बिहार…
गंगा के किनारे बसे बिहार के एक छोटे से जिले से करीब पैंतीस किलोमीटर दूर एक गाँव था—देवपुरा।
नाम भले ही देवपुरा था, लेकिन गाँव की हालत किसी से छिपी नहीं थी।
चारों तरफ दूर-दूर तक फैले खेत… कहीं धान की फसल लहरा रही थी तो कहीं सूखी पड़ी जमीन किसान की मजबूरी की कहानी कह रही थी। गाँव तक पहुँचने वाली सड़क आधी पक्की और आधी कच्ची थी। बरसात के दिनों में वही रास्ता कीचड़ से इतना भर जाता कि मोटरसाइकिल तो दूर, पैदल चलना भी किसी परीक्षा से कम नहीं लगता।
गाँव में बिजली आती भी थी तो कभी-कभी।
रात में कई घरों की रोशनी अब भी मिट्टी के दीयों और लालटेन से होती थी।
कुछ घरों में टीवी था, लेकिन मोबाइल नेटवर्क पकड़ने के लिए लोगों को अक्सर छत या खेत के किनारे जाना पड़ता था।
गाँव के बीचों-बीच एक पुराना पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे सुबह से ही कुछ बुजुर्ग अपनी चारपाई डालकर बैठ जाते।
कोई अखबार पढ़ता…
कोई राजनीति पर चर्चा करता…
और कोई गाँव की लड़कियों के बारे में अपनी राय देने में पीछे नहीं रहता।
देवपुरा में आज भी यही माना जाता था कि—
“लड़की को ज्यादा पढ़ाने से क्या फायदा? आखिर शादी करके दूसरे घर ही तो जाना है।”
इसी सोच के बीच कुछ लड़कियाँ स्कूल छोड़ चुकी थीं।
लेकिन उसी गाँव में एक लड़की ऐसी भी थी, जो इस सोच को बदलना चाहती थी।
उसका नाम था गौरी।
उम्र महज उन्नीस साल।
सांवला-सा मासूम चेहरा, बड़ी-बड़ी भूरी आँखें और कमर तक आते काले बाल।
गौरी देखने में बिल्कुल साधारण थी।
न उसके पास महंगे कपड़े थे…
न कोई महंगा फोन…
न शहर जैसी सुविधाएँ।
लेकिन उसके अंदर एक चीज बहुत बड़ी थी—
सपने।
ऐसे सपने जिन्हें देखकर गाँव के लोग अक्सर उसका मजाक उड़ाते थे।
गौरी पढ़ना चाहती थी।
बहुत पढ़ना चाहती थी।
वह चाहती थी कि एक दिन वह अपने पैरों पर खड़ी हो।
अपने पिता की तरह किसी के खेत में मजदूरी करके नहीं…
बल्कि अपनी मेहनत और अपनी पढ़ाई के दम पर अपनी पहचान बनाए।
वह चाहती थी कि एक दिन उसके पिता किसी के सामने सिर झुकाकर यह न कहें—
“मेरी बेटी है… अभी पढ़ रही है।”
बल्कि गर्व से कहें—
“ये मेरी बेटी गौरी है… इसने अपने दम पर अपनी जिंदगी बनाई है।”
गौरी का परिवार भी गाँव के बाकी गरीब परिवारों जैसा ही था।
उसके पिता गौतम जी गाँव के छोटे किसान थे।
अपनी थोड़ी-सी जमीन थी, जिसमें साल भर का अनाज भी मुश्किल से निकलता था। बाकी समय उन्हें दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता।
गौरी की माँ सरोज घर संभालने के साथ-साथ कभी सिलाई करतीं तो कभी पड़ोस के घरों में छोटे-मोटे काम कर कुछ पैसे कमा लेतीं।
घर में गौरी के अलावा उसका एक छोटा भाई भी था।
छोटा-सा मिट्टी का घर…
आँगन में तुलसी का पौधा…
एक तरफ पुरानी चारपाई…
और रसोई के नाम पर मिट्टी से बना छोटा-सा चूल्हा।
बस यही दुनिया थी गौरी की।
लेकिन इसी छोटी-सी दुनिया में गौरी के सपने बहुत बड़े थे।
हर सुबह सूरज निकलने से पहले गौरी उठ जाती।
पहले माँ के साथ घर का काम करवाती।
आँगन में झाड़ू लगाती…
चूल्हे में आग जलाती…
भाई के लिए नाश्ता बनाती…
और फिर अपनी पुरानी किताबें एक कपड़े के थैले में रखकर स्कूल के लिए निकल जाती।
उसकी किताबों के कई पन्ने पुराने हो चुके थे।
कुछ किताबें उसे अपनी सहेली से मिली थीं।
कुछ किताबें उसके पिता ने हाट से पुरानी खरीदकर दी थीं।
लेकिन गौरी उन किताबों को किसी खजाने से कम नहीं समझती थी।
उस दिन भी सुबह-सुबह गौरी आँगन में जमीन पर बैठी अपनी किताब पढ़ रही थी।
सूरज की हल्की किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं।
माँ रसोई में चूल्हे पर चाय चढ़ाते हुए बोलीं—
“गौरी… पहले नाश्ता कर ले बिटिया, फिर पढ़ लेना।”
गौरी ने किताब से नजर हटाए बिना कहा—
“बस माँ… ये वाला सवाल पूरा कर लूँ।”
माँ मुस्कुराईं।
“तू भी ना… सुबह होते ही किताब लेकर बैठ जाती है।”
गौरी ने इस बार किताब बंद की और माँ की तरफ देखकर मुस्कुराई।
“माँ, अगर अभी नहीं पढ़ूँगी तो कब पढ़ूँगी?”
सरोज कुछ पल उसे देखती रहीं।
फिर धीरे से बोलीं—
“पढ़ ले बिटिया… खूब पढ़। बस भगवान करे तेरे सपने पूरे हों।”
गौरी की आँखों में चमक आ गई।
वह अपनी किताब सीने से लगाकर बोली—
“पूरे होंगे माँ।”
“मैं खुद करूँगी।”
उसके चेहरे पर एक अजीब-सा विश्वास था।
ऐसा विश्वास जो गरीबी से बड़ा था।
गाँव की बंद सोच से बड़ा था।
और उन तमाम लोगों से बड़ा था जो उसे बार-बार समझाते थे—
“लड़की हो… जितना पढ़ना है पढ़ लो, लेकिन आखिर में करना तो घर ही संभालना है।”
गौरी हर बार बस मुस्कुरा देती।
क्योंकि उसके मन में एक ही बात थी—
वह सिर्फ किसी की बेटी, किसी की पत्नी या किसी की बहू बनकर नहीं जीना चाहती थी।
वह अपनी एक पहचान बनाना चाहती थी।
और शायद…
उस छोटे-से पिछड़े गाँव में रहने वाली उस साधारण-सी लड़की की जिंदगी में अब कुछ ऐसा होने वाला था, जो उसके इन सपनों को एक नई दिशा देने वाला था।