उस रात शहर पर अजीब सी खामोशी छाई हुई थी.
आसमान में काले बादल जमा थे और तेज हवा पुराने पेडों की शाखाओं को झकझोर रही थी. कुछ देर पहले हुई बारिश के कारण गलियां सुनसान थीं. सडक पर लगी पीली रोशनियां बारिश की बूंदों से धुंधली दिखाई दे रही थीं.
शहर के पुराने हिस्से में एक छोटा सा मकान था. उसी मकान की दूसरी मंजिल पर आरव अपने कमरे में बैठा था.
उसकी मेज पर किताबें खुली पडी थीं, लेकिन पिछले आधे घंटे से उसने एक भी पन्ना नहीं पलटा था.
उसका ध्यान बार- बार खिडकी की तरफ जा रहा था.
उसे पता नहीं क्यों ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई उसे बाहर से देख रहा हो.
आरव ने आखिरकार किताब बंद कर दी.
उसने घडी की तरफ देखा.
रात के ग्यारह बज चुके थे.
तभी अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई.
ठक.
आरव चौंक गया.
कुछ पल तक कमरे में बिल्कुल खामोशी रही.
फिर दोबारा दस्तक हुई.
ठक.
ठक.
आरव अपनी कुर्सी से उठा और कमरे के दरवाजे की तरफ बढा.
उसने धीमी आवाज में पूछा, कौन है?
बाहर से कोई जवाब नहीं आया.
आरव कुछ क्षण वहीं खडा रहा.
फिर उसने धीरे से दरवाजा खोला.
बाहर कोई नहीं था.
सिर्फ ठंडी हवा का एक तेज झोंका कमरे के अंदर आया और मेज पर रखे कुछ कागज जमीन पर गिर गए.
आरव ने गलियारे में देखा.
पूरा रास्ता खाली था.
वह कुछ कदम बाहर आया.
सीढियों की तरफ देखा.
नीचे भी कोई नहीं था.
तभी उसकी नजर दरवाजे के ठीक सामने जमीन पर पडी एक चीज पर गई.
वह एक पुराना लिफाफा था.
आरव झुककर उसे उठाने लगा.
लिफाफा बहुत पुराना दिखाई दे रहा था. उसका रंग पीला पड चुका था और किनारे हल्के से मुडे हुए थे. फिर भी उसमें एक अजीब बात थी.
उस पर धूल नहीं थी.
मानो वह अभी- अभी वहां रखा गया हो.
आरव ने लिफाफे को पलटा.
पीछे लाल मोम की एक मुहर लगी हुई थी.
उस मुहर पर एक अजीब निशान बना था.
एक खुली हुई आंख और उसके चारों तरफ सात छोटे सितारे.
आरव ने पहले कभी ऐसा निशान नहीं देखा था.
फिर उसकी नजर लिफाफे के सामने गई.
वहां सिर्फ एक नाम लिखा था.
आरव।
उसका दिल अचानक तेजी से धडकने लगा.
उसने लिफाफे को उलट- पलटकर देखा.
भेजने वाले का नाम कहीं नहीं था.
सिर्फ नीचे एक तारीख लिखी थी.
सत्रह अक्टूबर एक हजार नौ सौ छब्बीस।
आरव कुछ क्षण तक उस तारीख को घूरता रहा.
फिर उसने दोबारा पढा.
एक हजार नौ सौ छब्बीस।
उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ.
यह चिट्ठी सौ साल पुरानी थी.
लेकिन उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि चिट्ठी उसके नाम थी.
वह लिफाफा लेकर अपने कमरे में वापस आ गया.
दरवाजा बंद करने के बाद उसने लिफाफे को मेज पर रखा.
उसका मन लगातार सवालों से घिरता जा रहा था.
सौ साल पुरानी चिट्ठी उसके घर तक कैसे पहुंची थी?
इसे उसके नाम किसने लिखा था?
और अगर इसे एक हजार नौ सौ छब्बीस में लिखा गया था, तो इतने सालों तक यह सुरक्षित कैसे रही?
आरव ने कुछ देर तक उस लिफाफे को छुआ तक नहीं.
फिर उसने आखिरकार फैसला किया कि उसे चिट्ठी खोलनी होगी.
उसने मोम की मुहर पर उंगली रखी.
उसी क्षण कमरे की रोशनी झपकने लगी.
एक बार.
दो बार.
फिर पूरी लाइट बंद हो गई.
कमरा अंधेरे में डूब गया.
आरव ने हाथ रोक लिया.
बाहर हवा अचानक बहुत तेज हो गई थी.
खिडकी अपने आप खुल गई.
पर्दे हवा में तेजी से उडने लगे.
और तभी मेज पर रखा लिफाफा हल्की चांदी जैसी रोशनी से चमकने लगा.
आरव कुछ पल तक उस रोशनी को देखता रहा.
उसके हाथ ठंडे पड गए थे.
फिर उसने साहस करके लिफाफा उठाया.
मोम की मुहर अपने आप टूट गई.
अंदर से एक पुराना कागज निकला.
कागज का रंग पीला था, लेकिन उस पर लिखे अक्षर चांदी की तरह चमक रहे थे.
आरव ने टॉर्च जलाई और कागज को पढना शुरू किया.
पहली पंक्ति पढते ही उसका चेहरा बदल गया.
जिस दिन यह चिट्ठी तुम्हारे हाथों में पहुंचेगी, उस दिन मेरी प्रतीक्षा समाप्त हो जाएगी।
आरव ने दोबारा वह पंक्ति पढी.
फिर आगे बढा.
अगर तुम यह पढ रहे हो, तो इसका अर्थ है कि सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं।
आरव की सांसें तेज हो गईं.
वह कुर्सी पर बैठ गया.
चिट्ठी आगे लिखी थी.
मेरा नाम जानने की जल्दी मत करना. पहले उस घर को याद करना, जहां तुम्हारे दादा ने तुम्हें जाने से हमेशा रोका था।
आरव अचानक रुक गया.
उसका चेहरा सफेद पड गया.
उसके दादा ने बचपन में उसे एक जगह जाने से हमेशा मना किया था.
रुद्र हवेली.
शहर के पुराने हिस्से के आखिरी छोर पर बनी वह हवेली वर्षों से बंद पडी थी.
आरव के दादा अक्सर कहा करते थे कि उस हवेली के पास कभी मत जाना.
आरव ने तब कभी उस बात को गंभीरता से नहीं लिया था.
लेकिन अब उसी हवेली का नाम इस सौ साल पुरानी चिट्ठी में लिखा था.
वह आगे पढने लगा.
तुम्हारे परिवार ने जिस रहस्य को छिपाकर रखा था, वह अब ज्यादा समय तक छिपा नहीं रहेगा।
आरव के हाथ कांपने लगे.
रुद्र हवेली का दरवाजा उस रात खुलेगा, जिस रात चिट्ठी तुम्हारे पास पहुंचेगी।
आरव ने तुरंत खिडकी की तरफ देखा.
दूर अंधेरे में रुद्र हवेली की धुंधली आकृति दिखाई दे रही थी.
वह कुछ क्षण तक उसे देखता रहा.
फिर उसकी नजर वापस कागज पर गई.
आखिरी पंक्ति के नीचे अचानक एक नया वाक्य उभरने लगा.
स्याही धीरे- धीरे फैल रही थी.
कुछ ही क्षणों में शब्द साफ हो गए.
अब पीछे मत देखना।
आरव का शरीर सिहर उठा.
उसने अनायास पीछे मुडकर देखा.
कमरे में कोई नहीं था.
लेकिन उसके पीछे रखी कुर्सी धीरे- धीरे हिल रही थी.
आरव अपनी जगह से उठ गया.
तभी दरवाजे के बाहर किसी के चलने की आवाज सुनाई दी.
एक कदम.
फिर दूसरा.
फिर तीसरा.
आवाज धीरे- धीरे उसके कमरे के पास आती जा रही थी.
आरव ने सांस रोक ली.
कदमों की आवाज दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गई.
कुछ क्षण तक खामोशी रही.
फिर बाहर से एक धीमी आवाज आई.
आरव।
आरव के शरीर में जैसे बिजली दौड गई.
वह आवाज किसी बूढे आदमी की थी.
आरव ने कांपती आवाज में पूछा, कौन है?
बाहर से जवाब आया.
तुम्हें वह चिट्ठी नहीं पढनी चाहिए थी।
आरव पीछे हट गया.
उसने दरवाजे को घूरते हुए पूछा, आप कौन हैं?
कुछ पल तक कोई आवाज नहीं आई.
फिर वह आवाज दोबारा सुनाई दी.
वही, जिसने तुम्हारे परिवार को सौ साल पहले बचाया था।
आरव कुछ समझ नहीं पाया.
मेरे परिवार को किससे बचाया था?
इस बार कोई जवाब नहीं आया.
आरव धीरे- धीरे दरवाजे के पास गया.
उसने कुंडी पकडी और दरवाजा खोल दिया.
गलियारा खाली था.
लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे.
वे निशान सीढियों की तरफ नहीं जा रहे थे.
वे रुद्र हवेली की दिशा में जाने वाले पुराने रास्ते की ओर बढ रहे थे.
आरव ने चिट्ठी उठाई.
कागज पर फिर से नए शब्द उभर रहे थे.
रुद्र हवेली में आओ. वहां तुम्हें पहला उत्तर मिलेगा।
आरव ने चिट्ठी को मोडकर जेब में रख लिया.
उसे पता था कि वहां जाना खतरनाक हो सकता था.
लेकिन अब उसके पास पीछे हटने का कोई कारण भी नहीं था.
फिर उसे अचानक अपने बचपन की एक बात याद आई.
जब वह करीब दस साल का था, तब उसके दादा ने एक रात उसे रुद्र हवेली की कहानी सुनाई थी.
उन्होंने कहा था कि वह हवेली कभी एक विद्वान आदमी की थी.
उस आदमी का नाम रुद्रदेव था.
रुद्रदेव पुराने ग्रंथों और रहस्यमयी शक्तियों पर अध्ययन करता था.
लोग कहते थे कि उसे ऐसी दुनिया के बारे में पता था, जिसका अस्तित्व सामान्य लोगों की दुनिया से अलग था.
एक ऐसी दुनिया, जहां हवा में भी जादू था.
जहां पेड बोल सकते थे.
जहां रात में रास्ते बदल जाते थे.
और जहां हर जादू की एक कीमत चुकानी पडती थी.
फिर एक रात रुद्रदेव अचानक गायब हो गया.
उसके बाद हवेली बंद कर दी गई.
आरव के दादा ने उस रात कहानी सुनाते हुए सिर्फ एक बात कही थी.
अगर कभी रुद्र हवेली का दरवाजा खुद खुल जाए, तो वहां मत जाना।
तब आरव ने पूछा था, क्यों?
लेकिन उसके दादा ने जवाब नहीं दिया था.
अब उसे समझ आ रहा था कि शायद उसके दादा उस रहस्य के बारे में कुछ जानते थे.
आरव ने तुरंत अपनी दोस्त मीरा को फोन किया.
काफी देर बाद फोन उठा.
मीरा ने उनींदी आवाज में कहा, आरव? इतनी रात को फोन क्यों किया?
आरव ने कहा, मीरा, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।
मीरा तुरंत गंभीर हो गई.
क्या हुआ?
आरव ने कुछ क्षण सोचा.
फिर बोला, मुझे आज एक चिट्ठी मिली है।
मीरा ने हंसते हुए पूछा, इतनी रात को चिट्ठी के लिए फोन किया है?
आरव की आवाज धीमी हो गई.
वह चिट्ठी सौ साल पुरानी है।
दूसरी तरफ कुछ क्षण के लिए खामोशी छा गई.
मीरा ने पूछा, क्या?
उस पर एक हजार नौ सौ छब्बीस की तारीख है. और वह मेरे नाम है।
मीरा की आवाज बदल गई.
तुम मजाक तो नहीं कर रहे?
काश मैं मजाक कर रहा होता।
उसमें क्या लिखा है?
आरव ने चिट्ठी की तरफ देखा.
उसमें रुद्र हवेली का जिक्र है।
मीरा कुछ पल चुप रही.
फिर उसने धीरे से पूछा, क्या तुम अभी उसके पास हो?
नहीं।
तो वहीं रहो. वहां मत जाना।
आरव ने खिडकी से बाहर देखा.
दूर रुद्र हवेली दिखाई दे रही थी.
उसका मुख्य दरवाजा अंधेरे में साफ दिखाई नहीं दे रहा था.
तभी अचानक हवेली के अंदर एक रोशनी जली.
आरव की आंखें फैल गईं.
उसने कहा, मीरा।
क्या हुआ?
हवेली का दरवाजा खुल गया है।
मीरा कुछ सेकंड तक चुप रही.
फिर उसने पूछा, तुम्हें पक्का दिखाई दे रहा है?
हां।
आरव की नजर चिट्ठी पर पडी.
स्याही फिर बदल रही थी.
इस बार सिर्फ एक वाक्य लिखा गया था.
उसे साथ लाना।
आरव ने मीरा से कहा, चिट्ठी पर तुम्हारे बारे में भी लिखा है।
मीरा ने घबराकर पूछा, मेरे बारे में क्या?
आरव ने चिट्ठी पढी.
तुम इस कहानी का हिस्सा हो।
फोन के दूसरी तरफ खामोशी छा गई.
कुछ देर बाद मीरा ने कहा, मैं तुम्हारे घर आ रही हूं।
करीब दस मिनट बाद मीरा वहां पहुंच गई.
उसने आते ही चिट्ठी अपने हाथ में ली.
कुछ देर तक वह चमकती हुई स्याही को देखती रही.
फिर उसने धीरे से कहा, यह साधारण स्याही नहीं है।
आरव ने पूछा, तुम्हें इसके बारे में पता है?
मीरा ने सिर हिलाया.
मैंने इसके बारे में पुराने इतिहास की एक किताब में पढा था. इसे चंद्र स्याही कहा जाता था।
चंद्र स्याही?
हां. कहा जाता था कि इस स्याही से लिखे शब्द स्थायी नहीं रहते थे. लेखक जब चाहता, शब्द बदल सकता था।
आरव ने चिट्ठी की ओर देखा.
लेकिन लेखक तो सौ साल पहले मर चुका होगा।
मीरा ने जवाब नहीं दिया.
उसी समय चिट्ठी पर नए शब्द उभर आए.
मैं मरा नहीं हूं।
दोनों के चेहरे पर डर साफ दिखाई देने लगा.
मीरा ने धीरे से पूछा, यह किसने लिखा है?
आरव ने कहा, मुझे नहीं पता।
चिट्ठी पर अगली पंक्ति उभरी.
अगर सच जानना है, तो रुद्र हवेली में आओ।
आरव ने मीरा की ओर देखा.
मीरा ने कुछ देर सोचा.
फिर दोनों रुद्र हवेली की ओर चल पडे.
हवेली शहर के पुराने हिस्से से काफी दूर थी.
रास्ते में उन्हें कोई नहीं मिला.
जितना वे हवेली के करीब पहुंचते गए, हवा उतनी ही ठंडी होती गई.
आखिरकार वे हवेली के सामने पहुंच गए.
विशाल लोहे का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था.
मीरा ने धीमी आवाज में कहा, यह दरवाजा वर्षों से बंद था।
आरव ने कहा, शायद आज किसी ने इसे खोला है।
दोनों अंदर चले गए.
हवेली के भीतर अंधेरा था.
दीवारों पर धूल जमी हुई थी.
छत से पुराने झूमर लटक रहे थे.
फर्श पर जगह- जगह लकडी के टूटे हुए टुकडे पडे थे.
लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के अंदर किसी पुराने इत्र जैसी खुशबू आ रही थी.
मानो यहां कोई अभी भी रहता हो.
आरव ने टॉर्च आगे की तरफ की.
सामने एक लंबा गलियारा था.
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे.
मीरा एक चित्र के सामने रुक गई.
उस चित्र में एक आदमी बना था.
उसकी आंखें काली थीं.
नीचे लिखा था.
रुद्रदेव।
आरव उसके पास गया.
यही है।
मीरा ने पूछा, क्या?
मेरे दादा ने इसी आदमी की कहानी सुनाई थी।
दोनों चित्र को देखने लगे.
अचानक चित्र की आंखों से चांदी की एक बूंद नीचे गिरी.
मीरा पीछे हट गई.
आरव।
आरव ने चित्र को देखा.
चित्र के नीचे फर्श पर एक छोटा सा निशान चमक रहा था.
वही निशान जो चिट्ठी पर बना था.
एक आंख और सात सितारे.
आरव ने जैसे ही उस निशान को छुआ, पूरी हवेली में तेज हवा चलने लगी.
दरवाजे अपने आप बंद होने लगे.
धडाम.
धडाम.
धडाम.
मीरा ने पीछे मुडकर देखा.
मुख्य दरवाजा बंद हो चुका था.
उसने उसे खोलने की कोशिश की.
दरवाजा नहीं खुला.
आरव, हम अंदर फंस गए हैं।
आरव ने कोई जवाब नहीं दिया.
उसकी नजर सामने की दीवार पर थी.
वहां पहले कुछ नहीं लिखा था.
लेकिन अब धीरे- धीरे चांदी के अक्षर उभर रहे थे.
सौ साल पहले जो शुरू हुआ था, वह आज पूरा होगा।
फिर दूसरी पंक्ति आई.
खून ने रास्ता खोला है।
आरव का चेहरा गंभीर हो गया.
खून?
मीरा ने उसकी तरफ देखा.
इसका क्या मतलब है?
तभी हवेली के भीतर से किसी बच्चे के हंसने की आवाज आई.
दोनों जम गए.
आवाज ऊपर की मंजिल से आई थी.
फिर किसी महिला की धीमी आवाज सुनाई दी.
उसे ऊपर लाओ।
आरव ने पूछा, कौन है?
कोई जवाब नहीं आया.
कुछ पल बाद ऊपर जाने वाली सीढियों पर एक- एक करके मोमबत्तियां जलने लगीं.
एक.
दो.
तीन.
फिर पूरी सीढी रोशनी से भर गई.
मीरा ने आरव का हाथ पकड लिया.
हमें यहां से जाना चाहिए।
आरव ने कहा, अब शायद बहुत देर हो चुकी है।
उसने जेब से चिट्ठी निकाली.
कागज पर अब सिर्फ एक वाक्य लिखा था.
ऊपर जाओ. तुम्हारे परिवार का पहला रहस्य वहीं इंतजार कर रहा है।
आरव ने चिट्ठी को देखा.
फिर सीढियों की तरफ देखा.
वह धीरे- धीरे ऊपर बढने लगा.
मीरा उसके पीछे चल रही थी.
हर सीढी पर कदम रखते ही हवेली के भीतर किसी अनजान भाषा में फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी.
ऊपर पहुंचकर उन्हें एक बडा कमरा दिखाई दिया.
कमरे के बीच में एक पुरानी मेज रखी थी.
मेज पर एक किताब थी.
उस किताब के ऊपर लिखा था.
रुद्र वंश का इतिहास।
आरव ने किताब उठाई.
पहला पन्ना खोला.
उस पर उसके परिवार का नाम लिखा था.
आरव की सांस रुक गई.
उसने अगला पन्ना पलटा.
वहां उसके दादा का नाम था.
फिर उसके पिता का.
फिर उसका अपना नाम.
लेकिन उसके नाम के नीचे एक और नाम लिखा था.
आरव, अंतिम द्वार का रक्षक।
मीरा ने हैरानी से पूछा, यह क्या है?
आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले किताब के आखिरी पन्ने अपने आप पलटने लगे.
फिर एक पन्ने पर जाकर रुक गए.
उस पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था.
जब चिट्ठी पहुंचेगी, मायालोक का द्वार खुलेगा।
अचानक कमरे की दीवार के पीछे से तेज आवाज आई.
ऐसा लगा जैसे किसी विशाल पत्थर का दरवाजा खुल रहा हो.
फर्श कांपने लगा.
मेज पर रखी चिट्ठी हवा में उठ गई.
उसकी चांदी की स्याही इतनी तेज चमकी कि पूरा कमरा रोशनी से भर गया.
आरव और मीरा ने आंखें बंद कर लीं.
जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो उनके सामने की दीवार गायब हो चुकी थी.
उसकी जगह एक विशाल चमकता हुआ द्वार दिखाई दे रहा था.
द्वार के उस पार कोई दूसरी दुनिया थी.
आसमान बैंगनी रंग का था.
पेड हवा के बिना हिल रहे थे.
दूर पहाडों के ऊपर नीली रोशनी तैर रही थी.
और हवा में अनजान आवाजें गूंज रही थीं.
मीरा ने कांपती आवाज में कहा, यह जगह हमारी दुनिया में नहीं है।
आरव ने धीरे से कहा, मायालोक।
तभी द्वार के उस पार से किसी ने उन्हें पुकारा.
आरव।
वही बूढी आवाज.
आरव ने द्वार की ओर देखा.
धुंध के बीच एक लंबी परछाईं खडी थी.
उसके हाथ में बिल्कुल वैसी ही चिट्ठी थी, जैसी आरव के हाथ में थी.
परछाईं ने कहा, सौ साल से मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था।
आरव ने पूछा, तुम कौन हो?
परछाईं कुछ कदम आगे बढी.
लेकिन उसका चेहरा अब भी अंधेरे में छिपा था.
उसने कहा, जिसने तुम्हारे पूर्वजों से एक वादा किया था।
आरव ने पूछा, कैसा वादा?
परछाईं ने जवाब दिया.
मायालोक का द्वार बंद रखने का।
आरव ने चिट्ठी को कसकर पकड लिया.
फिर इसे खोला क्यों गया?
परछाईं कुछ पल चुप रही.
फिर उसने कहा.
क्योंकि तुम्हारे परिवार ने अपना वादा तोड दिया था।
अचानक उसके पीछे का आसमान लाल हो गया.
दूर कहीं एक विशाल घंटी बजी.
धडाम.
परछाईं ने आखिरी बार कहा.
अब मायालोक जाग चुका है।
और उसी क्षण चिट्ठी पर एक आखिरी पंक्ति उभरी.
आरव, तुम्हारे पास केवल सात रातें हैं।
चिट्ठी की चांदी जैसी रोशनी बुझ गई.
द्वार के उस पार अंधेरा छा गया.
और आरव समझ गया कि जिस रहस्य को वह एक पुरानी चिट्ठी समझकर अपने कमरे में लेकर आया था, वह दरअसल सौ साल पुराने एक ऐसे रहस्य की शुरुआत थी, जिसका संबंध उसके अपने परिवार से था.
लेकिन उसे अभी यह नहीं पता था कि उन सात रातों के बाद क्या होने वाला था.
और सबसे बडा सवाल अब भी अनसुलझा था.
वह चिट्ठी आखिर किसने लिखी थी?
किसके लिए लिखी गई थी?
और सौ साल तक उसे रोका क्यों गया था?