Episode-8
सही समय- बस एक भ्रम।
नमस्कार दोस्तों! स्वागत है, आप सभी का मातृभारती के इस प्लेटफॉर्म पर।
इस सीरीज़ के एक बेहद अनोखे और आपके होश उड़ा देने वाले सफ़र में। मैं हूँ आपका दोस्त... धर्मेंद्र कुमार।
तो चलिए, आपको ले चलते है 'घुमक्कड़ जिज्ञासा' के अगले पड़ाव पर...
अपनी आँखें खोलिए, अपने दिमाग की खिड़कियों को साफ़ कीजिए और मेरे साथ चलिए एक ऐसी खोई हुई दृष्टि की खोज में, जो हमारे अपने ही घर में सदियों से हमारा इंतजार कर रही है! आज पेश है हमारी इस नई सीरीज़ का बेहद धमाकेदार—एपिसोड!।
हम सबने अपनी जिंदगी में कभी न कभी, किसी न किसी मोड़ पर यह वाक्य जरूर कहा है या अपनों से सुना है—कि "यार, अभी सही समय नहीं है। जरा लाइफ में थोड़ा सेटल हो जाएँ, फिर घूमने निकलेंगे।"
एक बार बच्चे थोड़े बड़े हो जाएँ, फिर देखेंगे।
अभी ऑफिस में काम का बहुत प्रेशर है, यह प्रोजेक्ट ख़त्म हो जाए, फिर!
और सच मानिए, इस "फिर" के चक्कर में न जाने कितनी ही मासूम जिज्ञासाएँ, कितने ही खूबसूरत सपने हमारे भीतर चुपचाप दम तोड़ देते हैं।
हम इंसान हमेशा एक ऐसे 'परफेक्ट टाइम' का इंतजार करते रहते हैं जो शायद कैलेंडर में कभी आता ही नहीं।
हम भूल जाते हैं कि समय कोई रेलवे स्टेशन नहीं है जहाँ कोई ट्रेन आकर रुकेगी और हमारा इंतजार करेगी; समय तो एक बहती हुई नदी की तरह है, जो बस लगातार बह रहा है।
और जो इंसान सिर्फ किनारे बैठकर सही समय का इंतजार करता रहता है, वह अक्सर जिंदगी की दौड़ में बहुत पीछे छूट जाता है।
यात्रा का सबसे पहला और बुनियादी सबक यही है—चलना शुरू करना, सोचने से कहीं ज्यादा जरूरी है।
यहाँ हमें अपने दिमाग के दो अलग-अलग तौर-तरीकों को समझना होगा:
एक है Waiting Mindset (इंतजार करने वाली सोच)
और दूसरा है Curious Action (जिज्ञासा से भरा कदम)। Waiting Mindset हमसे हमेशा कहता है:
जब सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट हो जाएगा, बैंक बैलेंस एकदम मनमुताबिक होगा, ऑफिस से लंबी छुट्टियां मिलेंगी और मौसम भी शानदार होगा, तब हम अपनी यात्रा शुरू करेंगे।
वहीं दूसरी तरफ, Curious Action कहता है: चलो, अभी जो भी स्थिति है, उसी में कदम आगे बढाते हैं; जो भी मुश्किलें आएंगी या जो भी नया अनुभव होगा, उसे रास्ते में ही सीख लेंगे।
याद रखिए, दुनिया की हर सच्ची और यादगार यात्रा हमेशा कैलेंडर देखकर नहीं, बल्कि इसी 'Curious Action' से शुरू होती है।
जब हमारी किताबी बातें हमारे वास्तविक जीवन के सफर के अनुभवों से मिलती हैं, तब इस भ्रम का पर्दा पूरी तरह उठ जाता है।
उदाहरण के लिए, हमने स्कूल की किताबों में पढ़ा था कि पृथ्वी गोल है! यह हमारे लिए सिर्फ एक भौगोलिक तथ्य था, जिसे हमने रट लिया था। लेकिन जब आप इस 'इंतजार वाले माइंडसेट' को तोड़कर किसी हवाई जहाज में बैठते हैं और वह जहाज ऊँचाई पर जाता है, तब खिडकी से बाहर देखने पर आपको धरती की वह वक्रता धीरे-धीरे अपनी आँखों से साफ दिखने लगती है।
उस पल आपकी रूह महसूस करती है कि जो कल तक किताब में सिर्फ़ एक सूखा हुआ तथ्य था, वह आज आपका एक जीवंत अनुभव बन चुका है।
कई लोगों के दिमाग में यह गलतफहमी बैठी होती है कि यात्रा का मतलब सिर्फ कोई बहुत बडा इंटरनेशनल ट्रिप या महीनों लंबा कोई सफर ही होता है।
लेकिन 'घुमक्कड जिज्ञासा' किसी बड़े बजट या लंबी छुट्टियों की मोहताज नहीं है; यह एक छोटे से सफर से भी आपके भीतर उतनी ही गहराई से जाग सकती है।
आपके घर के पास का कोई छोटा सा जंगल, किसी शांत नदी का किनारा, या आपके ही शहर का कोई पुराना ऐतिहासिक स्मारक—ये सब एक बहुत बड़ी आंतरिक शुरुआत हो सकते हैं।
एक और किताबी उदाहरण लीजिए। हमने किताबों में पढ़ा कि "पानी हमेशा नीचे की ओर बहता है!
लेकिन जब आप पहाडों की यात्रा पर निकलते हैं और वहाँ नदियों को पत्थरों और चट्टानों के बीच से टेढ़े-मेढ़े (zig- zag) रास्तों से बहते हुए देखते हैं, तब आपको समझ आता है कि प्रकृति कभी भी सबसे छोटा रास्ता (shortest path) नहीं चुनती, बल्कि वह हमेशा सबसे सुरक्षित रास्ता (safest path) चुनती है।
इस अनुभव से जो सीख मिलती है, वह जिंदगी का एक बहुत बडा दर्शन बन जाती है कि हमारी असल जिंदगी में भी सीधे और आसान दिखने वाले रास्ते हमेशा सही नहीं होते;
कभी-कभी घुमावदार और संघर्षों से भरे रास्ते ही हमें सही मंजिल तक पहुँचाते हैं।
यह जो "एक दिन" का जुमला है न, यह हमारे जीवन का सबसे खतरनाक और धोखेबाज वाक्य है। हम अक्सर कहते हैं—एक दिन मैं भी वहाँ जाऊँगा। एक दिन मैं भी यह काम करूँगा।
लेकिन हकीकत यह है कि यह "एक दिन" कैलेंडर के किसी भी महीने में मौजूद नहीं होता। यात्रा हमें बहुत कड़ाई से सिखाती है कि अगर जिज्ञासा आज जगी है, मन में कुछ नया देखने की तड़प आज उठी है, तो पहला कदम भी आज और इसी वक्त उठना चाहिए।
जैसे हमने विज्ञान में हवा के दबाव की परिभाषाएं रटी थीं। लेकिन जब आप किसी पहाड़ी घाटी में पैराग्लाइडिंग के लिए खडे होते हैं और उड़ते समय हवा की वह ऊपर उठाने वाली ताकत आपके पूरे शरीर को थाम लेती है, तब वह सिर्फ एक किताबी परिभाषा नहीं रह जाती।
वह आपके रोम-रोम में महसूस होती है। विज्ञान तब तक आपके दिमाग पर बोझ रहेगा जब तक उसमें आपका शरीर और आपका वास्तविक अनुभव शामिल नहीं हो जाता।
अपने बच्चों के लिए भी माता-पिता को यही सबसे जरूरी सबक सिखाना होगा। अगर हमारे बच्चे बचपन में ही यह सीख लें कि असली सीखना स्कूल की चहारदीवारी और किताबों के दायरे से कहीं बाहर भी होता है, तो वे कभी भी जिंदगी में नए सवाल पूछने से नहीं डरेंगे।
और अगर हम बड़े इस बात को समझ लें, तो हम अपनी ढलती उम्र का बहाना बनाकर "अब बहुत देर हो गई है" कहना हमेशा के लिए छोड़ देंगे।
चलते-चलते मैं आपके और आपके परिवार के लिए एक बहुत ही छोटा और प्यारा सा अभ्यास छोड रहा हूँ।
अगली बार जब भी आपका मन किसी नए सफर पर जाने का विचार करे और आपका दिमाग तुरंत कोई बहाना बनाकर कहे कि "अभी सही समय नहीं है" तो जरा रुकिए और अपने दिल पर हाथ रखकर खुद से बस एक सवाल पूछिए—
"क्या मेरे भीतर की घुमक्कड़ जिज्ञासा अभी जीवित है? अगर आपके अंदर से आवाज आए "हाँ" तो समझ लीजिए कि वही पल आपके जीवन का सबसे सही और परफेक्ट समय है।
इस पूरे अध्याय का निचोड़ यही है कि 'सही समय' कैलेंडर की कोई तारीख या शुभ मुहूर्त नहीं है। सही समय वह अनमोल क्षण है जब आप अपनी जिज्ञासा को टालना बंद कर देते हैं।
यात्रा हमें कभी भी हाथ पर हाथ धरकर इंतजार करना नहीं सिखाती; यात्रा तो हमें हर हाल में पहला कदम उठाना सिखाती है। इसलिए इंतजार छोड़िए, आज पहले से ही मौजूद है; अपनी जिज्ञासा के साथ कदम आगे बढाइए!
मिलते हैं घुमक्कड़ जिज्ञासा के इस सीरीज़ के अगले एपिसोड में, तब तक के लिए पढ़ते रहिये अपने यात्री साथी को, सिर्फ़ और सिर्फ़ "मातृभारती ऐप और वेबसाइट पर!"
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