hukm aur hasarat in Hindi Love Stories by Diksha mis kahani books and stories PDF | हुक्म और हसरत -40

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हुक्म और हसरत -40

🔥♥️ हुक्म और हसरत ♥️🔥

#Arsia

एपिसोड 40 — मुलाकात की चाहत 

दोपहर तक सिया का ध्यान काम में लग चुका था।

सुबह से ही वह एक के बाद एक फाइल देख रही थी। कभी किसी अधिकारी को निर्देश देती, तो कभी काव्या से किसी प्रस्ताव की जानकारी लेती। पिछले कुछ दिनों में उसके काम करने के तरीके में काफी बदलाव आया था। अब वह किसी भी फैसले पर पहुंचने से पहले उसके हर पहलू को समझने की कोशिश करती थी।

लेकिन आज उसके दिमाग के किसी कोने में अब भी वही रहस्यमयी आवाज घूम रही थी।

Mr. S. की आवाज।

जितना वह उसे भूलने की कोशिश करती, उतना ही वह उसके ख्यालों में लौट आती।

सिया ने अपने सामने रखी फाइल बंद की और कुर्सी से पीठ टिकाकर बैठ गई।

आखिर वह आदमी था कौन?

उसने अपना चेहरा छिपा रखा था। उसके बारे में किसी को ज्यादा जानकारी नहीं थी। बड़े-बड़े कारोबारी उसके साथ काम करना चाहते थे, लेकिन वह खुद लोगों से दूरी बनाए रखता था।

और सबसे अजीब बात थी उसकी आवाज।

सिया को आज तक किसी अनजान व्यक्ति को लेकर इतनी जिज्ञासा नहीं हुई थी।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

“अंदर आ जाऊं, राजकुमारी?”

काव्या की आवाज सुनकर सिया सीधी होकर बैठ गई।

“हां, आ जाओ।”

काव्या एक फाइल लेकर अंदर आई और उसे मेज पर रख दिया।

“राजकुमारी, ये आज की बाकी फाइलें हैं। इनमें से दो पर आपके हस्ताक्षर चाहिए और तीसरे प्रस्ताव पर आपकी राय।”

सिया ने फाइलों की तरफ देखा।

“काव्या, क्या तुम्हें लगता है कि मैं एक दिन बिना फाइलों के भी रह पाऊंगी?”

काव्या ने गंभीर चेहरा बनाते हुए कहा, “बिल्कुल रह सकती हैं।”

सिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“सच में?”

“जी। जिस दिन सारी फाइलें खत्म हो जाएंगी, उस दिन नई फाइलें आ जाएंगी।”

सिया ने उसे घूरा।

“तुम्हें मेरी परेशानी में भी मजाक सूझता है?”

“मैं तो आपको भविष्य की सच्चाई बता रही हूं।”

दोनों हंस पड़ीं।

काव्या अपनी कुर्सी खींचकर बैठने लगी, तभी सिया के चेहरे का भाव बदल गया।

“काव्या…”

“जी?”

सिया ने कुछ पल सोचा, फिर पूछा, “अगर किसी ऐसे इंसान से मिलना हो, जिसके बारे में हमें कुछ भी पता न हो, तो उससे मिलने का तरीका क्या होगा?”

काव्या के हाथ रुक गए।

उसने धीरे-धीरे सिया की तरफ देखा।

“Mr. S.?”

सिया ने आंखें बड़ी कर लीं।

“तुम हर बार मेरा सवाल पूरा होने से पहले जवाब कैसे दे देती हो?”

काव्या मुस्कुराई।

“क्योंकि पिछले चौबीस घंटे से आपके दिमाग में वही चल रहे हैं।”

“ऐसा कुछ नहीं है!”

“अच्छा?”

“हां!”

“तो फिर आप उनसे मिलने का तरीका क्यों पूछ रही हैं?”

सिया ने कुछ पल उसे देखा, फिर हार मानकर बोली, “ठीक है, मुझे उनसे मिलना है। अब खुश?”

काव्या हंस पड़ी।

“बहुत खुश, राजकुमारी!”

सिया ने उसके हाथ पर हल्की-सी चपत लगाई।

“ज्यादा खुश मत हो।”

काव्या ने अपनी हंसी संभालते हुए पूछा, “लेकिन आपको उनसे मिलना क्यों है? सिर्फ उनकी आवाज के लिए?”

सिया कुछ पल चुप रही।

“सिर्फ आवाज के लिए नहीं। मुझे समझना है कि वह इतने रहस्यमयी क्यों हैं। उनके पास इतनी बड़ी पहचान है, फिर भी वह अपना चेहरा तक सामने नहीं आने देते। समारोह में भी खुद मंच पर नहीं आए। उनके सहायक ने पुरस्कार लिया और उन्होंने केवल अपनी आवाज के जरिए संदेश दिया।”

“तो आपको लगता है कि इसके पीछे कोई खास वजह है?”

“पता नहीं। हो भी सकती है और नहीं भी। लेकिन मैं जानना चाहती हूं।”

काव्या ने सिर हिलाया।

“ठीक है। कल समारोह में जो कारोबारी मिले थे, उनसे संपर्क करने की कोशिश कर सकती हूं। शायद उनके जरिए Mr. S. के कार्यालय तक पहुंच सकें।”

सिया की आंखें चमक उठीं।

“तो फिर पता करो!”

“अभी करती हूं।”

काव्या उठने लगी, लेकिन तभी दरवाजे पर एक गंभीर आवाज सुनाई दी।

“राजकुमारी।”

दोनों ने दरवाजे की तरफ देखा।

अर्जुन वहां खड़ा था।

हमेशा की तरह उसका चेहरा गंभीर था और पहनावा पूरी तरह व्यवस्थित। उसकी नजर पहले सिया पर गई, फिर मेज पर रखी फाइलों पर।

सिया की मुस्कान लौट आई।

“जी, खड़ूस?”

अर्जुन ने उसकी बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

“आपको बाहर जाना है।”

“कहां?”

“शहर के नए विकास केंद्र का निरीक्षण करने।”

सिया ने दीवार पर लगी घड़ी की तरफ देखा।

“अभी?”

“जी।”

“लेकिन मैं एक जरूरी काम कर रही हूं।”

अर्जुन की नजर उसके सामने रखी फाइल पर गई।

“कौन-सा काम?”

सिया ने तुरंत फाइल उठाकर अपने सीने से लगा ली।

“ये गोपनीय है।”

काव्या ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया, ताकि उसकी हंसी अर्जुन के सामने न आ जाए।

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा, “निरीक्षण की जानकारी आपको सुबह ही दे दी गई थी।”

“तो?”

“तो हमें समय पर निकलना है।”

सिया ने आंखें सिकोड़कर उसे देखा।

“आपको हर काम का समय तय करना जरूरी है?”

“जी।”

“और अगर मैं नहीं आई तो?”

“तो मैं वापस आकर आपको याद दिला दूंगा।”

सिया ने मुंह बनाया।

“आपको पता है, आप दुनिया के सबसे खड़ूस इंसान हैं?”

“यह जानकारी मुझे पहले भी मिल चुकी है, राजकुमारी।”

काव्या इस बार अपनी हंसी नहीं रोक पाई।

सिया ने उसे घूरा।

“तुम हंस क्यों रही हो?”

“कुछ नहीं, राजकुमारी।”

अर्जुन ने अपनी घड़ी देखी।

“पंद्रह मिनट।”

“अर्जुन!”

“जी, राजकुमारी?”

“आप सच में बहुत परेशान करते हैं।”

“मैं अपना काम कर रहा हूं।”

इतना कहकर वह वहां से चला गया।

सिया कुछ पल दरवाजे को देखती रही, फिर कुर्सी पर बैठते हुए बड़बड़ाई, “एक दिन इस आदमी की गंभीरता खत्म करके रहूंगी।”

काव्या ने मुस्कुराकर पूछा, “और अगर खत्म ही नहीं हुई तो?”

सिया ने तुरंत जवाब दिया, “तो उसकी गंभीरता के साथ ही जी लूंगी।”

काव्या की हंसी छूट गई।

सिया भी हंस पड़ी।

लेकिन कुछ ही पलों बाद उसका ध्यान फिर उसी रहस्यमयी आदमी की तरफ चला गया।

“काव्या, एक काम करना।”

“जी?”

“Mr. S. से मिलने का रास्ता जरूर पता करना।”

काव्या ने सिर हिलाया।

“आप चिंता मत कीजिए। मैं कोशिश करती हूं।”

सिया ने संतोष से सिर हिलाया और निरीक्षण के लिए तैयार होने लगी।

उसे नहीं पता था कि जिस मुलाकात का इंतजार वह इतनी उत्सुकता से कर रही थी, वह इतनी आसानी से होने वाली नहीं थी।

और शायद यही बात उसे उस रहस्य की तरफ और खींचने वाली थी।

---

शहर के विकास केंद्र में

करीब आधे घंटे बाद सिया और अर्जुन शहर के नए विकास केंद्र पहुंचे।

यह केंद्र स्थानीय लोगों को सरकारी योजनाओं की जानकारी देने, उनकी शिकायतें दर्ज करने और विभिन्न सेवाओं तक पहुंच आसान बनाने के लिए बनाया जा रहा था।

इमारत का बाहरी हिस्सा लगभग तैयार था, लेकिन अंदर अभी भी काफी काम बाकी था।

गाड़ी रुकते ही अर्जुन नीचे उतरा और उसने आसपास का निरीक्षण किया। इसके बाद वह दूसरी तरफ आया और सिया के उतरने के लिए दरवाजा खोल दिया।

सिया बाहर आई और इमारत की तरफ देखते हुए बोली, “जगह तो अच्छी है।”

“अंदर चलकर देख लीजिए, राजकुमारी।”

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“कभी-कभी आप दो अच्छे शब्द भी बोल सकते हैं।”

“मैंने जगह के बारे में अपनी राय दे दी।”

“वह भी कितनी मुश्किल से!”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

दोनों अंदर चले गए।

वहां मौजूद अधिकारी ने उनका स्वागत किया और उन्हें अलग-अलग कमरों का निरीक्षण करवाने लगा।

सिया ने हर जगह ध्यान से देखा। एक कमरे में मेज-कुर्सियां लगाई जा रही थीं, दूसरे में कंप्यूटर रखे जाने थे। लेकिन जब वह शिकायत कक्ष में पहुंची, तो उसने देखा कि वहां आने-जाने के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी।

उसने अधिकारी से पूछा, “यहां रोज कितने लोग अपनी शिकायत लेकर आएंगे?”

अधिकारी ने जवाब दिया, “शुरुआत में लगभग पचास से साठ लोग प्रतिदिन आने की उम्मीद है।”

“और बैठने की व्यवस्था?”

“वह सामने वाले कमरे में होगी।”

सिया ने कमरे का निरीक्षण किया।

“लेकिन अगर यहां ज्यादा लोग आ गए तो?”

अधिकारी कुछ पल के लिए चुप हो गया।

सिया ने आगे कहा, “हमें सिर्फ इमारत तैयार नहीं करनी है। हमें यह भी देखना है कि यहां आने वाले लोगों को परेशानी न हो। बैठने की जगह बढ़ाइए और शिकायत दर्ज करने के लिए अलग काउंटर बनाइए।”

अधिकारी ने तुरंत सिर हिलाया।

“जी, राजकुमारी। हम योजना में बदलाव करवा देंगे।”

सिया ने अगला कमरा देखा और फिर पूछा, “यहां महिलाओं और बुजुर्गों के लिए कोई अलग सहायता व्यवस्था है?”

अधिकारी ने बताया कि अभी इसकी योजना नहीं बनाई गई है।

सिया ने निर्देश दिया कि सहायता कक्ष में ऐसा प्रबंध किया जाए, जहां जरूरत पड़ने पर महिलाओं और बुजुर्गों को आसानी से मदद मिल सके।

अर्जुन कुछ दूरी पर खड़ा चुपचाप निरीक्षण देख रहा था।

सिया ने हर छोटी बात पर सवाल किया, लेकिन किसी अधिकारी को अपमानित नहीं किया। जहां कमी थी, वहां उसने सुधार का रास्ता सुझाया।

निरीक्षण खत्म होने पर अधिकारी ने राहत की सांस ली।

“राजकुमारी, आपके सुझावों से केंद्र को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।”

सिया मुस्कुराई।

“बस ध्यान रखिए कि ये बदलाव कागजों तक सीमित न रह जाएं।”

“जी, राजकुमारी।”

बाहर निकलते समय सिया ने अर्जुन की तरफ देखा।

“तो, खड़ूस जी? आज का निरीक्षण कैसा रहा?”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा, “आपने जरूरी कमियां पहचान लीं।”

सिया ने भौंहें उठाईं।

“बस?”

“जी।”

“एक तारीफ करने में आपकी इतनी ऊर्जा क्यों खर्च होती है?”

“क्योंकि तारीफ काम के हिसाब से होनी चाहिए, राजकुमारी।”

सिया ने हंसते हुए कहा, “अच्छा! तो अगली बार मैं इतना अच्छा काम करूंगी कि आपको तारीफ करने के लिए पूरा भाषण देना पड़े।”

अर्जुन ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा, “पहले काम पूरा कर लीजिए।”

सिया ने मन ही मन उसे खड़ूस कहा और गाड़ी में बैठ गई।

अर्जुन ने दरवाजा बंद किया और अपनी जगह पर आ गया।

सिया खिड़की से बाहर देखते हुए मुस्कुराई।

उसकी जिंदगी में कुछ लोग ऐसे थे, जो उसे परेशान करते थे, लेकिन उसकी जिम्मेदारियों को निभाने में भी मदद करते थे।

अर्जुन उनमें सबसे आगे था।

हालांकि वह यह बात उसे कभी बताने वाली नहीं थी।

कम से कम अभी तो नहीं।

---

एक खबर, जिसने उत्सुकता बढ़ा दी

शाम तक सिया वापस कार्यालय पहुंच गई।

वह दिनभर के निरीक्षण की रिपोर्ट देख रही थी, तभी काव्या तेजी से अंदर आई।

उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी, जिसे देखकर सिया तुरंत समझ गई कि कुछ पता चला है।

“काव्या!”

“जी, राजकुमारी?”

“जल्दी बताओ। क्या पता चला?”

काव्या ने नाटकीय अंदाज में कुर्सी खींची और बैठ गई।

“पहले पानी तो पी लेने दीजिए।”

सिया ने उसे घूरा।

“काव्या!”

“अच्छा बाबा, बताती हूं।”

उसने अपना फोन निकाला और कुछ जानकारी देखते हुए कहा, “कल समारोह में लंदन से आए कारोबारी की कंपनी के एक प्रतिनिधि से संपर्क हुआ है। उन्होंने बताया कि Mr. S. अगले कुछ दिनों तक इसी शहर में रहने वाले हैं।”

सिया की आंखें चमक उठीं।

“सच?”

“जी।”

“और उनसे मिलने का समय?”

काव्या की मुस्कान थोड़ी कम हो गई।

“वही मुश्किल है।”

सिया का चेहरा उतर गया।

“मतलब?”

“उनका कार्यालय हर किसी को सीधे मिलने का समय नहीं देता। पहले मिलने का कारण बताना होगा। उसके बाद उनका कार्यालय तय करेगा कि मुलाकात हो सकती है या नहीं।”

सिया ने कुछ देर सोचा।

“तो हम उनसे मिलने का कारण बता देंगे।”

काव्या ने पूछा, “क्या कारण लिखूं?”

सिया ने तुरंत कहा, “उनसे मिलना है।”

काव्या ने माथे पर हाथ रख लिया।

“राजकुमारी, यह कोई कारण हुआ?”

“क्यों नहीं? मैं उनसे मिलना चाहती हूं।”

“लेकिन उनके कार्यालय को यह क्यों बताएं कि आप उनसे सिर्फ जिज्ञासा के कारण मिलना चाहती हैं?”

सिया कुछ पल चुप रही।

फिर बोली, “ठीक है। लिख दो कि मैं उनसे व्यापार और शहर के विकास से जुड़े संभावित सहयोग के विषय में चर्चा करना चाहती हूं।”

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

“लेकिन क्या आप सच में इस विषय में बात करना चाहती हैं?”

सिया ने मुस्कुराकर कहा, “बिल्कुल। अगर मुलाकात हो गई, तो बात भी कर लेंगे।”

काव्या हंस पड़ी।

“आप भी न, राजकुमारी!”

सिया ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

“फोन दो।”

“क्यों?”

“मैं खुद लिखती हूं।”

काव्या ने फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।

सिया ने संदेश का प्रारूप देखा और उसमें कुछ बदलाव किए। उसने शहर के विकास से जुड़े संभावित व्यावसायिक सहयोग का उल्लेख किया और मुलाकात के लिए सुविधाजनक समय मांगा।

संदेश भेजने के बाद उसने फोन वापस कर दिया।

“अब इंतजार करते हैं।”

काव्या ने कहा, “जवाब आने में समय लग सकता है।”

“कोई बात नहीं। मैं इंतजार कर लूंगी।”

“और अगर जवाब नहीं आया?”

सिया ने तुरंत कहा, “तो दोबारा संपर्क करेंगे।”

काव्या ने सिर हिलाया।

“आपने तो ठान लिया है।”

सिया मुस्कुराई।

“हां। अब जब तक उनसे मिल नहीं लेती, चैन नहीं आएगा।”

उसी समय रोशनी का फोन आ गया।

काव्या ने कॉल उठाई और स्पीकर चालू कर दिया।

“हां, रोशनी?”

दूसरी तरफ से रोशनी की उत्साहित आवाज आई, “कुछ पता चला? Mr. S. से मिलने का कोई रास्ता मिला?”

काव्या ने कहा, “हमने उनके कार्यालय में मुलाकात के लिए संदेश भेज दिया है।”

“सच में? कब मिलेंगे उनसे?”

सिया ने फोन के पास आकर कहा, “अभी जवाब नहीं आया है।”

रोशनी ने उत्साह से कहा, “जैसे ही जवाब आए, मुझे बताना। मैं भी साथ चलूंगी।”

सिया हंस पड़ी।

“तुम्हें उनसे मिलने की इतनी जल्दी क्यों है?”

“क्योंकि मैं जानना चाहती हूं कि नकाब के पीछे आखिर कैसा इंसान है!”

काव्या ने चुटकी ली, “और उनकी आवाज?”

रोशनी ने बिना झिझक कहा, “वह तो बोनस है!”

तीनों हंस पड़ीं।

कुछ देर बातचीत के बाद कॉल समाप्त हो गई।

सिया ने अपना फोन उठाया और संदेश देखा।

अभी तक कोई जवाब नहीं आया था।

उसने फोन मेज पर रख दिया।

लेकिन उसके मन में उत्सुकता अब पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुकी थी।

---

अर्जुन की एक शर्त

कुछ देर बाद अर्जुन कमरे में आया।

“राजकुमारी, आज का काम पूरा हो गया है। अब महल चलने का समय है।”

सिया ने फोन उठाते हुए कहा, “बस पांच मिनट।”

अर्जुन ने पूछा, “क्या कोई जरूरी काम बाकी है?”

“हां।”

“कौन-सा?”

सिया ने फोन अपनी तरफ कर लिया।

“गोपनीय।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“आप आज दूसरी बार इस शब्द का इस्तेमाल कर चुकी हैं।”

सिया हंस पड़ी।

“तो क्या हुआ?”

“आमतौर पर जब कोई व्यक्ति बार-बार किसी बात को गोपनीय कहता है, तो इसका मतलब होता है कि वह कुछ छिपा रहा है।”

सिया ने आंखें बड़ी कर लीं।

“वाह! आज तो आप जासूस बन गए!”

“मैं केवल एक सवाल पूछ रहा हूं।”

सिया ने कुर्सी से उठते हुए कहा, “ठीक है, बता देती हूं। मैं Mr. S. से मिलने की कोशिश कर रही हूं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“मुलाकात के लिए संपर्क किया है?”

“हां।”

“किस कार्यालय से?”

सिया ने उसे जानकारी दे दी।

अर्जुन ने गंभीर स्वर में कहा, “अगर वहां से जवाब आता है, तो मुलाकात की जगह, समय और वहां मौजूद लोगों की जानकारी पहले जांची जाएगी।”

सिया ने दोनों हाथ कमर पर रख लिए।

“आपको लगता है कि मैं किसी अनजान जगह पर अकेले चली जाऊंगी?”

“मैं यह सुनिश्चित कर रहा हूं कि ऐसा न हो।”

“और अगर मैं कहूं कि मुझे आपकी सुरक्षा वाली बातें सुनना पसंद नहीं?”

अर्जुन ने बिना भाव बदले कहा, “तब भी मैं अपना काम करता रहूंगा, राजकुमारी।”

सिया कुछ पल उसे देखती रही।

फिर मुस्कुराकर बोली, “आपको पता है, आपके अंदर एक छोटा-सा इंसान भी है या नहीं?”

अर्जुन ने जवाब दिया, “मुझे नहीं लगता कि यह सवाल आपकी आज की फाइलों से संबंधित है।”

सिया की हंसी छूट गई।

“अरे! आप तो सच में नहीं सुधरेंगे।”

“चलें, राजकुमारी?”

सिया ने अपना सामान उठाया।

“चलो, खड़ूस।”

वह आगे बढ़ी तो अर्जुन ने औपचारिक दूरी बनाए रखते हुए उसके पीछे कदम बढ़ा दिए।

सिया रास्ते भर कुछ न कुछ बोलती रही, लेकिन अर्जुन अपने काम पर केंद्रित रहा।

फिर भी सिया के चेहरे पर मुस्कान थी।

उसे पता था कि अर्जुन की गंभीरता आसानी से नहीं बदलने वाली।

और शायद यही वजह थी कि वह उसे बार-बार छेड़ने से खुद को रोक नहीं पाती थी।

---

नकाब के पीछे की दुनिया

उसी रात शहर के एक शांत इलाके में एक काली गाड़ी आकर रुकी।

बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे। इमारत के प्रवेश द्वार पर तैनात कर्मचारी ने गाड़ी को देखते ही दरवाजा खुलवा दिया।

गाड़ी से उतरकर एक व्यक्ति अंदर गया।

काले कपड़े।

चेहरे पर नकाब।

और ऐसा व्यक्तित्व, जिसके सामने लोग बिना वजह भी अपने शब्द सोच-समझकर चुनते थे।

Mr. S.

वह सीधे अपने निजी कार्यालय में पहुंचा।

उसका सहायक पहले से वहां मौजूद था।

“सर, कल की बैठक के सभी दस्तावेज तैयार हैं।”

Mr. S. ने अपनी मेज पर रखी फाइल उठाई।

“समीक्षा पूरी हो गई?”

“जी, सर। सभी आंकड़ों की दोबारा जांच कर ली गई है।”

“ठीक है। सुबह आठ बजे बैठक शुरू होगी। किसी को देर से आने की अनुमति नहीं होगी।”

“जी, सर।”

सहायक ने अपनी डायरी में निर्देश लिख लिए।

फिर उसने कुछ क्षण रुककर कहा, “सर, एक और संदेश आया है।”

Mr. S. ने फाइल से नजर उठाई।

“किसका?”

“रायगढ़ परिवार की ओर से। राजकुमारी सिया ने आपसे मुलाकात का समय मांगा है।”

कमरे में कुछ पल के लिए शांति छा गई।

सहायक ने फोन आगे बढ़ा दिया।

“उन्होंने शहर के विकास से जुड़े संभावित व्यावसायिक सहयोग के विषय में चर्चा करने की इच्छा जताई है।”

Mr. S. ने संदेश पढ़ा।

कुछ क्षण तक वह स्क्रीन देखता रहा।

फिर फोन मेज पर रख दिया।

“उन्होंने मिलने का कारण स्पष्ट लिखा है?”

“जी, सर।”

“उनके प्रस्ताव के बारे में जानकारी मंगवाइए।”

“और मुलाकात?”

Mr. S. ने शांत स्वर में कहा, “पहले प्रस्ताव देखूंगा।”

“जी, सर।”

सहायक ने सिर झुका दिया।

वह बाहर जाने लगा, लेकिन Mr. S. ने उसे फिर रोक दिया।

“एक बात और।”

“जी, सर?”

“मुलाकात से जुड़ी कोई भी जानकारी बाहर नहीं जानी चाहिए। जब तक समय और स्थान तय न हो जाए, किसी को कोई आश्वासन मत दीजिए।”

“समझ गया, सर।”

सहायक बाहर चला गया।

Mr. S. ने मेज पर रखा संदेश फिर से देखा।

रायगढ़ परिवार की राजकुमारी उससे मिलना चाहती थी।

लेकिन वह जल्दबाजी में कोई निर्णय लेने वालों में से नहीं था।

उसने फोन बंद किया और सामने रखी फाइल खोल ली।

बाहर रात गहराती जा रही थी।

शहर के एक हिस्से में सिया जवाब का इंतजार कर रही थी।

और दूसरे हिस्से में Mr. S. उस मुलाकात पर विचार कर रहा था।

फिलहाल दोनों के बीच केवल एक संदेश था।

एक ऐसी मुलाकात की संभावना, जिसके बारे में सिया ने कई सवाल सोच रखे थे।

उसे अभी यह नहीं पता था कि मुलाकात होगी भी या नहीं।

लेकिन उसने मन ही मन तय कर लिया था—

अगर मौका मिला, तो वह Mr. S. से उनकी आवाज के बारे में जरूर पूछेगी।

क्योंकि उस आवाज के पीछे छिपा रहस्य अब उसके लिए केवल जिज्ञासा नहीं रहा था।

वह उसका जवाब जानना चाहती थी।

और अब कहानी में एक नया सवाल जुड़ चुका था—

क्या Mr. S. सिया को मिलने का समय देगा?

या यह मुलाकात होने से पहले ही कोई नई मुश्किल खड़ी हो जाएगी?

सुनते रहिए… “हुक्म और हसरत”। ❤️

जारी रहेगा... 💗✨

© Diksha

प्रिय पाठकों,
Agla episode 1 hafte bad milega ....

यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

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