Ankaha sach ( Part - 10) in Hindi Fiction Stories by Vishakha Pareek books and stories PDF | अनकहा सच (भाग-10)

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अनकहा सच (भाग-10)

अनकहा सच___


राजू ने आँखों में छलकते आँसुओं को दबाते हुए कहा, "हाँ... बहुत प्यारी थी मेरी छोटी बहन।"
हितेश ने थोड़ा सोचकर पूछा, "फिर... तेरा छोटा भाई कहाँ है?"
राजू ने हितेश की तरफ देखा। हितेश की यह बात सुनकर राजू की आँखों में एक बार फिर दर्द का सैलाब उमड़ पड़ा। उसने खुद को सँभालते हुए रुंधे गले से कहा, "हुआ यह कि... उनके जन्म के मुश्किल से सात-आठ दिन ही बीते थे। एक सुबह जब हम सोकर उठे, तो मेरी माँ और मेरा छोटा भाई घर में नहीं थे।"
हितेश ने हैरान होकर पूछा, "क्या?! माँ और भाई घर पर नहीं थे? फिर...फिर  कहाँ गए वो?"
राजू ने आँखें मूँदकर एक गहरी सांस ली, और कहां "पता नहीं... पर वे उस सुबह घर पर नहीं थे। घर में हंगामा मच गया, सब उन्हें ढूँढने लगे। दादाजी, पापा, गाँव वाले... सबने ढूँढा, पर वे कहीं नहीं मिले। और फिर... फिर धीरे-धीरे पूरे गाँव में अफ़वाहें फैलने लगीं।"
अफवाह..."कैसी अफ़वाहें?" हितेश ने हैरान होकर पूछा।
राजू की आँखों से आँसू की एक बूँद गालों पर ढलक गई। उसने पोंछते हुए कहा, हां...."लोग बातें बनाने लगे कि... मेरी माँ का किसी और के साथ चक्कर चल रहा था, वे दोनों बच्चे उसी के थे और वह मेरे छोटे भाई को लेकर उसी के साथ भाग गई..."
हितेश ने भौचक्का होकर कहा, क्या? "माँ भाग गई?! पर राजू... उस दिन घर पर जो आंटी थीं, वो तो तेरी माँ ही थीं न?!" वो तो वहीं हैं घर पर.....फिर?
राजू ने सिर झुकाकर धीमी आवाज़ में कहा, "नहीं हितेश... वे हमारी असली माँ नहीं हैं। उस हादसे के कुछ समय बाद पापा की दूसरी शादी करा दी गई थी।"
"क्या? वो तुम्हारी मां नहीं हैं....यार राजू...!" हितेश के होश उड़ गए।

राजू ने आगे बताया, "उस अफ़वाह के बाद गाँव भर में हमारी बहुत बदनामी हुई। पापा उस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए और उनका दिमाग़ी संतुलन बिगड़ने लगा। वे नशे में डूब गए और उनकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई... जो आज तक वैसी ही है।"
राजू ने एक ठंडी सांस ली, "और सबसे दर्दनाक बात यह है हितेश कि... पापा को लगता है कि मेरी बहन भी उनकी बेटी नहीं है। उन्हें लगता है कि वह भी उसी का खून है... इसीलिए वे मेरी बहन का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते और हर वक्त उसे अपनी नज़रों से दूर चले जाने को कहते हैं। रही बात हमारी इस माँ की, तो इनकी अपनी कोई औलाद नहीं हुई। ये हमारा ध्यान तो रखती हैं, पर हमें वो सगी माँ वाला प्यार कभी नहीं मिल पाया..."
यह सब सुनकर हितेश सन्न रह गया। उसका दिल अपने दोस्त के इस गहरे दर्द को देखकर तड़प उठा। उसने आगे बढ़कर राजू के कंधे पर हाथ रखा और उसे सँभालने की कोशिश की।
फिर हितेश ने थोड़ा हिचकिचाते हुए पूछा, "अगर... अगर तेरी असली माँ भाग ही गई थी, तो वो सिर्फ़ तेरे भाई को ही क्यों ले गई? तेरी बहन को छोड़कर क्यों गई?"
राजू ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, "पता नहीं यार... सब कहते हैं कि उस रात मेरी बहन दादी के पास सो रही थी और भाई माँ के पास... शायद इसीलिए..."