क्षत्रिय कन्या वधू बनकर नहीं आऐगी,अगर ऐसा हुआ तो तू मेरा मरा हुआ मुँह देखेगा,जैसा कि अमूमन ऐसा होता है",जयन्त ने डाक्टर अरुण से कहा....तब डाक्टर अरुण जयन्त से मुस्कुराते हुए बोले...."जी! मेरी माता जी अब जीवित नहीं हैं,मेरे कोई भाई बहन भी नहीं हैं जिन्हें इस शादी से कोई आपत्ति हो, और रही मेरे पिताजी की बात तो उन्हें भी इस सम्बन्ध से कोई आपत्ति ना है क्योंकि ये बात मैं उन्हें बता चुका हूँ, वे जाति-पाँति भेदभाव नहीं मानते,अगर वो ये सब मानने लगेगें तो फिर लोगों का इलाज कैंसे करेगें,क्योंकि उनके यहाँ तो हर जाति धर्म के लोग इलाज करवाने आते हैं और मैं भी उन्हीं के नक्श-ए-कदम पर चल रहा हूँ,उन्होंने इस मसले में आपके पिता जी से बात करने को भी कहा था लेकिन मैंने ही उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया","अगर ऐसा है तो फिर मुझे अब कोई चिन्ता नहीं,मैं खुशी खुशी अपनी बहन का हाथ आपके हाथ में सौंपने के लिए तैयार हूँ",जयन्त ने डाक्टर अरुण को आश्वासन देते हुए कहा...."जी! बहुत बहुत शुक्रिया मुझ पर भरोसा करने के लिए",डाक्टर अरुण बोले..."इसमें शुक्रिया की कोई बात नहीं है डाक्टर साहब! मेरे अहोभाग्य जो आप मेरे बहनोई बनेगें",जयन्त ने कहा...."अच्छा! ये सब छोड़िए,पहले ये बताइए कि अब आप चन्द्रविजय की जासूसी किस तरह से करेगें", डाक्टर अरुण ने जयन्त से पूछा..."जी! मैं वही सोच रहा था",जयन्त बोला..."तो फिर क्या सोचा आपने",डाक्टर अरुण ने जयन्त से पूछा...."हमें चन्द्रविजय के परिवारवालों को भी समझना होगा कि उनका चरित्र और स्वाभाव कैसा है,उसी आधार पर हम आगे की रणनीति बना सकते हैं",जयन्त ने डाक्टर अरुण से कहा...."लेकिन उसके लिए तो हमें उसके घर पर रहना होगा,यहाँ खलिहान में रहकर हम उसके परिवारवालों का स्वाभाव और चरित्र पता नहीं कर सकते",डाक्टर अरुण बोले...."ये भी सही कहा आपने,लेकिन उसके घर में रहने के लिए अब कौन सी योजना बनाएँ",जयन्त बोला..."इसके लिए तो आप को ही क्यों उपाय सोचना पड़ेगा,ऐसी चीजों में मेरा दिमाग़ नहीं चलता",डाक्टर अरुण बोले...."हाँ! मैं जल्द ही कुछ सोचता हूँ,चलिए! तब तक थोड़ी देर आराम करते हैं",जयन्त ऐसा कहकर धरती पर ही पुआल पर एक कपड़ा बिछाकर लेट गया और डाक्टर अरुण चारपाई पर लेटकर आराम करने लगे तभी कोठरी के बाहर से आवाज़ आई...."जोगी....बिरजू...दोनों भीतर हो क्या?","हाँ! कौन है?",जोगी बने जयन्त ने पूछा..."हम हैं हरिया! तनिक बाहर तो आओ तुम दोनों",हरिया कोठरी के बाहर खड़े होकर बोला... हरिया के कहने पर जोगी बना जयन्त कोठरी के बाहर गया और उसने बाहर जाकर हरिया से पूछा...."हाँ! बोलो! हरिया भइया! क्या बात है?","मालिक ने तुम दोनों को फौरन बुलवाया है",हरिया बोला...."वो काहे भला?",जोगी बने जयन्त ने पूछा...."मालिक कहे है कि शादी का घर है तो बहुत काम हैं घर में,तुम दोनों को लकड़ियाँ चीड़ने के लिए बुलाया है, अब इतने मेहमान आएँ है तो रोज का ढ़ेर भर खाना बनेगा,जिसके लिए लकड़ियाँ चाहिए, सो मालिक ने दो तीन पेड़ कटवाकर घर के पीछे वाले बाड़े में डलवा दिए हैं और तुम दोनों उन पेड़ों को कुल्हाड़ी से चीड़कर छोटे छोटे टुकड़ों में बदल दो",हरिया बोला...."लेकिन हम लोगों के पास कुल्हाड़ी नहीं है",जोगी बना जयन्त बोला..."मालिक के घर में कुल्हाड़ियों की कमी है क्या?",हरिया बोला..."तो फिर ठीक है ,तुम चलो हम दोनों आते हैं",जोगी बना जयन्त बोला..."नहीं! मालिक ने तुम लोंगो को साथ ले चलने को कहा है,अपने साथी को भी बाहर बुला लो,हम सब साथ में ही चलेगें",हरिया बोला..."ठीक है,तुम यहीं रुको,,मैं अभी उसे बाहर बुलाकर लाता हूँ" और ऐसा कहकर जोगी बना जयन्त कोठरी के भीतर पहुँचा और उसने दोनों पोटलियांँ उठाते हुए कहा...."बिरजू भाई! उठो! हम लोगों को अभी निकलना होगा","लेकिन हम लोग जा कहाँ रहे हैं",बिरजू बने अरुण ने पूछा..."मालिक के घर,उन्होंने हम दोनों को अपने घर बुलवाया है",जोगी बने जयन्त ने कहा..."लेकिन क्यों?",बिरजू बने डाक्टर अरुण ने पूछा..."लकड़ियाँ चीरने के लिए",जोगी बने जयन्त ने जवाब दिया..."लकड़ियाँ चीरने के लिए....लेकिन ये काम तो मैंने कभी नहीं किया",बिरजू बने डाक्टर अरुण ने हैरान होकर पूछा...."अब ज्यादा सवाल मत पूछो बिरजू भाई! पहले मालिक के घर चलते हैं,फिर जो वहाँ होगा सो देखा जाऐगा",जोगी बने जयन्त ने कहा... इसके बाद बोझिल मन से बिरजू बने डाक्टर अरुण चारपाई से उठे और अपनी पोटली उठाकर कोठरी से बाहर आएँ फिर जोगी बने जयन्त और हरिया के साथ चन्द्रविजय के घर की ओर चल पड़े,दोनों रास्ते में कुछ बातें करना चाहते थे लेकिन हरिया की मौजूदगी में वे दोनों बातें ना कर सके,इसके बाद थोड़ी ही देर में तीनों चन्द्रविजय के घर पहुँचे,तब हरिया ने चन्द्रविजय से कहा..."मालिक! मैं दोनों को खलिहान से लिवा लाया हूँ""तो अब खड़े क्या हो,दोनों को बाड़े में ले जाकर कुल्हाड़ियाँ देकर लकड़ियांँ चीरने का काम सौंप दो", चन्द्रविजय हरिया से बोला..."जी! मालिक!", फिर ऐसा कहकर हरिया दोनों को बाड़े में ले गया और पेड़ो के तनों को दिखाते हुए बोला...."इन तनों को चीड़कर छोटे टुकड़े करने हैं,कर लोगे ना तुम दोनों","हाँ! कर लेगें....बिलकुल कर लेगें",जोगी बने जयन्त ने कहा...."ठीक है तो करो,दोपहर का खाना तो तुम लोग खाकर आ ही गए हो,शाम तक लकड़ियाँ चीड़ो,उसके बाद ही खाने को कुछ मिलेगा,वो वहाँ छप्पर के नीचे पानी का मटका रखा है,उससे तुम लोग पानी पी लेना,मैं अभी जाता हूँ,बहुत काम पड़े हैं,शाम को आऊँगा,तुम लोगों के पास", और ऐसा कहकर हरिया वहाँ से चला गया.....हरिया के जाते ही जोगी बने जयन्त ने उन कटे हुए पेड़ो के तनों को देखा और बिरजू बने डाक्टर अरुण से कहा..."तो डाक्टर साहब! फिर लग जाइए काम पर""ये....सब काम मुझसे ना हो पाऐगा जयन्त बाबू! ऐसा काम मैंने पहले कभी नहीं किया",बिरजू बने डाक्टर अरुण जोगी बने जयन्त से बोले...."इससे पहले आपने प्रेम भी तो नहीं किया था डाक्टर बाबू! हम जीवन में कोई खास काम पहली या आखिरी बार ही करते हैं,तो ऐसा समझ लीजिए ये काम भी आपके प्रेम की तरह खास ही है",जोगी बना जयन्त बोला...."सच...ये काम मुझे करना ही पड़ेगा क्या?",डाक्टर अरुण ने पूछा..."इसके सिवा और कोई चारा भी तो नहीं है",जयन्त बोला..."चलिए...तो फिर लाइए कुल्हाड़ी,मैं लकड़ियाँ चीड़ने की कोशिश करता हूँ" बिरजू बने डाक्टर अरुण बोले..और फिर डाक्टर अरुण की बात सुनकर जयन्त ने मुस्कुराते हुए उनके हाथों में कुल्हाड़ी थमा दी...
क्रमशः....सरोज वर्मा....