Sometimes sunshine, sometimes shade in Hindi Motivational Stories by Vijay Erry books and stories PDF | कभी धूप, कभी छाँव

Featured Books
Categories
Share

कभी धूप, कभी छाँव

कभी धूप, कभी छाँव
लेखक: विजय शर्मा एरी
गाँव के किनारे बसे छोटे-से घर में सुबह की पहली किरणें जब खिड़की से घुसतीं, तो रमेश को लगता था जैसे जीवन खुद आकर मुस्कुरा रहा हो। नीम के पेड़ की घनी छाँव में बैठी माँ चूल्हे पर रोटियाँ सेंकतीं और पिता खेतों की ओर निकल जाते। रमेश उस समय बारह साल का था। जीवन उसके लिए सिर्फ खेल, दोस्तों की हँसी और माँ के हाथ का गुड़ था। धूप और छाँव दोनों ही प्यारे लगते थे—धूप में खेत की मिट्टी गरम होती और छाँव में नीम की ठंडक शरीर में उतर जाती।
लेकिन जीवन कभी एक जैसा नहीं रहता।
वर्ष 1998 की गर्मियों में पिता अचानक बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने कहा, “दिल कमजोर हो गया है।” इलाज चलता रहा, लेकिन एक रात पिता हमेशा के लिए चले गए। घर में जैसे अँधेरा छा गया। माँ ने आँसू पोछे और कहा, “बेटा, कभी धूप आती है, कभी छाँव। हमें दोनों को सहना सीखना होगा।” रमेश स्कूल की पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने लगा। ईंटें ढोता, खेतों में काम करता। धूप इतनी तेज होती कि सिर चकराने लगता, लेकिन माँ की बात याद आती तो वह फिर से उठ खड़ा होता।
पंद्रह साल की उम्र में वह शहर चला गया। एक छोटी फैक्ट्री में नौकरी मिली। कमरा किराए का था—एक खिड़की, एक चारपाई और दीवार पर माँ की तस्वीर। शहर की धूप गाँव वाली धूप से अलग थी। यहाँ धूप सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि भागमभाग, टारगेट और अकेलापन लेकर आती। कभी-कभी रात को छत पर बैठकर वह तारों को देखता और सोचता—क्या माँ सही कहती थीं? क्या सच में जीवन में छाँव भी आती है?
एक दिन फैक्ट्री में नया सुपरवाइजर आया—सुरेश। सुरेश ने रमेश की मेहनत देखी और कहा, “तुम पढ़ना चाहते हो तो रात की क्लास जॉइन कर लो। मैं मदद करूँगा।” रमेश ने हिम्मत जुटाई। दिन भर काम, रात को पढ़ाई। तीन साल बाद उसने मैट्रिक पास की। फिर इंटर। फिर एक छोटी कंपनी में क्लर्क की नौकरी। तनख्वाह बढ़ी। उसने गाँव माँ को बुला लिया। माँ आईं तो घर में जैसे फिर से छाँव आ गई। माँ की हँसी, उनका खाना, उनकी कहानियाँ—सब कुछ फिर से जीवित हो उठा।
लेकिन छाँव भी हमेशा नहीं रहती।
2005 में माँ बीमार पड़ गईं। कैंसर। इलाज महँगा था। रमेश ने सब कुछ बेच दिया—गाँव की जमीन, गहने, यहाँ तक कि अपनी साइकिल भी। अस्पताल के गलियारों में बैठे-बैठे वह सोचता—यह कैसी धूप है जो कभी खत्म नहीं होती? माँ की आँखों में आँसू थे, लेकिन उन्होंने हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, दुख भी धूप है। इससे बचोगे नहीं, लेकिन इसके बाद छाँव जरूर आएगी। तुम्हारे अंदर वह शक्ति है।” माँ चली गईं। रमेश अकेला रह गया।
अकेलापन एक ऐसी धूप है जो अंदर तक झुलसा देती है।
रमेश ने काम में डूबने की कोशिश की। प्रमोशन मिला। ऑफिस का मैनेजर बन गया। शादी की बात आई। पड़ोस की लड़की सीमा से मुलाकात हुई। सीमा साधारण थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग ही छाँव थी। शादी हुई। घर में फिर से हँसी गूँजने लगी। बेटा हुआ—अनिल। अनिल के जन्म के दिन रमेश ने पहली बार महसूस किया कि छाँव कितनी ठंडी और मीठी होती है। बच्चे की किलकारियाँ, सीमा की देखभाल, घर की छोटी-छोटी खुशियाँ—सब कुछ जैसे पिछले दुखों को धो रहा था।
जीवन फिर से रंगों से भर गया। अनिल स्कूल गया। रमेश ने उसके लिए अच्छी शिक्षा का इंतजाम किया। घर में टीवी आया, फ्रिज आया, स्कूटर आया। रमेश सोचता—शायद अब धूप खत्म हो गई। लेकिन 2012 में कंपनी में मंदी आई। छँटनी शुरू हुई। रमेश की नौकरी चली गई। घर का बजट बिगड़ गया। सीमा ने सिलाई का काम शुरू किया। अनिल की फीस भरने के लिए उन्होंने गहने गिरवी रख दिए। रमेश दिन भर नौकरी की तलाश में घूमता। शाम को घर लौटता तो अनिल दौड़कर गले लगता। वह छोटी-सी मुस्कान ही उसकी छाँव बन जाती।
एक दिन पुराने दोस्त सुरेश ने फोन किया। “एक नई कंपनी खुल रही है। तुम्हारा अनुभव काम आएगा।” रमेश ने जॉब जॉइन की। धीरे-धीरे सब कुछ संभलने लगा। अनिल बड़ा हुआ। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। अच्छी कंपनी में प्लेसमेंट मिला। रमेश और सीमा ने गर्व से देखा कि उनका बेटा आगे बढ़ रहा है।
लेकिन जीवन का चक्र रुकता नहीं।
2020 में कोरोना आया। दुनिया थम गई। अनिल का ऑफिस वर्क फ्रॉम होम हो गया। रमेश रिटायर हो चुके थे। घर में सब इकट्ठे थे, लेकिन बाहर की दुनिया डरी हुई थी। पड़ोसी बीमार पड़ रहे थे। एक दिन सीमा को बुखार आया। टेस्ट पॉजिटिव निकला। अस्पताल में बेड नहीं मिल रहे थे। रमेश ने रात-रात जागकर देखभाल की। सीमा ठीक हो गईं, लेकिन रमेश खुद कमजोर पड़ गए। डॉक्टर ने कहा, “ब्लड प्रेशर और शुगर कंट्रोल में रखो।”
उस दौरान रमेश ने डायरी लिखना शुरू किया। हर दिन एक पन्ना। उसने लिखा—
“जीवन कभी धूप है, कभी छाँव।
धूप में पसीना बहता है, छाँव में साँस मिलती है।
धूप सिखाती है संघर्ष, छाँव सिखाती है कृतज्ञता।
दोनों जरूरी हैं।
अगर सिर्फ धूप हो तो जल जाएँगे,
अगर सिर्फ छाँव हो तो कमजोर पड़ जाएँगे।”
अनिल ने एक दिन डायरी पढ़ी। आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “पापा, आपकी जिंदगी ही एक पूरी कहानी है। मैं इसे कभी नहीं भूलूँगा।”
आज रमेश सत्तर साल के हैं। अनिल की शादी हो चुकी है। पोता-पोती घर में खेलते हैं। सीमा अभी भी उनके साथ हैं—बाल सफेद, लेकिन मुस्कान वैसी ही। सुबह वे बगीचे में बैठते हैं। सूरज निकलता है तो धूप आती है। पेड़ की छाँव में वे चाय पीते हैं। कभी-कभी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं—पिता की मृत्यु, माँ की बीमारी, नौकरी छूटना, कोरोना के दिन। लेकिन अब वे यादें दुख नहीं देतीं। वे सिखाती हैं।
रमेश पोते को कहते हैं, “बेटा, जिंदगी में कभी धूप आएगी, कभी छाँव। दोनों को गले लगाना। धूप में भागना मत, छाँव में सोना मत। दोनों में जीना सीखो।”
पोता पूछता है, “दादा, छाँव कब आएगी?”
रमेश मुस्कुराते हुए जवाब देते हैं, “जब तुम धूप को सह लोगे, तब छाँव अपने आप आ जाएगी। और जब छाँव में आराम कर लोगे, तब नई धूप तुम्हें और मजबूत बनाएगी।”
गाँव की वह पुरानी नीम अभी भी खड़ी है। रमेश कभी-कभी वहाँ जाते हैं। पेड़ के नीचे बैठकर आँखें बंद करते हैं। हवा में माँ की आवाज सी सुनाई देती है—“कभी धूप, कभी छाँव…”
और रमेश समझ जाते हैं—यह सिर्फ एक कहावत नहीं, जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।
सुख और दुख, सफलता और असफलता, मिलना और बिछड़ना—सब एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो दोनों को समान भाव से स्वीकार करता है, वही सच में जीता है।
अब जब सूरज डूबता है और शाम की ठंडक फैलती है, रमेश सीमा का हाथ पकड़कर बैठते हैं। दोनों चुपचाप देखते हैं कि आकाश कैसे रंग बदलता है—लाल से नारंगी, नारंगी से बैंगनी। ठीक वैसे ही जैसे जीवन के रंग बदलते रहते हैं।
कभी धूप।
कभी छाँव।
और दोनों के बीच—एक पूरा जीवन।
(समाप्त)